Friday, December 26, 2025

अपने-अपने त्योहार, अपनी-अपनी गालियाँ

भारत की राजनीति में आजकल ऑफ बीट सेक्युलरिज्म का दौर चल रहा है। सबने अपने-अपने महापुरुषों और अपने-अपने त्योहारों का कॉपीराइट करा लिया है। इसलिए जब भी कोई त्योहार आता है तो हर खेमे के लोग अपने-अपने कलैंडर खोलकर बैठ जाते हैं और उसके जवाब में अपने किसी महापुरुष की कोई घटना लेकर ताल ठोक देते हैं।
जिस खेमे का त्योहार होता है, उसकी ओर से बधाइयों के मैसेज भेजे जाते हैं और बाकी सारे खेमे एकजुट होकर उन बधाइयों के नीचे गालियाँ लिखने का काम करते हैं। इस तरह सबके मिले-जुले परिश्रम से सोशल मीडिया कंपनियों पर चांदी बरस रही है।
अभी 25 दिसंबर के दिन यही स्थिति बनी। स्वयं को सेक्युलर समझनेवालों ने बड़े दिन के अवसर पर अपने बड़े दिल का प्रदर्शन करने के लिए चैटजीपीटी की मदद से क्रिसमिस के सजावटी पोस्टर तैयार किये और डायरेक्ट मदर मेरी के आंगन में बधाइयाँ गाने पहुँच गए।
उनकी यह हरक़त भाजपा की सोशल मीडिया आर्मी को रास नहीं आई और उन्होंने सैंटाक्लॉज़ को ट्रोल करने के लिए कमर कस ली। जहाँ-जहाँ सैंटा, जीसस या क्रिसमिस लिखा दिखा, वहाँ-वहाँ कार्यकर्ताओं माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की सौवीं जयंती का पोस्टर चिपका दिया।
हर पोस्ट के साथ यह कहते हुए लानत भेजी जाने लगी कि, ‘पश्चिमी सभ्यता के त्योहार याद रहे और अपने अटल जी की जयंती को भूल गए।’
ये और बात है कि किसी महापुरुष को भूल जाने की लानत भेजनेवाले ख़ुद महामना मदनमोहन मालवीय जी की जयंती को भूले हुए थे। बहरहाल, क्योंकि अटल जी को हथियार बनाकर सोशल मीडिया की वार में अपना पलड़ा भारी पड़ रहा था तो मालवीय जी को परेशान करने की क्या ज़रूरत थी?
इधर भाजपा अटल जी की सौवीं जयंती का पांचजन्य बजा चुकी थी, उधर एक अलग खेमा पहले ही गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्रों की कुर्बानी को याद करने का अभियान छेड़ चुका था। इस खेमे का जोश इतना अधिक था कि 26 दिसंबर की घटना से ही 25 दिसंबर के त्योहार को चारों खाने चित्त कर दिया गया था।
क्रिसमस का उत्साह दीवार में चिन गया और भाजपा ने अटल जी की जन्मशती का उत्सव धूमधाम से मना लिया।
उधर कट्टर सेक्युलरों ने भी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी-अपनी हार्डडिस्क का हज़ारों टीबी डाटा खंगाल मारा और भाजपा नेताओं की चर्चप्रेयर की तस्वीरें खोज-खोजकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दीं।
त्योहार का उत्साह ऐसा रहा कि सबने एक-दूसरे को धूमधाम से गालियां देकर रात काट दी। सुबह फेसबुक मेमोरी ने याद दिलाया कि इसी 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में पिछले साल ज़ोर-शोर से मनाया गया था। तुलसी मैया इस वर्ष भी अपने पूजन के महामहोत्सव की राह तकती रह गईं लेकिन सोशल मीडिया आर्मी को इस बार अपने आंगन की तुलसी दिखाई ही नहीं दी।
अपने-अपने त्योहार के शुभ अवसर पर सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने लगे हैं। गले मिलने के अवसरों पर हम गिरेबान में झाँकने की नसीहतें देने लगे हैं। उपहार के मौकों पर उपहास की गुंजाइश तलाशी जा रही हैं। उत्साह और उन्माद के बीच का अंतर समाप्त हो गया है। और जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ये महाभारत जारी है, उन्हें दीपावली, ईद और क्रिसमिस में कोई अंतर नज़र नहीं आता।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, December 20, 2025

सड़क सौन्दर्य

देश की यातायात व्यवस्था देखकर मेरा मन श्रद्धा से भर जाता है। पूरी दुनिया सड़कों के रास्ते दफ्तर पहुँचती है और दफ्तर पहुँचकर चुनौतियों से जूझने लगती है। हम भारतीय चुनौतियों से जूझते हुए दफ्तर पहुँचते हैं और दफ्तर पहुँचकर चैन की साँस लेने लगते हैं।
अन्य देशों के लोग गाड़ी की पिछली सीट पर बैठकर अख़बार पढ़ते हैं, लेकिन हम सड़कों के अप्रतिम सौंदर्य के कारण गाड़ी में अख़बार नहीं पढ़ पाते, इसलिए दफ्तर पहुँचकर अख़बार पढ़ने लगते हैं।
चूँकि हम भारतीय बड़े दिलवाले लोग हैं इसलिए तीन लेन की सड़क पर पाँच लेन बनाने में कभी नहीं कतराते। सड़क पर बनी सफेद-पीली पट्टियां हमारी शक्ल देखती रह जाती हैं और हम उनके अरमानों को कुचलकर लहराते हुए निकल जाते हैं।
हम पश्चिम की तरह यू टर्न के लिए सड़क को चौड़ा नहीं करते, बल्कि उसके लिए मेन लेन को भी संकरा कर देते हैं। प्रेम गली अति सांकरी...!
होंगे वे और देश जहाँ पैदल चलने के लिए फुटपाथ बनाए जाते हैं। हम वसुधैवकुटुम्बकम वाले तो इन फुटपाथों पर सपरिवार निवास करते हैं। दुनिया बैडरूम में हाइवे का चित्र लगाती है, हम हाईवे पर ही बैडरूम बना लेते हैं। खुले आसमान के नीचे...!
चूँकि सड़कें राष्ट्र की धरोहर हैं, इसलिए इनकी सुरक्षा के लिए यातायात पुलिस की भी सुविधा है। ये कर्मठ सेवक सड़क पर कभी भी, कहीं भी बैरिकेड्स लगाकर चले जाते हैं। इनका विश्वास है कि बैरिकेड्स अपने आप गाड़ियों को नैतिकता की प्रेरणा देते रहेंगे।
बीच के डिवाइडर पर लगी रेलिंग कहीं भी अपनी महान सड़कों के चरण स्पर्श करने सड़क पर उतर आती है। रिपेयर करने के बाद बचे हुए पत्थर, बजरी आदि को वहीं सड़क पर छोड़ दिया जाता है ताकि जनता अपने नेताजी का एहसान याद रख पाए।
पेड़ की डालियाँ अगर झुककर ट्रैफिक सिग्नल का चेहरा छिपा दें तो हम अनुमान से चौराहा पार करते रहते हैं लेकिन डाली और सिग्नल के इस प्रणय में खलल नहीं पड़ने देते।
रेलिंग, बैरिकेड्स, पेड़ों की डालियों, भिखारियों, रेहड़ियों, गड्ढों और कचरे से जो जगह बच जाती है वहाँ मवेशी विचरण करते हैं। क्योंकि 'सबै भूमि गोपाल की!'
दुनिया को होगा अपने राजमार्गों पर अभिमान। हमने तो ऊबड़-खाबड़ सड़कों के सम्मान में गीत लिखे हैं- 'गड्डी जांदी है छलांगां मार दी।'
हम भारतीयों का कलाप्रेम देखना हो तो किसी ट्रक का सौंदर्य देख लो। नजरबट्टू से लेकर चुटीले तक सब कलात्मक। यहाँ तक कि हॉर्न में भी गाना भरवा रखा होता है। रात के अंधेरे में रेस-पैडल पर ईंट रखकर पालथी मारकर पैग लगाता ट्रक-ड्राइवर, जब अस्सी-नब्बे की स्पीड में ट्रक दौड़ाते हुए हॉर्न से मधुर संगीत बजाने लगता है तो ऐसा लगता है, मानो स्वर लहरियां बिखेरती हुई किसी गंधर्व की सवारी आ रही है।
मैंने अपने ड्राईवर से पूछा कि ख़तरा किसे कहते हैं तुम्हें पता है। उसने बाईं ओर स्टीयरिंग घुमाकर एक गाड़ी को ओवरटेक किया और बोला- "साहब, ख़तरा तो बाएं हाथ का खेल है।"
✍️ चिराग़ जैन

Saturday, December 6, 2025

रुपया क्यों लुढ़कता है

जो लोग रुपये के गिरने के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उन्हें मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि रुपया सरकार के कारण नहीं, तुम्हारी फटी हुई जेब के कारण गिरता है।
यदि तुमने अपनी जेब सिल ली होती तो रुपया नहीं गिरता। सरकार उचित नीतियां बनाकर सारा रुपया अपने पास सुरक्षित करना चाहती है तो जनता शोर मचाने लगती है। 
अब ले लो मज़े, और रखो अपने पास। अब गिर गया ना रुपया। अब पड़ गया चैन?
जेब नहीं सिल पाए तो कम से कम जुबान ही सिल लो। देश की करंसी के विषय में ऐसी गिरी हुई बातें करनेवालों को राष्ट्रद्रोही करार देकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए। 
जिसे गिरना हो वो गिरेगा ही। शादियों में लोग आसमान की ओर रुपये उछालते हैं, लेकिन रुपया फिर ज़मीन पर आ गिरता है। अब जिसे गिरने की आदत पड़ गई हो, उसे कोई कहाँ तक उछाल सकेगा?
सोशल मीडिया पर रुपये की गिरावट को लेकर बड़ा मज़ाक बनाया जा रहा है। ये काफ़ी गिरी हुई हरकत है। गिरते को गरियानेवाला नजरों से गिर जाता है।
रुपया बेचारा कब से ललचायी नज़रों से नब्बे के अंक को देख रहा था। हमारी नीतियों ने अथक परिश्रम करके उसे नब्बे पार करवाया है। इस उपलब्धि पर सरकार की पीठ थपथपाई जानी चाहिए लेकिन जिन्हें केवल आलोचना करनी है उनका कोई इलाज नहीं है।
यह सरकार का बड़प्पन है कि दूसरों की गलतियों की सज़ा चुपचाप भुगत रही है। दरअस्ल रुपया नेहरू जी के कारण गिरता है क्योंकि नेहरू जी ने रुपया गोल बनाया। अब गोल है तो लुढ़केगा ही। यदि उन्होंने रुपया चौकोर बनाया होता तो रुपया कभी नहीं गिरता।
डॉलर ने रुपये को छेड़ते हुए कहा- "आज खुश तो बहुत होगे तुम। जो रुपया गिरे हुओं को भी चढ़ा देता था, आज वो ख़ुद गिरा पड़ा है।"
इस पर रुपये ने खनकता हुआ जवाब दिया- "गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में।"
डॉलर ने चिकोटी काटकर बात आगे बढ़ाई- "रुपये को उठाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।"
रुपये ने थोड़ा दार्शनिक होते हुए जवाब दिया- "कौन कमबख्त उठने के लिए गिरता है, हम तो गिरते हैं ताकि बाज़ार उठ सके।"
डॉलर फिर बोला- "बाप का, दादा का, भाई का, सबका बदला लेगा रे, तेरा डॉलर।"
रुपया गिरे हुए गुरूर से बोला- "मुझ पर एक एहसान करना, मुझ पर कोई एहसान मत करना।"
डॉलर ख़ुद पर इतराते हुए बोला- "हमारा डॉलर गिरा होता तो हमारी सरकार उसे उठाने के लिए जी-जान लगा देती।"
अब हमारे नेताजी बोले- "मैं आज भी गिरे हुए पैसे नहीं उठाता डॉलर सेठ!"
डॉलर अपना सा मुँह लेकर रह गया। हमारे नेताजी ने जेब से रुपया निकाला और ख़ुद की नजर उतारते हुए डायलॉग बोला- "बाबूमोशाय, बात ऊँची होनी चाहिए, सच्ची नहीं।"

✍️ चिराग़ जैन 

Thursday, December 4, 2025

कांग्रेस, कर्नाटक और नाटक

सोशल मीडिया पर एक विपक्षी ने मोदी जी के उन भाषणों का वीडियो पोस्ट कर दिया जिनमें वे गिरते रुपये के मुद्दे पर केंद्र सरकार को कोस रहे हैं। वीडियो देखकर एक भाजपाई भड़क गया। उसने कमेंट में लिखा- ‘ज़्यादा अर्थशास्त्री बनने का नाटक मत करो और अपना कर्नाटक संभालो।’
राजनैतिक गलियारों में जो दल दूसरे को नंगा करने निकलता है, वह अपने कपड़े पहले ही उतार चुका होता है। इससे किसी और के हाथों नंगा होने का ख़तरा टल जाता है।
कर्नाटक-कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर रस्साकशी चल रही है। दक्षिणपंथियों को यह देखकर सुकून मिल रहा है कि दक्षिण में कांग्रेस का कोई मध्यममार्ग नहीं निकल पा रहा है।
डीके शिवकुमार किसी गुप्त समझौते की बात कर रहे हैं। उधर सिद्धारमैया यह सिद्ध करने पर तुले हैं कि जब तक सरकार रहेगी, तब तक वे ही मुख्यमंत्री रहेंगे। कर्नाटक से संबंध रखनेवाले कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा एक आधिकारिक बयान दिया गया जिसमें कवि का तात्पर्य यह था कि कर्नाटक के विषय में अंतिम निर्णय राहुल गांधी जी विदेश से लौटकर लेंगे।
जब गुत्थी सुलझने को तैयार नहीं हुई तो अध्यक्ष महोदय ने गुत्थी की गेंद बनाकर थर्ड अम्पायर के पाले में फेंक दी।
राहुल गांधी एक जेब में हाथ डालकर कर्नाटक कांग्रेस के क्रिकेट मैच की अंपायरिंग करने निकले। चूँकि डीके शिवकुमार कांग्रेस के आर्थिक संकटमोचक हैं इसलिए जेबवाला हाथ डीके ने पकड़ रखा है। अब बेचारे राहुल जी को एक हाथ से दोनों धड़ों का फैसला करना है।
राहुल जी जेबवाले हाथ से मुट्ठी भींचकर दूसरे हाथ को हवा में उठाने की कोशिश करते हैं। जैसे ही हाथ थोड़ा उठने लगता है, सिद्धारमैया अपना पंजा उनकी कोहनी पर गड़ा देते हैं। समय की मार देखो, एक घूसे में नारियल फोड़नेवाले राहुल गांधी, अपनी कोहनी टस से मस नहीं कर पा रहे हैं।
जेबवाले हाथ पर एक पक्ष का कब्ज़ा, हवावाले हाथ पर दूसरे पक्ष का कब्ज़ा। इस भावुक दृश्य को देखकर कांग्रेस की आँखें भीग जाती हैं। भारत जोड़ो यात्रा के प्रवर्तक एक बार अपने दोनों हाथ जोड़ना चाहते हैं लेकिन दोनों हाथ अलग-अलग दिशा में खींचे जा रहे हैं।
राहुल जी ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए अपने पंजे को कांग्रेस के चुनाव-चिह्न की मुद्रा में लहराया। भावुक कांग्रेसियों को लगा कि वे पार्टी का निशान दिखाकर नेताओं को मर्यादा सिखा रहे हैं। लेकिन व्यावहारिक कांग्रेसी समझ गए कि वे दरअस्ल ‘ओके-टाटा-बाय-बाय’ कर रहे हैं।
इस नाज़ुक समय में अमित शाह यदि कर्नाटक की ओर मुँह करके खड़े भी हो जाएँ तो कांग्रेस के पसीने छूट सकते हैं। लेकिन भाजपा अभी ऐसा कुछ नहीं करेगी। वह तो चुपचाप तमाशा देख रही है कि दोनों दावेदारों में से किसे भाजपा की सदस्यता दिलानी है और कौन कुछ दिन और कांग्रेस में ही रहनेवाला है।

-चिराग़ जैन