Tuesday, August 24, 2021

सावधान! कहीं आप अपने धर्म का विरोध तो नहीं कर रहे?

आचरण को आवरण से अधिक महत्व देने का नाम है जैनत्व! जैन आगम में प्रथमानुयोग का अध्ययन करें तो ऐसे सैंकड़ों चरित्र मिल जाएंगे, जिन्होंने अपने चारित्रिक बल से अनीति को हतोत्साहित किया है। तीर्थंकर पार्श्वनाथ पर उपसर्ग करनेवाले कमठ से लेकर मुनि मानतुंग को कारागृह में बन्द कर देने की घटना तक संहनन तथा आत्मबल ही नायकत्व का निर्धारण करता रहा है।
यही क्षमा, यही धैर्य, यही संहनन, यही अहिंसा यदि हम वर्तमान में भी बचा ले गए, तो यह अपने जैनत्व के प्रति हमारा सबसे बड़ा योगदान होगा। किन्तु हम उद्वेग के प्रवाह में उलटबांसी करके अपने आधार को ही ध्वस्त करने पर आमादा हुए जा रहे हैं। हम नपुंसक से अहिंसक की तुक मिलाकर बड़े गर्व से कहते हैं कि जैनी अहिंसक हैं, नपुंसक नहीं! मुट्ठी और जबड़े भींचकर जब कोई यह जुमला बोलता है, तो मुझे लगता है कि वह अपनी परम्परा के मस्तक पर मुष्ठी प्रहार करके गौरव मान रहा है। ऐसी अनुभूति होती है कि हिंसा के प्रतिकार में हिंसक हो जाने की बजाय अहिंसा तथा क्षमा का रास्ता अपनाकर सामनेवाले के चरित्र को प्रभावित करनेवालों को नपुंसक कहा जा रहा है।
श्रीमद रायचंद्र और महात्मा गांधी ने जैन धर्म के जिस आत्मबल को आत्मसात करके एक गाल पर थप्पड़ मारने पर दूसरा गाल आगे करने की बात कही, उसकी खिल्ली उड़ती दिखाई देती है।
तीर्थंकर नेमिनाथ को जब ज्ञात हुआ कि उनके विवाहोत्सव में अतिथि सत्कार के लिए पशुओं की बलि दी जानी है तो इस हिंसा का प्रतिकार करने के लिए उन्होंने तलवार नहीं खींची थी। बल्कि अपने आचरण से उस कृत्य में संलग्न लोगों को शर्मिंदा करने का उपक्रम किया था। उन्होंने तो यह नहीं कहा कि हमें आप नपुंसक न समझ लें, इसलिए हम अहिंसा को तिलांजलि दे देकर पशुओं की हत्या करनेवालों की हत्या कर देंगे।
सेठ सुदर्शन, राजा श्रीपाल, मुनि सुखमाल, मुनि समन्तभद्र और न जाने कितने श्रावक-श्रमणों ने धर्म तथा निजी सुखों की रक्षार्थ ‘विरोधी हिंसा’ की ओट लेकर हिंसक बन जाने के स्थान पर अपने आत्मबल तथा साधना के बल पर धर्म की रक्षा की।
धर्म की रक्षा उसके अनुयाइयों को जीवित रखकर नहीं बल्कि उसके आदर्शों को जीवित रखकर की जा सकती है। किसी ने हमारे धर्म का अपमान किया और हम उसकी गर्दन उतारने दौड़ पड़े तो समझ लीजिए कि विरोधी ने तो केवल धर्म की देह को पत्थर मारे थे, लेकिन अनुयाइयों ने उसकी आत्मा खरोंच दी। जिन्होंने सिर पर सिगड़ी रखे जाने के बावजूद उपसर्गी का प्रतिकार न किया, उन्हें क्या हम नपुंसक कहने लगेंगे?
जैनत्व के इतिहास में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलेगा कि जहाँ युद्ध करनेवाले अथवा युद्ध जीतनेवाले को उसके दैहिक बल के कारण पूजा गया हो। हमने युद्ध में संलग्न बाहुबली को नहीं पूजा, हमने तो सर्वस्व त्यागनेवाले बाहुबली को पूजा है। हमने चक्रवर्ती भरत को नहीं पूजा, हमने तो मुनि भरत को पूजा है।
धर्म को सीढ़ी बनाकर उद्वेग पर सवारी करनेवाले लोग इस धर्म की आत्मा के लिए सर्वाधिक ख़तरनाक लोग हैं। जिस पर पत्थर फेंका गया, उसे शांत रखना कठिन कार्य है। यह कार्य मुनियों ने किया। यह कार्य पुरखों ने किया। और इसी कठिन कार्य को करते हुए जैनत्व की आत्मा को अक्षुण्ण रखा है हमारे पूर्वजों ने। किन्तु उद्वेग को अराजक बना देना सरल कार्य है। इस सरल कार्य को करके जैन धर्म के पाले में खड़े होकर जिनत्व की मूल भावना को चोट पहुँचा रहे हैं कुछ लोग। उनके बहकावे में आने से बचें। क्योंकि आगम की रक्षा हेतु मुट्ठी भींच लेने की बात से अधिक हास्यास्पद कुछ नहीं हो सकता!

© चिराग़ जैन

Sunday, August 22, 2021

रक्षाबंधन

‘बंधन भी सुख का कारण हो सकता है’ - इस अद्भुत सत्य का अनोखा उदाहरण है रक्षाबंधन! यद्यपि मैं जानता हूँ कि ईश्वर ने सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को आत्मरक्षा हेतु आत्मनिर्भर बनाया है तथापि मुझे इस बात का एहसास है कि नाड़ी पर एक धागा बांधकर मन में अपनत्व की जिस अपेक्षा को गतिमान किया जाता है; वह संवेदना के स्नायु तंत्र को आनन्दित कर देती है।
कोई हम पर इतना अधिकार रखे कि हमें अपनी रक्षा का दायित्व सौंप दे... अहा! इस अनुभूति से मन कितना बलिष्ठ हो उठता है।
सम्भवतः हम इस त्यौहार की इस अलौकिक ख़ुशी को सही से समझ ही नहीं सके हैं। इसीलिए हमने इसको किन्हीं अर्थों में परिहास बना डाला है। यदि किसी लड़की को अहसास हो जाए कि अमुक परिचित लड़का उसके प्रति प्रेम का भाव रखता है, अथवा उसे प्रपोज़ करनेवाला है तो वह लड़की उसको राखी बांधने निकल पड़ती है! उधर लड़के को अनुमान हो जाए कि जिससे वह प्रेम करता है, वह उसे राखी बांधने की जुगत में है तो लड़का राखी से बचने का उपाय खोजने लगता है!
इस परिस्थिति के दोनों ही पात्र बचकानी हरकतें कर रहे हैं। जिसकी नीयत में तुम्हें खोट दिखाई दे रहा है, उसको राखी जैसे सम्मान से सम्मानित कैसे किया जा सकता है? और जिसकी तुम राखी से भयभीत हो, उससे तुम कम से कम प्रेम तो कभी नहीं कर सकते!
राखी एक पदक है। राखी एक सम्मान है। यदि कोई स्त्री किसी पुरुष को इस सम्मान के योग्य समझती है तो यह उस पुरुष के लिए गौरव का विषय है। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के इस युग में जब स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को भौंडा करके परोसने के सभी द्वार खुले हैं ऐसे में राखी का एक धागा संवेदनाशून्य होते सम्बन्धों पर संवेदना के काँचुकीय की भूमिका निर्वाह करता है।

© चिराग़ जैन

Saturday, August 21, 2021

जैन आगम की प्रासंगिकता

धर्म आत्मबल में वृद्धि करने का साधन है। साधना संहनन को सुदृढ़ करने का अभ्यास है। विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संयत रखने का उपाय ही व्रत है।
जैन आगम का प्रथमानुयोग, जीव के इसी नैतिक विकास का आधार तैयार करता है। प्रथमानुयोग हमें संकट के समय संयत रहने के अवलम्बन प्रदान करता है। जब हम विपत्ति से घिरे हों तब उस विपत्ति का कोई एक उदाहरण मस्तिष्क में कौंध जाए तो विपत्ति छोटी लगने लगती है। यही प्रेरणा मनुष्य के जीवन में कथाओं को उपयोगी बनाती है। यह प्रेरणा न हो तो तमाम कथाएँ राजा-रानी की कहानी की तरह बालक का मन बहलाने का उपकरण मात्र सिद्ध होंगी।
यदि थोड़ा सा विवेक जागृत कर लिया जावे तो शास्त्रों में पढ़ी गईं अनेक कहानियां हमें हमारे परिवेश में साकार होती दिखाई देंगी। जैन आगम की इन कथाओं को जब कभी अपने या अपनों के जीवन में घटित होते देखता हूँ तब-तब मुझे लगता है कि महावीर की प्रासंगिकता सिद्ध हो गयी।
ऐसा अनेक बार होता है कि जब हमारा कोई अपना लोभवश हमसे छल करके हमारा आर्थिक अहित कर रहा होता है। ऐसी स्थिति को जानने के बाद यदि हम उस सम्पत्ति से निर्मोह होकर चल देते हैं तो उस क्षण हम भरत को राज्य सौंप कर वन को जाते हुए बाहुबली सदृश हो जाते हैं। 
ऐसा अनेक बार हुआ है कि यदि हमें ज्ञात हो जावे कि हमारी उपस्थिति से किसी महफ़िल का माहौल असहज हो जाएगा तो हम उस अवांछित परिस्थिति को टालने के लिए स्वयं को उस उत्सव से विलग कर लेते हैं। जब हम ऐसा करते हैं तब हम अपने अवचेतन में विद्यमान नेमिनाथ से प्रेरणा प्राप्त कर रहे होते हैं जिन्होंने स्वयं को हिंसा का कारण बनते देख उस उत्सव का ही परित्याग कर दिया जो उनके लिए संयोजित किया गया था।
कोई हमें परेशान किये जा रहा है और हम उसके उपद्रव पर ध्यान न देकर अपने कार्य में एकाग्रचित्त रह पाएं तो उस समय हमारा व्यक्तित्व कमठ का उपसर्ग झेलते पार्श्वनाथ से प्रेरणा पा रहा होता है। हमें मिली ख़राब चीज़ को भी यदि हम सँवार कर उपयोगी बना लेने का हौसला रखते हैं तो हम मैनासुन्दरी के किरदार को जीवंत कर देते हैं।
सेठ सुदर्शन, मुनि मानतुंग, मुनि सुखमाल, अंजनबाला, राजुल, अकलंक, निकलंक, सुकौशल मुनि, सनतकुमार मुनि, अकम्पनाचार्य और श्रीपाल जैसे दर्जनों चरित्र हमारे अवचेतन में विद्यमान हैं। जिन परिस्थितियों में ये सब उल्लेखनीय बन गए, उन्हीं परिस्थितियों में ये सब सामान्य भी सिद्ध हो सकते थे। ये सब कथाएँ हमें यह प्रेरणा प्रदान करती हैं कि अनुकूल परिस्थितियों में धर्म पालन करने से कोई विशेष नहीं होता। आपका उल्लेख तब किया जाता है जब आप प्रतिकूल परिस्थितियों में धर्म का पालन कर सकें।
हाल ही में मुझे शल्य चिकित्सा की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा। जब मुझे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था उस समय मुझे यह विचार आया कि घर पर हर रोज़ समाधि मरण और बारह भावना की ऑडियो सीडी बजती है। यदि इस क्षण मैंने इन दोनों काव्यकृतियों में वर्णित उदाहरणों का चिंतन नहीं किया, यदि इस क्षण में मैं विकल हो गया तो बरसों से सुनी जा रही इन महनीय रचनाओं की महत्ता खण्डित होगी। फिर इनका श्रवण मधुर संगीत से अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकेगा। ...जब तक एनेस्थीसिया ने मुझे पूर्णतया अवचेत न कर दिया तब तक मैं अनेक उदाहरण देते हुए लगातार स्वयं से यह प्रश्न पूछ रहा था कि - "तुमरे जिये कौन दुःख है?" 
इस एक प्रश्न ने मेरे मन को उस भय से बचाए रखा, जो ऑपरेशन से पूर्व किसी को हो सकता है। यूँ भी देह और विदेह के पृथकत्व के लिए वह क्षण सर्वाधिक उपयुक्त है, जब आप स्वयं उस बिंदु पर खड़े हों। अन्यथा धर्म चर्चा परानुभूति के प्रवचन से अधिक कुछ नहीं है।
मैं पग-पग पर इन चरित्रों से प्रेरणा प्राप्त करता हूँ। सर्दी लगी तो दिगम्बरत्व का ध्यान कर लिया। गर्मी लगी तो सिर पर जलती सिगड़ी को भूलकर साधनारत रहे मुनि का स्मरण हो आया। परिवेश के व्यवधान किसी कार्य में विघ्न बनने लगे तो ध्यानमग्न बाहुबली के हाथ-पैरों पर लिपटी लताएँ ध्यान आ गयीं। अपने भाग्य पर क्रोध आया तो बेड़ियों में बंधी चंदनबाला ने हौसला दिया। 
कुल मिलाकर जीवन की स्लेट पर अनुभव ने जो इबारत लिखी है उसमें उन सब कथाओं का उजाला है, जो बचपन से लेकर अब तक आगम के प्रथम सोपान पर पढ़ी-सुनी हैं। कुल मिलाकर हम सबके जीवन में धर्म बार-बार अवसर लेकर आता है कि हमें उल्लेखनीय बनाया जा सके। कुल मिलाकर आत्मबल और विवेक के अभाव में हम उल्लेखनीय हो जाने के प्रत्येक अवसर पर सामान्य हो जाना सरल समझते हैं। कुल मिलाकर परिस्थितियों से जूझने में आगम को स्मरण रखने वाले लोग, आगम को नियमित रूपेण पूजने वाले लोगों से अधिक सम्यकदृष्टि हैं।

✍️ चिराग़ जैन


Wednesday, August 18, 2021

मेहंदी

सावन की हरियाली
उतर आई है
हथेलियों पर
...महकने लगा है भाग्य!

© चिराग़ जैन

Tuesday, August 17, 2021

वर्तमान गवाह है...

जिन्होंने यह कहना शुरू किया कि इस्लाम ख़तरे में है, उन्हीं के नुमाइंदों ने अफगानिस्तान पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। यूएनओ में स्थायी सदस्यता की डींगें हाँकनेवाले देशों के लिए यह शर्मिंदगी भरी लानत है। सबसे उम्दा हथियार बनानेवाले देशों के लिए यह डूब मरने की बात है। मानवाधिकार के नाम पर अन्य देशों की निजता में हस्तक्षेप करनेवाले चौधरियों के लिए यह निर्वस्त्र होने जैसा अनुभव है।
धार्मिक कट्टरता की ओट में सत्ता की गलियाँ तलाश रही बर्बरता का घिनौना चेहरा तालिबान की हरक़तों में साफ दिखाई दे रहा है। कट्टरता के खोल में छिपे ये लिजलिजे कीड़े अपने खोल की मज़बूती को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि अब ये पूरी मनुष्यता को चाटने की तैयारी में जुट गए हैं।
चूँकि वैचारिक स्तर पर विकसित होती मानवता इनके खोल के लिए सर्वाधिक हानिकारक है, इसलिए ज्यों ही कोई व्यक्ति इन्हें सोच के स्तर पर विकास करता दीख पड़ता है, ये तुरन्त बर्बर हो जाते हैं। मुस्कुराहट और ठहाके इनके आतंक पर सबसे बड़ा आघात हैं, इसलिए हँसानेवाले लोगों के विरुद्ध ये धर्म और संस्कृति के अपमान की निराधार दलीलें परोसने लगते हैं। उत्सव मनाते हुए लोग इन्हें अपने दहशती सम्मोहन से छूटते हुए प्रतीत होते हैं इसलिए उत्सवों की हत्या के लिए ये बम फोड़ने लगते हैं। ज्यों ही मनुष्यता को यह एहसास होने लगता है कि वह इक्कीसवीं सदी में खड़ी है, ये तुरन्त उसे घसीटकर सोलहवीं शताब्दी में ले जाने की ज़िद्द करने लगते हैं। मनुष्यता मिल-जुलकर रहना चाहती है और बर्बरता उसे अलग-थलग कबीलों में बाँटने के लिए जी-जान लगाए बैठी है। लकड़ियों के गट्ठड़ को विभाजित करके उसे आसानी से तोड़ सकने की कला में बर्बरता माहिर है।
हमने इतिहास से सबक नहीं लिया तो आज वर्तमान हमें सिखा रहा है कि धार्मिक कट्टरता की ओट में पनपा एक तालिबान पूरी दुनिया के बड़े-बड़े धुरंधरों की नपुंसकता पर से पर्दा हटा चुका है। यदि पूरी दुनिया के सारे देश मिलकर इस एक कबीले की जकड़ से अफगानिस्तान को मुक्त नहीं करा सकते तो कम से कम इतना तो अवश्य करें कि अपने समाज को कट्टरता के दंश से मुक्त कराने के प्रयास तुरन्त प्रारम्भ कर दें ताकि इस तालिबानी फफूंद को अपने पैर पसारने का वातावरण न मिल सके।
और हाँ, गहरी श्वास लेकर सोचोगे तो समझ आएगा कि किसी भी धर्म को सबसे ज़्यादा नुक़सान उन्हीं लोगों से होता है जो उस धर्म के अनुयाइयों में यह बात प्रचारित करते हैं कि तुम्हारा धर्म ख़तरे में है।

© चिराग़ जैन

Friday, August 13, 2021

देशभक्ति

कैसे इस पर न्यौछावर हो अपना ख़ून-पसीना सीखें
वक़्त पड़े तो फौलादी साबित हो हर इक सीना, सीखें
शीश कटे तो उसका, जिसने भारत-भू पर आँख उठाई
हम इस पर मरना क्यों चाहें, इसकी ख़ातिर जीना सीखें
© चिराग़ जैन

हिंदुस्तान बोलेगा

अगर इंसान बनकर आए तो इंसान बोलेगा
ज़ुबां मिसरी सरीखी मीर का दीवान बोलेगा
अगर हैवानियत लेकर इधर आए तो फिर सुन लो
शिवाजी की ज़ुबां में सारा हिंदुस्तान बोलेगा

© चिराग़ जैन

Monday, August 9, 2021

प्रतिशोध का दंश

प्रतिशोध एक अंतहीन प्रक्रिया है। जाति, धर्म, सम्प्रदाय, खानदान, राजनीति, विचारधारा, देश, समाज... इन सबका सौंदर्य और सुख प्रतिशोध की इस महाज्वाला में भस्म हुआ जाता है। देवासुर संग्राम से लेकर रामायण, महाभारत और चाणक्य ही नहीं, वरन प्रत्येक संस्कृति और समाज के पास प्रतिशोध की इस विकराल चिता में ज़िन्दा जली हुई ज़िन्दगी की भयावह दास्तान है।
राम, गौतम, महावीर, नानक, ईसा... इन सबने इसी प्रतिशोध के चक्र को गतिहीन करके निष्क्रोध होने के अलग-अलग मार्ग सुझाए। उन्होंने हमें दिखाना चाहा कि मनुष्य की मुस्कुराती हुई आँखों में सुख देखने का अभ्यास कर लो तो रक्तपात और परपीड़ा में आनन्द तलाशनेवालों का क़द छोटा होता चला जाएगा। उन्होंने हमें सिखाया कि घृणा फैलाकर कोई समाज सुखी न रह सकेगा। उन्होंने हमें बताया कि क्षमा को इतना विराट बना लो कि विद्रूपता उसके आकार को लांघने का साहस न कर सके। उन्होंने हमें बताया कि अपनी मनुष्यता को इतना प्रबल बना लो कि कोई अमानुष उसके संकल्प को विचलित न कर सके। उन्होंने हमें सुझाया कि अपनी आस्था को इतना पुष्ट कर लो कि अनास्था का कोई झंझावात उसे आहत न कर पाए।
लेकिन हम तो उल्टे चलने लगे। हमने अपने धर्म का आनन्द भोगने की बजाय दूसरे के धर्म को नष्ट करने में सारी ऊर्जा झोंक दी। हम अपनी लकीर बड़ी करने की बजाय दूसरों की लकीरें मिटाने में जुट गए। हम क्षमा को ताक पर रखकर उद्दंडता के अखाड़े में दण्ड पेलने लगे।
हम घृणा को प्रेम से जीतने की बजाय, घृणा का उत्तर घृणा से देने पर उतारू हो गए। जिस क्षण हम अपने तरीके छोड़कर उसके तरीके से लड़ने लगे, बस उसी क्षण से हम पराजित हैं।
हमारी स्थिति उस विदुर की तरह है जो शकुनि के पासे बदलवाकर अब पछता रहा है। हम उन पांडवों की तरह हैं जो कौरव बनकर युद्ध जीत तो गए किन्तु उनके भीतर का पाण्डवत्व कुरुक्षेत्र में गिरनेवाला पहला शव बन गया।
हम कुरुक्षेत्र में प्रवेश करते समय केवल इतना भर संकल्प ले लें कि जब इस रण से बाहर निकलेंगे तो अपने भीतर के पाण्डवत्व को साथ लेकर लौटेंगे। हम अपनी क्षमा को बिसारकर उद्दंडता को सबक़ नहीं सिखाएंगे।
विश्वास कीजिये, यदि हम ऐसा कर पाए तो हमारे धर्मस्थलों में विद्यमान ग्रंथ जीवंत हो उठेंगे। फिर हमें हमारे महापुरुषों की वाणी का प्रचार करने के लिए लाउड स्पीकर नहीं लगाने पड़ेंगे। फिर हमारा आचरण ही हमारे धर्म का प्रतीक हो जाएगा।

© चिराग़ जैन

Wednesday, August 4, 2021

दूसरा आयाम

जो प्रतीक्षा आँख में शबरी बसाए जी रही है
वह प्रतीक्षा राम के भी पाँव में निश्चित मिलेगी
धूप जैसी जिस विकलता को सुदामा ने जिया है
वह विकलता द्वारिका की छाँव में निश्चित मिलेगी

जो महल तक आ गयी होगी युगों का न्याय लेने
वह किसी वन में सिसकती इक शिला की आह होगी
जो युगों पहले घटे अन्याय के हित वन गयी है
वह किसी के मौन से पनपी कोई परवाह होगी
एक घटना जो नगर में कंकरी सी चुभ रही है
वह अहल्या के अछूते गाँव में निश्चित मिलेगी

द्रौपदी के चीर में बस द्रौपदी की लाज है क्या
उस अभागे वस्त्र के भीतर समूचा युग ढँका है
चीर लेकर जब स्वयं श्रीकृष्ण दौड़े हस्तिनापुर
तब मुरारी ने जगत् के ध्वंस पर अंकुश रखा है
जो घृणा सबको दिखाई दी सती के आँसुओं में
वह घृणा उस द्यूत के हर दाँव में निश्चित मिलेगी

हर कथानक में कथा का दूसरा आयाम भी है
सिर्फ़ राधा ही नहीं व्याकुल, विकल घनश्याम भी है
अपहृता होकर नहीं पीड़ित अकेली जानकी ही
प्रेम और दायित्व के घावों से पीड़ित राम भी है
धार का अस्तित्व जिस जल पर रहा निर्भर हमेशा
बस उसी जल पर पराश्रित नाव भी निश्चित मिलेगी

© चिराग़ जैन