Friday, August 12, 2011

झूठ के दम पे मुहब्बत

सच के कारण मिली नफ़रत क़ुबूल है लेकिन
झूठ के दम पे मुहब्बत नहीं अच्छी लगती

यूँ तो रिश्ते मेरे दिल को सुक़ून देते हैं
पर ये रिश्तों की सियासत नहीं अच्छी लगती

भूख जिस वक़्त कलेजा गलाने लगती है
तब ख़ुदाओं की इबादत नहीं अच्छी लगती

उनको कल तक मेरा क़िरदार बहुत भाता था
अब मेरी एक भी आदत नहीं अच्छी लगती

कैसे इस दौर के बच्चों को दुआ दे कोई
इनको पुरख़ों की नसीहत नहीं अच्छी लगती

काम जिस शख़्स का चलता हो बेइमानी से
उसको दुनिया में शराफ़त नहीं अच्छी लगती

क़ायदा जिसने मुहब्बत का पढ़ लिया हो चिराग़
उनको फिर कोई शरीयत नहीं अच्छी लगती

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, August 7, 2011

घुटने

जिनकी पहचान थी ख़ुद्दारी, उन्हीं लोगों के
हाथ तो हाथ मेरे यार, जुड़े हैं घुटने
बात जब अपने पे आती है बदलते हैं उसूल
पेट की ओर ही हर बार मुड़े हैं घुटने
✍️ चिराग़ जैन

Sunday, July 31, 2011

इत्र

इत्र है हँसी
महक उठता है वो
जिस पर छिड़का जाए

लेकिन
जो छिड़कता है
वो तो
चमक ही उठता है।

✍️ चिराग़ जैन

Friday, July 29, 2011

जीवन का ज्ञान

पुरखों से आशीष, बुज़ुर्गों से जीवन का ज्ञान मिला
ऐसे मुझको जीवन भर मुस्काने का वरदान मिला
ईश्वर की अनुकम्पा है या फिर गत कर्मों का फल है
ख़ुशियां मेरी मीत हो गईं, दुख मुझसे अनजान मिला

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, June 7, 2011

काॅन्ट्रेक्ट बेस जाॅब

सरकारी नौकरी में
मिलने वाले
नियत वेतन की तरह
मिलता है
रिश्तों में दर्द।

और वार्षिक बोनस की तरह
मिल जाती है
ख़ुशी भी
यदा-कदा।

लेकिन
काॅन्ट्रेक्ट बेस जाॅब
होते हैं रिश्ते।

बहुत कुछ
सहन करना पड़ता है
इनमें!

...और
कब तक चलेंगे
कुछ कह नहीं सकते।

✍️ चिराग़ जैन

Friday, June 3, 2011

मुख़्बिर

उफ़
ये मुई
सपनों की रोशनी

पलकें बंद हैं
पर
चमक उठा है
चेहरा।

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, May 22, 2011

कर्ता का सम्मान

कर्ता का सम्मान कहां है
ऐसा यहां विधान कहां है
राम-कृष्ण हैं, हर मंदिर में
तुलसी या रसखान कहां है

✍️ चिराग़ जैन

निस्पृह

तुम
हर बार तलाश लेती हो
कोई नई वजह
नकारने की।

...और मैं
हर बार
बिना वजह
स्वीकार लेता हूँ
मन ही मन।

हर बार बदल जाता है
तुम्हारा बहाना

...और मैं
हर बार
बिना वजह
कर बैठता हूँ
गुज़ारिश।

मैं हर बार रहता हूँ
वैसा का वैसा
क्योंकि मैंने
कभी तलाशी ही नहीं 
कोई वजह
तुम्हें चाहने के लिए।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, March 12, 2011

ज़िन्दगी की शिक़ायत

उम्र भर मौत से भागते जो रहे
मौत आई तो बस मौत के हो गए
मेरे हर रोम में अपना अहसास भर
एक पल में पिया सौत के हो गए

एक ही पल में ये क्या से क्या हो गया
एक पल ज़िन्दगी से बड़ा हो गया
मौत को देखकर तुम पिघल से गए
और रुख़ ज़िन्दगी पर कड़ा हो गया
मौत ने छल किया? अपहरण कर लिया?
या सफल मौत के टोटके हो गए?

मौत ने कौन सा रस पिलाया कि फिर
ज़िन्दगी की तुम्हें याद आई नहीं
हाल तक पूछने की न कोशिश हुई
इतनी भी दुनियादारी निभाई नहीं
पीढ़ियाँ तुमको थाली चढ़ाती रही
और तुम मौत के गोत के हो गए

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, March 5, 2011

भावार्थ

इन दिनों
संदर्भ निंदा कर रहे हैं
विषय की भावार्थ से-
शब्द लट्टू हो गए
भाषा पे
या फिर व्याकरण पे
बोलियों के गेसुओं में फँस गया है मर्म
कुछ अलंकारों में सीमित हो गया कवि-कर्म
जटिल सा लगने लगा है
आजकल सरलार्थ
आँख मूंदे, मुस्कुराता
मौन है भावार्थ

✍️ चिराग़ जैन