Wednesday, August 11, 2004

लफ्ज़ों के शोर में

हालात ने जब-जब भी माजरा बढ़ा दिया
जीने की हसरतों ने हौसला बढ़ा दिया

लफ्ज़ों के शोर में ये समन्दर ख़मोश थे
चुप्पी ने शाइरी का दायरा बढ़ा दिया

यूँ ख़त्म हो चुका था रात को ही मसअला
सुब्ह की सुर्ख़ियों ने मामला बढ़ा दिया

कुछ पहले ही लज़ीज़ थीं चूल्हे की रोटियाँ
फिर माँ की उंगलियों ने ज़ायक़ा बढ़ा दिया

मंज़िल थी मिरे रू-ब-रू, रस्ता था दो क़दम
अपनों की क़ोशिशों ने फासला बढ़ा दिया

✍️ चिराग़ जैन

Friday, July 30, 2004

तुम्हारा आगमन

ये हवा कल भी बही थी
ज़िन्दगी कल भी यही थी
कुछ कमी कल भी नहीं थी
पर तुम्हारे आगमन ने बीहड़ों में जान भर दी
संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी

बिन तुम्हारे भी अधूरापन नहीं था ज़िन्दगी में
पर ख़ुषी का भी कोई कारण नहीं था ज़िन्दगी में
ये महक, ये बदलियाँ, ये बारिषंे कल भी यहीं थीं
कैसे मैं कह दूँ कोई सावन नहीं था ज़िन्दगी में
तुमने ही इन बारिषों को इक नई झनकार देकर
बदलियों को रंग, दिल को संग, मुझको प्यार देकर
मस्त मौसम में अचानक इक नई पहचान भर दी
संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी

शब्द-सा बेकार था, तुम अर्थ बन मुझमें समाईं
आँसुओं का गीत था, तुम दर्द बनकर छलछलाईं
तुम समन्दर के हृदय पर लहर बनकर डोलती हो
आम्र-तरु की डालियों पर कोयलों-सी गुनगुनाईं
आपके आने से पहले मुस्कुराना भी कठिन था
खेलना, हँसना, मनाना, रूठ जाना भी कठिन था
तुमने अपनाकर ये मेरी ज़िन्दगी आसान कर दी
संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी

✍️ चिराग़ जैन

कोई कैसे सच बोले

जब तक हमसे भाग्य हमारे खोटे होकर मिलते हैं
बस तब ही तक हम लोगों से छोटे होकर मिलते हैं

कोई कैसे सच बोले सबकी है अपनी लाचारी
अब तो दर्पण से भी लोग मुखोटे होकर मिलते हैं

जिनसे मतलब हो बस उनकी हाँ को हाँ कहते हैं जो
उनका क्या है; बिन पेंदी की लोटे होकर मिलते हैं

जब से ख़ुद्दारी गिरवी रख, हमने बेच दिया ईमान
तब से वही लिफ़ाफ़े हमको मोटे होकर मिलते हैं

हमरे कैसी करी तरक्क़ी, इमली, पीपल, बरगद सब
धरती से कट कर गमलों में छोटे होकर मिलते हैं

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, July 15, 2004

हमारी ज़िंदगानी

अंधेरों की कहानी आफ़ताबों में नही मिलती
हक़ीक़त की निशानी चंद ख़्वाबों में नहीं मिलती
हमारे दर्द को महसूस करने की ज़रूरत है
हमारी ज़िंदगानी इन किताबों में नहीं मिलती

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, July 13, 2004

कुछ देर मिलन के बाद

दो पल को प्यास मिटाकर तुम घंटों तड़पाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो

जब जाड़े की सुबह में तन को धूप सुहाने लगती है
सबकी आँखों में जब अलसाई मस्ती छाने लगती है
जब उस मीठे-मीठे मौसम में नींद-सी आने लगती है
बस तभी अचानक हवा रंग में भंग मिलाने लगती है
ज्यों छोटी-छोटी सी बदली सूरज पर हावी हो जाएँ
ख़ुशियाँ भी जाते-जाते ज्यों यादों के काँटे बो जाएँ
बस ऐसा ही लगता है जब तुम घड़ी दिखाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो

जैसे कटने से पहले ही फ़सलों पर पाला पड़ जाए
जैसे किसान के आंगन में मौसम का मूड बिगड़ जाए
जैसे सुन्दर सपने से जग जाना दिल को दुख देता है
जैसे घर के आंगन का बँट जाना आँखें भर देता है
जैसे मासूम परिंदों को सैयादों से डर लगता है
जैसे सजनी को साजन के बिन सूना-सा घर लगता है
बस ऐसा ही लगता है जब तुम पर्स उठाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो

जैसे चकवे के बिन चकवी का जीना दूभर होता है
जैसे सीता का हृदय राम बिन सुबक-सुबक कर रोता है
जैसे रस-रंग-गंध के बिन हर पुष्प वृथा-सा लगता है
जैसे कन्हा का मुख राधा की करुण व्यथा-सा लगता है
जैसे लक्ष्मण की पत्नी के रोने पर भी पाबन्दी हों
जैसे सुग्रीवों की मुस्कानें बाली के घर बन्दी हों
बस ऐसा ही लगता है जब तुम हाथ हिलाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो

✍️ चिराग़ जैन

वक़्त का हिण्डोला

घर के मुख्य द्वार की
देहलीज पर बैठकर
दफ़्तर से लौटते पापा की
राह तकतीं
नन्हीं-नन्हीं आँखें
रोज़ शाम
आशावादी दृष्टिकोण से
निहारती थीं
सड़क की ओर
...कि पापा
लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी
हमारे लिए।

लेकिन लुप्त हो रही है
ये स्नेहिल परंपरा
पिछले कुछ वर्षों से
बच नहीं पाती अब
वह चिल्लड़
जिसे ख़नकाकर
चिज्जी ख़रीदते थे पापा
हर शाम
दफ़्तर से लौटते वक़्त
अपने बच्चों के लिए!

ख़र्च हो गई है
सारी रेज़गारी
रोज़गार की तलाश में
और मोटी-मोटी किताबों के बीच
ग़ुम हो गया है
वक़्त का वह हिण्डोला
जिसमें बैठकर
राह तकते थे बच्चे
दफ़्तर से लौटते पापा की।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, July 12, 2004

वर्तमान

मुझे बेबस दिलों में पल रहे अरमान लिखने हैं
ग़रीबों के घरों के दर्द और तूफ़ान लिखने हैं
कभी मौक़ा मिलेगा तो चमन की बात कर लूंगा
अभी फुटपाथ के गलते हुए इन्सान लिखने हैं

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, July 7, 2004

सियासत का ज़हर

सच के मंतर से सियासत का ज़हर काट दिया
हाँ, ज़रा रास्ता मुश्क़िल था, मगर काट दिया

वक्ते-रुख़सत तिरी ऑंखों की तरफ़ देखा था
फिर तो बस तेरे तख़य्युल में सफ़र काट दिया

फिर से कल रात मिरी मुफ़लिसी के ख़ंज़र ने
मिरे बच्चों की तमन्नाओं का पर काट दिया

सिर्फ़ शोपीस से कमरे को सजाने के लिए
हाय ख़ुदगर्ज़ ने खरगोश का सर काट दिया

एक छोटा-सा दिठौना मिरे माथे पे लगा
बद्दुआओं का मिरी माँ ने असर काट दिया

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, June 22, 2004

भाग्यवाद

यहाँ प्रारब्ध का लेखा सिकन्दर तक ने भोगा है
पड़ोसी की ख़ताओं को समन्दर तक ने भोगा है
बहुत चाहा बचाना राम ने रावण को मरने से
मग़र जो लिख गया वो तो कलन्दर तक ने भोगा है

✍️ चिराग़ जैन

Friday, June 18, 2004

जीत की चाहत

चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं
नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं

जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर
अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं

बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त
जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं

मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश पर
चंद ग़ज़लें चुटकुलों के बीच आकर मर गईं

वो लम्हा जब झूठ की महफ़िल में सच दाखिल हुआ
साज़िशें उस एक पल में हड़बड़ा कर मर गईं

क्या इसी पल के लिए करता था गुलशन इंतज़ार
जब बहार आई तो कलियाँ खिलखिला कर मर गईं

जिन दीयों में तेल कम था, उन दीयों की रोशनी
तेज़ चमकी और पल में डगमगा कर मर गईं

दिल कहे है- प्रेम में उतरी तो मीरा जी उठीं
अक्ल बोले- बावरी थीं, दिल लगाकर मर गईं

ये ज़माने की हक़ीक़त है, बदल सकती नहीं
बिल्लियाँ शेरों को सारे गुर सिखाकर मर गईं

✍️ चिराग़ जैन