Friday, January 16, 2004

यादों के ताजमहल में

मैंने मुस्कानें भोगी हैं अब मैं ग़म भी सह लूँगा
स्मृतियाँ दिल में उफनीं तो आँसू बनकर बह लूँगा
तुम सपनों की बुनियादों पर रँगमहल चिनवा लेना
मैं यादों के ताजमहल में शासक बनकर रह लूँगा

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 9, 2004

वो भी दीपक ही है

ये अंधेरा दिए से डरता है
या फ़क़त एहतराम करता है
वो भी दीपक ही है जो सारा दिन
रात होने की दुआ करता है

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, January 6, 2004

तनहा रोते हैं

जीवन बीता घातों में प्रतिघातों में
दौलत की शतरंजी चाल-बिसातों में
दुनियादारी के ही वाद-विवादों में
अब तनहा रोते हैं काली रातों में

जिस धरती पर सम्बन्धों को उगना था
हम उस पर दौलत की फसल लगा आए
जिन आँखों में सीधे-सादे सपने थे
उनको दौलत का अरमान थमा आए
एक अदद इन्सान कमाना ना आया
यूँ चांदी के सिक्के खूब कमा लाए
अपने ही भीतर से उखड़े-उखड़े हैं
सारे जग पर अपनी धाक् जमा आए
जीवन का सब वक़्त सुनहरा काट दिया
बिन मतलब, बेकार फिजूली बातों में

हमने महलों में भी तनहाई भोगी
उनके चैपालों पर शाही ठाठ रहे
हमने अपनों के भी दर्द नहीं बाँटे
उनको ग़ैरों के भी मरहम याद रहे
हाथ हमारे दौलत खूब रही लेकिन
उनके हाथों में अपनों के हाथ रहे
हम सुख में भी निपट अकेले होते थे
वे दुख में भी सम्बन्धों के साथ रहे
अब समझा है राम तुम्हें क्या स्वाद मिला
शबरी के जूठे फल, कच्चे भातों में

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, December 16, 2003

दिल में आह बाक़ी है

जब तलक़ दिल में आह बाक़ी है
तब तलक़ वाह-वाह बाक़ी है

अब कहाँ कोई ज़ुल्म ढाता है
ये पुरानी कराह बाक़ी है

ख्वाब सारे फ़ना हुए लेकिन
देखिए ख्वाबगाह बाक़ी है

मैंने सब कुछ लुटा दिया लेकिन
अब भी इक ख़ैरख्वाह बाक़ी है

जिस्म को रूह छोड़ती ही नहीं
हो न हो कोई चाह बाक़ी है

ज़िन्दगानी भटक गई तो क्या
हर जगह एक राह बाक़ी है

कट चुका है शजर कभी का मगर
अब भी धरती पे छाह बाक़ी है

मिरे दिल को कचोटता है बहुत
मुझमें मेरा ग़ुनाह बाक़ी है

मिरी यादों के शामियाने में
एक भीगी निगाह बाक़ी है

✍️ चिराग़ जैन

Friday, November 21, 2003

हादसा थी ज़िन्दगी

हादसा थी ज़िन्दगी, होता रहा जो उम्र भर
दौलते-लमहात थी, खोता रहा जो उम्र भर

कौन समझे उसके अश्क़ों की ढलकती दास्तां
बस दरख़तों से लिपट, रोता रहा जो उम्र भर

अब तो कलियों से भी उसकी पीठ क़तराने लगी
पत्थरों को गुल समझ ढोता रहा जो उम्र भर

इक न इक दिन उसका घर अश्क़ों में डूबेगा ज़रूर
सबके आंगन में हँसी बोता रहा जो उम्र भर

मौत को देखा तो वो भी कसमसा कर रो दिया
ज़िन्दगी को बोझ-सा ढोता रहा जो उम्र भर

मौत ने आकर जगाया तो सुबककर रो पड़ा
ऑंख में सपने लिए सोता रहा जो उम्र भर

मौत जब आई तो मौक़ा देखते ही बेहिचक
उड़ गया पिंजरे में इक तोता रहा जो उम्र भर

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, November 12, 2003

गीत गढ़ने का हुनर

मसख़रों की मसख़री अपनी जगह
शायरों की शायरी अपनी जगह
गीत गढ़ने का हुनर कुछ और है
मंच की बाज़ीगरी अपनी जगह

✍️ चिराग़ जैन

Monday, November 3, 2003

अंदाज़ा न कर

पीर की ज़द का अंदाज़ा न कर
कल की आफ़त का अंदाज़ा न कर

ज़ख़्म गहरा है दर्द होगा ही
अब रियायत का अंदाज़ा न कर

वक़्त पर ख़ुद-ब-ख़ुद पनपती है
यूँ ही हिम्मत का अंदाज़ा न कर

बीज में पेड़ छिपा होता है
क़द से ताक़त का अंदाज़ा न कर

सिर्फ़ दो दिन की मुलाक़ातों से
उनकी आदत का अंदाज़ा न कर

हँस के मिलना तो उसकी आदत है
इससे उल्फ़त का अंदाज़ा न कर

इसमें मुमक़िन है हर कोई मंज़र
इस सियासत का अंदाज़ा न कर

सिर्फ़ जामे को देखकर उसकी
बादशाहत का अंदाज़ा न कर

चाहता हूँ तुझे मीरा होकर
तू इबादत का अंदाज़ा न कर

जिसने मांगा न हो कभी कुछ भी
उसकी चाहत का अंदाज़ा न कर

✍️ चिराग़ जैन

Monday, October 20, 2003

दीपावली

जीवन बाती से जुड़े, पुरुषार्थों की आग
हर आंगन संदीप्त हो, जाय अंधेरा भाग ॥

दिव्य-दिव्य हों कल्पना, दिव्य-दिव्य हों रंग।
दिव्य अल्पनाएँ बनें, हों सब दिव्य प्रसंग ॥

पावन पुष्पों से गुँथें, ऐसे बन्धनवार।
जिन्हें लगाकर सज उठें, सबके तोरणद्वार ॥

भोर समीरों में घुलें, गेंदे के मकरंद।
सांझ ढले कर्पूर की, हर दिसि भरे सुगन्ध ॥

लक्ष्मी का अवतार हो, हाथ लिए संतोष।
जिससे खाली हो सकें, सभी लालसा कोष॥

पथ पर हो दीपावली, मन में हो मकरंद।
वाणी में मिष्ठान्न हो, जीवन में आनंद॥

मन दशरथ, केकैयी कुमति, देह अयोध्या धाम।
तृष्णा इक वनवास है, सुख के क्षण श्रीराम॥

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, October 12, 2003

व्यस्तता

जब तक तुम संग थीं
मैंने नहीं तलाशी कोई ख़ुशी
नहीं खोजी कोई मुस्कान
नहीं ढूँढ़ी कोई हँसी
...ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

अब तलाशता फिरता हूँ
एक-मासूम सी ख़ुशी
अपने दिल के लिये।
एक कोमल-सी मुस्कान
अपने होंठों के लिये।
एक गीली-सी हँसी
अपने चेहरे के लिये।
और एक पावन-सी चमक
अपनी आँखों के लिये।

लेकिन रीती ही रह जाती है
तलाशों का जल भरने के लिए बढ़ती
छोटी-सी अंजुरी।

दूर तक यात्रा करने के बाद
पलकों के भीतर
लौट आती हैं गीली निगाहें
और देर तक इंतज़ार करने के बाद
थककर बैठ जाता हूँ मैं।

हाय राम!
खुशियों को भी
अभी व्यस्त होना था!

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, October 4, 2003

कुछ तो होगी बात

रावण के व्यक्तित्व में, कुछ तो होगी बात
जिसे मारने जन्म लें, तीन लोक के नाथ

✍️ चिराग़ जैन