Tuesday, July 13, 2004

वक़्त का हिण्डोला

घर के मुख्य द्वार की
देहलीज पर बैठकर
दफ़्तर से लौटते पापा की
राह तकतीं
नन्हीं-नन्हीं आँखें
रोज़ शाम
आशावादी दृष्टिकोण से
निहारती थीं
सड़क की ओर
...कि पापा
लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी
हमारे लिए।

लेकिन लुप्त हो रही है
ये स्नेहिल परंपरा
पिछले कुछ वर्षों से
बच नहीं पाती अब
वह चिल्लड़
जिसे ख़नकाकर
चिज्जी ख़रीदते थे पापा
हर शाम
दफ़्तर से लौटते वक़्त
अपने बच्चों के लिए!

ख़र्च हो गई है
सारी रेज़गारी
रोज़गार की तलाश में
और मोटी-मोटी किताबों के बीच
ग़ुम हो गया है
वक़्त का वह हिण्डोला
जिसमें बैठकर
राह तकते थे बच्चे
दफ़्तर से लौटते पापा की।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, July 12, 2004

वर्तमान

मुझे बेबस दिलों में पल रहे अरमान लिखने हैं
ग़रीबों के घरों के दर्द और तूफ़ान लिखने हैं
कभी मौक़ा मिलेगा तो चमन की बात कर लूंगा
अभी फुटपाथ के गलते हुए इन्सान लिखने हैं

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, July 7, 2004

सियासत का ज़हर

सच के मंतर से सियासत का ज़हर काट दिया
हाँ, ज़रा रास्ता मुश्क़िल था, मगर काट दिया

वक्ते-रुख़सत तिरी ऑंखों की तरफ़ देखा था
फिर तो बस तेरे तख़य्युल में सफ़र काट दिया

फिर से कल रात मिरी मुफ़लिसी के ख़ंज़र ने
मिरे बच्चों की तमन्नाओं का पर काट दिया

सिर्फ़ शोपीस से कमरे को सजाने के लिए
हाय ख़ुदगर्ज़ ने खरगोश का सर काट दिया

एक छोटा-सा दिठौना मिरे माथे पे लगा
बद्दुआओं का मिरी माँ ने असर काट दिया

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, June 22, 2004

भाग्यवाद

यहाँ प्रारब्ध का लेखा सिकन्दर तक ने भोगा है
पड़ोसी की ख़ताओं को समन्दर तक ने भोगा है
बहुत चाहा बचाना राम ने रावण को मरने से
मग़र जो लिख गया वो तो कलन्दर तक ने भोगा है

✍️ चिराग़ जैन

Friday, June 18, 2004

जीत की चाहत

चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं
नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं

जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर
अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं

बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त
जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं

मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश पर
चंद ग़ज़लें चुटकुलों के बीच आकर मर गईं

वो लम्हा जब झूठ की महफ़िल में सच दाखिल हुआ
साज़िशें उस एक पल में हड़बड़ा कर मर गईं

क्या इसी पल के लिए करता था गुलशन इंतज़ार
जब बहार आई तो कलियाँ खिलखिला कर मर गईं

जिन दीयों में तेल कम था, उन दीयों की रोशनी
तेज़ चमकी और पल में डगमगा कर मर गईं

दिल कहे है- प्रेम में उतरी तो मीरा जी उठीं
अक्ल बोले- बावरी थीं, दिल लगाकर मर गईं

ये ज़माने की हक़ीक़त है, बदल सकती नहीं
बिल्लियाँ शेरों को सारे गुर सिखाकर मर गईं

✍️ चिराग़ जैन

Friday, May 28, 2004

कोई गीत नहीं लिखा

तुम रूठी तो मैंने रोकर, कोई गीत नहीं लिखा
इस ग़म में दीवाना होकर, कोई गीत नहीं लिखा
तुम जब तक थीं साथ तभी तक नज़्में-ग़ज़लें ख़ूब कहीं
लेकिन साथ तुम्हारा खोकर कोई गीत नहीं लिखा

प्यार भरे लम्हों की इक पल याद नहीं दिल से जाती
मन भर-भर आता है फिर भी साँस नहीं रुकने पाती
उखड़ा-उखड़ा रहता हूँ पर जीवन चलता रहता है
शायद मैंने खण्डित की है प्रेमनगर की परिपाटी
इस पीड़ा में नयन भिगोकर कोई गीत नहीं लिखा

रोज़ सजानी थी नग़्मों में प्रेम-वफ़ा की परिभाषा
और जतानी थी फिर से मिलने की अंतिम अभिलाषा
प्रश्न उठाने थे तुम पर या ख़ुद को दोषी कहना था
या फिर ईश्वर के आगे रखनी थी कोई जिज्ञासा
मैंने अब तक आख़िर क्योंकर कोई गीत नहीं लिखा

संबंधों की पीड़ा भी है, भीतर का खालीपन भी
मुझसे घण्टों बतियाता रहता है मेरा दरपन भी
हर पल भाव घुमड़ते रहते हैं मेरे मन के भीतर
नम पलकों से हो ही जाता है आँसू का तर्पण भी
इतना सब सामान संजोकर कोई गीत नहीं लिखा

सारी दुनिया को कैसे बतलाऊंगा अपनी बातें
आकर्षण, अपनत्व, समर्पण या पीड़ा की बरसातें
जिन बातों को हम-तुम बस आँखों-आँखों में करते थे
क्या शब्दों में बंध पाएंगी वो भावों की सौगातें
इन प्रश्नों से आहत होकर कोई गीत नहीं लिखा

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, May 27, 2004

तू भी सब-सा निकला

जो जितना भी सच्चा निकला
वो उतना ही तनहा निकला

सुख के छोटे-से क़तरे में
ग़म का पूरा दरिया निकला

कुछ के वरक़ ज़रा महंगे थे
माल सभी का हल्का निकला

मैंने तुझको ख़ुद-सा समझा
लेकिन तू भी सब-सा निकला

कौन यहाँ कह पाया सब कुछ
कम ही निकला जितना निकला

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, May 2, 2004

हमने देखे हैं कई साथ निभाने वाले

हमने देखे हैं कई साथ निभाने वाले
बरगला लेंगे तुझे भी ये ज़माने वाले

बारिशों में ये नदी कैसा कहर ढाती है
ये बताएंगे तुझे इसके मुहाने वाले

धूप जिस पल मिरे आंगन में उतर आएगी
और जल जाएंगे दीवार उठाने वाले

मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ाने वाले

रास्ते सच के बहुत तंग, बहुत मुश्क़िल हैं
सोच ले ये भी ज़रा जोश में आने वाले

अपनी ऑंखों को भी सिखला ले हुनर धोखे का
झूठी बातों से हक़ीक़त को छिपाने वाले

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, April 22, 2004

नए नग़मे सजा लेना

मैं जहाँ भी रहूँ मुझको ख़ुशी मिल जाएगी
बस मेरे गीत गुनगुना के मुस्कुरा देना
जब मेरे गीत इस जहान के काबिल न रहें
नए नग़मे सजा लेना मुझे भुला देना

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, April 3, 2004

भगवान महावीर

जो क़ामयाब हो जाए ज़रा, वो बदगुमान हो जाता है
जो फूल गया सत्तामद में, मूरख समान हो जाता है
जो लक्ष्मी के पीछे भागे, वो अर्थवान हो जाता है
लक्ष्मी जिसके पीछे भागे वो वर्द्धमान हो जाता है

✍️ चिराग़ जैन