Friday, January 31, 2020

प्रमोद तिवारी

कितना बोलते थे प्रमोद जी। नॉन स्टॉप। सुननेवाले का सिर दुःखने लगता था लेकिन बोलते-बोलते उनका मुँह नहीं दुःखता था। और अब ऐसी चुप्पी धार ली है कि साँसों तक की आवाज़ नहीं आ रही। एक-एक मंज़र आँखों के सामने तैर रहा है। लालकिले की वीडियो यूट्यूब पर डलवाने के लिए उनकी बेचैनी और मेरी लापरवाही की जुगलबंदी से जो गालियाँ निर्मित हुईं, उनकी मिठास मुझे अभी तक जस की तस याद है। और वह वीडियो अपलोड करने के बाद जब मैंने उनके लेखन पर लेख लिखा तो उनका अपनत्व, फोन पर मुझे डेढ़ घंटे तक झेलना पड़ा था। सिंगरौली यात्रा में बनारस से सिंगरौली तक अनवरत प्रवचन, आगरा में तेज भाई, संपत जी और रमेश भाई के सम्मुख मेरे गीतों की प्रशंसा का क्रम शुरू किया तो कार्यक्रम में विलम्ब हो जाने की क़ीमत पर भी उसे समाप्त करने को राज़ी न हुए। और पिछली 1 मार्च को दिल्ली के बीएसएफ ग्राउंड में मुरादाबादी दाल के चटखारे लेते हुए एक आँख मीचकर हौले से प्रशंसात्मक सवाल -‘क्या खाए हो गुरु, रोज़ ही लपक के गीत प गीत पेले जा रहे हो। ये वरदान है, जब तक मिल्ला है लपकते रहो। जब मिलना बंद हो जाएगा तो हमाई तरह फक्खड़ हो जाओगे।’
पहेली सी बूझ रहा हूँ कि मैं अपने साथ उनके इस अंतिम संवाद को आशीर्वाद मानूँ, सुझाव मानूँ या चेतावनी ...काश उस ही रात उनसे पूछ लेता। उनकी यादें अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के साथ जीवन की पूंजी बन गई हैं।
अपने कवि होने पर उन्हें अहंकार बिल्कुल नहीं था, लेकिन ठसक पूरी थी। मूलतः पत्रकारिता से जुड़े रहे इसलिए उनके आँख, नाक, कान हमेशा तैनात रहते थे। ज़िन्दगी की किताब के इतने पृष्ठ पलट चुके थे कि अपने अनुभव साझा करते हुए वे कभी थकते ही नहीं थे।
मंचीय जोड़-तोड़ से वे अक्सर खिन्न रहा करते थे लेकिन उनकी प्रस्तुति और मंच पर उनकी धमक से यह खिन्नता कभी अनर्गल नहीं लगती थी। नॉन-स्टॉप बोलने में उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था। किसी यात्रा में यदि उन्हें ड्राइवर के साथ न बैठने को मिले तो वे पूरी यात्रा के दौरान आगे की दोनों सीटों के बीच ही स्थापित रहते थे ताकि संवाद की सम्प्रेषणीयता में कोई बाधा न आ सके।
किसी के व्यक्तिगत जीवन में झाँकना उन्हें बहुत पसंद नहीं था लेकिन मंचीय व्यवहार की कोई भी हरक़त उनकी नज़र से बच नहीं सकती थी। मन को भरपूर जीनेवाले प्रमोद तिवारी जी हिंदी कवि सम्मेलनीय जगत् में गीत का एक अनोखा तेवर स्थापित कर गए हैं।
आज भी जब कोई नया साधक उनके बिंब-विधान और उनकी मस्ती को गीत में साधने का प्रयास करता है तो भीतर से आवाज़ आती है कि कानपुर-लखनऊ हाइवे पर घटी दुर्घटना में उस सुबह केवल उनका शरीर ध्वस्त हुआ था, उनका मन आज भी गीत रच रहे बालकों को डपटकर बोलता है- ‘मस्ती भरे गीत लिखो बे!’

-चिराग़ जैन

Thursday, January 30, 2020

लोकतंत्र का बकासुर

यह लोकतंत्र का सौंदर्य है कि जिस प्रदेश में चुनाव होते हैं, पूरे देश की चिंताएँ और चिंतन उसी प्रदेश पर केंद्रित हो जाते हैं। बाक़ी पूरे देश में सब कुछ अपने आप ठीक चल रहा होता है।
हमारे संविधान निर्माताओं ने कितनी दूरदर्शिता के साथ यह व्यवस्था की होगी कि देश के तमाम खुराफ़ाती मस्तिष्कों से देश को बचाए रखने के लिए एक बार में किसी एक प्रदेश की भेंट दे दी जाए। यूँ भी गाँव को बकासुर के आतंक से बचाने के लिए स्वतः ही एक व्यक्ति को बकासुर की भेंट चढ़ा देने के क़िस्से हमें सुनाए गए हैं। शोले में गब्बर सिंह जी ने भी यही समझाया था कि - ‘राजनीति के प्रकोप से हमें अगर कोई बचा सकता है तो वह स्वयं राजनीति ही है। अगर इसके बदले में राजनीति एक बार में एक प्रदेश को तहस-नहस कर देती है तो इसमें क्या बुराई है!’
हमारा लोकतंत्र देश के एक प्रदेश को छकड़े पर लादकर बकासुर के द्वार तक पहुँचा देता है। राजनीति प्रदेश का शिकार करने से पहले उसके साथ किलोल करती है। हम इस किलोल में बकासुर की सहृदयता, देशभक्ति, जनहित-भावना, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा ढूंढने लगते हैं। देर तक बकासुर हमें दौड़ाते रहते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम वह भेंट है जिसे कच्चा चबाकर यह असुर अपना पेट भरेगा। जब हम यह बात पूरी तरह भूल जाते हैं तब मुस्कुराते हुए बकासुर ठहाका लगाते हैं, हम कालिया और उसके साथियों की तरह ठहाके में डूब जाते हैं, पूरे वातावरण में शिकार और शिकारी के ठहाके गूंजने लगते हैं और फिर ठांय-ठांय-ठांय की आवाज़ के साथ सिनेमाघर में सन्नाटा पसर जाता है और बकासुर अगली भेंट के स्वागत में खर्राटों का स्वागत-गान गाने लगता है।
बकासुर कहते हैं ‘शू गाय’; हम गाय बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू लिंगायत’; हम धर्म बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू धर्मनिरपेक्षता’; हम मानवता बचाने दौड़ पड़ते हैं। ‘शू सीएए’; ‘शू जनलोकपाल’; ‘शू शाहीन बाग़’; ‘शू पैट्रोल के दाम’; ‘शू प्याज़’; ‘शू चौकीदार’; ‘शू पप्पू’; ‘शू मफ़लर’; ‘शू चायवाला’; ‘शू खाँसी’; ‘शू सीलिंग’; ‘शू पद्मावत’; ‘शू पटेल आरक्षण’; ‘शू जाट आरक्षण’; ‘शू गुर्जर आरक्षण’; ‘शू जीएसटी’; ‘शू बिहारी’; ‘शू पंद्रह लाख’; ‘शू हिन्दू राष्ट्र’; ‘शू गांधी’; ‘शू गोडसे’; ‘शू सावरकर’; ‘शू पटेल’... सरदार बोलता है और हम भागने लगते हैं। हमें लगता है सरदार खुश होगा, शाबासी देगा! लेकिन सरदार ठाने बैठा है कि उसने हमें कहाँ पहुँचाना है। सरदार जानता है कि जो डर गया वो मर गया। इसलिए सरदार हिंदुओ को बताता है कि मुसलमान तुम्हें मार देंगे। मुसलमानों को समझाता है कि हिन्दू तुम्हें भगा देंगे। सरदार कालिया को बताता है कि पद्मावती रिलीज़ हो गई तो संस्कृति का सत्यानाश हो जाएगा। कालिया पद्मावती की रिलीज़ रोकने के लिए जान दे देता है। कालिया के मरते ही सरदार पद्मावती को पद्मावत बनाकर रिलीज़ करवा देता है।
हर बकासुर अपने शिकार को बताता है कि फलां पार्टी का बकासुर शिकार की एक-एक उंगली को तोड़-तोड़ कर खाता है। मैं इतना निर्मम नहीं हूँ कि अपने शिकार को दस बार अलग-अलग नोचूँ। मैं एक ही बार में पूरी बाँह उखाड़ कर चबा जाता हूँ। इतनी करुणा देख हमारी आँखें भीग जाती हैं और हम ख़ुशी-ख़ुशी अपनी बाँह आगे बढ़ा देते हैं ताकि करुणा का यह पुंज हमारी बोटियाँ नोचकर, हमें उंगलियाँ चबानेवाले बकासुर से बचा ले!

© चिराग़ जैन

वसंतोत्सव

सृष्टि के समस्त सर्जकों को सृजन की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती का अनवरत आशीष मिले!

वसंत की पहली दस्तक और सरस्वती पूजन के पर्व का सुयोग इस बात का द्योतक है कि सौंदर्य और सकारात्मकता ही सृजन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं।

प्रकृति पर आच्छादित वासंती रंग की सुवास श्वास के साथ घुलकर मन को स्वस्थ करे ताकि सृजन का मानस स्वस्थ हो और तूलिका, लेखनी, वाद्य, कण्ठ, अंगुलियाँ, हथेलियां और ओष्ठ सब कुछ सकारात्मक हो उठे!

बाँस को बाँसुरी न बनाया गया तो वह या तो हथियार बन जाएगा या ज्वाला को जन्म देगा!

-चिराग़ जैन

Wednesday, January 29, 2020

बहुत टॉप रमेश मुस्कान

ज़िन्दगी जीने के एक रवैये का नाम है - 'रमेश मुस्कान'! आडम्बर, झूठ, परिश्रम, महत्वाकांक्षा और औपचारिकता से रहित एक सहज, प्रसन्न, उन्मुक्त और संतुष्ट जीवन का सटीक उदाहरण है रमेश मुस्कान का जीवन।
मंच पर जमने और कविता लिखने की कला किसी से भी सीखी जा सकती है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी तनाव से मुक्त रहने की स्थितप्रज्ञता सिखाने के लिए रमेश मुस्कान के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति मेरे आसपास नहीं है।
दृष्टि इतनी तेज़ कि सामने वाले की आँखों में यदि एक पल के लिए भी कोई रंग उतरा हो तो वह अनदेखा नहीं रह सकता। कान इतने तेज़ कि बात करने वाले के शब्दों की सरसराहट में छिपे हुए भाव की आहट भी सुन लें। आकलन इतना स्पष्ट कि उठने के अंदाज़ से किसी के गिरने की अवस्था भाँप लें और अन्वेषण इतना ईमानदार कि जो व्यक्ति अभी-अभी हानि पहुँचा कर गया हो उसके वार की भी प्रशंसा करने से न चूकें।
एक व्यक्ति के रूप में बेहद शानदार और एक कवि के रूप में उतने ही आलसी। शब्द चयन और अन्वेषण की विलक्षण क्षमताओं को देखते हुए अनेक नक्षत्रों ने ठहर कर इनके किसी परिधि पर आने की प्रतीक्षा की, लेकिन पूरी आकाशगंगा चक्कर खाती फिर रही है कि कोई ध्रुवतारा रंचमात्र भी हिले बिना कैसे प्रकाशमान रह पाता है!
जब कोई शुभचिंतक इनके लाभ के लिए इनके श्रमरूप का दर्शन करने की प्रतीक्षा करने लगता है तो ये और अधिक स्थिर होकर उस शुभचिंतक के थक जाने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। इतिहास साक्षी है कि प्रतीक्षाओं की इस स्पर्धा में आज तक रमेश मुस्कान विजयस्थल से टस-से-मस नहीं हुए हैं।
पर्यटन और बतरस उनके प्रिय चाव हैं। यदि पर्यटन का लोभ न होता तो कदाचित इनकी लेखनी से हिंदी साहित्य के हाथ उतना भी ख़ज़ाना न लगा होता, जितने लिखे को ये महाशय बहुत माने बैठे हैं। बतरस में निश्चित ही इनका कोई विकल्प नहीं है, लेकिन माइक के समक्ष ये एकदम सीरियस हो जाते हैं और माइक के विकिरण से अपनी रक्षार्थ शीघ्रातिशीघ्र अपने आसन पर आ विराजते हैं। माइक से दूर होते ही मंच पर इनकी प्रत्युत्पन्नमति पुनः बांबी में से बाहर निकल आती है।
चूँकि लाभ और रमेश मुस्कान के मध्य आलस्य की एक गहरी खाई है, अतएव सत्य बोलते हुए इन्हें कभी डर नहीं लगता। ये जानते हैं कि कोई चाहकर भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि इस कार्य के लिए ये पूर्णतया आत्मनिर्भर हैं।
इतने सब के बावजूद एक सत्य अकाट्य है कि जिसके पास रमेश मुस्कान जैसा दोस्त हो वह कभी असफल नहीं हो सकता क्योंकि असफल होने के सारे रास्ते रमेश मुस्कान जानते हैं और अपने दोस्तों को कभी उन रास्तों पर जाने नहीं देते।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, January 28, 2020

सफ़र

आगे बढ़ने वाला हर पैर अपने ही दूसरे पैर को पीछे छोड़ता है। अगर पीछे वाला पैर स्वयं आगे आने की बजाय दूसरे पैर की निंदा में लग जाएगा तो सफ़र वहीं रुक जाएगा।

© चिराग़ जैन

Friday, January 24, 2020

हो रही है थकान पानी को

किसलिए है गुमान पानी को
मारता है उफ़ान, पानी को

कुछ नमी हो तो घर हुआ जाए
ढूंढता है मकान पानी को

चैन से बैठती नहीं लहरें
हो रही है थकान पानी को

रेत में दफ़्न हो गया क़तरा
देने निकला था जान पानी को

सबके अंदर का सच बयां होगा
मिल गई गर ज़ुबान पानी को

© चिराग़ जैन

देश का भला

"भाई! देश का भला कब होगा?"
"जब आपके वोट से हम चुनाव जीतेंगे।"

"भैया जी! चुनाव में जीत मुबारक़ हो। अब देश का भला कीजिये!"
"अभी तो जीते हैं यार। चुनावों में रात-दिन काम किया है। साँस तो ले लें।"

"सर जी! आपको चुनाव जीते एक साल हो गया, अब देश का भला कीजिये।"
"विपक्ष ने हमारा जीना मुहाल कर रखा है। रोज़ सरकार के कामकाज पर हंगामा हो रहा है। इनसे निबटना पड़ेगा, तब देश का भला करेंगे।"

"जनाब! सरकार बने दो साल हो गए, अब तो देश...!"
"अरे यार तुम तो पीछे ही पड़ गए। सरकार के पास बहुत काम हैं। इतनी सारी समितियां हैं, इतने सारे विभाग हैं, इतने सारे अफसर हैं। इनसे फुर्सत मिले तब तो कुछ करें।"

"सरकार, तीन साल बीत गए। महंगाई बढ़ रही है, सड़कें टूट रही हैं, ग़रीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, अपराध से जनता त्रस्त है।"
"तुम बार-बार यहाँ क्यों चले आते हो। अपने गिरेबान में झाँको। सरकार सड़कें बनवाती है, तुम उन्हें तोड़ देते हो। सरकार कहाँ तक करेगी। तुम लोग इस लायक हो ही नहीं कि तुम्हारे लिए कुछ किया जाए। जाओ पहले समाज को जागरूक करो, हर बार मुँह उठा कर सरकार के पास मत आया करो।"

"माई-बाप! एक साल रह गया है आपकी सरकार का। जनता आपसे नाराज़ है। लोगों में ग़ुस्सा है कि आपने जनता के लिए कोई काम नहीं किया।"
"ये सब हमारे ख़िलाफ़ विपक्ष का षड्यंत्र है। हमारी अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। दफ़्तरों में भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है। चारों तरफ़ ख़ुशहाली है। ग़रीब आदमी सुखी हो गया है। पूरी दुनिया में हमारे नाम का डंका बज रहा है। और आप कहते हैं कि सरकार ने काम नहीं किया। यह विपक्ष का फैलाया हुआ भ्रम है।"

"हाँ भई! अब क्यों आए हो? हम तुम्हें वोट नहीं देंगे।"
"आप हमारी विचारधारा के मजबूत स्तम्भ हैं। आप हमसे नाराज़ हो गए तो देश ग़लत हाथों में चला जाएगा। हम आपसे वादा करते हैं कि आपकी सारी शिकायतें दूर कर देंगे।"
"रहने दीजिए, ऐसे वादे आपने पिछली बार भी किये थे।"
"तो ठीक है। दे दीजिए उन लोगों को वोट जो हमारी जाति के विरोधी हैं। बैठा दीजिये उन्हें कुर्सी पर जो हमारे धर्म के दुश्मन हैं। होने दीजिए देश को ग़ुलाम। आप देश की हानि से पहले अपने स्वार्थ की सोचते हैं। हमें शर्म आती है कि आप जैसे लोगों के लिए हमारे महापुरुषों ने अपने प्राण दिए।"
नेताजी की लताड़ सुनकर वोटर शर्मिंदा हो गया और चुपचाप गर्दन नीचे करके वोट और देश नेताजी के हाथों में दे आया ।

© चिराग़ जैन

Wednesday, January 8, 2020

घने जंगल की एक शाम

तंज़ानिया की राजधानी दार-एस-सलाम में शानदार कवि-सम्मेलन सम्पन्न हो चुका था। वहाँ बसे भारतीयों का अपनत्व हमें सहज कर चुका था। यद्यपि इस यात्रा में पाठक जी हमारे मुख्य आयोजक थे लेकिन वहाँ बसे शेष भारतीयों ने भी हमें अकेलापन महसूस नहीं होने दिया।
एक सप्ताह में बेहद खूबसूरत पल जीने को मिले। आयोजकों का अपनत्व, हिंदी के प्रति डी एन पाठक जी का समर्पण, जितेंद्र भारद्वाज का कवि प्रेम, अजय गोयल और शिवि पाठक की काव्य प्रतिभा, पारुल जी की आवाज़, तंज़ानिया में भारत के राजदूत श्री संजीव कोहली जी की सहजता और स्वामी विवेकानन्द सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक संतोष जी की सरलता।
तंज़ानिया स्थित स्वामी विवेकानन्द सांस्कृतिक केंद्र में सविता मौर्या नामक एक महिला तंज़ानिया के स्थानीय बच्चों को हिंदी सिखाती हैं। सविता जी को यदि तंज़ानिया में हिंदी की मदर टेरेसा कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। वे अन्य प्रवासी भारतीयों की तरह अपनी आजीविका और घर-गृहस्थी में व्यस्त हैं, किन्तु इस सब व्यस्तता से बचे सप्ताहांत को वे हिंदी की खेती में उपयोग करती हैं। अनेक वर्ष से यह कार्य अनवरत जारी है। इसके परिणामस्वरूप वहाँ हिंदी बोलने, समझने, लिखने और पढ़ने वाले तंज़ानियन बच्चों का एक समूह तैयार हो गया है। इस महती कार्य को करने वाली सविता जी यह सब अवैतनिक रूप से करती हैं। हाँ, बच्चों के आने-जाने के लिए बस के किराये की व्यवस्था वहाँ के प्रवासियों की श्स्वर्णगंगाश् नामक संस्था करती है और कक्षाओं के लिए स्थान की व्यवस्था स्वामी विवेकानन्द सांस्कृतिक केंद्र में निःशुल्क की गई है।
हमने जब इन बच्चों को हिंदी बोलते सुना, हिंदी के गीतों पर भावपूर्ण नृत्य करते देखा, हिंदी सिनेमा के गाने गाते देखा और हिंदी में इनसे बात की तो लगा जैसे कोई स्वप्न साकार हो गया।
कितना कुछ यादों में क़ैद हो गया है। कवि सम्मेलन से पूर्व जब तंज़ानियन बच्चों ने किशोर कुमार के फिल्मी गाने गाए तो मन झंकृत हो गया। कवि सम्मेलन में सैंकड़ों लोगों ने लगभग दो घण्टे तक मुझे और अरुण जैमिनी जी को सुना और सराहा। हम दोनों को विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के अगले दिन पाठक जी हम दोनों कवियों को लेकर कुंबु-कुंबु सेल्यूस नामक स्थान के लिए रवाना होनेवाले थे। सेल्यूस तंज़ानिया के उस घने जंगल का नाम है जहाँ सैलानी न केवल जंगल सफ़ारी के लिए जाते हैं बल्कि शिकार के शौकीनों के लिए इस क्षेत्र को स्वर्ग कहा जाता है। यह स्थान दार-ए-सलाम से 220 किलोमीटर दूर था।
रवानगी से ही अरुण जैमिनी जी और मैं रोमांचित थे। शिकार की बात सुनकर मन कुछ खिन्न अवश्य हुआ किन्तु इस बात की प्रसन्नता थी कि जिन वन्यजीवों को भारत में देखना सम्भव नहीं था, उन्हें उन्हीं की भूमि पर स्वच्छंद विचरते देख सकेंगे।

रूफीजी मे नौकायन की तैयारी

रास्ता लम्बा, ख़ूबसूरत, ऊबड़-खाबड़ तथा कहीं-कहीं भयानक भी था। कई घण्टे राजमार्ग पर चलने के बाद गाड़ी एक कच्ची-सी सड़क पर उतर गयी। शहर पीछे छूट रहा था और हम गहरे जंगल में समाए जा रहे थे। कच्ची सड़क के दोनों ओर घने पेड़ों के झुरमुठ थे। दिन का समय था लेकिन गाड़ी से उतरने की मनाही थी। मोबाइल का नेटवर्क साथ छोड़ चुका था। जंगल इतना घना था कि रिज़ॉर्ट का मालिक, जिसका नाम ‘अतीत’ था, वह पानी से लेकर बर्फ़ तक हर ज़रूरत की चीज़ गाड़ी में स्टोर करके चला था। वह स्वयं गाड़ी ड्राइव कर रहा था। उसने हमें बताया कि इस ख़राब सड़क पर दो या तीन टूर करने के बाद गाड़ी के काफ़ी सारे पुर्ज़े बदलवाने पड़ते हैं। उसकी बात सुनकर मैंने अरुण जी से आँखों ही आँखों में कहा कि हमें तो इसी टूर के बाद अपने पुर्ज़ों की जाँच करवानी पड़ेगी।
ख़राब सड़क पर रोड़वेज की पुरानी बस में जो खड़खड़ का पार्श्व संगीत बजता रहता है, वही संगीत इस शानदार एक्सयूवी में हमारा सहगामी बना हुआ था। लेकिन हमारा पथ-प्रदर्शक एक गुजराती युवा था जो हमसे अधिक वाचाल, सभ्य तथा उत्सवधर्मी था इसलिए पूरे रास्ते उसने कभी किशोर कुमार के गीतों से तो कभी उस घने जंगल के किस्सों से मन बहलाए रखा।
पाठक जी थोड़े अंतर्मुखी हैं, वे कम बोलते हैं किंतु चिड़चिड़े अभिभावकों की तरह मनोरंजन में व्यवधान उत्पन्न नहीं करते। उल्टे हर गतिविधि में अपने मौन के साथ उपस्थित रहते हैं।
यूँ तो कुंबु-कुंबु रिज़ॉर्ट पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गयी थी लेकिन अतीत भाई के आतिथ्य ने रास्ते भर इतनी आवभगत की थी कि भूख लगभग नदारद थी। लेकिन रसोई में सामर्थ्य हो तो वह अफारे में भी भूख जगा दे। यही हमारे साथ उस दिन हुआ। उस घने जंगल में जहाँ ध्यान भटकाने के लिए मोबाइल नेटवर्क नहीं था, वहाँ ग्रामीण आभा से सुसज्जित उस प्रांगण में ज्यों ही हम खाट पर पसरे, हमारे सामने छाछ के गिलास अवतरित हो गए। सफ़र की थकान में जी भर-भर छाछ गटकने के बाद हम बहुत दिन बाद मोबाइलहीन होकर मनुष्यों से बात कर पा रहे थे।


सुकून के पल

जंगल की दोपहरी, रिजॉर्ट का खुला आंगन, घने वृक्षों की छाँव में बिछी हुई खाटें, दो पेड़ों के तनों से बंधा हुआ आराम झूला और इस माहौल को भोगते हुए हम। दस मिनिट में ही खाना लगा दिया गया। पेट भरा होने के बावजूद इस निर्जन में ऐसी व्यवस्था करने वाले का अनुरोध टाला न जा सका। अचार से लेकर तरकारी तक, सबमें से थोड़ा-थोड़ा थाली में सजाया तो छप्पन भोग जैसा महसूस होने लगा। ‘जंगल में मंगल’ की अवधारणा का कुछ-कुछ अर्थ हमें समझ आ रहा था।
थकान, माहौल और अन्न ग्रहण के उपरांत पलकों ने झपकने की तैयारी कर ली। लेकिन हमारे होस्ट ने शायद हमारे आलस्य की सुपारी ले रखी थी। ज्यों ही हमने सुस्ताने की बात कही, वह बोल उठा कि एक बार रूफिजी का पानी देख लो, फिर सो लेना।

नदी तट का एक मनोरम दृश्य

रूफिजी एक भव्य नदी है, जिसके किनारे यह रिज़ॉर्ट बना हुआ है। यह नदी सेल्यूस के बीच से बहती है। इसमें घड़ियालों और मगरमच्छों के झुंड आसानी से दिखाई दे जाते हैं। हम खाट से उठकर सौ क़दम ही चले होंगे कि हमें इस विशालकाय नदी के दर्शन हुए। प्रकृति को उसका अपना माहौल मिल जाए तो वह कितनी विराट हो जाती है, इस बात का अनुमान हमें नदी के तट पर खड़े होकर हुआ।

क्षितिज सिमट आया कैमरे में

कुछ देर इस नदी के सौंदर्य को निहारने के बाद हम अंततः रिज़ॉर्ट में बने कमरों में आकर पसर ही गए। एकाध घण्टे की नींद; जिसे बेहोशी कहना अधिक समीचीन है; उससे ऊर्जा एकत्रित करके हमने चाय का एक सत्र चलाया। चाय पीते-पीते हमें बताया गया कि अब हम इससे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत अनुभव से गुज़रने वाले हैं। हम शहरी लोगों के लिए यही स्थान कुंजवन सरीखा आनन्द उपलब्ध करा रहा था, अब इससे अधिक क्या होगा... यह हमारी समझ से परे था।
शाम हो रही थी... हम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए कल्पना कर रहे थे कि अब आगे क्या होगा। उधर रिज़ॉर्ट के कर्मचारियों ने काफ़ी सारा सामान नदी तट पर रखी नाव में जमाना शुरू कर दिया। चाय समाप्त होते ही हमें भी एक दूसरी नाव में सवार कर दिया गया। यह नाव एक जानदार मोटरबोट थी, एक नाव में ढेर सारा सामान एक निश्चित दिशा में चल रहा था और दूसरी नाव में हमारा होस्ट हमें रूफिजी की लहरों पर रोमांच करा रहा था।
घड़ियालों से भरी नदी में सूर्य अस्त होने जा रहा था। हल्के बादलोंवाले आकाश में प्रदूषण से मुक्त संध्या अनगिनत रंग बिखेरकर जो दृश्य उत्पन्न करती है उसी के लिए ‘वर्णनातीत’ शब्द की सर्जना हुई होगी। रूफिजी का पाट इतना चौड़ा है कि एकबारगी समुद्र का भ्रम होने लगता है। हमारी मोटरबोट पूरी गति से डूबते हुए सूर्य की दिशा में दौड़ रही थी। पीछे नदी की लहरें मोटरबोट के वेग से एक विशेष आकार बनाते हुए नृत्य कर रही थीं। मोटरबोट पूरे उत्साह में भरकर डूबते सूरज को छू लेने को तत्पर थी और नदी उस तुच्छ मशीन का हाथ पकड़कर उसे रोक लेने को आतुर थीं। हम लहरों पर सवार थे, आँखों में प्रकृति का अनुपम सौंदर्य चमक रहा था, आगे का कार्यक्रम पता नहीं था इसलिए कहीं पहुँचने की जल्दी भी नहीं थी। जब तक सूर्य अस्त न हो गया तब तक हम इसी आनन्द में मग्न रहे। हमारा मोबाइल केवल कैमरा हो गया था।
इधर अंधेरा उजाले पर हावी होने लगा, और उधर हमारा केवट हमें रिज़ॉर्ट ले जाने की बजाय नदी के बीच उग आए एक रेतीले टापू पर ले आया। हम पहली बार इस तरह के टापू पर आए थे इसलिए टापू पर चढ़ने में हम दोनों को ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी।
रात हो रही थी और हम निर्जन वन के बीच विशाल नदी पर बने एक टापू पर कुर्सी लगाकर बैठे थे। हमारे पैरों के नीचे हाल ही में बने किसी मगरमच्छ के पंजों के निशान थे। नदी में घड़ियालों की आँखें चमक रही थीं। पानी की गति का जो संगीत होता है, उसकी लय पर पूरा वातावरण अस्ताचल से निकलती धीमी रौशनी में नृत्य कर रहा था।
दूसरी नाव में लादकर टापू पर एक लाइव तंदूर (जिसे आजकल बारबिक्युनेशन बोलते हैं) लाया गया था। शाकाहारी स्नेक्स की दर्जनों वैरायटी के साथ सोमरस की भी व्यवस्था की गई थी। हमें बताया गया कि नॉनवेज खानेवालों के लिए नॉनवेज भी बनवाया जाता है। इसलिए हम दोनों के शाकाहारी होने की बात सुनकर हमारा होस्ट काफी निराश था।
बहरहाल, रात का सन्नाटा। और यह सन्नाटा आपकी कल्पना में उतरे किसी भी सन्नाटे से ज़्यादा रोमांचक था। छोटा सा रेत का द्वीप, उसके चारों ओर पूरे वेग से बहती नदी, नदी के चारों ओर अफ्रीका का घना जंगल, नदी के पानी में चमकतीं मगरमच्छ की आँखें, जंगल से आती शेर की आवाज़, चांदनी रात, तारों से भरा आकाश, सामने रखे तंदूरी आलू, हाथ में जाम और बराबर की कुर्सी ओर रखे सारेगामापा कारवां में किशोर दा का गीत- ये शाम मस्तानी...!
अगली सुबह खुली जीप में हम गेम रिज़र्व में दाखि़ल हुए। हमारा राइडर देव एक अफ्रीकी लड़का था, लेकिन उसका स्वभाव बेहद शालीन था। अंग्रेजी उसे समझ आती थी सो संवाद में कोई ख़ास समस्या नहीं हो रही थी। प्रवेश करते ही इम्पाला हिरणों का एक झुंड चौकड़ी भरते हुए हमारे सामने से गुज़रा। उसके बाद जिराफ़, ज़ेब्रा, जंगली सूअर, जंगली भैंसे, साँप, दरियाई घोड़े, सांभर, बंदर, लंगूर और मगरमच्छ देखते हुए तीन घण्टे का समय बीत गया। देव, मुख्य सड़क पर चल ही नहीं रहा था। ऊबड़-खाबड़ धरती पर उसकी लैंड-क्रूज़र शेर की तलाश में झाड़ियों को रौंदती हुई बढ़ रही थी। अचानक देव ने अपनी भाषा में कुछ कहा। उसके चेहरे की रंगत और आँखों की चमक बता रही थी कि हमारी तलाश ख़त्म होने को है। उसने एक छोटे से टीले के ऊपर गाड़ी चढ़ा दी। टीले के ऊपर एक पेड़ था, जिसकी छाया में पाँच शेरनियाँ आराम फरमा रही थीं। देव ने उनसे लगभग तीन फीट दूर गाड़ी रोक दी। अरुण जी और मैं इस खूबसूरत ख़तरे को निहारते रहे। हमने खूब फ़ोटो खींची। शेरनियों के साथ पोज़ बनाकर सेल्फियाँ भी लीं। ऐसा लगा मानो कोई संकल्प पूरा हो गया हो।
शेरनियाँ सुस्ती में सोती रहीं और हम आगे बढ़ गए। थोड़ी दूर पर हमें हाथियों का एक झुंड मिला। यह भी हमसे 10 फीट से ज़्यादा दूर नहीं था। गर्मी से मुक्ति पाने को हाथी अपने ऊपर पानी डालते रहे और हम आराम से उनकी वीडियो बनाते रहे। इसके बाद हमने एक ऐसी जगह पर खाना खाया जहाँ चारों ओर जिराफ़ ही जिराफ़ थे।
सुकून, रोमांच और आंनद जैसे शब्दों के सही मआनी क्या होते हैं; यह बताने में शायद मैं अभी पूरी तरह सफल न होऊँ, लेकिन जब कभी इन शब्दों के बारे में सोचता हूँ तो मेरी कल्पना रूफिजी के बीच बने उस रेतीले टापू पर पहुँचकर घने अंधेरे में गुम हो जाती है।

© चिराग़ जैन

किशन सरोज जी नहीं रहे

ले गया चुनकर कँवल कोई हठी युवराज
ताल के शैवाल-सा हिलता रहा मन

स्वर्ग का युवराज गीत-सरोवर के सबसे ख़ूबसूरत कँवल को ले चला और गीतों के रसिकों का मन काँपता रह गया। विरह और पीड़ा से परिपूर्ण किशन सरोज जी का कवित्व गीत की सबसे परिष्कृत शब्दावली का साधक था। मेहंदी रचे हाथों से दीप तिरोहित होते देख किशन सरोज जी वर्तिका के मोहपाश में बंधने की बजाय, जल में हुई सिहरन को महसूस करते रहे। गीत की संवेदना की सूक्ष्म दृष्टि का इससे बढ़िया कोई और उदाहरण तलाश पाना कठिन है। किशन जी के गीतों में यह सूक्ष्मदृष्टि फिर-फिर कर उतरती दिखती है।
अन्य गीतकारों की तरह स्वार्थ की ओट में जताए जा रहे संबंध भी उन्होंने गीत में अभिव्यक्त किये किंतु उनके लिए जो बिम्ब विधान किशन सरोज जी के पास था, वह अन्य गीतकारों के पास नहीं मिलता।

एक पल में आँख ओझल, हिरनियों का दल हुआ
कौन जाने, तन हुआ घायल कि मन घायल हुआ
बहुत घबराए अकेले प्राण, नदिया के किनारे
फिर लगा प्यासे हिरण के बाण, नदिया के किनारे

समर्पण की पराकाष्ठा और किसी अपने को अभय करने के लिए किस हद्द तक पहुँचा जा सकता है, यह बात समझने के लिए उनके गीत की इन पंक्तियों को जीना पड़ेगा रू

थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित
छोड़ आया सब पुराने मित्र
तुम निश्चिन्त रहना!
कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र
तुम निश्चिन्त रहना!

अभिव्यक्ति के लिए इतनी सक्षम प्रतिभा और अनुभूति के लिए इतना संवेदनशील मन का संयोग ही किसी मनुष्य को किशन सरोज बना सकता है। एक गीत के मुखड़े में वे सामान्य बिम्ब विधान पर कविताएँ रचनेवालों को इशारे से बताते हैं कि संवेदना की दृष्टि जहाँ पड़ती है, वहीं कविता खड़ी मिलती है। अहा, क्या गीत है -

नीम तरु से फूल झरते हैं
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य!

यही आश्चर्य-बोध उनके प्रतीकों, बिंबों और शब्द-चयन को अभ्यार्थियों के लिए पाठशाला बना देता है। कितना बड़ा गीतकार, और कितना सहज मनुष्य! यह विलक्षण था। अपनी किसी आवश्यकता को तब तक किसी के सम्मुख प्रकट नहीं करते थे, जब तक उसे अनदेखा करना सम्भव होता था और फिर जब कहना पड़ता था तो संकोच का सागर उनके मन से उनकी वाणी तक लहलहाने लगता था।
न कोई लाग-लपेट, न कोई दिखावा और न ही कोई महत्वाकांक्षा, न किसी से स्पर्धा! केवल दो ही शब्द उनके पूरे जीवन का परकोटा रहे रू एक प्रेम, दूसरा गीत!
आज किशन जी विदा हो गए। गीत की गंगा में बहाए गए उनके सीप-शंख चुनकर आने वाली पीढियां गीत-वधुओं के कुन्तलों में गूँथती रहेंगी और गीत की कनुप्रिया की स्वर्णकेशी व्यथा का गायन युग-युग तक किशन सरोज जी के अस्तित्व की गवाही देता रहेगा।

-चिराग़ जैन

Sunday, January 5, 2020

उसको बदनामी से डर लगता था

पलकों में पलते सपनों की नाकामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था

मैं उसकी आँखों में गुम था, वो सबकी नज़रें पढ़ती थी
मैंने प्यार किया बिन मतलब, वो बिन कारण के लड़ती थी
दुनिया भर की बातें सुनकर आँखों में पानी भरती थी
मैं उसको समझाता था तब जाने क्या सोचा करती थी
जीना-मरना साथ करूँगा, इस हामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था

दुनियावाले क्या सोचेंगे -इसका सोच-विचार बहुत था
हिम्मत करने से बचती थी, वैसे उसको प्यार बहुत था
किस रंग के दरवाज़े होंगे, क्या दीवारों का रंग होगा
कितनी फुलवारी फूलेगी, कैसा फूलों का ढंग होगा
सपनों के इस सुंदर घर की नीलामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था

जब भी प्यार किया जाता है, सोच-विचार नहीं करते हैं
सोच-समझने वाले अक्सर, पूरा प्यार नहीं करते हैं
मर-मिटने का ख़ौफ़ नहीं हो, तब जीना अच्छा लगता है
सपनों में जीकर तो देखो, हर सपना सच्चा लगता है
हर ख़ूबी की चाह थी उसको, हर ख़ामी से डर लगता था
उसने राह बदल ली, उसको बदनामी से डर लगता था

© चिराग़ जैन

Wednesday, January 1, 2020

मुझे आँसू पचाना आ गया है

पीर से कह दो
मुझे आँसू पचाना आ गया है
अब किसी आघात से घायल नहीं हो पाऊंगा मैं
प्यास को अपने पसीने से बुझाना आ गया है
दोपहर की धूप से बिल्कुल नहीं घबराऊंगा मैं

भाग्य के दरबार से संत्रास लेकर लौट आया
आस के आवास से उपहास लेकर लौट आया
मैं स्वयं में इक नया विश्वास लेकर लौट आया
अब किसी के सामने झोली नहीं फैलाऊंगा मैं

अब समस्या भी मुझे भयभीत कर सकती नहीं है
नियति अब कुछ भी मेरे विपरीत कर सकती नहीं है
हार ने जो कर दिया, वह जीत कर सकती नहीं है
युध्द के परिणाम पर हर हाल में मुस्काऊंगा मैं

आपदा में धीर का व्यवहार करना आ गया है
मुस्कुरा कर दर्द का उपचार करना आ गया है
अब मुझे हर वार को स्वीकार करना आ गया है
डूब कर भी धार के उस पार तो लग जाऊंगा मैं

© चिराग़ जैन