Tuesday, February 8, 2011

अच्छा लगता है

इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच
निकाल ही लेता हूँ
कुछ लम्हे
कविता लिखने के लिए।

बहुत सारी
अधलिखी कविताओं को छोड़
चुरा ही लाता हूँ कुछ पल
तुमसे बतियाने के लिए।

अक्सर पूछ बैठता हूँ ख़ुद से
क्या मिलता है मुझे
कविता लिखने से?
क्या हासिल होता है
तुमसे बतियाने से?

अच्छा लगता है
...यही ना!

© चिराग़ जैन

Saturday, January 29, 2011

लहरें शोर मचाती हैं

गहराई में जाकर बिल्कुल चुप हो जाती हैं
और किनारे आकर लहरें शोर मचाती हैं

लहरें पल भर में जीवन का सार बताती हैं
जिसमें से उठती हैं उस में ही मिल जाती हैं

जब उस अनुपम प्रथम मिलन की यादें आती हैं
नम होते हैं अधर और पलकें मुस्काती हैं

साहिल केवल कचरा ही देता है सागर को
फिर भी लहरें साहिल को मोती दे जाती हैं

मैं तो भावों और शब्दों में उलझा रहता हूँ
पर उनसे जुड़कर ग़ज़लें पावन हो जाती हैं

✍️ चिराग़ जैन

Monday, December 20, 2010

व्यवहार

विवाद होने से अधिक निराशाजनक है, व्यवहार समाप्त हो जाना!

© चिराग़ जैन

Friday, December 17, 2010

कैमरा

ख़ुद अन्धेरे में रहकर ही
प्रकाशित करता है औरों को
...कैमरा।

लेकिन जैसे ही कोई किरण
रौशन करने आती है
कैमरे को...

...तो इसे
अंधियारी लगने लगती है
सारी दुनिया।

बिल्कुल इंसान की तरह है
कैमरा भी
...ओछा कहीं का!

© चिराग़ जैन

Thursday, December 9, 2010

लक्ष्मी पूजन के समय आतिशबाज़ी

एक ख़बर- वाराणसी में गंगा आरती के दौरान बम धमाका!
टिप्पणी- कभी दीवाली मनाई हो तो पता चले, लक्ष्मी पूजन के समय आतिशबाज़ी नहीं की जाती.

© चिराग़ जैन

Monday, November 1, 2010

अनुचर

क़लम भी
कुछ कम नहीं है
कुदाल से।

...शायद
कुछ गहरी ही
चोट करती हो।

और यथार्थ
...यथार्थ तो
दास मात्र है
विचार का।

अनुचर है बेचारा
हाथ बांधे चलता है
विचार के पीछे-पीछे।

हिम्मत नहीं 
कि एक क़दम भी
आगे निकल जाए!

...अवलम्बन चाहिए ससुरे को
विचार का।

© चिराग़ जैन

Wednesday, September 22, 2010

भारतवर्ष की ख़ुश्बू

मिरे भारत के हर ज़र्रे में है संघर्ष की ख़ुश्बू
हर इक संघर्ष से उठती है पावन हर्ष की ख़ुश्बू
जो अपने मुल्क़ की मिट्टी से कोसों दूर बैठे हैं
अभी भूले नहीं वो लोग भारतवर्ष की ख़ुश्बू

© चिराग़ जैन

Monday, September 20, 2010

आपसी सहयोग की भावना

ख़बर 1-राजधानी में जामा मस्जिद के निकट भड़की आतंक की आग।
ख़बर 2- हरियाणा ने यमुना में 6,53,503 क्यूसेक पानी छोड़ा, बाढ़ का ख़तरा।
टिप्पणी- इसको कहते हैं आपसी सहयोग की भावना!

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, September 18, 2010

सॉफ़्टवेअर करप्ट हो जाए

अब किसी के लिखे ख़त जलाने की ज़रूरत नहीं
है, बस मोबाइल का सॉफ़्टवेअर करप्ट हो जाए तो यादों के सारे अवशेष स्वतः ही ब्रह्मलीन हो जाते हैं!

© चिराग़ जैन

Sunday, September 12, 2010

जमुना-कवि संवाद

कल मैंने जमुना से पूछा-
“जमुना रानी!
क्यों करती हो यूँ मनमानी
कहाँ से लाई हो इतना
विध्वंसक पानी!”

जमुना बोली-
“ये पानी?
ये पानी न बारिश का है
न नदियों-नालों का है
ये पानी तो दिल्ली के सरकारी घोटालों का है।

ये जो मेरे तटबंधों की
चढ़ती हुई जवानी है
ये सारा सरकारी आँखों से
उतरा हुआ पानी है।"

© चिराग़ जैन