Thursday, August 14, 2008

देश को महान कौन करता

यदि इतिहास वाले लोग हम जैसे होते
बोलो दुविधाओं का निदान कौन करता
झाँसी वाली रानी कर लेती समझौता गर
राष्ट्र के निमित्त बलिदान कौन करता
भगत भी चाटुकारों वाली भाषा सीख लेते
भारतीयता पे अभिमान कौन करता
नेताजी सुभाष औ पटेल होते स्वार्थी तो
फिर मेरे देश को महान कौन करता

© चिराग़ जैन

Saturday, August 2, 2008

कोई बिछड़कर मिला है

जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है

उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है

कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है

हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है

भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है

कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है

ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है

जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है

कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, July 15, 2008

ग़रीबी

रुके आँसू, दबी चीखें, बंधी मुट्ठी, भिंचे जबड़े
इन्हीं के तर्जुमे से मुल्क़ में विस्फोट होता है
ये बम रखने का काम अच्छा-बुरा औरों की ख़ातिर है
ग़रीबी के लिए तो सिर्फ़ सौ का नोट होता है

© चिराग़ जैन

Tuesday, July 1, 2008

ख़ुशियों की तस्वीर

मन के आंगन में मुस्कानों की जागीर बनानी है
अपने ही हाथों से ख़ुद अपनी तक़दीर बनानी है
हम कुछ रंग चुरा लाए हैं ख़ुशियों के गुलदस्ते से
इन रंगों से हमको जीवन की तस्वीर बनानी है

© चिराग़ जैन

Monday, May 5, 2008

बेमतलब का डर

तेरा अहसास मेरे दिल में ही पलता रहा बरसों
बयाने-दिल किसी डर से यूँ ही टलता रहा बरसों
तेरा दिल भी मेरी ख़ामोशियों को कोसता होगा
मेरे दिल को भी बेमतलब का डर खलता रहा बरसों

© चिराग़ जैन

Monday, April 28, 2008

बहाना अनबन का

तू मेरे मन भा जाए या मैं तेरे मन भा जाऊँ
तू मुझसे जुड़ता जाए या मैं तुझसे जुड़ता जाऊँ
आओ तलाशें कोई बहाना अनबन का, इससे पहले
तू मुझसे उकता जाए या मैं तुझसे उकता जाऊँ

✍️ चिराग़ जैन

Monday, April 21, 2008

इक मुक़म्मल बयान

प्यार कब बेज़ुबान होता है
लफ्ज़ बिन दास्तान होता है
आँख तक बोलने लगें इसमें
इक मुक़म्मल बयान होता है

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, April 13, 2008

वो कश्मीर हमारा है

हिमगिरि की गोदी में पसरा जो इक हरा बगीचा है
जिसकी झीलों को पुरखों ने स्वेदकणों से सींचा है
जिसके कण-कण में भारत की सौंधी ख़ुश्बू बिखरी है
जिसके प्रांगण में हरियाली दिव्य रूप में बिखरी है
जहाँ धरा पर स्वर्ग सरीख़ा अद्भुत भव्य नज़ारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

एक ओर हरियाली घाटी हरा रंग लहराती है
श्वेत बर्फ़ से ढँकी चोटियाँ चांदी बन छा जाती हैं
सांझ-सवेरे सूरज झीलों के पानी को रंगता है
इसी तरह कश्मीर रोज़ दो बार तिरंगा बनता है
स्वयं प्रकृति ने दुनिया भर को हर दिन दिया इशारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

अमरनाथ से हरगिज़ अपना रिश्ता तोड़ नहीं सकते
मानसरोवर जाने वाली राहें छोड़ नहीं सकते
‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ स्वर से गुंजित लद्दाख जहाँ
हम उस पुण्य धरा से पल भर भी मुख मोड़ नहीं सकते
जिसे आस्था भरी दृष्टि से अपलक नित्य निहारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

जिन शिखरों ने सीमा-प्रहरी का किरदार निभाया है
जिसके गीतों को बच्चों ने विद्यालयों में गाया है
जिसके दम पर पूरा भारत सदा रहा निश्चिंत-निडर
कैसे माने भारत कि वो पर्वतराज पराया है
सेल्यूकस-सा विश्व विजेता जिसके आगे हारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

सवा पाँच सौ काबिल बेटे इक करगिल पर वार दिए
अरबों-खरबों रुपए इसकी रक्षा हेतु निसार दिया
जिसके जन-जन की ख़ुशियों की लेते ज़िम्मेदारी हम
भला दान मेें कैसे दे दें वो केसर की क्यारी हम
नज़र गड़ी जिस पर चोरों की, जो अनमोल सितारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

बेशक़ हम शिव के वंशज हैं, विष धारण कर सकते हैं
लेकिन वक़्त पड़े तो शंकर तांडव भी कर सकते हैं
कर्ण दान में दे सकते हैं निज रक्षा के साधन भी
लेकिन धर्म नीति से हमने जीते बीसों रावन भी
क्षमा विवशता नहीं हमारी, ये स्वभाव हमारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

© चिराग़ जैन

Saturday, April 12, 2008

बचपन नहीं जाता

अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता
तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता

कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन
कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता

भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब
मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता

चुभन ही क्यों बहुत लम्बे समय तक याद रहती है
मिरे मन से वो इक पल का परायापन नहीं जाता

किसी के रूठ जाने पर जो पीछे छूट जाते हैं
बहुत दिन तक उन अपनों का अकेलापन नहीं जाता 

© चिराग़ जैन

Thursday, March 20, 2008

अवतारी बालक

जीवन के जिस मौसम में आँखें सपने पाला करती हैं
कुछ रंग-बिरंगी उम्मीदें जब होश संभाला करती हैं
पलकों के भीतर कोई अनगढ़ मूरत ढाली जाती है
सरगम साँसों की वीणा पर प्रियतम के गीत सुनाती है

वो मौसम जिसमें अपने कुछ कानून बनाए जाते हैं
वो मौसम जिसमें मिलन-विरह के नग़में गाए जाते हैं
वो मौसम जिसमें दुनियादारी से चिढ़ होने लगती है
वो मौसम जब आँखें अपनी दुनिया में खोने लगती हैं
वो मौसम जिसमें प्रीतम सारे जग से ऊँचा होता है
वो मौसम जब दो बाँहों में संसार समूचा होता है
वो मौसम जिसमें लोगों को दुनिया का तौर नहीं दिखता
वो मौसम जिसमें साजन से बढ़कर कुछ और नहीं दिखता
उस मौसम में इक बालक को जंज़ीर दिखाई देती थी
भारत माता की पीड़ा, आहें, पीर दिखाई देती थी
उस मौसम में इक बालक भारत मां की पूजा करता था
धरती की ख़ातिर जीता था, धरती की ख़ातिर मरता था
उस मौसम में इक बालक खेतों में बन्दूकें बोता था
मां की पीड़ा का अनुभव कर भीतर ही भीतर रोता था

उसके मन के भीतर जाने कैसा लावा सा गलता था
उसकी गीली आंखों में आज़ादी का सपना पलता था
उसकी आवाजे़ें अंग्रेजों के नक्कारों पर भारी थीं
उसकी बातों में स्वाभिमान वाली स्वर्णिम चिंगारी थी
ईश्वर ने स्वाभिमान की मानो मूरत एक बनाई थी
जिसने सतपथ पर चल अपनी जीवन वसुधा महकाई थी
वो जागा तो भारत की सोई जवानी ने अंगड़ाई ली
वो निकला तो आज़ादी की देवी ने आ अगुआई की
वो झूमा तो ऐसा झूमा, दुश्मन की नींवें हिला गया
वो गूंजा तो ऐसा गूंजा, लंदन तक हल्ला मचा गया
वो हंसते-हंसते फांसी पर झूला; दुश्मन थर्राया था
वो एक कटा तो गली-गली में भगतसिंह उग आया था
वो लक्ष्मण, भरत, भीष्म, अर्जुन की एक सकल प्रतिच्छाया था
वो मां के कष्ट मिटाने को अवतारी बनकर आया था

✍️ चिराग़ जैन