लिखे किसी ने गीत तो समझो, मन को गहरी पीर मिली
सृजन हुआ उन्मुक्त तभी जब, ख़ुशियों को ज़ंजीर मिली
किस्से बने, कहानी फैली, चित्र सजे, कविता जन्मी
पर न मिली मजनू को लैला, ना रांझे को हीर मिली
© चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Wednesday, August 20, 2008
Thursday, August 14, 2008
देश को महान कौन करता
यदि इतिहास वाले लोग हम जैसे होते
बोलो दुविधाओं का निदान कौन करता
झाँसी वाली रानी कर लेती समझौता गर
राष्ट्र के निमित्त बलिदान कौन करता
भगत भी चाटुकारों वाली भाषा सीख लेते
भारतीयता पे अभिमान कौन करता
नेताजी सुभाष औ पटेल होते स्वार्थी तो
फिर मेरे देश को महान कौन करता
© चिराग़ जैन
बोलो दुविधाओं का निदान कौन करता
झाँसी वाली रानी कर लेती समझौता गर
राष्ट्र के निमित्त बलिदान कौन करता
भगत भी चाटुकारों वाली भाषा सीख लेते
भारतीयता पे अभिमान कौन करता
नेताजी सुभाष औ पटेल होते स्वार्थी तो
फिर मेरे देश को महान कौन करता
© चिराग़ जैन
Saturday, August 2, 2008
कोई बिछड़कर मिला है
जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है
उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है
कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है
उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है
कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है
हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है
भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है
कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है
ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है
जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है
कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है
✍️ चिराग़ जैन
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है
भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है
कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है
ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है
जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है
कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, July 15, 2008
ग़रीबी
रुके आँसू, दबी चीखें, बंधी मुट्ठी, भिंचे जबड़े
इन्हीं के तर्जुमे से मुल्क़ में विस्फोट होता है
ये बम रखने का काम अच्छा-बुरा औरों की ख़ातिर है
ग़रीबी के लिए तो सिर्फ़ सौ का नोट होता है
© चिराग़ जैन
इन्हीं के तर्जुमे से मुल्क़ में विस्फोट होता है
ये बम रखने का काम अच्छा-बुरा औरों की ख़ातिर है
ग़रीबी के लिए तो सिर्फ़ सौ का नोट होता है
© चिराग़ जैन
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Tuesday, July 1, 2008
ख़ुशियों की तस्वीर
मन के आंगन में मुस्कानों की जागीर बनानी है
अपने ही हाथों से ख़ुद अपनी तक़दीर बनानी है
हम कुछ रंग चुरा लाए हैं ख़ुशियों के गुलदस्ते से
इन रंगों से हमको जीवन की तस्वीर बनानी है
© चिराग़ जैन
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Monday, May 5, 2008
बेमतलब का डर
तेरा अहसास मेरे दिल में ही पलता रहा बरसों
बयाने-दिल किसी डर से यूँ ही टलता रहा बरसों
तेरा दिल भी मेरी ख़ामोशियों को कोसता होगा
मेरे दिल को भी बेमतलब का डर खलता रहा बरसों
© चिराग़ जैन
बयाने-दिल किसी डर से यूँ ही टलता रहा बरसों
तेरा दिल भी मेरी ख़ामोशियों को कोसता होगा
मेरे दिल को भी बेमतलब का डर खलता रहा बरसों
© चिराग़ जैन
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Monday, April 28, 2008
बहाना अनबन का
तू मेरे मन भा जाए या मैं तेरे मन भा जाऊँ
तू मुझसे जुड़ता जाए या मैं तुझसे जुड़ता जाऊँ
आओ तलाशें कोई बहाना अनबन का, इससे पहले
तू मुझसे उकता जाए या मैं तुझसे उकता जाऊँ
✍️ चिराग़ जैन
तू मुझसे जुड़ता जाए या मैं तुझसे जुड़ता जाऊँ
आओ तलाशें कोई बहाना अनबन का, इससे पहले
तू मुझसे उकता जाए या मैं तुझसे उकता जाऊँ
✍️ चिराग़ जैन
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Monday, April 21, 2008
इक मुक़म्मल बयान
प्यार कब बेज़ुबान होता है
लफ्ज़ बिन दास्तान होता है
आँख तक बोलने लगें इसमें
इक मुक़म्मल बयान होता है
✍️ चिराग़ जैन
लफ्ज़ बिन दास्तान होता है
आँख तक बोलने लगें इसमें
इक मुक़म्मल बयान होता है
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, April 13, 2008
वो कश्मीर हमारा है
हिमगिरि की गोदी में पसरा जो इक हरा बगीचा है
जिसकी झीलों को पुरखों ने स्वेदकणों से सींचा है
जिसके कण-कण में भारत की सौंधी ख़ुश्बू बिखरी है
जिसके प्रांगण में हरियाली दिव्य रूप में बिखरी है
जहाँ धरा पर स्वर्ग सरीख़ा अद्भुत भव्य नज़ारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
एक ओर हरियाली घाटी हरा रंग लहराती है
श्वेत बर्फ़ से ढँकी चोटियाँ चांदी बन छा जाती हैं
सांझ-सवेरे सूरज झीलों के पानी को रंगता है
इसी तरह कश्मीर रोज़ दो बार तिरंगा बनता है
स्वयं प्रकृति ने दुनिया भर को हर दिन दिया इशारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
अमरनाथ से हरगिज़ अपना रिश्ता तोड़ नहीं सकते
मानसरोवर जाने वाली राहें छोड़ नहीं सकते
‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ स्वर से गुंजित लद्दाख जहाँ
हम उस पुण्य धरा से पल भर भी मुख मोड़ नहीं सकते
जिसे आस्था भरी दृष्टि से अपलक नित्य निहारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
जिन शिखरों ने सीमा-प्रहरी का किरदार निभाया है
जिसके गीतों को बच्चों ने विद्यालयों में गाया है
जिसके दम पर पूरा भारत सदा रहा निश्चिंत-निडर
कैसे माने भारत कि वो पर्वतराज पराया है
सेल्यूकस-सा विश्व विजेता जिसके आगे हारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
सवा पाँच सौ काबिल बेटे इक करगिल पर वार दिए
अरबों-खरबों रुपए इसकी रक्षा हेतु निसार दिया
जिसके जन-जन की ख़ुशियों की लेते ज़िम्मेदारी हम
भला दान मेें कैसे दे दें वो केसर की क्यारी हम
नज़र गड़ी जिस पर चोरों की, जो अनमोल सितारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
बेशक़ हम शिव के वंशज हैं, विष धारण कर सकते हैं
लेकिन वक़्त पड़े तो शंकर तांडव भी कर सकते हैं
कर्ण दान में दे सकते हैं निज रक्षा के साधन भी
लेकिन धर्म नीति से हमने जीते बीसों रावन भी
क्षमा विवशता नहीं हमारी, ये स्वभाव हमारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
© चिराग़ जैन
जिसकी झीलों को पुरखों ने स्वेदकणों से सींचा है
जिसके कण-कण में भारत की सौंधी ख़ुश्बू बिखरी है
जिसके प्रांगण में हरियाली दिव्य रूप में बिखरी है
जहाँ धरा पर स्वर्ग सरीख़ा अद्भुत भव्य नज़ारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
एक ओर हरियाली घाटी हरा रंग लहराती है
श्वेत बर्फ़ से ढँकी चोटियाँ चांदी बन छा जाती हैं
सांझ-सवेरे सूरज झीलों के पानी को रंगता है
इसी तरह कश्मीर रोज़ दो बार तिरंगा बनता है
स्वयं प्रकृति ने दुनिया भर को हर दिन दिया इशारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
अमरनाथ से हरगिज़ अपना रिश्ता तोड़ नहीं सकते
मानसरोवर जाने वाली राहें छोड़ नहीं सकते
‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ स्वर से गुंजित लद्दाख जहाँ
हम उस पुण्य धरा से पल भर भी मुख मोड़ नहीं सकते
जिसे आस्था भरी दृष्टि से अपलक नित्य निहारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
जिन शिखरों ने सीमा-प्रहरी का किरदार निभाया है
जिसके गीतों को बच्चों ने विद्यालयों में गाया है
जिसके दम पर पूरा भारत सदा रहा निश्चिंत-निडर
कैसे माने भारत कि वो पर्वतराज पराया है
सेल्यूकस-सा विश्व विजेता जिसके आगे हारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
सवा पाँच सौ काबिल बेटे इक करगिल पर वार दिए
अरबों-खरबों रुपए इसकी रक्षा हेतु निसार दिया
जिसके जन-जन की ख़ुशियों की लेते ज़िम्मेदारी हम
भला दान मेें कैसे दे दें वो केसर की क्यारी हम
नज़र गड़ी जिस पर चोरों की, जो अनमोल सितारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
बेशक़ हम शिव के वंशज हैं, विष धारण कर सकते हैं
लेकिन वक़्त पड़े तो शंकर तांडव भी कर सकते हैं
कर्ण दान में दे सकते हैं निज रक्षा के साधन भी
लेकिन धर्म नीति से हमने जीते बीसों रावन भी
क्षमा विवशता नहीं हमारी, ये स्वभाव हमारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
© चिराग़ जैन
Saturday, April 12, 2008
बचपन नहीं जाता
अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता
तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता
कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन
कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता
भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब
मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता
चुभन ही क्यों बहुत लम्बे समय तक याद रहती है
मिरे मन से वो इक पल का परायापन नहीं जाता
किसी के रूठ जाने पर जो पीछे छूट जाते हैं
बहुत दिन तक उन अपनों का अकेलापन नहीं जाता
तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता
कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन
कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता
भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब
मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता
चुभन ही क्यों बहुत लम्बे समय तक याद रहती है
मिरे मन से वो इक पल का परायापन नहीं जाता
किसी के रूठ जाने पर जो पीछे छूट जाते हैं
बहुत दिन तक उन अपनों का अकेलापन नहीं जाता
© चिराग़ जैन
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