Wednesday, October 3, 2007

ख़ुद से मुख़ातिब

कितना आसान है
दुनिया को ग़लत ठहराना

थोड़ा चालाक रवैया
ज़रा-सी अय्यारी
झूठ को सच बना देने का क़रामाती गुर
थोड़ी कज़बहसी
थोड़ी ज़िद्द
ज़रा-सी लफ़्फ़ाज़ी
तेज़ आवाज़ औ’ मुद्दों को घुमाने का हुनर
चन्द सिक्कों से ख़रीदे हुए दो-चार गवाह
और इक इन्तहा बेअदबी की
ढिठाई की....

....कितना मुश्क़िल है मगर
ख़ुद से मुख़ातिब होना!

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, September 18, 2007

अंतर्मुखी

ख़ुशी की लाश उठती है ख़ुशी की चाह के नीचे
बहुत से ज़ख्म होते हैं ज़रा-सी आह के नीचे
हमारे दिल की बातें दिल में ऐसे दब के रहती हैं
कि जैसे पीर सोता हो कोई दरगाह के नीचे

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, August 25, 2007

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी
कुछ मुंडेरों के मुक़द्दर में चमेली आ गयी

पैर भी सुस्ता लिये, आँखों ने भी दम ले लिया
ज़िंदगी की राह में, दिल की हवेली आ गई

झाँकता है हर कोई ऐसे दिल-ए-नाशाद में
जैसे आंगन में कोई दुल्हन नवेली आ गई

बोझ कंधों का उतर कर गिर गया जाने कहाँ
जब मेरे सिर पे बुज़ुर्गों की हथेली आ गई

तीरगी का ख़ौफ़, सन्नाटे की दहशत थी मगर
इक किरण सूरज की धरती पर अकेली आ गयी

✍️ चिराग़ जैन

Friday, August 24, 2007

बिटिया

शादी का जोड़ा चढ़ा, सजे सोलहों साज
इक छोटी-सी लाडली, बड़ी हुई है आज

विदा समय बाबुल कहे, जोड़े दोनों हाथ
मेरी लाज बंधी हुई, बिटिया तेरे साथ

बिन कारण ताने सहे, बिन मतलब संत्रास
पर उसने तोड़ा नहीं, बाबुल का विश्वास

बाबुल तेरी देहरी, जब से छूटी हाय।
तब से मन की बात बस, मन ही में रह जाय

दो नावों में ही रहें, बिटिया के दो पाँव
ना ये अपना घर हुआ, ना वो अपना गाँव

सहना, घुलना, सिसकना, सुनना बात तमाम
बिटिया के ससुराल में, कितने सारे काम

अब तू करना सीख ले, सब के संग निबाह
माँ ऑंखें भर-भर कहे, भरियो नहीं कराह

चिड़िया जब दुलहिन बनी, पेड़ हुआ कंगाल
सूनी-सूनी सी लगे, झूले बिन हर डाल

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, August 14, 2007

तिरंगा

अपना तिरंगा एक परचम ही नहीं है
भावनाओं की बहार-सी है तीन रंग में
छोटे-छोटे बालकों के अधरों पे बिखरी जो
वही एक पावन हँसी है तीन रंग में
प्रेम, त्याग, एकता, अखण्डता, समानता से
ओत-प्रोत आत्मा बसी है तीन रंग में
खादी वाले मोटे रेशों का ही ताना-बाना नहीं
भारत की एकता कसी है तीन रंग में

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, August 9, 2007

सावन

घन, पंछी, बरखा करें, गर्जन, कलरव, सोर
हृदय मयूरा झूमिहै, ज्यों सावन में मोर

जब मेघन का नेह जल, बरसत है चहुँ ओर
इस प्रेमी मन भीगता, उत बिरहन की कोर

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, July 21, 2007

ज़िन्दगी

दुनिया में आ के सकुचाई पल भर फिर
ममता की छाँव में सँवर गई ज़िन्दगी
पालना, खिलौना, पाठशाला, अनुभव, ज्ञान
प्रेम की छुअन से निखर गई ज़िन्दगी
क़ामयाबी का गुमान ज़िन्दगी पे लदा और
ज़िन्दगी के दाता को अखर गई ज़िन्दगी
मौत की हवा ने श्वास का दीया बुझा दिया तो
हाड़-हाड़ राख में बिखर गई ज़िन्दगी

✍️ चिराग़ जैन


Friday, July 6, 2007

लव इन दिल्ली-यूनिवर्सिटी

मौरिस नगर के नुक्कड़ों को
आज भी याद हैं
हज़ारों निशब्द प्रेम कहानियाँ
जिनका पूरा सफ़र
तय होकर रह गया
आँखों-आँखों में ही।

लेकिन अब
ये प्रेम कहानियाँ
ऐसी ख़ामोशी से नहीं बनतीं।
अब
दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ लिखकर
अपने अधिकार जान गया है प्रेम।

अब लोक-लाज
और पिछड़े हुए समाज से
आगे निकलकर
‘निरुलाज़’ और ‘मॅक-डीज़’ में
बर्गर खाते हुए
घंटों बतिया सकता है प्रेम
...सेफ्ली।

या फिर आट्र्स फैकल्टी के बाहर
भेल-पुड़ी खाते हुए
आलिंगनबद्ध हो सकता है
सारे ज़माने के सामने।

अब फैशनेबल मोटर बाइक पर
बेहिचक-बेझिझक
बिना किसी से डरे
फर्राटे से दौड़ सकता है प्रेम।

पहले की तरह नहीं
कि नाम पूछने में ही
महीनों लग जाएँ।
अब तो झट से पूछ सकता है
कोई भी
कुछ भी
किसी से भी।

© चिराग़ जैन

दिल्ली

वे भी दिन थे
जब पुरानी दिल्ली की
तंग गलियाँ
अकारण ही मुस्कुरा देती थीं 
नज़र मिलने पर
अजनबियों से भी।

दरियागंज की हवेलियाँ
अक्सर देखा करती थीं 
एक कटोरी को
देहरी लांघकर
इतराते हुए
दूसरी देहरी तक जाते
कुछ दशक पहले तक।

शाहदरा के बेतरबीब मकान
चिलचिलाती धूप में अक्सर
दरवाज़ा खोलकर
बिना झल्लाए
तर कर देते थे
अजनबियों का गला
ठण्डे-ठण्डे पानी से।

करोल बाग़ की सड़कें
अनायास ही जुट जाती थीं 
मुसीबत में खड़े
मुसाफ़िरों की मदद के लिए!

लेकिन अब दिल्ली
दो पल ठहर कर
किसी को रास्ता नहीं बताती है।
अब एक्सीडेंट देखकर भी
गाड़ियों की कतारें
(न जाने
कहाँ पहुँचने की जल्दी में)
फर्राटे से निकल जाती हैं। 

अब कोई किसी प्यासे को
पानी नहीं पिलाता
और तो और
अब तो कोई प्यासा
पानी पीने के लिए
किसी का
दरवाज़ा भी नहीं खटखटाता।

शाहदरा और
उत्तम नगर की
कस्बाई गलियाँ
धड़धड़ाती मैट्रो में सवार होकर 
गड्ड-मड्ड हो जाती हैं
साउथ-एक्स
और नेहरू प्लेस की
शहरी भीड़ में।

अब इन गलियों के पास
नहीं बचा है वक़्त
चाय की चुस्कियों के साथ
‘जनसत्ता’ पढ़ने का।

अब तो
फटाफट न्यूज़ का
दस मिनिट का बुलेटिन
देख पाते हैं
बमुश्किल।

दरियागंज की हवेलियों में
अब गोदाम हैं 
किताबों के
काग़ज़ के
और रुपयों के।

पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ
अब तंग आ चुकी हैं 
अजनबियों से।

हुक्के की गुड़गुड़ाहट पर
कब्ज़ा कर लिया है
‘आइए भैनजी,
सूट देखिये!’
-की आवाज़ ने।

मुद्दतों से
ग़ज़ल नहीं इठलाई है
बल्लीमारान की
गली क़ासिम में
अब यहाँ
जूतियों का
इंटरनेशनल बाज़ार है।

© चिराग़ जैन

ऐब्स्ट्रेक्ट

किसी की याद के
कुछ रंग
यक-ब-यक
बिखर जाते हैं
ज़ेहन के कॅनवास पर।

और
मैं ठहर कर
निहारने लगता हूँ
उस कलाकृति की
ख़ूबसूरती को।
बूझने लगता हूँ
अतीत के स्ट्रोक्स की
जटिल पहेलियाँ।

आज तक
समझ नहीं पाया हूँ
कि ये ऐब्स्ट्रेक्ट
बना
तो बना कैसे?

✍️ चिराग़ जैन