Monday, May 25, 2009

दूसरा प्यार

फिर से मन में अंकुर फूटे, फिर से आँखों में ख़्वाब पले
फिर से कुछ अंतस् में पिघला, फिर से श्वासों से स्वर निकले
फिर से मैंने सबसे छुपकर, इक मन्नत मांगी ईश्वर से
फिर से इक सादा-सा चेहरा, कुछ ख़ास लगा दुनिया भर से
फिर इक लड़की की रुचियों से, जीवन के सब प्रतिमान बने
फिर इक चेहरे की सुधियों से, सुन्दरता के उपमान बने
मुझको लगता था ये सब कुछ शायद इस बार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा

फिर से मेरे मोबाइल में इक नम्बर सबसे ख़ास बना
फिर इक सोशल प्रोफ़ाइल से, मन का मधुरिम अहसास बना
फिर से मोबाइल की घंटी, आँखों की चमक बढ़ाती थी
फिर से इक लड़की की फोटो, मुझसे घण्टों बतियाती थी
उसको मैसिज कर सोना था, उसके मैसिज से जगना था
उसके भेजे हर इक मैसिज को अलग सहेजे रखना था
सोचा था हम पर पागलपन हावी इस बार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा

फिर से इक चंचल लड़की की हर बात सुहानी लगती थी
वो लड़की बहुत सयानी, पर दुनिया दीवानी लगती थी
उसकी ख़ुशियाँ, उसके सपने, उसकी हर चीज़ ज़रूरी थी
बाकी के सारे काम महज दुनिया की इक मजबूरी थी
फिर से मैं सारी दुनिया की नज़रों में इक बेकार हुआ
फिर से ख़र्चों का ग्राफ़ बढ़ा, आमदनी बंद, उधार हुआ
मेरा मस्तिष्क कभी दिल के हाथों लाचार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा

फिर से कुछ बेमतलब बातें, इन अधरों पर मुस्कान बनीं
फिर से इक लड़की की यादें, तन्हाई में वरदान बनीं
फिर से नयनों की कोरों पर, इक आँसू आ ठिठका, ठहरा
फिर से उसकी मुस्कानों ने सपनों पर बिठलाया पहरा
फिर से मेरी कविताओं का रस बदला औ’ शृंगार सजा
फिर से गीतों में पीर ढली, फिर से ग़ज़लों में प्यार सजा
मेरे कवि पर इक लड़की का, इतना अधिकार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा

शायद मेरी मन-बगिया में कुछ पावन पुष्प महकने थे
शायद मेरे काव्यांगन में कुछ अनुपम गीत उतरने थे
शायद यह फूल मुहब्बत का खिलना था और बिखरना था
शायद यह सब निर्धारित था, मिलना था और बिछड़ना था
शायद अहसासों की मेरे मन में इक खण्डित मूरत थी
शायद मुझको इस अनुभव की पहले से अधिक ज़रूरत थी
शायद मुझसे फिर कोमल भावों का सत्कार नहीं होता
सब अनुभव आधे रह जाते गर फिर से प्यार नहीं होता

© चिराग़ जैन

Sunday, May 17, 2009

खालीपन

जिस दरपन ने तुम्हें निहारा, उस दरपन का खालीपन
और सघन कर देता है इस अंतर्मन का खालीपन

कल तक आंगन में उनके आने की कोई आस तो थी
अब तो भुतहा सा लगता है इस आंगन का खालीपन

सारा कुछ खोकर भी जाने किसे जीतने निकला हूँ
शायद मुझमें घर कर बैठा है रावन का खालीपन

मेरा सब कुछ ले कर भी उनका मन रीता-रीता है
मेरे भीतर भरा हुआ है, उनके मन का खालीपन

शाम उदासी ओढ़ खड़ी है, बादल ग़ायब, हवा अचल
एक परिंदा भर सकता है नीलगगन का खालीपन

© चिराग़ जैन

Friday, May 8, 2009

इक नया रास्ता

ज़िन्दगी जब भी आज़माती है
इक नया रास्ता दिखाती है

न तो पिंजरे में चहचहाती है
न ही अब पंख फड़फड़ाती है

जब कभी माँ की याद आती है
ये हवा लोरियाँ सुनाती है

वो मरासिम को यूँ निभाती है
मिरा हर काम भूल जाती है

मेरे ख़्वाबों में यूँ वो आती है
जैसे पाजेब छनछनाती है

लफ़्ज़ मिल पाए तो सुनाऊंगा
इक ग़ज़ल मुझमें छटपटाती है

जब भी जाता है चांद महफ़िल से
रात की जान सूख जाती है

दिल को मिलती है जब ख़ुशी कोई
अक़्ल कुछ दर्द भूल जाती है

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, March 15, 2009

कोशिश

मैं ‘मन’ लिखने की
कोशिश करता हूँ
....सिर्फ़ कोशिश।

कभी इसका मन
कभी उसका मन
कभी सबका मन
...और कभी-कभी
अपना भी मन।

इतना ही समझ आता है मुझे
कि ‘कोशिश’
और ‘कामयाबी’
उर्दू ज़ूबान के
दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं!

© चिराग़ जैन

Friday, February 13, 2009

अनदेखी

देर तक देखता रहा मैं
एक बिन्दु को
आशा भरी नज़रों से
लगातार।

उतनी ही देर तक
तकती रहीं
दो आँखें
छलछलाती हुईं
मुझे भी!

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, February 12, 2009

इलेक्शन

होता तो यही है जी हर बार इलेक्शन में
पब्लिक को मनाती है, सरकार इलेक्शन में

जनता का ही पैसा है, जनता पे ही शासन है
जनता का ही होता है, व्यापार इलेक्शन में

कुछ झंडे उठाकर के, कुछ बिल्ले लगाकर के
बिन बात ही करते हैं, बेगार इलेक्शन में

कुछ रंगे सियारों ने, कुछ नंगे गरीबों के
बच्चों को लिया कैसे पुचकार इलेक्शन में

लीडर के कदम चूमें, ये लीपी हुई सड़कें
इनका तो हुआ ही है, उद्धार इलेक्शन में

हर दिल है महज दलदल, दिल्ली के दलालों की
कूदे तो भला कैसे, ख़ुद्दार इलेक्शन में

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 16, 2009

महत्व

तुमसे मिलना...
...जैसे
हाई-वे पर दौड़ती गाड़ी
दो पल को ठहरे
किसी पैट्रोल पम्प पर।

...जैसे
परवाज़ की ओर
बढ़ता परिंदा
यकायक उतर आए
धरती पर
पानी की चाह में।

...जैसे
बहुत लंबी
मरुथली यात्रा के दौरान
हरे पेड़ की छाँव!

© चिराग़ जैन

Tuesday, December 9, 2008

रिस्क

मेरे भीतर
दौड़ना चाहती है
इक नदी
दरदरे रेगिस्तान की ओर।

मस्तिष्क ने कहा-
"रिस्क है इसमें।"

मन बोला-
"जुआ ही तो है
या तो लहलहा उठेगा
रेगिस्तान
या दरदरा जाएगी
नदी!"

© चिराग़ जैन

Thursday, October 9, 2008

संकल्प

मैं ये दावा नहीं करता कि दुनिया को बदल दूंगा
मगर जो रास्ता सच का हो, उस रस्ते पे चल दूंगा
मेरा अधिकार है चिंतन पे, संकल्पों पे, कर्मों पे
मैं ये संकल्प लेता हूँ कि सत्कर्मों पे बल दूंगा

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, September 30, 2008

इरादा

तेरे मन में भी इक इरादा है
मेरे मन में भी इक इरादा है
वक्त क़ी आंधियाँ बताएंगीं
कौन मजबूत कितना ज्यादा है

© चिराग़ जैन