हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल
कुछ हसीं, कुछ शोख़, कुछ रंगीन पल
हर तरह की वासना से हीन पल
अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल
भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल
कब किसे दे पाए हैं तस्कीन पल
आपका आना, ठहरना, लौटना
इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल
साथ हो तुम तो मुझे लगता है ज्यों
हो गए हैं सब मिरे आधीन पल
कँपकँपाते होंठ, ऑंखों में हया
किस तरह भूलेंगे ये रंगीन पल
दिल में रोशन रख उमीदों के ‘चिराग़’
छू न पाएंगे तुझे ग़मगीन पल
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Tuesday, April 12, 2005
Sunday, April 3, 2005
सितारों की तरह
हो गई है ज़िन्दगी अपनी सितारों की तरह
देखते हैं लोग भी अब तो नज़ारों की तरह
जो चले थे काम करने कामगारों की तरह
वो उनींदे से खड़े हैं अब कतारों की तरह
सब शिकारी की तरह घर से निकलते हैं मगर
सब फँसे मिलते शिकंजे में शिकारों की तरह
आपके हालात की बेइंतहा मज़बूरियाँ
और मेरे दहकते अरमां अंगारों की तरह
हर ग़ज़ल मानी बदल लेती है मौक़ा देखकर
शेर हैं सब बेवफ़ाओं के इशारों की तरह
✍️ चिराग़ जैन
देखते हैं लोग भी अब तो नज़ारों की तरह
जो चले थे काम करने कामगारों की तरह
वो उनींदे से खड़े हैं अब कतारों की तरह
सब शिकारी की तरह घर से निकलते हैं मगर
सब फँसे मिलते शिकंजे में शिकारों की तरह
आपके हालात की बेइंतहा मज़बूरियाँ
और मेरे दहकते अरमां अंगारों की तरह
हर ग़ज़ल मानी बदल लेती है मौक़ा देखकर
शेर हैं सब बेवफ़ाओं के इशारों की तरह
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Ghazal,
Poetry,
Romanticism,
Website,
ग़ज़ल,
पद्य
Tuesday, March 22, 2005
आसरा
लड़खड़ाकर गिरे नहीं होते
गर तेरे आसरे नहीं होते
कमनसीबी का दौर है वरना
हम भी इतने बुरे नहीं होते
✍️ चिराग़ जैन
गर तेरे आसरे नहीं होते
कमनसीबी का दौर है वरना
हम भी इतने बुरे नहीं होते
✍️ चिराग़ जैन
Saturday, March 19, 2005
दर्द की दास्तान
दर्द की दास्तान सुन लेना
ख़ुद-ब-ख़ुद साहिबान सुन लेना
होंठ मेरे न कुछ कहेंगे मगर
आँसुओं का बयान सुन लेना
✍️ चिराग़ जैन
ख़ुद-ब-ख़ुद साहिबान सुन लेना
होंठ मेरे न कुछ कहेंगे मगर
आँसुओं का बयान सुन लेना
✍️ चिराग़ जैन
Friday, March 11, 2005
अहसास
तुम छोड़ जाओगे- ये अहसास खल रहा है
सीने में दर्द का इक लावा पिघल रहा है
कुछ इस तरह से हर इक लम्हा निकल रहा है
हाथों से जैसे कोई रेशम फिसल रहा है
✍️ चिराग़ जैन
सीने में दर्द का इक लावा पिघल रहा है
कुछ इस तरह से हर इक लम्हा निकल रहा है
हाथों से जैसे कोई रेशम फिसल रहा है
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Muktak,
Poetry,
Romanticism,
Website,
पद्य,
मुक्तक
Thursday, March 3, 2005
परिवर्तन
जब से हम करने लगे बात-बात में जंग
तब से फीके पड़ गए त्यौहारों के रंग
धुआँ-धुआँ सा रह गया दीपों का त्यौहार
शोर-शराबा बन गया होली का हुड़दंग
✍️ चिराग़ जैन
तब से फीके पड़ गए त्यौहारों के रंग
धुआँ-धुआँ सा रह गया दीपों का त्यौहार
शोर-शराबा बन गया होली का हुड़दंग
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, February 23, 2005
पुल बनाओ तो सही
पुल बनाओ तो सही इस फ़ासले के सामने
मुश्क़िलें ख़ुद हल बनेंगीं मसअले के सामने
आंधियाँ राहों में बिछ जाएंगीं सजदे के लिए
आसमां छोटा पड़ेगा हौसले के सामने
जब जवानी चल पड़ेगी बांधकर सर पर क़फ़न
कौन फिर आएगा उसके फ़ैसले के सामने
हिम्मतों ने ताक पर रखे ज़माने के उसूल
ताश के घर कब टिके हैं ज़लज़ले के सामने
रात भर लड़ता रहा था, जो अंधेरों से ‘चिराग़’
झुक गया सूरज भी ऐसे दिलजले के सामने
✍️ चिराग़ जैन
मुश्क़िलें ख़ुद हल बनेंगीं मसअले के सामने
आंधियाँ राहों में बिछ जाएंगीं सजदे के लिए
आसमां छोटा पड़ेगा हौसले के सामने
जब जवानी चल पड़ेगी बांधकर सर पर क़फ़न
कौन फिर आएगा उसके फ़ैसले के सामने
हिम्मतों ने ताक पर रखे ज़माने के उसूल
ताश के घर कब टिके हैं ज़लज़ले के सामने
रात भर लड़ता रहा था, जो अंधेरों से ‘चिराग़’
झुक गया सूरज भी ऐसे दिलजले के सामने
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Ghazal,
Motivation,
Poetry,
Website,
ग़ज़ल,
पद्य
Wednesday, February 16, 2005
गुमान के असर से बचा
चलो किसी तरह मैं मुश्क़िले-सफ़र से बचा
ख़ुदा मुझे तू अब गुमान के असर से बचा
इन आइनों के सामने से ज़रा बच के निकल
तू अपने आप को ख़ुद अपनी भी नज़र से बचा
अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे
तो अपने मुल्क़ को इस आग की ख़बर से बचा
ये दुनिया हर किसी पे उंगलियाँ उठाती है
तू अपनी सोच को रुसवाइयों के डर से बचा
बनावटें तिरे सच को भी झूठ कर देंगी
अगर वो सच है तो उसको अगर-मगर से बचा
दिलों की बात कहाँ, दुनिया की बिसात कहाँ
तू नज्मे-दिल को ज़माने की हर बहर से बचा
✍️ चिराग़ जैन
ख़ुदा मुझे तू अब गुमान के असर से बचा
इन आइनों के सामने से ज़रा बच के निकल
तू अपने आप को ख़ुद अपनी भी नज़र से बचा
अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे
तो अपने मुल्क़ को इस आग की ख़बर से बचा
ये दुनिया हर किसी पे उंगलियाँ उठाती है
तू अपनी सोच को रुसवाइयों के डर से बचा
बनावटें तिरे सच को भी झूठ कर देंगी
अगर वो सच है तो उसको अगर-मगर से बचा
दिलों की बात कहाँ, दुनिया की बिसात कहाँ
तू नज्मे-दिल को ज़माने की हर बहर से बचा
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Ghazal,
Poetry,
Romanticism,
Website,
ग़ज़ल,
पद्य
संतोष
सिर्फ़ मकरन्द बन के जी लेंगे
हम तेरी गन्ध बन के जी लेंगे
ज़िन्दगी चाक़ हो गई तो क्या
हम भी पैबन्द बन के जी लेंगे
✍️ चिराग़ जैन
हम तेरी गन्ध बन के जी लेंगे
ज़िन्दगी चाक़ हो गई तो क्या
हम भी पैबन्द बन के जी लेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, February 13, 2005
सरस्वती वंदना
जगती को वरदान ये, दीजे माँ वागीश
हर इक दीपक को मिले, सूरज से आशीष
✍️ चिराग़ जैन
हर इक दीपक को मिले, सूरज से आशीष
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Doha,
Festival,
Poetry,
Vasant Panchami,
Website,
दोहा,
पद्य
Subscribe to:
Posts (Atom)