Saturday, December 28, 2002

ज़ख़्म कौन धोएगा

भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा

बम्बई ने जो धमाकों के ज़ख़्म खाए हैं
भूखे बच्चे जो गोधरा में बिलबिलाए हैं
मंदिरों में भी धमाकों की गूंज उठती हैं
आज हिन्दोस्तां में अरथियाँ भी लुटती हैं
किसी मासूम की जब आह सुनी जाती है
तो ख़यालों में यही बात सरसराती है
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा

जब दरिंदों ने अयोध्या में ज़्ाुल्म ढाया था
जहाँ लाशों का समन्दर-सा लहलहाया था
काश इन्सान को इन्सान दिखाई देते
न तो हिन्दू न मुसलमान दिखाई देते
काश हिन्दोस्तां एक प्यार का क़स्बा होता
सबकी आँखों में एतबार का जज़्बा होता
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा

जिसने इस देश की ख़ातिर लहू बहाया था
जिसकी ललकार से अंग्रेज कँपकँपाया था
जिनको दुश्मन ने कोल्हुओं के साथ पेला था
जिनकी पीठों ने चाबुकों का दर्द झेला था
उन शहीदों के भी अरमान पूछते होंगे
आज अल्लाह और राम पूछते होंगे
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा

आज मरहम की ज़रूरत है तो मरहम बाँटें
क्या ज़रूरी है कि ख़ुशियों की जगह ग़म बाँटें
आओ हम इतने क़रीब आएँ कि दूरी न रहे
आओ ऐसे जिएँ कि मरना ज़रूरी न रहे
आओ इतने दिए जलाएँ कि ना रात आएँ
किसी के जे़ह्न में फिर ये न ख़यालात आएँ
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, December 3, 2002

अहसास

मेरे गीतों में मेरे प्रेम का विश्वास बिखरा है
कहीं पतझर ख़नकता है कहीं मधुमास बिखरा है
मेरी बातें दिलों को इसलिए छूकर गुज़रती हैं
कि इन बातों में कोई अनछुआ अहसास बिखरा है

✍️ चिराग़ जैन

Monday, November 25, 2002

मानव की तस्वीर

पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है
दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है
हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो
हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है

✍️ चिराग़ जैन

Monday, November 4, 2002

दीपावली

अमावस के आकाश में रौशनी का खेल
माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल
चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई
और आग में जलती देश की कमाई
मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है
और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है
क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश?
क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन है दीपकों के पास?
क्या सड़क को भूखों से ज़्यादा भूख लगती है?
क्या मेरे देश में फूँकने के लिये भी कमाई बचती है?

काश,
ये सारे प्रश्न
हमारी राहों से सदा-सदा के लिये मिट जायें
इसी कामना के साथ संभव हैं
दीपावली की शुभकामनाएँ।

✍️ चिराग़ जैन

Friday, November 1, 2002

स्वार्थ

तीर कोरे स्वार्थ के जब तरकशों से जुड़ गए
बाम पर बैठे कबूतर फड़फड़ाकर उड़ गए
स्वार्थ शामिल हो गया जब से हमारी सोच में
पग हमारे ख़ुद-ब-ख़ुद राहे-गुनाह पर मुड़ गए

✍️ चिराग़ जैन

Monday, October 28, 2002

तमन्ना

है तमन्ना यही प्यार जीता रहे
सबका जीवन गुनाहों से रीता रहे
भावना सब के दिल में यही जन्म ले
दुख मैं पीता रहूँ सुख तू पीता रहे 

✍️ चिराग़ जैन

Friday, October 11, 2002

मन में श्रद्धा हो तो

प्रेमी को प्रेमी का होना भर ही काफ़ी होता है
मन में श्रद्धा हो तो इक पत्थर ही काफ़ी होता है
ग़ैरों के संग रहना महलों में भी रास न आएगा
अपनापन मिल जाए तो कच्चा घर ही काफ़ी होता है

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, September 15, 2002

जो है वही कहना

किसी भी चोट को सहना बड़ा दुश्वार होता है
जु़बां हो और चुप रहना बड़ा दुश्वार होता है
ये माना दर्द को अभिव्यक्त करना भी ज़रूरी है
मगर जो है वही कहना बड़ा दुश्वार होता है

✍️ चिराग़ जैन

Monday, September 9, 2002

गुड्डी

गुड्डी के पापा
लन्च में टिफ़िन खोलते समय
मूंद लेते हैं आँखों को
क्योंकि देख नहीं पाते हैं
रोटियों से झाँकते
तवे के सुराखों को।

ईमानदार क्लर्क
समझ नहीं सकता है
क़िस्मत की गोटियों को
इसलिए चुपचाप निगल लेता है
बोलती हुई रोटियों को।

गुड्डी अक्सर लेट पहुँचती है स्कूल
नहीं करती कोई भूल
क्योंकि स्कूल का नियम है
कि लेट-स्टूडेंट्स के लिए
दो डन्डे ही काफ़ी हैं
और डर्टी-यूनिफ़ॉर्मर्स के लिए
चार भी कम हैं;

..इस प्रकार
अपनी बुध्दिमत्ता का प्रयोग कर
छोटी बच्ची
बोनस पिटाई से बच निकलती है
क्योंकि स्कूल की यूनिफॉर्म-सुपरवाइज़र
लेट-स्टूडेंट्स की
ड्रेस-चेकिंग नहीं करती है।

गुड्डी की माँ
अक्सर चिड़चिड़ाती है
सारा दिन बड़बड़ाती है
छोटी-छोटी चीजों के लिए
मन को मसोसती है
और जब कहीं वश नहीं चलता
तो गुड्डी और उसके पापा को कोसती है-

”…भगवान ऐसी औलाद
किसी को न दे
…अरी! मुझे कहीं से
थोड़ा-सा ज़हर ला दे
…कम से कम सारा दिन चीखने से बचूँगी
..इस परिवार के पीछे झींखने से बचूँगी
जीना हराम कर दिया है
..दो-हज़ार रुपल्ली घर में देकर समझते हैं
कि बहुत बड़ा काम कर दिया है।
….हफ्ते भर में ही
कपड़ों का जोड़ा बदलते हैं
..शान तो ऐसी है
जैसे बाप-दादों के कारखाने चलते हैं।

..ऐसी ही औलाद है
इसे भी हमेशा भूतनी-सी चढ़ती है
….जब बर्तन माँझती है
तो तवे को ईंट से रगड़ती है
..रगड़-रगड़ कर
तवे में सुराख़ कर डाला है
….समझती ही नहीं
तवा तो तवा है
…अपना तो भाग्य ही काला है।”

……दूर खड़ा हो देखता हँ
तो पाता हूँ
कि ग़रीबी की सुरसा
माँ की ममता को लील गई है
भोली बच्ची के बचपन को
मजबूरी की कीलों से कील गई है।

….गुड्डी
माँ के डर से
चुन्नी के फटेपन को
सिलवटों में छिपा लेती है।

….माँ
घर की ग़रीबी को
उधड़े आँचल में दबा लेती है।

और गुड्डी का बाप
ये सब कुछ देख
फूट-फूट कर रो पड़ता है
..क्योंकि एक ईमानदार क्लर्क
ईमानदारी के ज़ुर्म में
रोने के सिवाय
और कर भी क्या सकता है….!!

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, September 8, 2002

कल की छोड़ो, कल का क्या है

ऐसा मत सोचो कि जब सब सोचेंगे तब सोचेंगे
पहले हम सोचेंगे तब ही तो इक दिन सब सोचेंगे

आख़िर बंदूकों से ही जब सारे काम निकलने हैं
आयत रटने से क्या हासिल अहले-मक़तब सोचेंगे

दो और दो को पाँच बनाने की तरक़ीबें क्या होंगीं
इस उलझन का हल कुर्सी पर बैठे साहब सोचेंगे

आज जिन्हें मीठी लगती हैं, मेरी कड़वी बातें भी
कल वो मीठी बातों के भी कड़वे मतलब सोचेंगे

कल की चिन्ताओं पर अपना आज निछावर क्या करना
कल की छोड़ो, कल का क्या है, आएगा तब सोचेंगे

✍️ चिराग़ जैन