हम तो हर इक ज़ुल्म की हद से गुज़र भी जाएंगे
शेर के बच्चे हैं, अपनी ज़िद पे मर भी जाएंगे
ताश के पत्तों से बनते हैं सियासत के मकां
ये तुम्हारे घर हवाओं से बिखर भी जाएंगे
कौन रोके, गर फना होने पतंगा आ गया
एक बादल सूर्य से लेने को पंगा आ गया
ये सियासतदां संभल जाएं कि अब इस मुल्क में
नौजवां पीढ़ी के हाथों में तिरंगा आ गया
हमें ज़हमत हुई और आप पर इल्ज़ाम आया है
चलो जो कुछ हुआ, जैसा हुआ, सब काम आया है
सफ़र में मुश्क़िलें थीं, दर्द था, डर था, कराहें थीं
मगर हर ज़ख़्म को भरता हुआ अंज़ाम आया है
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Tuesday, August 23, 2011
Friday, August 19, 2011
अन्ना आंदोलन
आज मैंने
एक ग़ज़ब का नज़ारा देखा
मैंने देखा
एक होड़ सी लगी थी
बारिश के जज़्बे से
लोगों के जज़्बे की।
झमाझम बरसात में
दिल्ली की सड़कें
उफ़न आईं थीं लोगों के हुज़ूम से।
किसी को कोई डर ही नहीं था
बीमार पड़ने का
क्योकि
वे सब आए थे
देश की महामारी का
इलाज़ करने।
जहाँ तक निगाह जाती थी
सिर ही सिर नज़र आते थे।
…आज मैंने महसूस किया
कि किसी गांधी की एक आवाज़ पर
कैसे उठ खड़ा होता था
पूरा भारत!
✍️ चिराग़ जैन
एक ग़ज़ब का नज़ारा देखा
मैंने देखा
एक होड़ सी लगी थी
बारिश के जज़्बे से
लोगों के जज़्बे की।
झमाझम बरसात में
दिल्ली की सड़कें
उफ़न आईं थीं लोगों के हुज़ूम से।
किसी को कोई डर ही नहीं था
बीमार पड़ने का
क्योकि
वे सब आए थे
देश की महामारी का
इलाज़ करने।
जहाँ तक निगाह जाती थी
सिर ही सिर नज़र आते थे।
…आज मैंने महसूस किया
कि किसी गांधी की एक आवाज़ पर
कैसे उठ खड़ा होता था
पूरा भारत!
✍️ चिराग़ जैन
Monday, August 15, 2011
संकुचन
हम फैलाना चाहते हैं
बाइबल को
गीता को
क़ुरआन को
जातक को
आगम को।
लेकिन समेट लेना चाहते हैं
अपने ईसा
अपने कृष्ण
अपने पैग़म्बर
अपने बुद्ध
और अपने महावीर।
हमने शास्त्र बना दिया है
किताबों को
विस्तृत करके।
और पुरखा बना दिया है
भगवान को
संकुचित करके।
✍️ चिराग़ जैन
बाइबल को
गीता को
क़ुरआन को
जातक को
आगम को।
लेकिन समेट लेना चाहते हैं
अपने ईसा
अपने कृष्ण
अपने पैग़म्बर
अपने बुद्ध
और अपने महावीर।
हमने शास्त्र बना दिया है
किताबों को
विस्तृत करके।
और पुरखा बना दिया है
भगवान को
संकुचित करके।
✍️ चिराग़ जैन
आज़ादी
शहीदों ने लिखी थी कल हमारे नाम आज़ादी
मगर हमने बना डाली है इक इल्ज़ाम आज़ादी
‘ग़ुलामी की ज़दों में ज़िन्दगी दुश्वार होती है’
हमें चुपके से दे जाती है ये पैग़ाम आज़ादी
कमाई से कहीं मुश्क़िल है दौलत की हिफ़ाज़त भी
संभाले रख नहीं पाए कई सद्दाम आज़ादी
घड़ी भर को नज़र चूकी, अंधेरा हो गया ग़ालिब
छिनी दिन की, ज़रा सी चूक से, हर शाम आज़ादी
भला ऐसा हुआ क्या था कि केवल छह महीने में
कोई तेरे हवाले कर गया हे राम आज़ादी
✍️ चिराग़ जैन
मगर हमने बना डाली है इक इल्ज़ाम आज़ादी
‘ग़ुलामी की ज़दों में ज़िन्दगी दुश्वार होती है’
हमें चुपके से दे जाती है ये पैग़ाम आज़ादी
कमाई से कहीं मुश्क़िल है दौलत की हिफ़ाज़त भी
संभाले रख नहीं पाए कई सद्दाम आज़ादी
घड़ी भर को नज़र चूकी, अंधेरा हो गया ग़ालिब
छिनी दिन की, ज़रा सी चूक से, हर शाम आज़ादी
भला ऐसा हुआ क्या था कि केवल छह महीने में
कोई तेरे हवाले कर गया हे राम आज़ादी
✍️ चिराग़ जैन
Friday, August 12, 2011
झूठ के दम पे मुहब्बत
सच के कारण मिली नफ़रत क़ुबूल है लेकिन
झूठ के दम पे मुहब्बत नहीं अच्छी लगती
यूँ तो रिश्ते मेरे दिल को सुक़ून देते हैं
पर ये रिश्तों की सियासत नहीं अच्छी लगती
भूख जिस वक़्त कलेजा गलाने लगती है
तब ख़ुदाओं की इबादत नहीं अच्छी लगती
उनको कल तक मेरा क़िरदार बहुत भाता था
अब मेरी एक भी आदत नहीं अच्छी लगती
कैसे इस दौर के बच्चों को दुआ दे कोई
इनको पुरख़ों की नसीहत नहीं अच्छी लगती
काम जिस शख़्स का चलता हो बेइमानी से
उसको दुनिया में शराफ़त नहीं अच्छी लगती
क़ायदा जिसने मुहब्बत का पढ़ लिया हो चिराग़
उनको फिर कोई शरीयत नहीं अच्छी लगती
झूठ के दम पे मुहब्बत नहीं अच्छी लगती
यूँ तो रिश्ते मेरे दिल को सुक़ून देते हैं
पर ये रिश्तों की सियासत नहीं अच्छी लगती
भूख जिस वक़्त कलेजा गलाने लगती है
तब ख़ुदाओं की इबादत नहीं अच्छी लगती
उनको कल तक मेरा क़िरदार बहुत भाता था
अब मेरी एक भी आदत नहीं अच्छी लगती
कैसे इस दौर के बच्चों को दुआ दे कोई
इनको पुरख़ों की नसीहत नहीं अच्छी लगती
काम जिस शख़्स का चलता हो बेइमानी से
उसको दुनिया में शराफ़त नहीं अच्छी लगती
क़ायदा जिसने मुहब्बत का पढ़ लिया हो चिराग़
उनको फिर कोई शरीयत नहीं अच्छी लगती
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, August 7, 2011
घुटने
जिनकी पहचान थी ख़ुद्दारी, उन्हीं लोगों के
हाथ तो हाथ मेरे यार, जुड़े हैं घुटने
बात जब अपने पे आती है बदलते हैं उसूल
पेट की ओर ही हर बार मुड़े हैं घुटने
✍️ चिराग़ जैन
हाथ तो हाथ मेरे यार, जुड़े हैं घुटने
बात जब अपने पे आती है बदलते हैं उसूल
पेट की ओर ही हर बार मुड़े हैं घुटने
✍️ चिराग़ जैन
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मुक्तक
Sunday, July 31, 2011
इत्र
इत्र है हँसी
महक उठता है वो
जिस पर छिड़का जाए
लेकिन
जो छिड़कता है
वो तो
चमक ही उठता है।
✍️ चिराग़ जैन
महक उठता है वो
जिस पर छिड़का जाए
लेकिन
जो छिड़कता है
वो तो
चमक ही उठता है।
✍️ चिराग़ जैन
Friday, July 29, 2011
जीवन का ज्ञान
पुरखों से आशीष, बुज़ुर्गों से जीवन का ज्ञान मिला
ऐसे मुझको जीवन भर मुस्काने का वरदान मिला
ईश्वर की अनुकम्पा है या फिर गत कर्मों का फल है
ख़ुशियां मेरी मीत हो गईं, दुख मुझसे अनजान मिला
✍️ चिराग़ जैन
ऐसे मुझको जीवन भर मुस्काने का वरदान मिला
ईश्वर की अनुकम्पा है या फिर गत कर्मों का फल है
ख़ुशियां मेरी मीत हो गईं, दुख मुझसे अनजान मिला
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, June 7, 2011
काॅन्ट्रेक्ट बेस जाॅब
सरकारी नौकरी में
मिलने वाले
नियत वेतन की तरह
मिलता है
रिश्तों में दर्द।
और वार्षिक बोनस की तरह
मिल जाती है
ख़ुशी भी
यदा-कदा।
लेकिन
काॅन्ट्रेक्ट बेस जाॅब
होते हैं रिश्ते।
बहुत कुछ
सहन करना पड़ता है
इनमें!
...और
कब तक चलेंगे
कुछ कह नहीं सकते।
✍️ चिराग़ जैन
मिलने वाले
नियत वेतन की तरह
मिलता है
रिश्तों में दर्द।
और वार्षिक बोनस की तरह
मिल जाती है
ख़ुशी भी
यदा-कदा।
लेकिन
काॅन्ट्रेक्ट बेस जाॅब
होते हैं रिश्ते।
बहुत कुछ
सहन करना पड़ता है
इनमें!
...और
कब तक चलेंगे
कुछ कह नहीं सकते।
✍️ चिराग़ जैन
Friday, June 3, 2011
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