Thursday, December 9, 2010

लक्ष्मी पूजन के समय आतिशबाज़ी

एक ख़बर- वाराणसी में गंगा आरती के दौरान बम धमाका!
टिप्पणी- कभी दीवाली मनाई हो तो पता चले, लक्ष्मी पूजन के समय आतिशबाज़ी नहीं की जाती.

© चिराग़ जैन

Monday, November 1, 2010

अनुचर

क़लम भी
कुछ कम नहीं है
कुदाल से।

...शायद
कुछ गहरी ही
चोट करती हो।

और यथार्थ
...यथार्थ तो
दास मात्र है
विचार का।

अनुचर है बेचारा
हाथ बांधे चलता है
विचार के पीछे-पीछे।

हिम्मत नहीं 
कि एक क़दम भी
आगे निकल जाए!

...अवलम्बन चाहिए ससुरे को
विचार का।

© चिराग़ जैन

Wednesday, September 22, 2010

भारतवर्ष की ख़ुश्बू

मिरे भारत के हर ज़र्रे में है संघर्ष की ख़ुश्बू
हर इक संघर्ष से उठती है पावन हर्ष की ख़ुश्बू
जो अपने मुल्क़ की मिट्टी से कोसों दूर बैठे हैं
अभी भूले नहीं वो लोग भारतवर्ष की ख़ुश्बू

© चिराग़ जैन

Monday, September 20, 2010

आपसी सहयोग की भावना

ख़बर 1-राजधानी में जामा मस्जिद के निकट भड़की आतंक की आग।
ख़बर 2- हरियाणा ने यमुना में 6,53,503 क्यूसेक पानी छोड़ा, बाढ़ का ख़तरा।
टिप्पणी- इसको कहते हैं आपसी सहयोग की भावना!

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, September 18, 2010

सॉफ़्टवेअर करप्ट हो जाए

अब किसी के लिखे ख़त जलाने की ज़रूरत नहीं
है, बस मोबाइल का सॉफ़्टवेअर करप्ट हो जाए तो यादों के सारे अवशेष स्वतः ही ब्रह्मलीन हो जाते हैं!

© चिराग़ जैन

Sunday, September 12, 2010

जमुना-कवि संवाद

कल मैंने जमुना से पूछा-
“जमुना रानी!
क्यों करती हो यूँ मनमानी
कहाँ से लाई हो इतना
विध्वंसक पानी!”

जमुना बोली-
“ये पानी?
ये पानी न बारिश का है
न नदियों-नालों का है
ये पानी तो दिल्ली के सरकारी घोटालों का है।

ये जो मेरे तटबंधों की
चढ़ती हुई जवानी है
ये सारा सरकारी आँखों से
उतरा हुआ पानी है।"

© चिराग़ जैन

Sunday, August 15, 2010

आज़ाद हो गए हैं

कुछ इस तरह के अपने हालात हो गए हैं
सपने सभी सुहाने, बर्बाद हो गए हैं
आब-ओ-हवा है ऐसी, दम सबका घुट रहा है
कुछ लोग कह रहे हैं- ‘आज़ाद हो गए हैं’

© चिराग़ जैन

Monday, August 9, 2010

बाज़ारीकरण

किस क़दर हावी हुई हैं व्यस्तताएँ देखिए
कसमसा कर रह गईं संवेदनाएँ देखिए
स्वार्थ, बाज़ारीकरण और वासना की धुंध में
खो चुकी हैं प्रेम की संभावनाएँ देखिए

© चिराग़ जैन

Sunday, August 8, 2010

सही उत्तर

यूँ ही पूछ बैठी थीं तुम
‘मेरे बिना रह पाओगे?’
सुनकर
मेरे मस्तिष्क में
एकाएक कौंध गया एक और प्रष्न-
‘क्या तुम सही उत्तर सह पाओगी?’

...ख़ुद से उलझते-जूझते
अनायास ही
मेरे मुँह से निकल गया-
‘नहीं!’

...और तुमने
इसे अपने प्रश्न का
उत्तर समझ लिया।

© चिराग़ जैन

Saturday, August 7, 2010

अनकहा

सदियों से
तलाश रहा हूँ
एक ऐसा श्रोता
जो सुन सके
मेरी कविताओं का वह अंश
जो मैंने कहा ही नहीं

क्योंकि
‘बहुत कुछ’
कह देने की संतुष्टि से
कहीं बड़ी है
बेचैनी
‘कुछ’ न कह पाने की

© चिराग़ जैन