Monday, March 13, 2006

हम हाथ मल रहे हैं

हमको हमारे ऐसे हालात खल रहे हैं
रग-रग में बेक़ली के सागर मचल रहे है
उनकी झिझक ने इतना लाचार कर दिया है
सब हाथ में है फिर भी, हम हाथ मल रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, March 11, 2006

संबंधों की साँस उखड़ने लगती है


जब बेटी की उम्र ज़रा रफ़्तार पकड़ने लगती है
तब माँ हर आते-जाते की नज़रें पढ़ने लगती है

जब मन की कच्ची मिट्टी कुछ सपने गढ़ने लगती है
तब ज़िम्मेदारी की भारी बारिश पड़ने लगती है

यूँ तो वो अपनी हर ज़िद्द मनवा ही लेता है मुझसे
लेकिन मेरे भीतर-भीतर नफ़रत बढ़ने लगती है

प्यार अगर सच्चा हो तो हल हो जाती है हर मुश्क़िल
ख़ुदगर्ज़ी से संबंधों की साँस उखड़ने लगती है

मजबूरी भी बिल्कुल ज़िद्दी बच्चों जैसी होती है
ज़्यादा अगर तवज़्ज़ो दो तो सिर पर चढ़ने लगती है

पहले तो वो मुझसे केवल ख़ुशियाँ बाँटा करती थी
अब अपनी हर ग़लती भी मेरे सर मँढ़ने लगती है

महफ़िल में वो आती है तो मुझे ढूंढती है पहले
और फिर अपने मोबाइल के मैसिज पढ़ने लगती है

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, February 14, 2006

बेचैनियाँ

वक्त क़े हाथों मिलीं मायूसियाँ हैं किस क़दर
रुत बिछड़ने की है और नज़दीकियाँ हैं किस क़दर
एक ही पल में ख़ुशी भी है, तड़प भी, दर्द भी
क्या बताएँ इस घड़ी बेचैनियाँ हैं किस क़दर

✍️ चिराग़ जैन

अपना-अपना शऊर था

सरे-बज़्म मैं रुसवा हुआ, यही दौर का दस्तूर था
मैं ये बाज़ियाँ न समझ सका, मिरी सादगी का क़ुसूर था

तूने ग़म में ख़ुशियाँ तबाह कीं, मैंने हँस के दर्द भुला दिये
ये तो अपना-अपना रिवाज़ था, ये तो अपना-अपना शऊर था

तुझे जिस्म से ही गरज़ रही, मिरा जिस्म तेरी हदों में था
मिरी रूह मुझमें बची नहीं, तुझे कुर्बतों का फ़ितूर था

न सफ़र में मुझको मिला कोई, न डगर पे मुझको दिखा कोई
मुझे फिर भी इतना यक़ीन है, मेरे साथ कोई ज़रूर था

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, February 11, 2006

मुहब्बत हार जाती है

दिलों में पल रही चाहत सदा बेकार जाती है
भला सोहनी कहाँ कच्चे घड़े पर पार जाती है
वो लैला का फ़साना हो या फिर मेरी कहानी हो
मुक़द्दर जीत जाता है, मुहब्बत हार जाती है

✍️ चिराग़ जैन

काव्य के गहन सिध्दांत

साहित्य संस्कृति का दर्पण है। इसी सूक्ति को ध्यान में रखते हुए हिन्दी कविता हमेशा से ही हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का अनुपालन करती रही है। यह और बात है कि इन सिध्दांतों की आड़ में काव्य के मूल सिध्दांत और स्वयं कविता भी बैकुण्ठवासी हो चली है।
हमारी संस्कृति हमेशा से ही अतिथियों को भगवान मानती रही है। यह दीगर बात है कि इसी सिध्दांत का लाभ उठाकर रावण सीता को उठाकर ले गया था और हरिश्चंद्र को राजा के पद से च्युत होकर श्मशान का पंडित बनना पड़ा और न जाने क्या-क्या अपमान भोगना पड़ा। ख़ैर ‘अतिथिदेवोभवः’ के सिध्दांत की परमकृपा के चलते बाबा तुलसी अपना गृहनगर छोड़ते ही परमात्मा स्वरूप पूजे जाने लगे। यदि उस ज़माने में हवाई जहाजों का चलन होता तो रामचरितमानस् की पहली प्रति यूएसए अथवा यूरोप के किसी ‘बड़े’ प्रकाशक बंधु ने आर्टपेपर पर फोरकलर में छापी होती। ...लेकिन लाल रंग तिसको लगा, जिसके बड़ भागा (इसी कारण हतभागियों की किताब काले रंग से छपती है)।
इस सिध्दांत में भारतीय जुगाड़ संहिता की धारा 420 के अनुच्छेद 1 में एक छूट मिलती है- ‘यह कि यदि कोई धनिक जो कि भारत का नागरिक है, किसी विशेष अथवा सामान्य कारण से भारतीय भौगोलिक क्षेत्र से बाहर अपना निवास निर्माण नहीं कर पाया है तो भी उसकी खाता विवरणिका (बैंक स्टेटमेंट) में उपलब्ध शेष राशि के न्यूनतम नव अंकीय होने को आधार मानकर उसके काव्य को श्रेष्ठ काव्य की श्रेणी में गणित किया जा सकता है।’ जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे को सब कुछ दरसाई! बहिरो सुरै मूक पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई! (यहाँ पर जाकी से सूरदास जी का तात्पर्य बैंक बैलेंस से है)।
इसी धारा के अनुच्छेद 2 के अनुसार- ‘यदि कोई भारतीय नागरिक राजकीय सेवा में किसी ऐसे पद पर विराजमान है, जहाँ से वह साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों अथवा अकादमियों के सचिवों को विदेश यात्रा अथवा पुरस्कारों का वरदान देने में सक्षम हो तथा इस योग्यता के साथ-साथ स्वयं को कवि भी मानता हो तो उसके काव्यकर्म का सम्मान करना संपादकों तथा अकादमियों का परम कर्त्तव्य बन जाता है।’ जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करें सब कोई (इस चौपाई के रचनाकाल में घट-घटवासी राम सरकारी कुर्सी में जा बसे थे)।
बाद में कुछ विशेष प्रयोजनों के चलते इस धारा में एक अनुच्छेद और जोड़ा गया जिसके अनुसार- ‘यह कि कोई धनाढ्य मनुज जो कि एक पंक्ति भी शुध्द नहीं लिख सकता, ऐसे नागरिक को यदि कवि बनने की उत्कंठा जागे तो उसकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रकाशकों का दायित्व बन जाता है कि भारतीय संविधान के समानता के अधिकार का प्रयोग करते हुए उन्हें पाण्डुलिपि तैयार करके देवें। इसके लिए समय-समय पर कुछ ‘वास्तविक’ निर्धन कवियों की पाण्डुलिपि को यह कहकर निरस्त किया जाना आवश्यक है कि उनकी कविताएँ तो कूड़ा हैं। ऐसा कहकर निर्धन कवियों की रचनाओं को गुदड़ी में फेंक देना अपरिहार्य है ताकि समय पड़ने पर ‘गुदड़ी के लाल’ ढूंढे जा सकें और एक उत्तम पुरस्कारणीय पाण्डुलिपि तैयार की जा सके। विदेशी होगा पहला कवि, प्लेन से आया होगा गान, निकलकर रिजेक्टिड से चुपचाप, छपी होगी कविता अनजान।
इस प्रकार सभी भारतीय कवियों, साहित्यकारों, अप्रवासियों, धनिकों, प्रकाशकों, अधिकारियों तथा अन्य प्रत्येक नागरिक का धन्यवाद करते हुए अपनी आदत के अनुसार एक श्लोक को उध्दृत करना चाहूंगा। यह श्लोक प्रूफ की अशुध्दियों के चलते लम्बे समय से ग़लत छपता रहा है। आज मैं यहाँ पर उसका असली रूप प्रकाशित कर रहा हूँ-

मा लेखक प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत् धनाढ्यजुगाड़ादेकमवधी काव्यमोहितम्।।

अर्थात् हे लेखक! तुझे प्रतिष्ठा, आदर-सत्कार, मान-मर्यादा, गौरव, प्रसिध्दि, ख्याति, यश, कीर्ति, स्थिति, स्थान, स्थापना, ठौर, ठिकाना, ठहराव, आश्रय इत्यादि नित्य-निरंतर कभी भी न मिले, क्योंकि तूने इस जुगाड़तंत्र में निमग्न धनिकों, राजनायिकों, अप्रवासियों (जिनसे प्रकाशकों व अकादमिकों को कुछ लाभ हो सकता था) की, बिना किसी पत्रिका में प्रकाशित हुए ही आलोचना की है।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, January 28, 2006

तुझको कुछ भी याद नहीं?

तेरी पलकों में सपनों की दुनिया अब आबाद नहीं
मेरी यादें तेरे दिल तक पहुँचाती आवाज़ नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

तू मुझको रजनीबाला का मूर्तरूप सी लगती थी
बातें तेरी, मुझे पौह की मधुर धूप सी लगती थी
तेरा यौवन मुझे पंत की सोनजुही में दीखा था
तूने मेरी यादों में रातों को जगना सीखा था
वो सारी बातें अब तेरे जीवन की सौगात नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

फिल्मी गाने हम दोनों को आत्मकथा-से लगते थे
मेरे आँसू तुझको अपनी मौन व्यथा से लगते थे
इक-दूजे से आँख मिला हम बिन कारण मुस्काते थे
मिलने की उत्सुकता में जल्दी सोकर उठ जाते थे
अब बेचैनी से मन में उठते वो झंझावात नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

बस की पिछली सीट पे बैठे हम घण्टों बतियाते थे
इक-दूजे के कंधे पर सिर रखकर हम सो जाते थे
मेरे मन की बातें तू बिन बोले ही सुन लेती थी
मेरी मुस्कानों के मतलब मन ही मन गुन लेती थी
क्या अब तेरे अंतस में वो मधुर प्रेम का राग नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

घर वालों के लिए रोज़ हम नए बहाने गढ़ते थे
इक-दूजे के पत्र किताबों में रख-रखकर पढ़ते थे
हम दोनों को साथ देखकर दुनिया ताने कसती थी
लोगों की बातें सुनकर तू हौले-हौले हँसती थी
सोचा करते थे, छोड़ेंगे इक-दूजे का साथ नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, January 19, 2006

ख़ूब रोता हूँ

मैं अब जिन दोगलों के बीच रहकर ख़ूब रोता हूँ
मैं उनसे देर तक लम्बी ज़िरहकर ख़ूब रोता हूँ
मेरी मासूमियत तो बहुत पहले मर चुकी लेकिन
मैं सच बतलाऊँ अब भी झूठ कहकर ख़ूब रोता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

Monday, January 16, 2006

गुलशन

मैंने गुलशन को कई बार सँवरते देखा
हर तरफ़ रंग का ख़ुश्बू का समा होता है
पंछियों की चहक सरगम का मज़ा देती है
चांदनी टूट के गुलशन में उतर आती है
धूप पत्तों को उजालों से सजा देती है

कोई अल्हड़, कोई मदमस्त हवा का झोंका
शोख़ कलियों का बदन छू के निकल जाता है
इस शरारत से भी कलियों को मज़ा आता है
सबसे नज़रें बचा के कलियाँ चटक जाती हैं
फूल खिलते हैं तो गुलशन में बहार आती है

पर ये रंगीन फ़ज़ा और ये गुलशन की बहार
वक़्त के साथ वीराने में बदल जाती है
धूप की तल्ख़ी उड़ाती है रंग फूलों का
आंधियाँ नूर की महफ़िल को फ़ना करती हैं
पत्तियाँ सूख के तिनकों की शक़्ल लेती हैं
तिनके गुलशन में बेतरतीब बिखर जाते हैं
चांदनी टूट के रोती है इस तबाही को

अब इसे देखने कोई यहाँ नहीं आता
कोई हलचल यहाँ दिखाई ही नहीं देती
अब ये गुलशन यूँ ही वीरान पड़ा रहता है

एक कोने में कहीं ज़र्द से पत्तों में छिपा
एक बिरवा किसी का इंतज़ार करता है
उसको मालूम है कल फिर से बहार आएगी
फिर से सूरत इसी गुलशन की सँवर जाएगी
यही गुलशन, यही पत्ते, यही गुंचे मिलकर
पूरे आलम को बहारों से फिर सजा देंगे
ज़र्द पत्तों में ये वीराना दुबक जाएगा
हर तरफ़ रंग का, ख़ुश्बू का नशा छाएगा
सूखे तिनके किसी का घोसला बन जाएंगे
फिर से सब लोग इस गुलशन में चले आएंगे

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 13, 2006

दिखावा

मुहब्बत में सनम के बिन कोई मंज़र नहीं दिखता
सिवा दिलबर कोई भीतर कोई बाहर नहीं दिखता
किसी को हर तरफ़ महबूब ही महसूस होता है
किसी को दूर जाकर भी ख़ुदा का घर नहीं दिखता

✍️ चिराग़ जैन