Sunday, August 25, 2002

क़ुसूर

सज़ाओं में मैं रियायत का तलबदार नहीं
क़ुसूरवार हूँ कोई गुनाह्गार नहीं
मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है
मुझे किसी के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, August 3, 2002

दुःख

वाह के मज़मों में
अक्सर मौज़ूद होती है आह भी।
जैसे बहुत कुछ पा लेने पर भी
नहीं मिट पाती है कसक
कुछ खो जाने की।

दुःख जन्मता है
ख़ुशियों की कुक्षि से
कदाचित् यही सिद्ध करने के लिये
जलती हैं खलिहानों में रखी फ़सलें
फटते हैं धरती पर उतरते अंतरिक्ष-यान
मरते हैं जवान बेटे
फुँकते हैं बसे हुए घर
और छीन ली जाती है
घास की रोटी भी
भूखे बच्चों की उंगलियों से।

दुःख फैला है
धरती के कण-कण में
अविनाशी-सा
विराट, अरूपी, अमूर्त, अनवरत
अंधियारे-सा
सूनसान सन्नाटे की तरह
क्षितिज के छोर तक
सागर के तल पर झिलमिलाती
सूरज की किरण के समान
विशाल, अखण्ड और अनुपयोगी भी।

दुःख महसूस होता है
हृदय को प्रताड़ित करता 
एक अनजाना-अनकहा एहसास
जो उभर आता है
अक़्सर सुख के बीच
सुन्दर कन्या के गाल पर
मुँहासे की तरह।

दुःख अमर्यादित है
शायद इसीलिये नहीं बंध पाता
शब्दों की मर्यादा में
क्योंकि दुःख है
सिर्फ़ एक एहसास
जिसे नकारना असम्भव है
...सुख की तरह

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, July 6, 2002

आदमीयत का अंदाज़ा

हम मुहब्बत का अंदाज़ा करेंगे
वो हिमाक़त का अंदाज़ा करेंगे

जब तलक दूरियाँ न हों शामिल
कैसे चाहत का अंदाज़ा करेंगे

आदमी को समझ न पाए जो
क्या वो क़ुदरत का अंदाज़ा करेंगे

दौरे-ग़म में कहे कोई कुछ भी
सब नसीहत का अंदाज़ा करेंगे

आदमी ज़िब्ह करने वाले ही
आदमीयत का अंदाज़ा करेंगे

ख़ुद ही आफ़त बुलाएंगे और फिर
ख़ुद ही राहत का अंदाज़ा करेंगे

जब भी बेबाक़ सच कहेंगे हम
वो बग़ावत का अंदाज़ा करेंगे

हम तो अपना समझ के कह देंगे
सब तिज़ारत का अंदाज़ा करेंगे

लोग मेरी हरेक हरक़त से
मिरी फितरत का अंदाज़ा करेंगे

✍️ चिराग़ जैन

Friday, June 21, 2002

मुझे अहसास है

किसी पत्थर से जब तूने ये हाले दिल कहा होगा
तेरी आँखों से बरबस दर्द का सागर बहा होगा
मेरे दिल ने भी पीड़ा को हज़ारों बार झेला है
मुझे अहसास है तूने वो ग़म कैसे सहा होगा

✍️ चिराग़ जैन

Monday, May 20, 2002

कैसे लिखूँ

मस्त था मैं, भ्रमर-सा दीवाना था मैं
लेखनी प्रेयसी बन गई थी मेरी
ऑंसुओं की अमानत संजोई बहुत
जुल्म से जंग-सी ठन गई थी मेरी

एक दिन प्रेयसी मुझसे कहने लगी
मेरे प्रीतम ये क्या कर दिया आपने
मेरे बचपन को क्यों रक्त-रंजित किया
मांग में रक्त क्यों भर दिया आपने

क्यों शवों के नगर में मुझे लाए हो
मेरी मासूमियत तुमने देखी नहीं
घात-आघात की बात करते सदा
तुमने यौवन की लाली समेटी नहीं

शोक विधवा का, पीड़ा जगत् की दिखी
मेरे दिल के ज़ख़म ना दिखे आपको
सारी दुनिया के ऑंसू समन्दर लगे
मेरे ऑंसू सनम ना दिखे आपको

मेरे भीतर ज़रा झाँक कर देख लो
प्यार के गीत बनते चले जाएंगे
मेरे ऑंचल से ऑंसू अगर पोंछ लो
सब समन्दर सिमटते चले जाएंगे

मैं रहा मौन, मन ने मगर ये कहा
तेरे बचपन को मैंने क़तल कर दिया
तुझको खूँ से रंगा हर पहर, हर घड़ी
तुझको यौवन से भी बेदख़ल कर दिया

जब कभी तेरे यौवन पे लाली चढ़ी
मुझको बेवाओं की मांग दिखने लगीं
जब कभी तेरे ऑंचल में मोती जड़े
दिल में भूखी निगाहें सिसकने लगीं

तेरी मासूमियत कैसे देख्रू भला
भूखे बच्चे बिलखते नज़र आ रहे
ऐसे मौसम में क्या प्यार को शब्द दँ
जब ग़रीबों के बच्चे ज़हर खा रहे

क़ातिलों के शहर में खड़ा है कवि
हर तरफ़ मौत का घर नज़र आएगा
प्यार का गीत कैसे लिखेगा कोई
प्यार भी मौत की भेंट चढ़ जाएगा

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, April 2, 2002

दुश्मनों के सर

काली अमावस का अंधेरा होम करने को
दीवाली के दीप सामधेनी बन जाएंगे
पीड़ा वाली ज्वालाएँ जहाँ प्रचण्ड होंगी वहाँ
शांति-धार बरसाने प्रेम-घन जाएंगे
बलिदान हुए यदि कहीं तेरे लाडले तो
अरथी सजाने केसरी-सुमन जाएंगे
पर यदि तलवार चली रणबाँकुरों की
शत्रुओं के शीश तेरी ही शरण आएंगे

चाहे कितने भी हथियार वे बटोर लाएँ
लूट नहीं सकते हैं तेरी आन-बान माँ
बार-बार तूने घूँट कड़वे पिए हैं पर
अब नहीं करना पड़ेगा विषपान माँ
ऑंख भी उठाई यदि पापियों ने तेरी ओर
कम पड़ जाएंगे कफ़न वाले थान माँ
दुष्ट असुरों का सर्वनाश करने के लिए
परमाणु-बमों का करेंगे संधान माँ

लाज तेरे पावन किरीट की बचाने हेतु
कर में किरिच औ त्रिशूल धर लेंगे हम
चामरों की सौम्य पवन का जिन्हें ज्ञान नहीं
उन्हें समझाने को प्रलय-समर देंगे हम
अब नहीं तृषित रहेगी देवी रणचंडी
शत्रुओं के श्रोणित से घट भर देंगे हम
सुमनों की क्या बिसात माता भेंट में तू आज
मांग के तो देख दुश्मनों के सर देंगे हम

✍️ चिराग़ जैन

Friday, March 29, 2002

चाहत

मैं मुहब्बत का सुगम-संगीत लिखना चाहता हूँ
कंदरा संग पर्वतों की प्रीत लिखना चाहता हूँ
उत्तरा का मूक-वैधव्य जकड़ लेता है मुझको
जब कभी मैं पांडवों की जीत लिखना चाहता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, February 26, 2002

सरस्वती वन्दना

वरदान दे दे मुझे छंद-गीत-कविता का
वाग्देवी तेरा उपकार मांगता हूँ मैं
रंग-ओ-तरंग तेरे संग से मिलेगा मुझे
जीवन में तेरे सुविचार मांगता हूँ मैं
मृदु-सौम्य-भावपूर्ण वाणी बोलने के लिए
वाणी तेरे सभ्य-संस्कार मांगता हूँ मैं
वाणी का वरद् सुत बन के जिऊँ मैं यहाँ
हंसवाहिनी ये अधिकार मांगता हूँ मैं

शारदे दे ऐसा वरदान कि मुखर करे
पीड़ितों के दिल की पुकार मेरी कविता
जहाँ सच मौन की घुटन में सिसकता हो
वहाँ बन जाए ललकार मेरी कविता
यौवनों में डोले बन प्यार मेरी कविता; औ
पीढ़ियों में घोले संस्कार मेरी कविता
निराशा औ तेजहीनता की सूखी धरती पे
बने आशाओं की जलधार मेरी कविता

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, February 14, 2002

इबादत

उनकी बातों में इक इबारत है
उनसे मिलना भी इक इबादत है
इस ज़मीं के ख़ुदा हैं वो बन्दे
जिनके दिल में कहीं मुहब्बत है

✍️ चिराग़ जैन

Friday, February 1, 2002

कविता

ज्वार भावनाओं का जो मन में उमड़ता है
तब आखरों का रूप धरती है कविता
आस-पास घट रहे हादसों की कीचड़ में
कुमुदिनी बन के उभरती है कविता
प्रेयसी के रूप में सँवरती है कविता; औ
शहीदों की अरथी पे झरती है कविता
लोग मानते हैं काग़जों पे लिखी जा रही है
कवि जानते हैं कि उतरती है कविता

‘रश्मिरथी’ में ‘रेणुका’ में ‘सामधेनियों’ में
दिनकर बन के दमकती है कविता
सूर, रसख़ान जैसे साधुओं में बसती है
निराला की ‘बेला’ में झलकती है कविता
कभी घुंघरुओं में ख़नकती है कविता; औ
कभी ‘मधुशाला’ में छलकती है कविता
कभी महादेवी-सा बिरह झेलती है; कभी
आँसुओं की धार में ढलकती है कविता

✍️ चिराग़ जैन