अंधेरों की कहानी आफ़ताबों में नही मिलती
हक़ीक़त की निशानी चंद ख़्वाबों में नहीं मिलती
हमारे दर्द को महसूस करने की ज़रूरत है
हमारी ज़िंदगानी इन किताबों में नहीं मिलती
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Thursday, July 15, 2004
Tuesday, July 13, 2004
कुछ देर मिलन के बाद
दो पल को प्यास मिटाकर तुम घंटों तड़पाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
जब जाड़े की सुबह में तन को धूप सुहाने लगती है
सबकी आँखों में जब अलसाई मस्ती छाने लगती है
जब उस मीठे-मीठे मौसम में नींद-सी आने लगती है
बस तभी अचानक हवा रंग में भंग मिलाने लगती है
ज्यों छोटी-छोटी सी बदली सूरज पर हावी हो जाएँ
ख़ुशियाँ भी जाते-जाते ज्यों यादों के काँटे बो जाएँ
बस ऐसा ही लगता है जब तुम घड़ी दिखाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
जैसे कटने से पहले ही फ़सलों पर पाला पड़ जाए
जैसे किसान के आंगन में मौसम का मूड बिगड़ जाए
जैसे सुन्दर सपने से जग जाना दिल को दुख देता है
जैसे घर के आंगन का बँट जाना आँखें भर देता है
जैसे मासूम परिंदों को सैयादों से डर लगता है
जैसे सजनी को साजन के बिन सूना-सा घर लगता है
बस ऐसा ही लगता है जब तुम पर्स उठाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
जैसे चकवे के बिन चकवी का जीना दूभर होता है
जैसे सीता का हृदय राम बिन सुबक-सुबक कर रोता है
जैसे रस-रंग-गंध के बिन हर पुष्प वृथा-सा लगता है
जैसे कन्हा का मुख राधा की करुण व्यथा-सा लगता है
जैसे लक्ष्मण की पत्नी के रोने पर भी पाबन्दी हों
जैसे सुग्रीवों की मुस्कानें बाली के घर बन्दी हों
बस ऐसा ही लगता है जब तुम हाथ हिलाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
✍️ चिराग़ जैन
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
जब जाड़े की सुबह में तन को धूप सुहाने लगती है
सबकी आँखों में जब अलसाई मस्ती छाने लगती है
जब उस मीठे-मीठे मौसम में नींद-सी आने लगती है
बस तभी अचानक हवा रंग में भंग मिलाने लगती है
ज्यों छोटी-छोटी सी बदली सूरज पर हावी हो जाएँ
ख़ुशियाँ भी जाते-जाते ज्यों यादों के काँटे बो जाएँ
बस ऐसा ही लगता है जब तुम घड़ी दिखाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
जैसे कटने से पहले ही फ़सलों पर पाला पड़ जाए
जैसे किसान के आंगन में मौसम का मूड बिगड़ जाए
जैसे सुन्दर सपने से जग जाना दिल को दुख देता है
जैसे घर के आंगन का बँट जाना आँखें भर देता है
जैसे मासूम परिंदों को सैयादों से डर लगता है
जैसे सजनी को साजन के बिन सूना-सा घर लगता है
बस ऐसा ही लगता है जब तुम पर्स उठाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
जैसे चकवे के बिन चकवी का जीना दूभर होता है
जैसे सीता का हृदय राम बिन सुबक-सुबक कर रोता है
जैसे रस-रंग-गंध के बिन हर पुष्प वृथा-सा लगता है
जैसे कन्हा का मुख राधा की करुण व्यथा-सा लगता है
जैसे लक्ष्मण की पत्नी के रोने पर भी पाबन्दी हों
जैसे सुग्रीवों की मुस्कानें बाली के घर बन्दी हों
बस ऐसा ही लगता है जब तुम हाथ हिलाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
✍️ चिराग़ जैन
वक़्त का हिण्डोला
घर के मुख्य द्वार की
देहलीज पर बैठकर
दफ़्तर से लौटते पापा की
राह तकतीं
नन्हीं-नन्हीं आँखें
रोज़ शाम
आशावादी दृष्टिकोण से
निहारती थीं
सड़क की ओर
...कि पापा
लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी
हमारे लिए।
लेकिन लुप्त हो रही है
ये स्नेहिल परंपरा
पिछले कुछ वर्षों से
बच नहीं पाती अब
वह चिल्लड़
जिसे ख़नकाकर
चिज्जी ख़रीदते थे पापा
हर शाम
दफ़्तर से लौटते वक़्त
अपने बच्चों के लिए!
ख़र्च हो गई है
सारी रेज़गारी
रोज़गार की तलाश में
और मोटी-मोटी किताबों के बीच
ग़ुम हो गया है
वक़्त का वह हिण्डोला
जिसमें बैठकर
राह तकते थे बच्चे
दफ़्तर से लौटते पापा की।
✍️ चिराग़ जैन
देहलीज पर बैठकर
दफ़्तर से लौटते पापा की
राह तकतीं
नन्हीं-नन्हीं आँखें
रोज़ शाम
आशावादी दृष्टिकोण से
निहारती थीं
सड़क की ओर
...कि पापा
लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी
हमारे लिए।
लेकिन लुप्त हो रही है
ये स्नेहिल परंपरा
पिछले कुछ वर्षों से
बच नहीं पाती अब
वह चिल्लड़
जिसे ख़नकाकर
चिज्जी ख़रीदते थे पापा
हर शाम
दफ़्तर से लौटते वक़्त
अपने बच्चों के लिए!
ख़र्च हो गई है
सारी रेज़गारी
रोज़गार की तलाश में
और मोटी-मोटी किताबों के बीच
ग़ुम हो गया है
वक़्त का वह हिण्डोला
जिसमें बैठकर
राह तकते थे बच्चे
दफ़्तर से लौटते पापा की।
✍️ चिराग़ जैन
Monday, July 12, 2004
वर्तमान
मुझे बेबस दिलों में पल रहे अरमान लिखने हैं
ग़रीबों के घरों के दर्द और तूफ़ान लिखने हैं
कभी मौक़ा मिलेगा तो चमन की बात कर लूंगा
अभी फुटपाथ के गलते हुए इन्सान लिखने हैं
✍️ चिराग़ जैन
ग़रीबों के घरों के दर्द और तूफ़ान लिखने हैं
कभी मौक़ा मिलेगा तो चमन की बात कर लूंगा
अभी फुटपाथ के गलते हुए इन्सान लिखने हैं
✍️ चिराग़ जैन
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Wednesday, July 7, 2004
सियासत का ज़हर
सच के मंतर से सियासत का ज़हर काट दिया
हाँ, ज़रा रास्ता मुश्क़िल था, मगर काट दिया
वक्ते-रुख़सत तिरी ऑंखों की तरफ़ देखा था
फिर तो बस तेरे तख़य्युल में सफ़र काट दिया
फिर से कल रात मिरी मुफ़लिसी के ख़ंज़र ने
मिरे बच्चों की तमन्नाओं का पर काट दिया
सिर्फ़ शोपीस से कमरे को सजाने के लिए
हाय ख़ुदगर्ज़ ने खरगोश का सर काट दिया
एक छोटा-सा दिठौना मिरे माथे पे लगा
बद्दुआओं का मिरी माँ ने असर काट दिया
✍️ चिराग़ जैन
हाँ, ज़रा रास्ता मुश्क़िल था, मगर काट दिया
वक्ते-रुख़सत तिरी ऑंखों की तरफ़ देखा था
फिर तो बस तेरे तख़य्युल में सफ़र काट दिया
फिर से कल रात मिरी मुफ़लिसी के ख़ंज़र ने
मिरे बच्चों की तमन्नाओं का पर काट दिया
सिर्फ़ शोपीस से कमरे को सजाने के लिए
हाय ख़ुदगर्ज़ ने खरगोश का सर काट दिया
एक छोटा-सा दिठौना मिरे माथे पे लगा
बद्दुआओं का मिरी माँ ने असर काट दिया
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, June 22, 2004
भाग्यवाद
यहाँ प्रारब्ध का लेखा सिकन्दर तक ने भोगा है
पड़ोसी की ख़ताओं को समन्दर तक ने भोगा है
बहुत चाहा बचाना राम ने रावण को मरने से
मग़र जो लिख गया वो तो कलन्दर तक ने भोगा है
✍️ चिराग़ जैन
पड़ोसी की ख़ताओं को समन्दर तक ने भोगा है
बहुत चाहा बचाना राम ने रावण को मरने से
मग़र जो लिख गया वो तो कलन्दर तक ने भोगा है
✍️ चिराग़ जैन
Friday, June 18, 2004
जीत की चाहत
चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं
नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं
जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर
अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं
बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त
जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं
मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश पर
चंद ग़ज़लें चुटकुलों के बीच आकर मर गईं
वो लम्हा जब झूठ की महफ़िल में सच दाखिल हुआ
साज़िशें उस एक पल में हड़बड़ा कर मर गईं
क्या इसी पल के लिए करता था गुलशन इंतज़ार
जब बहार आई तो कलियाँ खिलखिला कर मर गईं
जिन दीयों में तेल कम था, उन दीयों की रोशनी
तेज़ चमकी और पल में डगमगा कर मर गईं
दिल कहे है- प्रेम में उतरी तो मीरा जी उठीं
अक्ल बोले- बावरी थीं, दिल लगाकर मर गईं
ये ज़माने की हक़ीक़त है, बदल सकती नहीं
बिल्लियाँ शेरों को सारे गुर सिखाकर मर गईं
✍️ चिराग़ जैन
नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं
जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर
अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं
बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त
जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं
मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश पर
चंद ग़ज़लें चुटकुलों के बीच आकर मर गईं
वो लम्हा जब झूठ की महफ़िल में सच दाखिल हुआ
साज़िशें उस एक पल में हड़बड़ा कर मर गईं
क्या इसी पल के लिए करता था गुलशन इंतज़ार
जब बहार आई तो कलियाँ खिलखिला कर मर गईं
जिन दीयों में तेल कम था, उन दीयों की रोशनी
तेज़ चमकी और पल में डगमगा कर मर गईं
दिल कहे है- प्रेम में उतरी तो मीरा जी उठीं
अक्ल बोले- बावरी थीं, दिल लगाकर मर गईं
ये ज़माने की हक़ीक़त है, बदल सकती नहीं
बिल्लियाँ शेरों को सारे गुर सिखाकर मर गईं
✍️ चिराग़ जैन
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Friday, May 28, 2004
कोई गीत नहीं लिखा
तुम रूठी तो मैंने रोकर, कोई गीत नहीं लिखा
इस ग़म में दीवाना होकर, कोई गीत नहीं लिखा
तुम जब तक थीं साथ तभी तक नज़्में-ग़ज़लें ख़ूब कहीं
लेकिन साथ तुम्हारा खोकर कोई गीत नहीं लिखा
प्यार भरे लम्हों की इक पल याद नहीं दिल से जाती
मन भर-भर आता है फिर भी साँस नहीं रुकने पाती
उखड़ा-उखड़ा रहता हूँ पर जीवन चलता रहता है
शायद मैंने खण्डित की है प्रेमनगर की परिपाटी
इस पीड़ा में नयन भिगोकर कोई गीत नहीं लिखा
रोज़ सजानी थी नग़्मों में प्रेम-वफ़ा की परिभाषा
और जतानी थी फिर से मिलने की अंतिम अभिलाषा
प्रश्न उठाने थे तुम पर या ख़ुद को दोषी कहना था
या फिर ईश्वर के आगे रखनी थी कोई जिज्ञासा
मैंने अब तक आख़िर क्योंकर कोई गीत नहीं लिखा
संबंधों की पीड़ा भी है, भीतर का खालीपन भी
मुझसे घण्टों बतियाता रहता है मेरा दरपन भी
हर पल भाव घुमड़ते रहते हैं मेरे मन के भीतर
नम पलकों से हो ही जाता है आँसू का तर्पण भी
इतना सब सामान संजोकर कोई गीत नहीं लिखा
सारी दुनिया को कैसे बतलाऊंगा अपनी बातें
आकर्षण, अपनत्व, समर्पण या पीड़ा की बरसातें
जिन बातों को हम-तुम बस आँखों-आँखों में करते थे
क्या शब्दों में बंध पाएंगी वो भावों की सौगातें
इन प्रश्नों से आहत होकर कोई गीत नहीं लिखा
✍️ चिराग़ जैन
इस ग़म में दीवाना होकर, कोई गीत नहीं लिखा
तुम जब तक थीं साथ तभी तक नज़्में-ग़ज़लें ख़ूब कहीं
लेकिन साथ तुम्हारा खोकर कोई गीत नहीं लिखा
प्यार भरे लम्हों की इक पल याद नहीं दिल से जाती
मन भर-भर आता है फिर भी साँस नहीं रुकने पाती
उखड़ा-उखड़ा रहता हूँ पर जीवन चलता रहता है
शायद मैंने खण्डित की है प्रेमनगर की परिपाटी
इस पीड़ा में नयन भिगोकर कोई गीत नहीं लिखा
रोज़ सजानी थी नग़्मों में प्रेम-वफ़ा की परिभाषा
और जतानी थी फिर से मिलने की अंतिम अभिलाषा
प्रश्न उठाने थे तुम पर या ख़ुद को दोषी कहना था
या फिर ईश्वर के आगे रखनी थी कोई जिज्ञासा
मैंने अब तक आख़िर क्योंकर कोई गीत नहीं लिखा
संबंधों की पीड़ा भी है, भीतर का खालीपन भी
मुझसे घण्टों बतियाता रहता है मेरा दरपन भी
हर पल भाव घुमड़ते रहते हैं मेरे मन के भीतर
नम पलकों से हो ही जाता है आँसू का तर्पण भी
इतना सब सामान संजोकर कोई गीत नहीं लिखा
सारी दुनिया को कैसे बतलाऊंगा अपनी बातें
आकर्षण, अपनत्व, समर्पण या पीड़ा की बरसातें
जिन बातों को हम-तुम बस आँखों-आँखों में करते थे
क्या शब्दों में बंध पाएंगी वो भावों की सौगातें
इन प्रश्नों से आहत होकर कोई गीत नहीं लिखा
✍️ चिराग़ जैन
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छूकर निकली है बेचैनी,
पद्य
Location:
दिल्ली, भारत
Thursday, May 27, 2004
तू भी सब-सा निकला
जो जितना भी सच्चा निकला
वो उतना ही तनहा निकला
सुख के छोटे-से क़तरे में
ग़म का पूरा दरिया निकला
कुछ के वरक़ ज़रा महंगे थे
माल सभी का हल्का निकला
मैंने तुझको ख़ुद-सा समझा
लेकिन तू भी सब-सा निकला
कौन यहाँ कह पाया सब कुछ
कम ही निकला जितना निकला
✍️ चिराग़ जैन
वो उतना ही तनहा निकला
सुख के छोटे-से क़तरे में
ग़म का पूरा दरिया निकला
कुछ के वरक़ ज़रा महंगे थे
माल सभी का हल्का निकला
मैंने तुझको ख़ुद-सा समझा
लेकिन तू भी सब-सा निकला
कौन यहाँ कह पाया सब कुछ
कम ही निकला जितना निकला
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, May 2, 2004
हमने देखे हैं कई साथ निभाने वाले
हमने देखे हैं कई साथ निभाने वाले
बरगला लेंगे तुझे भी ये ज़माने वाले
बारिशों में ये नदी कैसा कहर ढाती है
ये बताएंगे तुझे इसके मुहाने वाले
धूप जिस पल मिरे आंगन में उतर आएगी
और जल जाएंगे दीवार उठाने वाले
मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ाने वाले
रास्ते सच के बहुत तंग, बहुत मुश्क़िल हैं
सोच ले ये भी ज़रा जोश में आने वाले
अपनी ऑंखों को भी सिखला ले हुनर धोखे का
झूठी बातों से हक़ीक़त को छिपाने वाले
✍️ चिराग़ जैन
बरगला लेंगे तुझे भी ये ज़माने वाले
बारिशों में ये नदी कैसा कहर ढाती है
ये बताएंगे तुझे इसके मुहाने वाले
धूप जिस पल मिरे आंगन में उतर आएगी
और जल जाएंगे दीवार उठाने वाले
मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ाने वाले
रास्ते सच के बहुत तंग, बहुत मुश्क़िल हैं
सोच ले ये भी ज़रा जोश में आने वाले
अपनी ऑंखों को भी सिखला ले हुनर धोखे का
झूठी बातों से हक़ीक़त को छिपाने वाले
✍️ चिराग़ जैन
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