Thursday, March 30, 2006

नमक

यूँ चखा हमने बहुत दुनिया के स्वादों का नमक
है ज़माने से अलग माँ की मुरादों का नमक

तू परिन्दा है तिरी परवाज़ ना दम तोड़ दे
लग गया ग़र शाहज़ादों के लबादों का नमक

आँसुओं की शक़्ल ले लेंगी तड़प और सिसकियाँ
दिल के छालों पर जो गिर जाएगा यादों का नमक

दावतें धोखे की हरगिज़ हो न पाएंगीं लज़ीज़
ग़र न होगा उनमें कुछ यारों के वादों का नमक

दिल की धरती पर अमन के फूल महकेंगे नहीं
जम गया मिट्टी पे ग़र क़ातिल इरादों का नमक

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, March 16, 2006

विवशता

चुप-चुप देखती थीं राधिका कन्हैया जी को
हौले-हौले उठ रहे शोर से विवश थी
साँवरे के पास खींच लाती थी जो बार-बार
प्रीत की अनोखी उस डोर से विवश थी
इत होरी की उमंग, उत दुनिया से तंग
फागुन में गोरी चहुँ ओर से विवश थी
लोक-लाज तज भगी चली आई गोकुल में
मनवा में उठती हिलोर से विवश थी

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, March 14, 2006

फागुन की शाम

फागुन की शाम कैसी हवा चली हाय राम
जोगियों का दिल धक-धक करने लगा
सारी सोच बूझ घास-फूस सी बिखर गई
मन को खुमार चकमक करने लगा
पीपल का पेड़ सारे पंछियों के संग मिल
झूम-झूम मार बक-बक करने लगा
और चुपचाप मेरा मानस भी हौले-हौले
प्रेम के मृदंग पे धमक करने लगा

✍️ चिराग़ जैन

Monday, March 13, 2006

हम हाथ मल रहे हैं

हमको हमारे ऐसे हालात खल रहे हैं
रग-रग में बेक़ली के सागर मचल रहे है
उनकी झिझक ने इतना लाचार कर दिया है
सब हाथ में है फिर भी, हम हाथ मल रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, March 11, 2006

संबंधों की साँस उखड़ने लगती है


जब बेटी की उम्र ज़रा रफ़्तार पकड़ने लगती है
तब माँ हर आते-जाते की नज़रें पढ़ने लगती है

जब मन की कच्ची मिट्टी कुछ सपने गढ़ने लगती है
तब ज़िम्मेदारी की भारी बारिश पड़ने लगती है

यूँ तो वो अपनी हर ज़िद्द मनवा ही लेता है मुझसे
लेकिन मेरे भीतर-भीतर नफ़रत बढ़ने लगती है

प्यार अगर सच्चा हो तो हल हो जाती है हर मुश्क़िल
ख़ुदगर्ज़ी से संबंधों की साँस उखड़ने लगती है

मजबूरी भी बिल्कुल ज़िद्दी बच्चों जैसी होती है
ज़्यादा अगर तवज़्ज़ो दो तो सिर पर चढ़ने लगती है

पहले तो वो मुझसे केवल ख़ुशियाँ बाँटा करती थी
अब अपनी हर ग़लती भी मेरे सर मँढ़ने लगती है

महफ़िल में वो आती है तो मुझे ढूंढती है पहले
और फिर अपने मोबाइल के मैसिज पढ़ने लगती है

✍️ चिराग़ जैन