Thursday, January 19, 2006

ख़ूब रोता हूँ

मैं अब जिन दोगलों के बीच रहकर ख़ूब रोता हूँ
मैं उनसे देर तक लम्बी ज़िरहकर ख़ूब रोता हूँ
मेरी मासूमियत तो बहुत पहले मर चुकी लेकिन
मैं सच बतलाऊँ अब भी झूठ कहकर ख़ूब रोता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

Monday, January 16, 2006

गुलशन

मैंने गुलशन को कई बार सँवरते देखा
हर तरफ़ रंग का ख़ुश्बू का समा होता है
पंछियों की चहक सरगम का मज़ा देती है
चांदनी टूट के गुलशन में उतर आती है
धूप पत्तों को उजालों से सजा देती है

कोई अल्हड़, कोई मदमस्त हवा का झोंका
शोख़ कलियों का बदन छू के निकल जाता है
इस शरारत से भी कलियों को मज़ा आता है
सबसे नज़रें बचा के कलियाँ चटक जाती हैं
फूल खिलते हैं तो गुलशन में बहार आती है

पर ये रंगीन फ़ज़ा और ये गुलशन की बहार
वक़्त के साथ वीराने में बदल जाती है
धूप की तल्ख़ी उड़ाती है रंग फूलों का
आंधियाँ नूर की महफ़िल को फ़ना करती हैं
पत्तियाँ सूख के तिनकों की शक़्ल लेती हैं
तिनके गुलशन में बेतरतीब बिखर जाते हैं
चांदनी टूट के रोती है इस तबाही को

अब इसे देखने कोई यहाँ नहीं आता
कोई हलचल यहाँ दिखाई ही नहीं देती
अब ये गुलशन यूँ ही वीरान पड़ा रहता है

एक कोने में कहीं ज़र्द से पत्तों में छिपा
एक बिरवा किसी का इंतज़ार करता है
उसको मालूम है कल फिर से बहार आएगी
फिर से सूरत इसी गुलशन की सँवर जाएगी
यही गुलशन, यही पत्ते, यही गुंचे मिलकर
पूरे आलम को बहारों से फिर सजा देंगे
ज़र्द पत्तों में ये वीराना दुबक जाएगा
हर तरफ़ रंग का, ख़ुश्बू का नशा छाएगा
सूखे तिनके किसी का घोसला बन जाएंगे
फिर से सब लोग इस गुलशन में चले आएंगे

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 13, 2006

दिखावा

मुहब्बत में सनम के बिन कोई मंज़र नहीं दिखता
सिवा दिलबर कोई भीतर कोई बाहर नहीं दिखता
किसी को हर तरफ़ महबूब ही महसूस होता है
किसी को दूर जाकर भी ख़ुदा का घर नहीं दिखता

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, December 21, 2005

ग्लोबल वार्मिंग

मेघों का जल घट रहा, सूरज उगले आग
धरती धू-धू जल रही, मानव अब तो जाग

तप्त धरा, बादल विफल, गया संतुलन डोल
रे मानव अब तो संभल, अब तो ऑंखें खोल

मानव अब क्यों हो गया, आखिर बिल्कुल मौन
तूने ही छलनी करी, दिव्य परत ओज़ोन

तितली, धुरवा, बीजुरी, पाला, सावन, कूप
धीरे-धीरे धर रहे, इतिहासों का रूप

रिमझिम, झर-झर, झमाझम, बरसा था आकाश
इन बातों पर कल किसे, होएगा विश्वास

✍️ चिराग़ जैन

Friday, November 11, 2005

असफल मुर्दनी

पिछले रविवार को मेरे एक परिचित का फोन आया कि उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया है। यह और बात है कि मैंने कभी उनके पिताजी को देखा नहीं था लेकिन फिर भी परंपरानुसार मैंने फोन पर उन्हें यह जताने की हर संभव कोषिष की कि उनके पिताजी के निधन के इस आकस्मिक समाचार से मैं अर्द्धमृत सा हो गया हूँ। यदि उनके एकाध और पिताजी इसी प्रकार दिवंगत हो जाते तो मैं पूरी तरह मर गया होता।
फोन रखने के बाद मैंने कई दिनों से बेकार पड़े अपने सफेद कुर्ते-पायजामे पर इस्तरी की और देह के शेष हिस्सों को अस्त-व्यस्त कर कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गया। मेरे समान ही और भी बीस-बाईस अर्द्धमृतगण वहाँ पहले से ही उपस्थित थे, जो घर के बाहर हाथ बांधे हँसी रोके खड़े थे। मेरे पहुँचने पर सबने मुझे इस कौतूहल के साथ देखा मानो मेरी ही मृत्यु हुई हो। मैं झेंपकर अपने जीवित होने पर खिन्न होता हुआ एक ओर खड़ा हो गया। इसके बाद कुछ लोगों ने अपने-अपने पड़ोसियों के कान में कुछ कहा और फिर चेहरे पर शोक का स्थायी भाव लिए हुए पूर्ववत खड़े हो गए।
नवागंतुकों के स्वागत की इस परंपरा के निर्वाह के उपरांत उसे बताया जाता था कि लालाजी ने अभी प्राण त्यागे नहीं हैं। दो दिनों से वे कृत्रिम श्वास पर जीवित थे। वेंटिलेटर का पचास हज़ार रुपए रोज़ का ख़र्चा है। इसलिए आज परिवारवालों ने लिखकर दे दिया है कि वंेटिलेटर हटा दिया जाए। बस वेंटिलेटर हटते ही लालाजी दिवंगत हो जाएंगे और दस-बारह मिनिट में उनका पार्थिव शरीर घर ले आया जाएगा।
यही सूचना लगभग तीन घंटे तक लोगों के बीच आषा की किरण बनी रही। इस दौरान कुछ लोग ताज़ा समाचारों के लिए लगातार अस्पताल में स्थित लोगों से संपर्क बनाए हुए थे। शाम के लगभग चार बजे ख़बर मिली कि वंेटिलेटर हटा दिया गया है। ख़बर मिलते ही लोगों ने चैन की साँस ली। कुछ लोग अपने ज्योतिषियों को फोन कर पंचक आदि की गणना करवाने लगे। कुछ अपनी घड़ियों की ओर देखकर यह कालगणना करने लगे कि अभी घर पहुँचने में कितना समय लग सकता है। इसी प्रकार के कार्यक्रमोें में काफी समय बीत गया। कोई पोने पांच बजे अस्पताल की गाड़ी आकर रुकी। सभी मनुष्य अपनी स्वाभाविक जिज्ञासु प्रवृत्ति के चलते गाड़ी के इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगे।
लालाजी को चार-पांच लोगों ने गाड़ी से बाहर निकाला। उनकी श्वास अभी भी चल रही थी। उनको जीवित देख सबको घोर निराषा हुई। निराषा और शोक के इस माहौल से निकालते हुए लालाजी को घर के भीतर लिटाया गया। शेष आत्मीयजन घर के बाहर ही इंतज़ार करने लगे।
अब तक सभी के भीतर कथावाचकों की आत्माएं प्रवेष कर चुकीं थीं। सभी एक-दूसरे को मृत्युबोध और असार संसार के आँखों देखे क़िस्से सुनाने लगे। कई बार तो कथावाचक महोदय को देखकर ऐसा लगने लगता था कि वे अभी उठेंगे और हिमालय की कंदराओं में कहीं खो जाएंगे। लेकिन अगले ही क्षण जब वे जेब से तम्बाकू का पाउच निकालकर हालाहल के समान अपने मुख में डालते तो समझ आता कि अभी वे संसार में व्याप्त विष का पान कर रहे हैं और जब तक संसार का समस्त विष अपनी देह में धारण कर विष्व को विष मुक्त नहीं कर देंगे तब तक संन्यास नहीं लेंगे।
लोक-परलोक की इन्हीं चर्चाओं और भीष्म-प्रतिज्ञाओं के बीच जब सात बज गए तो अमृतक के भाई ने बाहर आकर हाथ जोड़कर धन्यवाद ज्ञापन किया और यह विष्वास दिलाया कि जैसे ही लालाजी अंतिम श्वास लेंगे, सबको समाचार दे दिया जाएगा। सबने उनको कृतज्ञता और क्रोध भरी दृष्टि से देखा और पत्थर जैसे क़दम उठाते हुए भारी मन लिए घर लौट आए।

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, November 6, 2005

तो भी मैं ग़लत

मैं अगर ख़ुद अपना सच बतलाऊँ तो भी मैं ग़लत
और अगर हर झूठ को सह जाऊँ तो भी मैं ग़लत

ग़र तुम्हारे वार से मर जाऊँ तो भी मैं ग़लत
और अगर ख़ुद को बचाना चाहूँ तो भी मैं ग़लत

बेअबद हूँ मैं अगर बेहतर करूँ कुछ आपसे
और गर बेहतर नहीं कर पाऊँ तो भी मैं ग़लत

बेवजह अपशब्द कहने की मुझे आदत नहीं
पर तुम्हारे शब्द ही दोहराऊँ तो भी मैं ग़लत

तुमने हर संबंध को व्यवसाय कर डाला मगर
मैं कहीं व्यवसाय करने जाऊँ तो भी मैं ग़लत

मेरा मुन्सिफ़ सारी बातें जानकर भी मौन है
और मैं बिन बात चुप हो जाऊँ तो भी मैं ग़लत

आंधियों का सामना कर लूँ तो बेगैरत ‘चिराग़’
और गर चुपचाप मैं बुझ जाऊँ तो भी मैं ग़लत

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, November 1, 2005

एक जिल्द में बांध दो

एक संग आकर कहें, कातिक औ’ रमज़ान
एक जिल्द में बांध दो, गीता और कुरान

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, October 30, 2005

मीडिया : एक चेहरा ये भी

हमारे मुल्क़ की क़िस्मत में ये विस्फोट क्यूँकर था
शहर से गाँव तक माहौल कल दमघोट क्यूँकर था
पसीना चू रहा था सबकी पेशानी से पर फिर भी
ख़बर पढ़ते हुए उनके बदन पर कोट क्यूँकर था

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, October 29, 2005

जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से

जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से
वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से

न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन
न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से

वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत
हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से

ये दहशतग़र्द अब इस बात से आगाह हो जाएँ
कि अब आवाम की बढ़ने लगी हिम्मत धमाकों से

वज़ूद अपना जताने के लिए वहशी बने हैं जो
उन्हें हासिल नहीं होती कभी शोहरत धमाकों से

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, October 19, 2005

रिसाला

याद है मुझको अभी भी
मैंने तुमको
एक जीती-जागती कविता कहा था।

सुन के तुम शरमा गई थी
खिलखिलाकर हँस पड़ी थी
और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में
चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए
मेरी आँखों में उतर आई थी तुम।

याद है मुझको
कि उस लम्हा
बिना सोचे ही तुमने
टप्प से उत्तर दिया था-
"तुम भी तो कोई रिसाला हो मुक़म्मल।"

आज समझा हूँ तुम्हारे
उस सहज उत्तर के मआनी,
मैं रिसाला हूँ
कि जिसको
हर घड़ी इक और ताज़ा वाक़या
या हादसा बुनना पड़ेगा।

मैं रिसाला हूँ
मुझे कुछ राज़ की बातें छिपाकर
ज़ेह्न में रखना ज़रूरी था।

पर तुम्हें मज़मून सारा
कह सुनाया बीच में ही
ख़ुद रिसाले ने

अनमने मन से मगर
थामा हुआ था
हाथ में तुमने, रिसाला;
बस रिसाले की ख़ुशी के वास्ते

और आख़िरकार इक दिन
ऊबकर तुमने
रिसाला बीच में ही छोड़कर
अपनी ख़ुशी की राह पकड़ी।
....ऊबना ही था तुम्हें!

पर तुम्हें अब भी मुक़र्रर
गुनगुनाना चाहता हूँ
क्योंकि कविता हर दफ़्अ
उतनी ही ताज़ा जान पड़ती है।

✍️ चिराग़ जैन