Saturday, August 1, 2009

लो वेस्ट जीन्स पर बैन

पिछले दिनों इस बात से पूरे समाज में सनसनी फैल गई कि अब लड़के-लड़कियाँ लो वेस्ट जीन्स नहीं पहन सकेंगे। मुद्दआ ये है कि इस प्रकार के परिधानों को उत्तेजक बताते हुए इन पर बैन लगा दिया गया है। अब ये विषय विश्वविद्यालयों की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं के वाद-विवाद व्यवसाय तक छाया रहेगा।

दरअसल हमारा जागरूक समाज इस निर्णय को इसलिए स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि यह हमारे मौलिक अधिकार ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का हनन है। इस संदर्भ में परम आदरणीया मल्लिका जी की एक सूक्ति उद्धृत की जा सकती है। जब उनके परिधानों को लेकर कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों ने हंगामा खड़ा किया था तो मल्लिका जी ने यह उद्बोधन देकर मुआमला शांत किया था कि मेरे पास ख़ूबसूरत बदन है तो मैं क्यों न दिखाऊँ। तर्क में दम था। सो हंगामाजीवियों को साँप संूघ गया और संपादकीय पृष्ठों से उठा विवाद पेज थ्री के इस बयान से समाप्त हो गया।

कदाचित् बुद्धिजीवियों ने यह सोचकर विवाद को आगे नहीं बढ़ाया कि यदि कल को मल्लिका जी ने उन्हें कम कपड़े पहनने की चुनौती दे डाली तो क्या होगा! सो अपनी इज़्ज़त अपने हाथ....। ख़ैर कपड़ों की तरह विषय भी भटक गया था। सो वापस लो वेस्ट जीन्स पर आते हैं।

यह मुआमला केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का नहीं है अपितु हमारे सभ्य समाज की ‘अनुभूति की स्वतंत्रता’ का भी है। जब कुछ ‘सुराग़’ ही नहीं दिखाई देगा तो कल्पनाशील समाज पूरी तस्वीर की कल्पना कैसे करेगा। और जब तस्वीर की कल्पना ही नहीं होगी तो वह सुखद अनुभूति कैसे होगी जो..........!

इतना ही नहीं, ये निर्णय पुनः हमारे समाज की महिलाओं को उसी पुरुषवादी कठघरे में ला खड़ा करने का एक षड्यंत्र है जिससे बाहर आने के लिए सैंकड़ों लोग महिला-मुक्ति का झंडा उठाए कमा रहे हैं। पहले पुरुषों ने धर्म के नाम पर महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में क़ैद कर रखा था और अब पूरे कपड़ों में क़ैद करने के लिए समाज और सभ्यता की दुहाई दी जा रही है।

ये अन्याय नहीं चलेगा। और चूंकि क्रांति दबाने से और भड़कती है इसलिए यदि पुरुष यूँ ही मनमानी करते रहे और महिलाओं को पूरे कपड़े पहनाने को विवश किया गया तो महिलाएँ इसका और भी अधिक विरोध करेंगी और कोई काॅरपोरेट कंपनी अपनी सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभाते हुए लो थाइज़ जीन्स लांच कर देगी। फिर देखते रह जाएंगे सारे पुरुष!

सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए इस निर्णय पर बैन लगाए। ज़रा सोचिए! एक ग़रीब आदमी जो अभी दो सप्ताह पहले लिवाइज़ की जीन्स ख़रीद कर लाया है, इस निर्णय के लागू होने से उसके दिल पर क्या बीतेगी। कहाँ से लाएगा नई जीन्स ख़रीदने के लिए वह पैसा। जिस दौर में लोगों के पास दाल-रोटी के लाले हैं, ऐसे में सरकार ने यदि इस प्रकार के निर्णयों पर रोक नहीं लगाई तो ग़रीबी कितनी बढ़ जाएगी।

वैसे भी जब गांधी जी अपने देशवासियों की चिंता में अपने पायजामे को धोती में बदल सकते हैं, तो गांधी जी के अनुयायी अपनी जीन्स को थोड़ा छोटा नहीं कर सकते। ये और बात है कि गांधी जी ने पाऊँचे काटे थे और हमने बैल्ट! पर मूल मुद्दआ तो कटौती का है। और कटौती हम कर रहे हैं। अब इस निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए और इसको जीन्स से हटाकर टाॅप पर लागू करना चाहिए कि जो लो वेस्ट टाॅप पहनेगा उस पर ज़ुर्माना किया जाएगा। इससे हमारे टाॅप भी ऊपर उठेंगे और ‘संस्कृति’ भी!

© चिराग़ जैन

जग में कुछ लोग कमाए

काऊ ने भोग लिए मन के सुख, काऊ ने देह के रोग कमाए
दौलत में सुख खोजने वालों ने केवल भौतिक भोग कमाए
काऊ ने प्रेम में जीते नारायण, काऊ ने मात्र वियोग कमाए
जीवन सिर्फ़ उन्होंने जिया, जिनने जग में कुछ लोग कमाए

© चिराग़ जैन

Friday, July 31, 2009

सपनों का कॅनवास

मैं खुली आँखों से
एक सपना देखता था
अक्सर।

बनाता था इक तस्वीर
अपनी ख़्वाहिशों की।
न जाने कब उभर आया
एक मुकम्मल इंसान
मेरे मन के कॅनवास पर।

न जाने क्यों
मैंने रख दिया
अपना दिल
बिना सोचे-समझे
इस इंसान के सीने में

...तुम
केवल एक रिश्ता नहीं हो
मेरे लिए
तुम मेरे सपनों का
कॅनवास हो।

© चिराग़ जैन

Wednesday, June 24, 2009

समाधान

बहुत समझदार हो तुम!
जब कभी
उदासी का आँचल ओढ़कर
जवान होने लगता है
मेरा कोई दर्द
तो चुपचाप
बिना किसी शोर-शराबे के
कंधा देकर
…पहुँचा आते हो उसे
वहाँ
…जहाँ से लौट नहीं पाया कोई
आज तक!

© चिराग़ जैन

Tuesday, June 23, 2009

आपदा-प्रबंधन

संकट हो कोई समक्ष खड़ा
या फिर घिर आए युद्ध बड़ा
जीवन की हर कठिनाई से
मानव का पुत्र सदैव लड़ा
मानवता का इक दिव्य भाव, अंतस् में धारण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

सागर ने लांघी मर्यादा
सूनामी यम का रूप बनी
भूकम्पों की मनमानी से
जब धरा मृत्यु का कूप बनी
मानवता एक हुई सारी
विपदा उसके आगे हारी
सब मतभेदों का तिरस्कार, जीवन के कारण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

जब जीवनदायी मेघ फटें
अम्बर से मौत बरसती हो
नदियाँ सुरसा का रूप धरें
धरती किसान को ग्रसती हो
पर्वत से गिरे शिला भारी
शहरों को डसे महामारी
मानवता की रक्षा हित हम, हर स्वार्थ समर्पण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

जगती का कष्ट मिटाने को
शिव हालाहल पी जाते हैं
कान्हा गोकुल की रक्षा में
पर्वत का बोझ उठाते हैं
अस्थियाँ दान जहाँ ऋषि करें
और जनक खेत में कृषि करें
यदि समय त्याग का आया तो, हम याद कोई क्षण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

© चिराग़ जैन

Monday, May 25, 2009

दूसरा प्यार

फिर से मन में अंकुर फूटे, फिर से आँखों में ख़्वाब पले
फिर से कुछ अंतस् में पिघला, फिर से श्वासों से स्वर निकले
फिर से मैंने सबसे छुपकर, इक मन्नत मांगी ईश्वर से
फिर से इक सादा-सा चेहरा, कुछ ख़ास लगा दुनिया भर से
फिर इक लड़की की रुचियों से, जीवन के सब प्रतिमान बने
फिर इक चेहरे की सुधियों से, सुन्दरता के उपमान बने
मुझको लगता था ये सब कुछ शायद इस बार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा

फिर से मेरे मोबाइल में इक नम्बर सबसे ख़ास बना
फिर इक सोशल प्रोफ़ाइल से, मन का मधुरिम अहसास बना
फिर से मोबाइल की घंटी, आँखों की चमक बढ़ाती थी
फिर से इक लड़की की फोटो, मुझसे घण्टों बतियाती थी
उसको मैसिज कर सोना था, उसके मैसिज से जगना था
उसके भेजे हर इक मैसिज को अलग सहेजे रखना था
सोचा था हम पर पागलपन हावी इस बार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा

फिर से इक चंचल लड़की की हर बात सुहानी लगती थी
वो लड़की बहुत सयानी, पर दुनिया दीवानी लगती थी
उसकी ख़ुशियाँ, उसके सपने, उसकी हर चीज़ ज़रूरी थी
बाकी के सारे काम महज दुनिया की इक मजबूरी थी
फिर से मैं सारी दुनिया की नज़रों में इक बेकार हुआ
फिर से ख़र्चों का ग्राफ़ बढ़ा, आमदनी बंद, उधार हुआ
मेरा मस्तिष्क कभी दिल के हाथों लाचार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा

फिर से कुछ बेमतलब बातें, इन अधरों पर मुस्कान बनीं
फिर से इक लड़की की यादें, तन्हाई में वरदान बनीं
फिर से नयनों की कोरों पर, इक आँसू आ ठिठका, ठहरा
फिर से उसकी मुस्कानों ने सपनों पर बिठलाया पहरा
फिर से मेरी कविताओं का रस बदला औ’ शृंगार सजा
फिर से गीतों में पीर ढली, फिर से ग़ज़लों में प्यार सजा
मेरे कवि पर इक लड़की का, इतना अधिकार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा

शायद मेरी मन-बगिया में कुछ पावन पुष्प महकने थे
शायद मेरे काव्यांगन में कुछ अनुपम गीत उतरने थे
शायद यह फूल मुहब्बत का खिलना था और बिखरना था
शायद यह सब निर्धारित था, मिलना था और बिछड़ना था
शायद अहसासों की मेरे मन में इक खण्डित मूरत थी
शायद मुझको इस अनुभव की पहले से अधिक ज़रूरत थी
शायद मुझसे फिर कोमल भावों का सत्कार नहीं होता
सब अनुभव आधे रह जाते गर फिर से प्यार नहीं होता

© चिराग़ जैन

Sunday, May 17, 2009

खालीपन

जिस दरपन ने तुम्हें निहारा, उस दरपन का खालीपन
और सघन कर देता है इस अंतर्मन का खालीपन

कल तक आंगन में उनके आने की कोई आस तो थी
अब तो भुतहा सा लगता है इस आंगन का खालीपन

सारा कुछ खोकर भी जाने किसे जीतने निकला हूँ
शायद मुझमें घर कर बैठा है रावन का खालीपन

मेरा सब कुछ ले कर भी उनका मन रीता-रीता है
मेरे भीतर भरा हुआ है, उनके मन का खालीपन

शाम उदासी ओढ़ खड़ी है, बादल ग़ायब, हवा अचल
एक परिंदा भर सकता है नीलगगन का खालीपन

© चिराग़ जैन

Friday, May 8, 2009

इक नया रास्ता

ज़िन्दगी जब भी आज़माती है
इक नया रास्ता दिखाती है

न तो पिंजरे में चहचहाती है
न ही अब पंख फड़फड़ाती है

जब कभी माँ की याद आती है
ये हवा लोरियाँ सुनाती है

वो मरासिम को यूँ निभाती है
मिरा हर काम भूल जाती है

मेरे ख़्वाबों में यूँ वो आती है
जैसे पाजेब छनछनाती है

लफ़्ज़ मिल पाए तो सुनाऊंगा
इक ग़ज़ल मुझमें छटपटाती है

जब भी जाता है चांद महफ़िल से
रात की जान सूख जाती है

दिल को मिलती है जब ख़ुशी कोई
अक़्ल कुछ दर्द भूल जाती है

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, March 15, 2009

कोशिश

मैं ‘मन’ लिखने की
कोशिश करता हूँ
....सिर्फ़ कोशिश।

कभी इसका मन
कभी उसका मन
कभी सबका मन
...और कभी-कभी
अपना भी मन।

इतना ही समझ आता है मुझे
कि ‘कोशिश’
और ‘कामयाबी’
उर्दू ज़ूबान के
दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं!

© चिराग़ जैन

Friday, February 13, 2009

अनदेखी

देर तक देखता रहा मैं
एक बिन्दु को
आशा भरी नज़रों से
लगातार।

उतनी ही देर तक
तकती रहीं
दो आँखें
छलछलाती हुईं
मुझे भी!

✍️ चिराग़ जैन