याद है मुझको अभी भी
मैंने तुमको
एक जीती-जागती कविता कहा था।
सुन के तुम शरमा गई थी
खिलखिलाकर हँस पड़ी थी
और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में
चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए
मेरी आँखों में उतर आई थी तुम।
याद है मुझको
कि उस लम्हा
बिना सोचे ही तुमने
टप्प से उत्तर दिया था-
"तुम भी तो कोई रिसाला हो मुक़म्मल।"
आज समझा हूँ तुम्हारे
उस सहज उत्तर के मआनी,
मैं रिसाला हूँ
कि जिसको
हर घड़ी इक और ताज़ा वाक़या
या हादसा बुनना पड़ेगा।
मैं रिसाला हूँ
मुझे कुछ राज़ की बातें छिपाकर
ज़ेह्न में रखना ज़रूरी था।
पर तुम्हें मज़मून सारा
कह सुनाया बीच में ही
ख़ुद रिसाले ने
अनमने मन से मगर
थामा हुआ था
हाथ में तुमने, रिसाला;
बस रिसाले की ख़ुशी के वास्ते
और आख़िरकार इक दिन
ऊबकर तुमने
रिसाला बीच में ही छोड़कर
अपनी ख़ुशी की राह पकड़ी।
....ऊबना ही था तुम्हें!
पर तुम्हें अब भी मुक़र्रर
गुनगुनाना चाहता हूँ
क्योंकि कविता हर दफ़्अ
उतनी ही ताज़ा जान पड़ती है।
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Wednesday, October 19, 2005
Wednesday, September 7, 2005
मिलन का क्षण
प्यार के दो बसन्ती लम्हें छू गए
और सूखा हुआ मन हरा हो गया
सीप को बून्द का बून्द को सीप का
प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया
पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने
धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी
पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी
अनबने रास्तों पर चली इक नदी
जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर
वो भँवर बन गया बावरा हो गया
जो निहारे नहीं उग रहे सूर्य को
चितवनों की कथा वो पढ़े किस तरह
पंछियों की चहक पर न झूमा कभी
प्रेम के गीत आख़िर गढ़े किस तरह
जिसने जितना स्वयं को समर्पित किया
उसका उतना बड़ा दायरा हो गया
सरगमें-सी उतरने लगीं श्वास में
और सन्तूर के सुर झनकने लगे
कामना हो गई बाँसुरी-सी मधुर
चाहतों के मंझीरे खनकने लगे
दिल कभी सौम्य सुर गुनगुनाने लगा
या कभी झूम कर दादरा हो गया
✍️ चिराग़ जैन
और सूखा हुआ मन हरा हो गया
सीप को बून्द का बून्द को सीप का
प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया
पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने
धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी
पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी
अनबने रास्तों पर चली इक नदी
जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर
वो भँवर बन गया बावरा हो गया
जो निहारे नहीं उग रहे सूर्य को
चितवनों की कथा वो पढ़े किस तरह
पंछियों की चहक पर न झूमा कभी
प्रेम के गीत आख़िर गढ़े किस तरह
जिसने जितना स्वयं को समर्पित किया
उसका उतना बड़ा दायरा हो गया
सरगमें-सी उतरने लगीं श्वास में
और सन्तूर के सुर झनकने लगे
कामना हो गई बाँसुरी-सी मधुर
चाहतों के मंझीरे खनकने लगे
दिल कभी सौम्य सुर गुनगुनाने लगा
या कभी झूम कर दादरा हो गया
✍️ चिराग़ जैन
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Monday, August 22, 2005
ओ माधो जी!
ओ माधो जी!
कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी
काफ़ी सजी-धजी लगती थी
यूँ लगता है
तुमने उसको नहलाने में
अपनी आँखों का सब पानी
ख़र्च कर दिया!
वो जो गै़रत वाला जोड़ा
तुम हरदम पहने रहते थे
कल मैंने उस ही जोड़े में
रूह तुम्हारी लिपटी देखी
आँखें झुकी हुई थी उसकी
गर्दन नीचे गड़ी हुई थी
आँखों का पानी
माथे पर
बूंदेें बनकर छलक रहा था
‘दो रोटी’ क़ीमत लिखी थी
साथ लिखा था-
‘दिल, ज़मीर, इज़्ज़त और ग़ैरत
मुफ़्त मिलेंगी’!
क्यों माधो जी!
रूह बेचकर माधो से तुम
‘मैडी’ हो गए!
✍️ चिराग़ जैन
कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी
काफ़ी सजी-धजी लगती थी
यूँ लगता है
तुमने उसको नहलाने में
अपनी आँखों का सब पानी
ख़र्च कर दिया!
वो जो गै़रत वाला जोड़ा
तुम हरदम पहने रहते थे
कल मैंने उस ही जोड़े में
रूह तुम्हारी लिपटी देखी
आँखें झुकी हुई थी उसकी
गर्दन नीचे गड़ी हुई थी
आँखों का पानी
माथे पर
बूंदेें बनकर छलक रहा था
‘दो रोटी’ क़ीमत लिखी थी
साथ लिखा था-
‘दिल, ज़मीर, इज़्ज़त और ग़ैरत
मुफ़्त मिलेंगी’!
क्यों माधो जी!
रूह बेचकर माधो से तुम
‘मैडी’ हो गए!
✍️ चिराग़ जैन
Friday, August 5, 2005
संबंधों की परिभाषा
जग सीमित करना चाहे, सम्बन्धों को परिभाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है
शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है
क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है
क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है
क्यों प्यासा रहता चातक पावस-जल की अभिलाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
क्या ये थोथे शब्द सुमन की गन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्या वीणा से सरगम का अनुबन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्यों बौछारों से पहले मौसम पर धुरवा छाती है
क्यों कोयल का स्वर सुन आमों में मिसरी घुल जाती है
कल-कल-कल-कल बहती सरिता किस पावन जिज्ञासा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
✍️ चिराग़ जैन
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है
शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है
क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है
क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है
क्यों प्यासा रहता चातक पावस-जल की अभिलाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
क्या ये थोथे शब्द सुमन की गन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्या वीणा से सरगम का अनुबन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्यों बौछारों से पहले मौसम पर धुरवा छाती है
क्यों कोयल का स्वर सुन आमों में मिसरी घुल जाती है
कल-कल-कल-कल बहती सरिता किस पावन जिज्ञासा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में
✍️ चिराग़ जैन
Monday, July 25, 2005
ट्यूशन का पौराणिक महत्व
ट्यूशन हमारी सांस्कृतिक तथा पौराणिक परम्पराओं का महत्वपूर्ण अंग है। यदि कुछ क्षण के लिए अपना दृष्टिकोण व्यापक करने के लिए पाश्चात्य विद्वानों की तरह सोचा जाए (क्योंकि हमारे यहां वेद-पुराणों की बातें तब तक समझ नहीं आतीं जब तक पश्चिम उसकी व्याख्या न करे) तो हम देखेंगे कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के युग से ही यह महान परम्परा हमारे समाज का अभिन्न अंग रही है।
संत कवि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस परम धर्म की उतनी ही ‘कड़ी अनुमोदना’ की है जितनी कि आज के तथाकथित विद्वान इसकी आलोचना कर रहे हैं। ये और बात है कि अपने पूर्वजों को सम्मान देने के लिए ये आधुनिक विद्वान अपने घरों में इस परम्परा को बन्द करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं कर पा रहे हैं। ख़ैर छोड़िये इनके घरों को; हम चर्चा कर रहे थे संतकवि तुलसीदास जी की। वे इस महान कर्म से इस हद तक प्रभावित थे, कि इसकी अनुमोदना करते समय वे चैपाई पूरी होने का भी सब्र न रख सके और एक अद्र्धाली मात्र में इस विचार को इन शब्दों में प्रतिपादित कर दिया- 'गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्पकाल विद्या सब आई।'
महाकवि ने यह स्पष्ट किया है कि गुरु के घर जाने से रघुराई जी ने अल्पकाल में ही सारी शिक्षा प्राप्त कर ली थी। अब जब रामायण की बात चली है तो महाभारत का ज़िक्र न करने से बात अधूरी ही रह जाएगी। हालांकि इस देश में बहुत सी बातें महाभारत के ज़िक्र के बावजूद अधूरी ही पड़ी हैं। लेकिन फिर भी, इस सत्य को दरकिनार कर, लेखन की परम्पराओं का निर्वाह करते हुए मैं रामायण के पश्चात महाभारत का ज़िक्र अवश्य करूंगा।
महाभारत में केवल अर्जुन ही एकमात्र ऐसे होनहार विद्यार्थी थे, जो अपने होनहार गुरु से ‘अल्पकाल में शिक्षा पाने के लिए’ नाइट ट्यूशन का सहारा लेते थे। इसी कारण केवल वही ऐसे शिष्य रहे जिन्हें चक्रव्यूह भेदना आता था। यूं सीखा तो एकलव्य ने भी था, लेकिन उसने छिपकर सीखा था, और गुरु द्रोण कोई टटपूंजिये तो थे नहीं जो मुफ़्त शिक्षा दे देते। न ही उन्हें सरकार अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई अनुदान दे रही थी, जो वे अपने आश्रम में पिछड़े वर्गोंं के लिए कुछ सीट्स रिज़र्व करते। एकलव्य ने उन्हें धोखा दिया था इसलिए उन्होंने एकलव्य के माध्यम से अपने शिष्यों को ‘जैसे को तैसा’ की अंतिम शिक्षा दे डाली।
गुरुद्रोण के इस ‘अंगूठा काटन कार्यक्रम’ को हम आज भी पूरे ज़ोर-शोर से चला रहे हैं। कुछ इंस्टिट्यूट्स ने तो इस परंपरा का बाक़ायदा विकास भी किया है। ये विकासवादी परंपरा के समर्थक इंस्टिट्यूट्स, शिष्यों का अंगूठा काटने की घटना के बाद हुई गुरु द्रोण की आलोचनाआंे से सबक लेते हुए, इस निश्चय पर पहुंचे हैं कि शिष्यों को सही-सलामत रहने दिया जाए और परम्परा के निर्वाह हेतु उनके अभिभावकों के हाथ-पैर कटवा लिए जाएं। इससे सामाजिक आलोचना भी नहीं होगी और परंपराओं की रक्षा भी हो सकेगी।
हाथ-पैर कटवा चुकने के बाद जब अभिभावकगण अपनी संतानों के शैक्षणिक विकास की भ्रामक आस लिए ट्यूशन वाली या वाले के पास पहुंचते हैं तो ये ट्यूशनधर्मी गुरुजी पहले तो पौराणिक परंपराओं का सम्मान करते हुए शिष्य से उसकी जाति पूछते हैं, फिर बातों-बातों में यह पता लगाते हैं कि इस राधेय/एकलव्य/अर्जुन/दुर्योधन/अश्वत्थामा या कृष्ण के पिता का व्यवसाय तथा सामाजिक कद कैसा है।
यदि शिष्य दुर्योधन, अर्जुन या युधिष्ठिर की तरह राजपरिवार से संबंध रखता हो तो पूरे आश्रम की नीतियां शिष्य की रुचियोें के अनुसार परिवर्तित करना गुरुजी के लिए सहज हो जाता है। आवश्यकता पड़ने पर विदुर या पितामह के हाथों में ही यह निर्णय सौंपा जा सकता है कि आश्रम की आचार-संहिता में क्या-क्या परिवर्तन करने होंगे। हां, ऐसे शिष्यों के प्रवेश के समय गुरुजी इस बात का विशेष ध्यान रखते हंै, कि फीस की चर्चा नहीं करनी। इससे इम्प्रेशन खराब होने का ख़तरा रहता है।
कृष्ण और राम जैसे शिष्य यदि राजपरिवार से संबंध न भी रखते हों तो भी गुरुजी की यह परम इच्छा रहती है कि समाज के ये अनमोल रत्न उन्हीं के इंस्टिट्यूट में अध्ययन करें। इस श्रेणी के शिष्यों की लोकप्रियता गुरुदेव को इस हद तक प्रभावित करती है कि कुछ गुरुश्रेष्ठ तो इनको लेने इनके घर तक जा पहुंचते हैं। इनको पढ़ाने से एक तो गुरुदेव को साख का लाभ मिलता है साथ ही अपना बड़प्पन झाड़ने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। इसलिए पब्लिक पर्सनेलिटी के प्रति गुरुजी का विशेष स्नेह देखने को मिलता है।
अश्वत्थामा श्रेणी के शिष्यों के लिए आश्रम में स्टाॅफ कोटे की सीटें हमेशा रिजर्व होती हैं। इन शिष्यों से गुरुजी और आश्रम दोनों को ही कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ नहीं होता, लेकिन इन्हें पढ़ाना गुरुजी के लिए सामाजिक मर्यादा का प्रश्न होता है।
यदि शिष्य राधेय श्रेणी से संबद्ध हो तो गुरुदेव समझ जाते हैं कि इससे उन्हें कोई ख़ास लाभ होने वाला नहीं है। यदि इससे फीस ली जाती है तो निर्धन से धन लेने के आरोप में गुरुजी की बदनामी होगी; और फ्री में विद्यादान दिया गया तो अपनी दृष्टि में ही गुरुजी को मूर्ख बनना पड़ेगा। इसलिए गुरुजी ऐसी स्थिति में अपने आश्रम की आचार संहिता में तुरन्त परिवर्तन कर डालते हैं। इस परिवर्तन के वक़्त केवल इतना ध्यान रखा जाता है कि आश्रम में प्रवेश लेने के इच्छुक विद्यार्थियों की न्यूनतम योग्यता में कोई ऐसी मांग जोड़ दी जाए जिसे पूरा करना राधेय के लिए मुमकिन न हो। यही कारण है कि प्रवेश के नियम स्पष्ट करने से पूर्व प्रवेशार्थी का आर्थिक, बौद्धिक, सामाजिक तथा मानसिक स्तर अच्छी तरह देख लिया जाता है।
ऐसे शिष्यों को अपने आश्रम से रिक्त लौटा देना गुरुजी की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए घातक हो सकता है, इसलिए चलते समय गुरुजी इन शिष्यों के एकाध गुणों की तारीफ़ करते हुए उसका नाम परिवर्तन अवश्य कर देते हैं। इससे एक तो गुरुदेव समाज की दृष्टि में महान बनते हैं साथ ही यह ख़तरा भी ख़त्म हो जाता है कि राधेय या इसका बाप बाहर जाकर आश्रम की बदनामी करे।
अंत में नम्बर आता है एकलव्य श्रेणी के शिष्यों का। इन शिष्यों के बाप से गुरुजी खाल या गर्दन उतरवाकर रख लेते हैं। यूं वे हाथ, पैर या अंगूठा आदि भी कटवा सकते थे लेकिन यह सब कुछ तो पहले ही इंस्टिट्यूट वाले कटवा लेते हैं इसलिए सत्यवादी हरिश्चंद्र के देश में पैदा होने के कारण मजबूरी में ट्यूशन वाले गुरुजी को अपना कर्तव्य पालन करते हुए ऐसा घिनौना कार्य करना पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन
Thursday, July 7, 2005
निस्पृह प्रेम
चाहता हूँ उन्हें ये अलग बात है
वो मिलें ना मिलें ये अलग बात है
एक अहसास से दिल महकने लगा
गुल खिलें ना खिलें ये अलग बात है
हम मिलें और मिलते रहें हर जनम
ज़िन्दगी भर का नाता बने ना बने
मन समर्पण के सद्भाव से पूर्ण हों
तन भले ही प्रदाता बने ना बने
बात दिल की दिलों तक पहुँचती रहें
लब हिलें ना हिलें ये अलग बात है
शब्द पावन हवन की महक से भरे
मुस्कुराहट में है यक्ष का अवतरण
आँख में झिलमिलाती चमक दीप की
अश्रु हैं दिव्य पंचामृती आचमन
नित्य श्रद्धा निवेदित करूँ मैं उन्हें
वर मिलें ना मिलें ये अलग बात है
✍️ चिराग़ जैन
वो मिलें ना मिलें ये अलग बात है
एक अहसास से दिल महकने लगा
गुल खिलें ना खिलें ये अलग बात है
हम मिलें और मिलते रहें हर जनम
ज़िन्दगी भर का नाता बने ना बने
मन समर्पण के सद्भाव से पूर्ण हों
तन भले ही प्रदाता बने ना बने
बात दिल की दिलों तक पहुँचती रहें
लब हिलें ना हिलें ये अलग बात है
शब्द पावन हवन की महक से भरे
मुस्कुराहट में है यक्ष का अवतरण
आँख में झिलमिलाती चमक दीप की
अश्रु हैं दिव्य पंचामृती आचमन
नित्य श्रद्धा निवेदित करूँ मैं उन्हें
वर मिलें ना मिलें ये अलग बात है
✍️ चिराग़ जैन
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Website,
कोई यूँ ही नहीं चुभता,
गीत,
छूकर निकली है बेचैनी,
पद्य
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Delhi, India
Saturday, June 25, 2005
मुझे तुम भूल सकते थे
फ़ज़ाई रक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
तुम्हारा अक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
तुम्हारी चाह हूँ, आदत, इबादत हूँ, मुहब्बत हूँ
महज इक शख़्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
✍️ चिराग़ जैन
तुम्हारा अक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
तुम्हारी चाह हूँ, आदत, इबादत हूँ, मुहब्बत हूँ
महज इक शख़्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, June 21, 2005
दिल के अरमान हैं
लफ़्ज़ आँखों के किनारों पे ठहर जाते हैं
अश्क़ होठों पे हँसी बन के बिखर जाते हैं
ये ज़माना जिन्हें अशआर कहा करता है
दिल के अरमान हैं काग़ज़ पे उतर जाते हैं
✍️ चिराग़ जैन
अश्क़ होठों पे हँसी बन के बिखर जाते हैं
ये ज़माना जिन्हें अशआर कहा करता है
दिल के अरमान हैं काग़ज़ पे उतर जाते हैं
✍️ चिराग़ जैन
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Chirag Jain,
Kavi-Sammelan,
Muktak,
Poet,
Poetry,
Website,
पद्य,
मुक्तक
Friday, June 17, 2005
गीत लिखते वक़्त
इक दफ़ा पलकों को अश्क़ों में भिगो लेते हैं हम
और फिर अधरों पे इक मुस्कान बो लेते हैं हम
गीत गाते वक्त रुंध ना जाए स्वर इसके लिए
गीत लिखते वक्त ही जी भर के रो लेते हैं हम
✍️ चिराग़ जैन
और फिर अधरों पे इक मुस्कान बो लेते हैं हम
गीत गाते वक्त रुंध ना जाए स्वर इसके लिए
गीत लिखते वक्त ही जी भर के रो लेते हैं हम
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, June 8, 2005
याद
कभी जब नीम की डाली पे चिड़ियाँ चहचहाती हैं
हज़ारों ख्वाहिशें दिल में तड़पकर कुलबुलाती हैं
मेरे आगे से जब भी ख़ुशनुमा मंज़र गुज़रते हैं
किसी की याद में भरकर ये आँखें छलछलाती हैं
✍️ चिराग़ जैन
हज़ारों ख्वाहिशें दिल में तड़पकर कुलबुलाती हैं
मेरे आगे से जब भी ख़ुशनुमा मंज़र गुज़रते हैं
किसी की याद में भरकर ये आँखें छलछलाती हैं
✍️ चिराग़ जैन
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