बात यहीं से हो शुरू, और यहीं हो बन्द
जीवन को कुछ यूँ जियो, जैसे दोहा छन्द
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Monday, January 13, 2003
Friday, January 3, 2003
मज़ा उनको भी आता है
अजब सी बात होती है मुहब्बत के तराने में
क़तल दर क़त्ल होते हैं सनम के मुस्कुराने में
मज़ा हमको भी आता है मज़ा उनको भी आता है
उन्हें नज़रें चुराने में हमें नज़रें मिलाने में
✍️ चिराग़ जैन
क़तल दर क़त्ल होते हैं सनम के मुस्कुराने में
मज़ा हमको भी आता है मज़ा उनको भी आता है
उन्हें नज़रें चुराने में हमें नज़रें मिलाने में
✍️ चिराग़ जैन
Monday, December 30, 2002
अन्तर
अन्तस् की पावन भोगभूमि
और मानस की पवित्र भावभूमि पर बसी
अधरों की सौम्यता।
लोचनयुगल में अनवरत प्रवाहमान
विश्वास की पारदर्शी भागीरथी
अनायास ही छलक पड़ती है
सागरमुक्ता-सी
दन्तपंक्ति के पार्श्व से प्रस्फुटित
निश्छल खिलखिलाहट के साथ।
और इस पल को
शब्दों में बांधने के
निरर्थक प्रयास करके
कसमसाकर रह जाता है शब्दकोश।
अप्रासंगिक लगने लगती हैं
सृष्टि की समस्त लौकिक-पारलौकिक उपमाएँ
क्योंकि
बहुत अन्तर होता है
उपमान और उपमेय में!
✍️ चिराग़ जैन
और मानस की पवित्र भावभूमि पर बसी
अधरों की सौम्यता।
लोचनयुगल में अनवरत प्रवाहमान
विश्वास की पारदर्शी भागीरथी
अनायास ही छलक पड़ती है
सागरमुक्ता-सी
दन्तपंक्ति के पार्श्व से प्रस्फुटित
निश्छल खिलखिलाहट के साथ।
और इस पल को
शब्दों में बांधने के
निरर्थक प्रयास करके
कसमसाकर रह जाता है शब्दकोश।
अप्रासंगिक लगने लगती हैं
सृष्टि की समस्त लौकिक-पारलौकिक उपमाएँ
क्योंकि
बहुत अन्तर होता है
उपमान और उपमेय में!
✍️ चिराग़ जैन
Saturday, December 28, 2002
ज़ख़्म कौन धोएगा
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा
बम्बई ने जो धमाकों के ज़ख़्म खाए हैं
भूखे बच्चे जो गोधरा में बिलबिलाए हैं
मंदिरों में भी धमाकों की गूंज उठती हैं
आज हिन्दोस्तां में अरथियाँ भी लुटती हैं
किसी मासूम की जब आह सुनी जाती है
तो ख़यालों में यही बात सरसराती है
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
जब दरिंदों ने अयोध्या में ज़्ाुल्म ढाया था
जहाँ लाशों का समन्दर-सा लहलहाया था
काश इन्सान को इन्सान दिखाई देते
न तो हिन्दू न मुसलमान दिखाई देते
काश हिन्दोस्तां एक प्यार का क़स्बा होता
सबकी आँखों में एतबार का जज़्बा होता
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
जिसने इस देश की ख़ातिर लहू बहाया था
जिसकी ललकार से अंग्रेज कँपकँपाया था
जिनको दुश्मन ने कोल्हुओं के साथ पेला था
जिनकी पीठों ने चाबुकों का दर्द झेला था
उन शहीदों के भी अरमान पूछते होंगे
आज अल्लाह और राम पूछते होंगे
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
आज मरहम की ज़रूरत है तो मरहम बाँटें
क्या ज़रूरी है कि ख़ुशियों की जगह ग़म बाँटें
आओ हम इतने क़रीब आएँ कि दूरी न रहे
आओ ऐसे जिएँ कि मरना ज़रूरी न रहे
आओ इतने दिए जलाएँ कि ना रात आएँ
किसी के जे़ह्न में फिर ये न ख़यालात आएँ
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा
✍️ चिराग़ जैन
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा
बम्बई ने जो धमाकों के ज़ख़्म खाए हैं
भूखे बच्चे जो गोधरा में बिलबिलाए हैं
मंदिरों में भी धमाकों की गूंज उठती हैं
आज हिन्दोस्तां में अरथियाँ भी लुटती हैं
किसी मासूम की जब आह सुनी जाती है
तो ख़यालों में यही बात सरसराती है
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
जब दरिंदों ने अयोध्या में ज़्ाुल्म ढाया था
जहाँ लाशों का समन्दर-सा लहलहाया था
काश इन्सान को इन्सान दिखाई देते
न तो हिन्दू न मुसलमान दिखाई देते
काश हिन्दोस्तां एक प्यार का क़स्बा होता
सबकी आँखों में एतबार का जज़्बा होता
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
जिसने इस देश की ख़ातिर लहू बहाया था
जिसकी ललकार से अंग्रेज कँपकँपाया था
जिनको दुश्मन ने कोल्हुओं के साथ पेला था
जिनकी पीठों ने चाबुकों का दर्द झेला था
उन शहीदों के भी अरमान पूछते होंगे
आज अल्लाह और राम पूछते होंगे
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
आज मरहम की ज़रूरत है तो मरहम बाँटें
क्या ज़रूरी है कि ख़ुशियों की जगह ग़म बाँटें
आओ हम इतने क़रीब आएँ कि दूरी न रहे
आओ ऐसे जिएँ कि मरना ज़रूरी न रहे
आओ इतने दिए जलाएँ कि ना रात आएँ
किसी के जे़ह्न में फिर ये न ख़यालात आएँ
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, December 3, 2002
अहसास
मेरे गीतों में मेरे प्रेम का विश्वास बिखरा है
कहीं पतझर ख़नकता है कहीं मधुमास बिखरा है
मेरी बातें दिलों को इसलिए छूकर गुज़रती हैं
कि इन बातों में कोई अनछुआ अहसास बिखरा है
✍️ चिराग़ जैन
कहीं पतझर ख़नकता है कहीं मधुमास बिखरा है
मेरी बातें दिलों को इसलिए छूकर गुज़रती हैं
कि इन बातों में कोई अनछुआ अहसास बिखरा है
✍️ चिराग़ जैन
Monday, November 25, 2002
मानव की तस्वीर
पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है
दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है
हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो
हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है
✍️ चिराग़ जैन
दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है
हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो
हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है
✍️ चिराग़ जैन
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Monday, November 4, 2002
दीपावली
अमावस के आकाश में रौशनी का खेल
माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल
चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई
और आग में जलती देश की कमाई
मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है
और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है
क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश?
क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन है दीपकों के पास?
क्या सड़क को भूखों से ज़्यादा भूख लगती है?
क्या मेरे देश में फूँकने के लिये भी कमाई बचती है?
काश,
ये सारे प्रश्न
हमारी राहों से सदा-सदा के लिये मिट जायें
इसी कामना के साथ संभव हैं
दीपावली की शुभकामनाएँ।
✍️ चिराग़ जैन
माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल
चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई
और आग में जलती देश की कमाई
मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है
और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है
क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश?
क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन है दीपकों के पास?
क्या सड़क को भूखों से ज़्यादा भूख लगती है?
क्या मेरे देश में फूँकने के लिये भी कमाई बचती है?
काश,
ये सारे प्रश्न
हमारी राहों से सदा-सदा के लिये मिट जायें
इसी कामना के साथ संभव हैं
दीपावली की शुभकामनाएँ।
✍️ चिराग़ जैन
Friday, November 1, 2002
स्वार्थ
तीर कोरे स्वार्थ के जब तरकशों से जुड़ गए
बाम पर बैठे कबूतर फड़फड़ाकर उड़ गए
स्वार्थ शामिल हो गया जब से हमारी सोच में
पग हमारे ख़ुद-ब-ख़ुद राहे-गुनाह पर मुड़ गए
✍️ चिराग़ जैन
बाम पर बैठे कबूतर फड़फड़ाकर उड़ गए
स्वार्थ शामिल हो गया जब से हमारी सोच में
पग हमारे ख़ुद-ब-ख़ुद राहे-गुनाह पर मुड़ गए
✍️ चिराग़ जैन
Monday, October 28, 2002
तमन्ना
है तमन्ना यही प्यार जीता रहे
सबका जीवन गुनाहों से रीता रहे
भावना सब के दिल में यही जन्म ले
दुख मैं पीता रहूँ सुख तू पीता रहे
✍️ चिराग़ जैन
सबका जीवन गुनाहों से रीता रहे
भावना सब के दिल में यही जन्म ले
दुख मैं पीता रहूँ सुख तू पीता रहे
✍️ चिराग़ जैन
Friday, October 11, 2002
मन में श्रद्धा हो तो
प्रेमी को प्रेमी का होना भर ही काफ़ी होता है
मन में श्रद्धा हो तो इक पत्थर ही काफ़ी होता है
ग़ैरों के संग रहना महलों में भी रास न आएगा
अपनापन मिल जाए तो कच्चा घर ही काफ़ी होता है
✍️ चिराग़ जैन
मन में श्रद्धा हो तो इक पत्थर ही काफ़ी होता है
ग़ैरों के संग रहना महलों में भी रास न आएगा
अपनापन मिल जाए तो कच्चा घर ही काफ़ी होता है
✍️ चिराग़ जैन
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