इन दिनों
संदर्भ निंदा कर रहे हैं
विषय की भावार्थ से-
शब्द लट्टू हो गए
भाषा पे
या फिर व्याकरण पे
बोलियों के गेसुओं में फँस गया है मर्म
कुछ अलंकारों में सीमित हो गया कवि-कर्म
जटिल सा लगने लगा है
आजकल सरलार्थ
आँख मूंदे, मुस्कुराता
मौन है भावार्थ
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Saturday, March 5, 2011
भावार्थ
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पद्य
Wednesday, March 2, 2011
वक़्त बीमार है
वक़्त बीमार है
Short term memory loss का पुराना मरीज़।
कुछ याद ही नहीं रह पाता इसको
लिख-लिख कर
मुश्क़िल से याद रख पाता है
बड़ी से बड़ी बात
मैंने अक्सर देखा है वक़्त को
अपनी ही लिखी पर्चियों के बीच
उलझे हुए
इतिहास की किताबों में
किसी क़िरदार की
सबसे सही पहचान तलाशते हुए
सुना है
वक़्त को धोखा देने के लिये
किसी ने जला डाली थीं
कुछ पर्चियाँ
Short term memory loss का पुराना मरीज़।
कुछ याद ही नहीं रह पाता इसको
लिख-लिख कर
मुश्क़िल से याद रख पाता है
बड़ी से बड़ी बात
मैंने अक्सर देखा है वक़्त को
अपनी ही लिखी पर्चियों के बीच
उलझे हुए
इतिहास की किताबों में
किसी क़िरदार की
सबसे सही पहचान तलाशते हुए
सुना है
वक़्त को धोखा देने के लिये
किसी ने जला डाली थीं
कुछ पर्चियाँ
…तब से
बौराया-सा फिर रहा है बेचारा!
✍️ चिराग़ जैन
बौराया-सा फिर रहा है बेचारा!
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, March 1, 2011
बेचारा ईश्वर
मैंने देखा-
मूसलाधार बारिश में
भीग रही थी
ईश्वर की मूर्ति
मैंने सोचा-
थपेड़े भी सहती होगी
गर्म लू के
इसी तरह।
मैंने महसूस किया-
सर्दी-गर्मी-बरसात
नंगे बदन
कैसे खड़ा रहता है परमात्मा।
...और तब मैंने चाहा-
काश, कोई इसकी भी सुध ले!
✍️ चिराग़ जैन
मूसलाधार बारिश में
भीग रही थी
ईश्वर की मूर्ति
मैंने सोचा-
थपेड़े भी सहती होगी
गर्म लू के
इसी तरह।
मैंने महसूस किया-
सर्दी-गर्मी-बरसात
नंगे बदन
कैसे खड़ा रहता है परमात्मा।
...और तब मैंने चाहा-
काश, कोई इसकी भी सुध ले!
✍️ चिराग़ जैन
Monday, February 28, 2011
भावना की डगर
भावना की डगर भी सहज तो नहीं
इस डगर पर स्वयं का तिरस्कार है
प्रेम जिससे किया वो परेशान है
और जिसने किया प्रेम, लाचार हैै
मन हुआ मुग्ध जिस पर, उसी शख़्स के
हर कथन को कथानक बनाता रहा
प्रियतमा के नयन की चमक को सदा
कर्म का एक मानक बनाता रहा
स्वार्थ की क्यारियों में समर्पण खिला
अब यहाँ तर्क की बात बेकार है
राह चलते हुए प्रेम का हादसा
कौन जाने, कहाँ, कब घटित हो गया
एक पावन लम्हा ज़िन्दगी से जुड़ा
तन निखरता गया, मन व्यथित हो गया
बस वही इक लम्हा, बस वही हादसा
बस उसी से सुखों का सरोकार है
✍️ चिराग़ जैन
इस डगर पर स्वयं का तिरस्कार है
प्रेम जिससे किया वो परेशान है
और जिसने किया प्रेम, लाचार हैै
मन हुआ मुग्ध जिस पर, उसी शख़्स के
हर कथन को कथानक बनाता रहा
प्रियतमा के नयन की चमक को सदा
कर्म का एक मानक बनाता रहा
स्वार्थ की क्यारियों में समर्पण खिला
अब यहाँ तर्क की बात बेकार है
राह चलते हुए प्रेम का हादसा
कौन जाने, कहाँ, कब घटित हो गया
एक पावन लम्हा ज़िन्दगी से जुड़ा
तन निखरता गया, मन व्यथित हो गया
बस वही इक लम्हा, बस वही हादसा
बस उसी से सुखों का सरोकार है
✍️ चिराग़ जैन
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छूकर निकली है बेचैनी,
पद्य
Location:
Chakrata, Uttarakhand 248123, India
Sunday, February 27, 2011
लड़कियाँ
मेरे पिता ने
बचपन में कभी
मुझे गुड़िया से नहीं खेलने दिया
ताकि मैं सीख सकूँ
कि लड़कियाँ
खेलने की चीज़ नहीं हैं।
✍️ चिराग़ जैन
मुझे गुड़िया से नहीं खेलने दिया
ताकि मैं सीख सकूँ
कि लड़कियाँ
खेलने की चीज़ नहीं हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Friday, February 11, 2011
क़ामयाबी की आस्तीनों में
मेरी शोहरत से जल गए दुश्मन
दोस्तों में बदल गए दुश्मन
क़ामयाबी की आस्तीनों में
हाय धोखे से पल गए दुश्मन
© चिराग़ जैन
दोस्तों में बदल गए दुश्मन
क़ामयाबी की आस्तीनों में
हाय धोखे से पल गए दुश्मन
© चिराग़ जैन
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मुक्तक
Tuesday, February 8, 2011
अच्छा लगता है
इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच
निकाल ही लेता हूँ
कुछ लम्हे
कविता लिखने के लिए।
बहुत सारी
अधलिखी कविताओं को छोड़
चुरा ही लाता हूँ कुछ पल
तुमसे बतियाने के लिए।
अक्सर पूछ बैठता हूँ ख़ुद से
क्या मिलता है मुझे
कविता लिखने से?
क्या हासिल होता है
तुमसे बतियाने से?
अच्छा लगता है
...यही ना!
© चिराग़ जैन
निकाल ही लेता हूँ
कुछ लम्हे
कविता लिखने के लिए।
बहुत सारी
अधलिखी कविताओं को छोड़
चुरा ही लाता हूँ कुछ पल
तुमसे बतियाने के लिए।
अक्सर पूछ बैठता हूँ ख़ुद से
क्या मिलता है मुझे
कविता लिखने से?
क्या हासिल होता है
तुमसे बतियाने से?
अच्छा लगता है
...यही ना!
© चिराग़ जैन
Saturday, January 29, 2011
लहरें शोर मचाती हैं
गहराई में जाकर बिल्कुल चुप हो जाती हैं
और किनारे आकर लहरें शोर मचाती हैं
लहरें पल भर में जीवन का सार बताती हैं
जिसमें से उठती हैं उस में ही मिल जाती हैं
जब उस अनुपम प्रथम मिलन की यादें आती हैं
नम होते हैं अधर और पलकें मुस्काती हैं
साहिल केवल कचरा ही देता है सागर को
फिर भी लहरें साहिल को मोती दे जाती हैं
मैं तो भावों और शब्दों में उलझा रहता हूँ
पर उनसे जुड़कर ग़ज़लें पावन हो जाती हैं
और किनारे आकर लहरें शोर मचाती हैं
लहरें पल भर में जीवन का सार बताती हैं
जिसमें से उठती हैं उस में ही मिल जाती हैं
जब उस अनुपम प्रथम मिलन की यादें आती हैं
नम होते हैं अधर और पलकें मुस्काती हैं
साहिल केवल कचरा ही देता है सागर को
फिर भी लहरें साहिल को मोती दे जाती हैं
मैं तो भावों और शब्दों में उलझा रहता हूँ
पर उनसे जुड़कर ग़ज़लें पावन हो जाती हैं
✍️ चिराग़ जैन
Monday, December 20, 2010
व्यवहार
विवाद होने से अधिक निराशाजनक है, व्यवहार समाप्त हो जाना!
© चिराग़ जैन
© चिराग़ जैन
Friday, December 17, 2010
कैमरा
ख़ुद अन्धेरे में रहकर ही
प्रकाशित करता है औरों को
...कैमरा।
लेकिन जैसे ही कोई किरण
रौशन करने आती है
कैमरे को...
...तो इसे
अंधियारी लगने लगती है
सारी दुनिया।
बिल्कुल इंसान की तरह है
कैमरा भी
...ओछा कहीं का!
© चिराग़ जैन
प्रकाशित करता है औरों को
...कैमरा।
लेकिन जैसे ही कोई किरण
रौशन करने आती है
कैमरे को...
...तो इसे
अंधियारी लगने लगती है
सारी दुनिया।
बिल्कुल इंसान की तरह है
कैमरा भी
...ओछा कहीं का!
© चिराग़ जैन
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