उम्र के इक पड़ाव पर जाकर
इश्क़ सबको दुलारता होगा
कभी चेहरा निहारता होगा
कभी गेसू संवारता होगा
© चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Monday, September 15, 2008
इश्क़
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Thursday, August 28, 2008
कोई यूँ ही नहीं चुभता
मैंने कौन-सी कविता कैसे लिखी, इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए असंभव-प्रायः है। भावनाओं के सागर में उठे ज्वार ने अन्तस् की धरती पर कैसा रेणुका-चित्र अंकित किया -यह तो सबको दिखाई देता है, लेकिन इस चित्र के सृजन की त्वरित प्रक्रिया में लहर कैसे उठी; कैसे धरती पर न्यौछावर हुई; कैसे उसने रेत को काटा और कैसे वह वापस लौट गई - इन दृश्यों के साक्षी तो बहुत हैं, समीक्षक कोई नहीं।
मैंने अपने भीतर कविता के प्रस्फुटन को चाहे समझा न हो, देखा अवश्य है। सहज साक्षीभाव से सृजन की आकुलता को अनुभूत किया है। मन के भीतर गुंजायमान काव्य-ध्वनियों का दिन-रात पीछा किया है और अनुभूति से अभिव्यक्ति के बीच, यात्रा की जटिलताओं से साक्षात्कार किया है।
मुझे मालूम है कि मैं किसी कविता के अवतरण का माध्यम हो सकता हूँ, निमित्त हो सकता हूँ, रचयिता नहीं। इसी सत्य को जानते हुए, मैंने कभी कविता लिखने के लिए प्रयास नहीं किए। अभिव्यक्ति में बदलती अनुभूति की विधा के साथ कभी छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं की। बल्कि उद्वेलन की पराकाष्ठा पर पहुँचकर इन रचनाओं ने स्वयं ही अपने अवतरण का निमित्त बनाकर मुझे कृतार्थ किया है। मैंने तो अन्तस् में कहीं दूर गूंजती हुई ध्वनियों को सुनकर, गणपति भाव से उन्हें यथावत् काग़ज़ पर उतारने से अधिक कुछ भी नहीं किया।
जैसे मधुमास में लाल-लाल फूलों से लदने से पहले गुलमोहर के छोटे-छोटे पत्ते स्वतः ही झरने लगते हैं। ऊँचे-ऊँचे वृक्षों का आसन त्यागकर विराट धरातल पर आ उतरते हैं। ठीक उसी प्रकार, कविता भी एक अजीब सी मस्ती लिए स्वेच्छा से ही शब्दों का रूप धारण करती है। काव्य की यह मस्ती स्वयं काव्य को तो आह्लादित करती ही है, साथ ही साथ संसर्गियों के मन में भी एक पावन-सी ऊर्जा, एक सात्विक-सा रोमांच उत्पन्न करती है। इस परिस्थिति में शब्द तलाशने नहीं पड़ते; तुक मिलाने नहीं पड़ते; मात्राएँ गिननी नहीं पड़तीं और धुनें बनानी नहीं पड़ती! सब कुछ स्वतः घटित होता है, एकदम सहज... सत्य-सा...! और ध्यानस्थ योगी-सा कवि, नितान्त अकेला... अकिंचन.... रचना का अवलम्बन बनकर सुखसागर में गोते लगाता है।
अनहद नाद के समान अन्तस् में गूंजते इन काव्य स्वरों के पाश्र्व में, जो कारक विद्यमान होते हैं, उनके बूते ही अनुभूति से अभिव्यक्ति की दुर्गम यात्रा पूर्ण हो पाती है। सो, मैं आभारी हूँ उन स्थितियों, परिस्थितियों, योग तथा मनुष्यों का, जो किसी भी रूप में मेरी अनुभूति के कारक बने और अभिव्यक्ति के साक्षी रहे। साथ ही आभार व्यक्त करता हूँ, उन अपनों का जिनके स्नेहावलम्बन को पकड़ मेरा रचनाकार अब तक की यात्रा तय कर सका!
काव्य का दिव्य अवतरण मेरे माध्यम से यूँ ही काग़ज़ों पर होता रहे और माँ शारदे का आशीष सदैव मेरे अन्तस् में काव्य-प्रस्फुटन का रूप धरकर फलीभूत होता रहे!
© चिराग़ जैन
Sunday, August 24, 2008
माखनचोर
कान्हा के किरदार का, कोई ओर न छोर
इक पर वो जगदीश है, इक पल माखनचोर
© चिराग़ जैन
इक पर वो जगदीश है, इक पल माखनचोर
गोपी, ग्वाले, बांसुरी, रास, नृत्य, बृजधाम
ये सारा कुछ कृष्ण का, केवल इक आयाम
© चिराग़ जैन
Thursday, August 21, 2008
राम ने खोया बहुत श्रीराम बनने के लिए
त्याग दी हर कामना निष्काम बनने के लिए
तीन पहरों तक तपा दिन, शाम बनने के लिए
घर, नगर, परिवार, ममता, प्रेम, अपनापन, दुलार
राम ने खोया बहुत श्रीराम बनने के लिए
© चिराग़ जैन
तीन पहरों तक तपा दिन, शाम बनने के लिए
घर, नगर, परिवार, ममता, प्रेम, अपनापन, दुलार
राम ने खोया बहुत श्रीराम बनने के लिए
© चिराग़ जैन
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Wednesday, August 20, 2008
ख़ुशियों को ज़ंजीर
लिखे किसी ने गीत तो समझो, मन को गहरी पीर मिली
सृजन हुआ उन्मुक्त तभी जब, ख़ुशियों को ज़ंजीर मिली
किस्से बने, कहानी फैली, चित्र सजे, कविता जन्मी
पर न मिली मजनू को लैला, ना रांझे को हीर मिली
© चिराग़ जैन
सृजन हुआ उन्मुक्त तभी जब, ख़ुशियों को ज़ंजीर मिली
किस्से बने, कहानी फैली, चित्र सजे, कविता जन्मी
पर न मिली मजनू को लैला, ना रांझे को हीर मिली
© चिराग़ जैन
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Thursday, August 14, 2008
देश को महान कौन करता
यदि इतिहास वाले लोग हम जैसे होते
बोलो दुविधाओं का निदान कौन करता
झाँसी वाली रानी कर लेती समझौता गर
राष्ट्र के निमित्त बलिदान कौन करता
भगत भी चाटुकारों वाली भाषा सीख लेते
भारतीयता पे अभिमान कौन करता
नेताजी सुभाष औ पटेल होते स्वार्थी तो
फिर मेरे देश को महान कौन करता
© चिराग़ जैन
बोलो दुविधाओं का निदान कौन करता
झाँसी वाली रानी कर लेती समझौता गर
राष्ट्र के निमित्त बलिदान कौन करता
भगत भी चाटुकारों वाली भाषा सीख लेते
भारतीयता पे अभिमान कौन करता
नेताजी सुभाष औ पटेल होते स्वार्थी तो
फिर मेरे देश को महान कौन करता
© चिराग़ जैन
Saturday, August 2, 2008
कोई बिछड़कर मिला है
जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है
उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है
कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है
उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है
कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है
हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है
भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है
कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है
ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है
जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है
कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है
✍️ चिराग़ जैन
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है
भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है
कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है
ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है
जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है
कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, July 15, 2008
ग़रीबी
रुके आँसू, दबी चीखें, बंधी मुट्ठी, भिंचे जबड़े
इन्हीं के तर्जुमे से मुल्क़ में विस्फोट होता है
ये बम रखने का काम अच्छा-बुरा औरों की ख़ातिर है
ग़रीबी के लिए तो सिर्फ़ सौ का नोट होता है
© चिराग़ जैन
इन्हीं के तर्जुमे से मुल्क़ में विस्फोट होता है
ये बम रखने का काम अच्छा-बुरा औरों की ख़ातिर है
ग़रीबी के लिए तो सिर्फ़ सौ का नोट होता है
© चिराग़ जैन
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Tuesday, July 1, 2008
ख़ुशियों की तस्वीर
मन के आंगन में मुस्कानों की जागीर बनानी है
अपने ही हाथों से ख़ुद अपनी तक़दीर बनानी है
हम कुछ रंग चुरा लाए हैं ख़ुशियों के गुलदस्ते से
इन रंगों से हमको जीवन की तस्वीर बनानी है
© चिराग़ जैन
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Monday, May 5, 2008
बेमतलब का डर
तेरा अहसास मेरे दिल में ही पलता रहा बरसों
बयाने-दिल किसी डर से यूँ ही टलता रहा बरसों
तेरा दिल भी मेरी ख़ामोशियों को कोसता होगा
मेरे दिल को भी बेमतलब का डर खलता रहा बरसों
© चिराग़ जैन
बयाने-दिल किसी डर से यूँ ही टलता रहा बरसों
तेरा दिल भी मेरी ख़ामोशियों को कोसता होगा
मेरे दिल को भी बेमतलब का डर खलता रहा बरसों
© चिराग़ जैन
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