मुझे गुलमोहरों के संग झरना आ गया होता
किसी छोटे से तिनके पर उबरना आ गया होता
तो मरते वक़्त मेरी आंख में आँसू नहीं होते
कि जीना आ गया होता तो मरना आ गया होता
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Thursday, May 12, 2005
Sunday, May 8, 2005
Tuesday, May 3, 2005
प्रेम-तीर्थ
मुम्बई में जुहू-चौपाटी पे शाम सात बजे
बाद; परिवार संग नहीं जाना चाहिए
आगरे में बालकों को ताज और प्रेमिका को
पालिवाल गार्डन में घुमाना चाहिए
बैंगलोर वाले लाल बाग़ जैसा कोई एक
प्रेमियों को देश भर में ठिकाना चाहिए
जहाँ पहले हैं, वहाँ और सुविधाएँ मिलें
जहाँ पे नहीं हैं वहाँ बन जाना चाहिए
आशिक़ों को आशिक़ी में डूबने के लिए
जोधपुर वाला एक लेक कायलाना चाहिए
सांझ वाला सत्संग करने के लिए
हर शहर में एक तीरथ बनाना चाहिए
ऐसे लोकप्रिय तीरथों के निर्माण हेतु
सरकार को भी अब आगे आना चाहिए
मानव प्रजाति वाले तोते-तोतियों के लिए
भी तो कोई बर्ड सेंचुरी बनाना चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
बाद; परिवार संग नहीं जाना चाहिए
आगरे में बालकों को ताज और प्रेमिका को
पालिवाल गार्डन में घुमाना चाहिए
बैंगलोर वाले लाल बाग़ जैसा कोई एक
प्रेमियों को देश भर में ठिकाना चाहिए
जहाँ पहले हैं, वहाँ और सुविधाएँ मिलें
जहाँ पे नहीं हैं वहाँ बन जाना चाहिए
आशिक़ों को आशिक़ी में डूबने के लिए
जोधपुर वाला एक लेक कायलाना चाहिए
सांझ वाला सत्संग करने के लिए
हर शहर में एक तीरथ बनाना चाहिए
ऐसे लोकप्रिय तीरथों के निर्माण हेतु
सरकार को भी अब आगे आना चाहिए
मानव प्रजाति वाले तोते-तोतियों के लिए
भी तो कोई बर्ड सेंचुरी बनाना चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
Monday, April 18, 2005
चांद का किरदार
एक पल सूरज छिपा और फिर उजाला हो गया
लेकिन इसमें चांद का किरदार काला हो गया
साज़िशें सूरज निगलने की रची थीं चांद ने
पर वो अपनी साज़िशों का ख़ुद निवाला हो गया
✍️ चिराग़ जैन
लेकिन इसमें चांद का किरदार काला हो गया
साज़िशें सूरज निगलने की रची थीं चांद ने
पर वो अपनी साज़िशों का ख़ुद निवाला हो गया
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, April 12, 2005
वो शालीन पल
हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल
कुछ हसीं, कुछ शोख़, कुछ रंगीन पल
हर तरह की वासना से हीन पल
अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल
भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल
कब किसे दे पाए हैं तस्कीन पल
आपका आना, ठहरना, लौटना
इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल
साथ हो तुम तो मुझे लगता है ज्यों
हो गए हैं सब मिरे आधीन पल
कँपकँपाते होंठ, ऑंखों में हया
किस तरह भूलेंगे ये रंगीन पल
दिल में रोशन रख उमीदों के ‘चिराग़’
छू न पाएंगे तुझे ग़मगीन पल
✍️ चिराग़ जैन
कुछ हसीं, कुछ शोख़, कुछ रंगीन पल
हर तरह की वासना से हीन पल
अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल
भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल
कब किसे दे पाए हैं तस्कीन पल
आपका आना, ठहरना, लौटना
इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल
साथ हो तुम तो मुझे लगता है ज्यों
हो गए हैं सब मिरे आधीन पल
कँपकँपाते होंठ, ऑंखों में हया
किस तरह भूलेंगे ये रंगीन पल
दिल में रोशन रख उमीदों के ‘चिराग़’
छू न पाएंगे तुझे ग़मगीन पल
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, April 3, 2005
सितारों की तरह
हो गई है ज़िन्दगी अपनी सितारों की तरह
देखते हैं लोग भी अब तो नज़ारों की तरह
जो चले थे काम करने कामगारों की तरह
वो उनींदे से खड़े हैं अब कतारों की तरह
सब शिकारी की तरह घर से निकलते हैं मगर
सब फँसे मिलते शिकंजे में शिकारों की तरह
आपके हालात की बेइंतहा मज़बूरियाँ
और मेरे दहकते अरमां अंगारों की तरह
हर ग़ज़ल मानी बदल लेती है मौक़ा देखकर
शेर हैं सब बेवफ़ाओं के इशारों की तरह
✍️ चिराग़ जैन
देखते हैं लोग भी अब तो नज़ारों की तरह
जो चले थे काम करने कामगारों की तरह
वो उनींदे से खड़े हैं अब कतारों की तरह
सब शिकारी की तरह घर से निकलते हैं मगर
सब फँसे मिलते शिकंजे में शिकारों की तरह
आपके हालात की बेइंतहा मज़बूरियाँ
और मेरे दहकते अरमां अंगारों की तरह
हर ग़ज़ल मानी बदल लेती है मौक़ा देखकर
शेर हैं सब बेवफ़ाओं के इशारों की तरह
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, March 22, 2005
आसरा
लड़खड़ाकर गिरे नहीं होते
गर तेरे आसरे नहीं होते
कमनसीबी का दौर है वरना
हम भी इतने बुरे नहीं होते
✍️ चिराग़ जैन
गर तेरे आसरे नहीं होते
कमनसीबी का दौर है वरना
हम भी इतने बुरे नहीं होते
✍️ चिराग़ जैन
Saturday, March 19, 2005
दर्द की दास्तान
दर्द की दास्तान सुन लेना
ख़ुद-ब-ख़ुद साहिबान सुन लेना
होंठ मेरे न कुछ कहेंगे मगर
आँसुओं का बयान सुन लेना
✍️ चिराग़ जैन
ख़ुद-ब-ख़ुद साहिबान सुन लेना
होंठ मेरे न कुछ कहेंगे मगर
आँसुओं का बयान सुन लेना
✍️ चिराग़ जैन
Friday, March 11, 2005
अहसास
तुम छोड़ जाओगे- ये अहसास खल रहा है
सीने में दर्द का इक लावा पिघल रहा है
कुछ इस तरह से हर इक लम्हा निकल रहा है
हाथों से जैसे कोई रेशम फिसल रहा है
✍️ चिराग़ जैन
सीने में दर्द का इक लावा पिघल रहा है
कुछ इस तरह से हर इक लम्हा निकल रहा है
हाथों से जैसे कोई रेशम फिसल रहा है
✍️ चिराग़ जैन
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Thursday, March 3, 2005
परिवर्तन
जब से हम करने लगे बात-बात में जंग
तब से फीके पड़ गए त्यौहारों के रंग
धुआँ-धुआँ सा रह गया दीपों का त्यौहार
शोर-शराबा बन गया होली का हुड़दंग
✍️ चिराग़ जैन
तब से फीके पड़ गए त्यौहारों के रंग
धुआँ-धुआँ सा रह गया दीपों का त्यौहार
शोर-शराबा बन गया होली का हुड़दंग
✍️ चिराग़ जैन
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