अबे 2012!
तेरे जैसा साल न आए दोबारा।
तूने तो पूरा देश ही निपटा मारा
सबसे पहले तो छीना
कुश्ती का सितारा
एक्टिंग का किंग
यानि दारा सिंह
अभी दारा की याद को भूले भी नहीं थे अख़बार
तब तक हमें अलविदा कह गए राजेश खन्ना
यानि पहले सुपरस्टार
फिर लगते रहे एक के बाद एक घाव
मुम्बई में विलासराव
उसके बाद ए के हंगल
फिर बेस्ट डायरेक्टर यश अंकल
मन करता था बीच में ही कर दें तुझसे कट्टी
तब तक रोड एक्सिडेंट में मारे गए
कॉमेडी किंग जसपाल भट्टी
फिर तेरी भेंट चढ़ा बाल ठाकरे जैसा लाल
फिर इंद्र कुमार गुजराल
तू साले साल था, या काल
दिसम्बर में भी तूने छोड़ा नहीं अपना गुर
छीन लिए पंडित रविशंकर
ग़ायब हो गए सितारों से सुर
इतने पर भी भरा नहीं तेरा कोष
दिल्ली में वहशियों की भेंट चढ़ गई
एक तेईस साल की निर्दोष
इसके अलावा भी
कुछ अच्छा नहीं रहा तेरा बीहेव
तूने ही लील लिए संघ के सुदर्शन
और आस्था के जय गुरुदेव
जो तुझसे बचे
उनकी भी हालत अच्छी नहीं है भाई
राम ही जाने कैसे होगी इसकी भरपाई
सचिन ने वन डे में जाना छोड़ दिया
लता मंगेशकर ने गाना छोड़ दिया
रतन टाटा ने कमाना छोड़ दिया
अन्ना ने आवाज़ उठाना छोड़ दिया
और सातवें सिलैण्डर ने रसोई में आना छोड़ दिया
वाह रे काले कालखण्ड
इतिहास निर्धारित करेगा तेरा दण्ड
अच्छा हुआ तू बीत गया
तुझे अंदाज़ा नहीं है
कि तेरे रहते कितना कुछ रीत गया
काश ऐसा साल
फिर कभी जीवन में न आए
जाते-जाते तू हमसे ले ले
फाइनल गुड बाय!
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Monday, December 31, 2012
Monday, December 17, 2012
पूजा के हक़दार
जिस डाली का काटा जाना आज अखर जाता है तुमको
उस डाली के कटने से ही कल को तुम फलदार बनोगे
जिस छैनी के छूने भर से चीख़ निकलती है पत्थर की
उस छैनी की चोटों से तुम पूजा के हक़दार बनोगे
अनुभव के दो हाथ समूचे माटी-माटी सन जाएंगे
तब जाकर मिट्टी के ढेले को किंचित आकार मिलेगा
मिट्टी से पहले हाथों की भाग्य लकीरें घिस जाएंगी
तब बर्तन कहला पाने का मिट्टी को अधिकार मिलेगा
जिन जलते शोलों से तन-मन सब कुछ झुलसेगा भीतर तक
उनके कारण ही तुम प्यासे ओंठों पर बौछार बनोगे
गंगा बनकर पुजना है तो, गोमुख से झरना ही होगा
बूंदों को बारिश बनना है, बादल को मरना ही होगा
रामशरण स्वीकार नहीं हो, और मुक्ति की इच्छा हो तो
कंचन मृग का स्वांग रचा कर, सीता को हरना ही होगा
अपने सारे सुख को अपने हाथों वनवासी कर दोगे
तब सम्भव है तुम जीते जी धरती पर अवतार बनोगे
✍️ चिराग़ जैन
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Sunday, December 9, 2012
क्या कर लेगा ऊलाला
सौम्य धुनों से क्या जीते रीमिक्सों का गड़बड़झाला
ओरिजनल से पस्त रहेगा, हर नकली-शकली वाला
जब महफ़िल में गुंजित होगी, बच्चन जी की मधुशाला
क्या कर लेंगी शीला-मुन्नी, क्या कर लेगा ऊलाला
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Wednesday, November 21, 2012
अंजाम वहशतों का
तुम पीटते ढिंढोरा, गर बात हो ज़रा सी
कैसे किए भला फिर हैरान देशवासी
बोलो जनाब इसमें क्या चाल थी सियासी
चुपचाप क्यों चढ़ाया तुमने कसाब फांसी
पर तक न मार पाया, उस पल वहाँ परिंदा
मरते ही आपने जब दफ़ना दिया दरिंदा
जनता को भी दिखाते अंजाम वहशतों का
मर कर तो हो न जाता फिर से कसाब ज़िंदा
साहिब का इस विषय पर कोई ग़ौर तो नहीं था
जिस तरह उसको मारा, वो तौर तो नहीं था
गीदड़ के नाम पर फिर हिरनी तो नहीं मारी
था तो कसाब ही ना, कोई और तो नहीं था
✍️ चिराग़ जैन
कैसे किए भला फिर हैरान देशवासी
बोलो जनाब इसमें क्या चाल थी सियासी
चुपचाप क्यों चढ़ाया तुमने कसाब फांसी
पर तक न मार पाया, उस पल वहाँ परिंदा
मरते ही आपने जब दफ़ना दिया दरिंदा
जनता को भी दिखाते अंजाम वहशतों का
मर कर तो हो न जाता फिर से कसाब ज़िंदा
साहिब का इस विषय पर कोई ग़ौर तो नहीं था
जिस तरह उसको मारा, वो तौर तो नहीं था
गीदड़ के नाम पर फिर हिरनी तो नहीं मारी
था तो कसाब ही ना, कोई और तो नहीं था
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, November 20, 2012
बपौती
साफ़-साफ़ बात सुन लो जी
ये दुनिया
हम मर्दों की बपौती है
इसमें रहना है
तो रहना ही होगा
हमारी शर्तों पर।
हमने कई तरह से चाहा
तुम्हें कहना
लेकिन तुम हो
कि सुनती ही नहीं हो
हमने नियम बनाए
ताकि तुम समझ सको
अपनी सीमाएँ!
हमने बातें बनाईं
ताकि तुम डर सको
बदनामी से!
हमने प्रथाएँ बनाईं
ताकि तुम
व्यस्त रह सको
उनके निर्वाह में!
हमें अच्छी नहीं लगती
मर्दाना कामकाज में
तुम्हारी दखलंदाज़ी।
तुम हो ही क्या
पुरुष की
मजबूरी और कमज़ोरी के सिवाय!
बेचारा अभिमन्यु
मारा गया
सिर्फ़ तुम्हारे कारण
तुम्हें मालूम होना चाहिए था
कि औरत का काम है
जागते रहना
पुरुष की सुविधा के लिए।
महाभारत के
महाविनाश की वजह
तुम
तुम्हें जानना चाहिए था
कि औरत बनी ही भोग के लिए है
उसको पचा लेना चाहिए
बड़े से बड़ा अभिमान
अपने भीतर।
लंका जैसी नगरी के
रक्तरंजन का कारण तुम।
तुम्हें पता होना चाहिए था
कि औरत के लिए
सर्वथा अनुचित है
किसी लक्ष्मण द्वारा खींची
मर्यादा रेखा का उल्लंघन।
बड़ी विदुषि बनी फिरती हो
पहचान नहीं सकती थी
साधु के वेश में खड़े रावण को
और गौतम के वेश में खड़े इन्द्र को
...थोड़ा ढँक-ओढ़ के नहीं रह सकती
ज़रूरी है अपने सौंदर्य का ढिंढोरा पीटना
आग को देखेगा
तो घी तो पिघलेगा ही
फिर दोष मंढ़ोगी पुरुष के सिर
उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।
समझ लो साफ-साफ
ये दुनिया हमारी है
इसमें रहना है
तो हमारे मुताबिक़ रहो
वरना
तुम्हारे लिए
दुनिया में एंट्री बैन!
✍️ चिराग़ जैन
ये दुनिया
हम मर्दों की बपौती है
इसमें रहना है
तो रहना ही होगा
हमारी शर्तों पर।
हमने कई तरह से चाहा
तुम्हें कहना
लेकिन तुम हो
कि सुनती ही नहीं हो
हमने नियम बनाए
ताकि तुम समझ सको
अपनी सीमाएँ!
हमने बातें बनाईं
ताकि तुम डर सको
बदनामी से!
हमने प्रथाएँ बनाईं
ताकि तुम
व्यस्त रह सको
उनके निर्वाह में!
हमें अच्छी नहीं लगती
मर्दाना कामकाज में
तुम्हारी दखलंदाज़ी।
तुम हो ही क्या
पुरुष की
मजबूरी और कमज़ोरी के सिवाय!
बेचारा अभिमन्यु
मारा गया
सिर्फ़ तुम्हारे कारण
तुम्हें मालूम होना चाहिए था
कि औरत का काम है
जागते रहना
पुरुष की सुविधा के लिए।
महाभारत के
महाविनाश की वजह
तुम
तुम्हें जानना चाहिए था
कि औरत बनी ही भोग के लिए है
उसको पचा लेना चाहिए
बड़े से बड़ा अभिमान
अपने भीतर।
लंका जैसी नगरी के
रक्तरंजन का कारण तुम।
तुम्हें पता होना चाहिए था
कि औरत के लिए
सर्वथा अनुचित है
किसी लक्ष्मण द्वारा खींची
मर्यादा रेखा का उल्लंघन।
बड़ी विदुषि बनी फिरती हो
पहचान नहीं सकती थी
साधु के वेश में खड़े रावण को
और गौतम के वेश में खड़े इन्द्र को
...थोड़ा ढँक-ओढ़ के नहीं रह सकती
ज़रूरी है अपने सौंदर्य का ढिंढोरा पीटना
आग को देखेगा
तो घी तो पिघलेगा ही
फिर दोष मंढ़ोगी पुरुष के सिर
उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।
समझ लो साफ-साफ
ये दुनिया हमारी है
इसमें रहना है
तो हमारे मुताबिक़ रहो
वरना
तुम्हारे लिए
दुनिया में एंट्री बैन!
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, November 14, 2012
बाज़ार की अफ़वाह और अफ़वाह का बाज़ार
दीवाली, दशहरा, रक्षाबंधन
ये सब हमारे लिए त्यौहार हैं
लेकिन कुछ लोगों के लिए सिर्फ व्यापार हैं
हर साल की तरह
इस साल भी दीवाली आई,
इस साल भी हुआ
लक्ष्मी जी का पूजन
आतिशबाज़ी और घरों की सफ़ाई,
लेकिन इस साल हमने मिठाई नहीं खाई।
बचपन में इतनी मिठाई आती थी
इतनी मिठाई आती थी
कि पेट अफ़र जाता था
रोटी तो माँ के डर से खानी पड़ती थी
वरना पेट तो मिठाई से ही भर जाता था।
खोये में मिलावट की बात को
ये टीवी चैनल कुछ ज़्यादा नहीं खेंच रहे हैं
मुझे तो लगता है
कि बेचारे खोए को बदनाम करके
ये अपनी चाॅकलेट बेच रहे हैं।
युगों-युगों से चले आ रहे त्यौहारों मे
ये अपनी राय क्यों झोंकते हैं
हमें हमारी ही परम्पराओं के पालन से रोकते हैं
बाज़ार की हवाएं कैसी कैसी बातें बनाती हैं
और तो और
डाॅक्टर कहता है
काजल लगाने से आंखें ख़राब हो जाती हैं।
पहले की माँए
दीवाली की रात
कच्ची पाली में काजल बनाती थी
पूरे साल बच्चों की आँखों में लगाती थी
काजल से आँख ख़राब होना तो दूर
चश्मे का नम्बर तक नहीं बढ़ा
ये काजल का ही करिश्मा था
कि लालटेन की रौशनी में पढ़कर
कलाम साहब राष्ट्रपति बन गए
लेकिन कभी चश्मा नहीं लगाना पड़ा
और अगर काजल लगाने से
इतना ही अधिक होता है आंखों का नुकसान
तो फिर आई लाइनर
और आई पैन्सिल पर
आप मौन क्यों हैं श्रीमान्!
ये सब हमारे लिए त्यौहार हैं
लेकिन कुछ लोगों के लिए सिर्फ व्यापार हैं
हर साल की तरह
इस साल भी दीवाली आई,
इस साल भी हुआ
लक्ष्मी जी का पूजन
आतिशबाज़ी और घरों की सफ़ाई,
लेकिन इस साल हमने मिठाई नहीं खाई।
बचपन में इतनी मिठाई आती थी
इतनी मिठाई आती थी
कि पेट अफ़र जाता था
रोटी तो माँ के डर से खानी पड़ती थी
वरना पेट तो मिठाई से ही भर जाता था।
खोये में मिलावट की बात को
ये टीवी चैनल कुछ ज़्यादा नहीं खेंच रहे हैं
मुझे तो लगता है
कि बेचारे खोए को बदनाम करके
ये अपनी चाॅकलेट बेच रहे हैं।
युगों-युगों से चले आ रहे त्यौहारों मे
ये अपनी राय क्यों झोंकते हैं
हमें हमारी ही परम्पराओं के पालन से रोकते हैं
बाज़ार की हवाएं कैसी कैसी बातें बनाती हैं
और तो और
डाॅक्टर कहता है
काजल लगाने से आंखें ख़राब हो जाती हैं।
पहले की माँए
दीवाली की रात
कच्ची पाली में काजल बनाती थी
पूरे साल बच्चों की आँखों में लगाती थी
काजल से आँख ख़राब होना तो दूर
चश्मे का नम्बर तक नहीं बढ़ा
ये काजल का ही करिश्मा था
कि लालटेन की रौशनी में पढ़कर
कलाम साहब राष्ट्रपति बन गए
लेकिन कभी चश्मा नहीं लगाना पड़ा
और अगर काजल लगाने से
इतना ही अधिक होता है आंखों का नुकसान
तो फिर आई लाइनर
और आई पैन्सिल पर
आप मौन क्यों हैं श्रीमान्!
लोभ की आरी में बाज़ार का हत्था लगाकर
आप काट नहीं पाएंगे
हमारी संस्कृति की शाखें
अरे हमारे तो सौंदर्य का प्रतिमान है
रतनारे नैन और कजरारी आँखें!
हमारे यहाँ
प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का काम था
किसी का भी गेट खटखटाकर
पानी मांग लेना इस देश में आम था
फिर आया एक ख़ास किस्म की ख़बरों का दौर
पानी पीने के बहाने माल साफ कर गए चोर
पानी पीने के बहाने लूट लिया
पानी पीने के बहाने मार दिया
पानी, प्यास और लूट का ऐसा मचा शोर
प्यासों की दहशत के चर्चे हो गए हर ओर
जैसे ही पानी मांगने वालों पर
लोगों ने नज़रें तरेरी
फौरन मार्किट में लांच हो गई
एक-एक लीटर की बिस्लेरी
कृष्ण के देश में
जहां दूध नदियों में बहा
वहाँ एक न्यूज़ चैनल ने कहा
कि आपके घर में आने वाला दूध
ज़हर हो सकता है
बताइए जनाब क्या इससे भी अधिक
कोई कहर हो सकता है
आप काट नहीं पाएंगे
हमारी संस्कृति की शाखें
अरे हमारे तो सौंदर्य का प्रतिमान है
रतनारे नैन और कजरारी आँखें!
हमारे यहाँ
प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का काम था
किसी का भी गेट खटखटाकर
पानी मांग लेना इस देश में आम था
फिर आया एक ख़ास किस्म की ख़बरों का दौर
पानी पीने के बहाने माल साफ कर गए चोर
पानी पीने के बहाने लूट लिया
पानी पीने के बहाने मार दिया
पानी, प्यास और लूट का ऐसा मचा शोर
प्यासों की दहशत के चर्चे हो गए हर ओर
जैसे ही पानी मांगने वालों पर
लोगों ने नज़रें तरेरी
फौरन मार्किट में लांच हो गई
एक-एक लीटर की बिस्लेरी
कृष्ण के देश में
जहां दूध नदियों में बहा
वहाँ एक न्यूज़ चैनल ने कहा
कि आपके घर में आने वाला दूध
ज़हर हो सकता है
बताइए जनाब क्या इससे भी अधिक
कोई कहर हो सकता है
आप साबुन के विज्ञापन में
माॅडल को दूध से नहाते दिखाते हो
अगर सारा ही दूध ज़हर है
तो आप साबुन के लिए
शुद्ध दूध कहाँ से लाते हो?
इन हालों आने वाली पीढ़ियों को
कृष्ण की कथा कैसे सुनाई जाएगी
क्या शुद्ध दूध का स्वाद चखने के लिए
बच्चों को साबुन खिलाई जाएगी।
पत्ता गोभी में एक कीड़ा पाया जाता है
जिसके कारण ब्रेन में होल होता है
काजू में कोलेस्ट्रोल होता है
दातुन करने से कमज़ोर होते हैं दाँत
मिठाई खाने से ख़राब होती हैं आँत
देशी घी से फेल हो सकता है हार्ट
इन्हीं बातों के दम पर तो चल रहे हैं
बड़े बड़े वाॅलमार्ट
यदि वो हमारी सुराही को ख़राब नहीं बताते
तो अपना वाटर कूलर कैसे बेच पाते
यदि इंडियन आदमी यूँ ही दीवाना रहता
आम और नीबू के अचार का
तो भट्टा ही बैठ जाता
जैम और जैली के व्यापार का
पाँच रुपए प्लेट के छोले कुल्चे से
यदि हमें नहीं डराया जाता
तो उनका डेढ़ सौ रुपए का पिज़्जा कौन खाने जाता
एक्चुअली हमारी जिस-जिस परंपरा में बाज़ार है
वो-वो परंपरा उन्हें स्वीकार है
और जिसमें संस्कृति की गंध है
मुहब्बत का घोंसला है
वो-वो उनके लिए ढकोसला है
इंडियन पब्लिक
पूरी दुनिया के व्यापारियों की एकमात्र होप है
इंडिया में मार्किट का बहुत बड़ा स्कोप है
इस स्कोप को ढूंढते हुए
जब कालीकट की बंदरगाह पर
तुमने उतारे थे काॅफी के जहाज
तब हमने तो नहीं किया था ऐतराज
आपका तो ये स्टाइल रहा है जनाब
पहले मुफ्त बाँट-बाँट के लगाते हो चाव
और फिर बढ़ा देते हो भाव
हम सदियों से
झाड़-फूस और जड़ी-बूटियों में
ढूंढते रहे हैं इलाज
लेकिन एलोपैथी ने सब कुछ बदल डाला है आज
ज़रा सा पेन हुआ नहीं
कि तुरंत कैप्सूल खाएंगी
एंटी बायोटिक और पेनकिलर पर
ज़िंदा रहने वाली बेटियाँ
प्रसव का दर्द सहना कैसे सीख पाएंगी
जब कोई काॅलेज का लड़का
इंडियन कल्चर को वेस्टर्न विकास से
कम तोल रहा होता है
तो उस समय वो नहीं बोलता
उसके पेट में पड़ा
बर्गर बोल रहा होता है
अब तो हमारे रहन-सहन पर
असर करने लगा है
लालच का कारोबार
हमें दो पल ठहर कर करना होगा विचार
आख़िर क्यों विदेशी कैक्टसों ने उखाड़ फेंके हैं
आंगन में लगे तुलसी और नीम
ये हमें निर्धारित करना होगा
कि हमें अपने बच्चों को
अंडरटेकर बनाना है
या महाबली भीम
नई पीढ़ी को जकड़ रहा
मानसिक ग़ुलामी का संकट
यूँ ही नहीं टलेगा
इसे भगाना भी होगा
केवल भारतीय गौरव
की बातें करने से काम नहीं चलेगा
भारतीय परंपरा को अपनाना भी होगा
✍️ चिराग़ जैन
माॅडल को दूध से नहाते दिखाते हो
अगर सारा ही दूध ज़हर है
तो आप साबुन के लिए
शुद्ध दूध कहाँ से लाते हो?
इन हालों आने वाली पीढ़ियों को
कृष्ण की कथा कैसे सुनाई जाएगी
क्या शुद्ध दूध का स्वाद चखने के लिए
बच्चों को साबुन खिलाई जाएगी।
पत्ता गोभी में एक कीड़ा पाया जाता है
जिसके कारण ब्रेन में होल होता है
काजू में कोलेस्ट्रोल होता है
दातुन करने से कमज़ोर होते हैं दाँत
मिठाई खाने से ख़राब होती हैं आँत
देशी घी से फेल हो सकता है हार्ट
इन्हीं बातों के दम पर तो चल रहे हैं
बड़े बड़े वाॅलमार्ट
यदि वो हमारी सुराही को ख़राब नहीं बताते
तो अपना वाटर कूलर कैसे बेच पाते
यदि इंडियन आदमी यूँ ही दीवाना रहता
आम और नीबू के अचार का
तो भट्टा ही बैठ जाता
जैम और जैली के व्यापार का
पाँच रुपए प्लेट के छोले कुल्चे से
यदि हमें नहीं डराया जाता
तो उनका डेढ़ सौ रुपए का पिज़्जा कौन खाने जाता
एक्चुअली हमारी जिस-जिस परंपरा में बाज़ार है
वो-वो परंपरा उन्हें स्वीकार है
और जिसमें संस्कृति की गंध है
मुहब्बत का घोंसला है
वो-वो उनके लिए ढकोसला है
इंडियन पब्लिक
पूरी दुनिया के व्यापारियों की एकमात्र होप है
इंडिया में मार्किट का बहुत बड़ा स्कोप है
इस स्कोप को ढूंढते हुए
जब कालीकट की बंदरगाह पर
तुमने उतारे थे काॅफी के जहाज
तब हमने तो नहीं किया था ऐतराज
आपका तो ये स्टाइल रहा है जनाब
पहले मुफ्त बाँट-बाँट के लगाते हो चाव
और फिर बढ़ा देते हो भाव
हम सदियों से
झाड़-फूस और जड़ी-बूटियों में
ढूंढते रहे हैं इलाज
लेकिन एलोपैथी ने सब कुछ बदल डाला है आज
ज़रा सा पेन हुआ नहीं
कि तुरंत कैप्सूल खाएंगी
एंटी बायोटिक और पेनकिलर पर
ज़िंदा रहने वाली बेटियाँ
प्रसव का दर्द सहना कैसे सीख पाएंगी
जब कोई काॅलेज का लड़का
इंडियन कल्चर को वेस्टर्न विकास से
कम तोल रहा होता है
तो उस समय वो नहीं बोलता
उसके पेट में पड़ा
बर्गर बोल रहा होता है
अब तो हमारे रहन-सहन पर
असर करने लगा है
लालच का कारोबार
हमें दो पल ठहर कर करना होगा विचार
आख़िर क्यों विदेशी कैक्टसों ने उखाड़ फेंके हैं
आंगन में लगे तुलसी और नीम
ये हमें निर्धारित करना होगा
कि हमें अपने बच्चों को
अंडरटेकर बनाना है
या महाबली भीम
नई पीढ़ी को जकड़ रहा
मानसिक ग़ुलामी का संकट
यूँ ही नहीं टलेगा
इसे भगाना भी होगा
केवल भारतीय गौरव
की बातें करने से काम नहीं चलेगा
भारतीय परंपरा को अपनाना भी होगा
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, October 7, 2012
ठहाकों का दौर
ग़मों का दौर है आफत में जान है लेकिन
कुछ ऐसी बात चले रंग और हो जाए
फिर एक बार फुर्सतों पे नूर आया है
चलो कि फिर से ठहाकों का दौर हो जाए
© चिराग़ जैन
कुछ ऐसी बात चले रंग और हो जाए
फिर एक बार फुर्सतों पे नूर आया है
चलो कि फिर से ठहाकों का दौर हो जाए
© चिराग़ जैन
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Sunday, September 30, 2012
जलोकड़ा
मौसम के मूड को
तपा डालता है सूरज
आग की तरहं
ठण्डी हवा को
बना डालता है लू।
हरे पत्ते
हो जाते हैं ज़र्द
देख ही नहीं पाता
किसी का सुख
जलोकड़ा कहीं का!
✍️ चिराग़ जैन
तपा डालता है सूरज
आग की तरहं
ठण्डी हवा को
बना डालता है लू।
हरे पत्ते
हो जाते हैं ज़र्द
देख ही नहीं पाता
किसी का सुख
जलोकड़ा कहीं का!
✍️ चिराग़ जैन
Thursday, September 20, 2012
मीडिया
खाली बैठे पक गए हैं यार, कुछ लफड़ा करो
ज़िन्दगी लगने लगी बेकार, कुछ लफड़ा करो
इस कदर सूखा पड़ा है, देश भर के क्राइम में
भजन टेलीकास्ट होंगे, अब क्या प्राइम टाइम में
क्या रिपोर्टर सीख लें, ठुमरी, ग़ज़ल, कव्वालियाँ
एंकरों का नूर सारा पी गईं खुशहालियाँ
ओ बड़े लोगों के बरखुरदार, कुछ लफड़ा करो
बात तो छेड़ो, बतंगड़ हम बना देंगे जनाब
फूक मारो, उसको अंधड़ हम बना देंगे जनाब
कोई नेता बेवजह की बात क्यों बकता नहीं
क्या कोई मंत्री यहां, घोटाला कर सकता नहीं
मीडिया से डर गई सरकार, कुछ लफड़ा करो
जातिवादी आग वाला एक दंगा ही सही
या किसी बिल पर बिना मतलब अड़ंगा ही सही
प्याज की कीमत बढ़ा दो, तेल को मंदा करो
शेयरों का खेल खेलो, गोल्ड का धंधा करो
हाय स्टेबल हो गया बाज़ार, कुछ लफड़ा करो
सबको सेटिस्फाई क्यों करने लगा बाज़ार भी
बिन बहस बढ़ता नहीं, टीआरपी का ग्राफ भी
सनसनी के फेस पर मनहूसियत सी छा गई
पूज्य भ्रष्टाचार जी को कौन डायन खा गई
मर गए क्या देश के गद्दार, कुछ लफड़ा करो
हाय रे फैशन जगत् कैसा रिसाला पढ़ गया
सुंदरी के पब्लिकल चुंबन पे ताला जड़ गया
कोई कास्टिंग काउच का मसला-मसाला भी नहीं
कोई एमएमएस किसी ने क्यों उछाला भी नहीं
बोर सा लगने लगा अख़बार, कुछ लफड़ा करो
एक तो लफड़े बिना, ख़बरें ख़तम होने लगीं
और कमर्शियल ब्रेक की इनकम भी कम होने लगी
आंकड़ों के खेल की पुड़िया असर करती नहीं
मीडिया विश्लेषकों की दाल अब गलती नहीं
पत्रकारों का चले घर बार, कुछ लफड़ा करो
जब से पूरे मुल्क में फैला हुआ आनंद है
आउटपुट एडीटरों की आउटगोइंग बंद है
हम समझते थे कि बस हम ही यहां चंगेज़ हैं
हम बताते थे कि हम दुनिया में सबसे तेज़ हैं
आज अपनी रुक गई रफ्तार, कुछ लफड़ा करो
✍️ चिराग़ जैन
ज़िन्दगी लगने लगी बेकार, कुछ लफड़ा करो
इस कदर सूखा पड़ा है, देश भर के क्राइम में
भजन टेलीकास्ट होंगे, अब क्या प्राइम टाइम में
क्या रिपोर्टर सीख लें, ठुमरी, ग़ज़ल, कव्वालियाँ
एंकरों का नूर सारा पी गईं खुशहालियाँ
ओ बड़े लोगों के बरखुरदार, कुछ लफड़ा करो
बात तो छेड़ो, बतंगड़ हम बना देंगे जनाब
फूक मारो, उसको अंधड़ हम बना देंगे जनाब
कोई नेता बेवजह की बात क्यों बकता नहीं
क्या कोई मंत्री यहां, घोटाला कर सकता नहीं
मीडिया से डर गई सरकार, कुछ लफड़ा करो
जातिवादी आग वाला एक दंगा ही सही
या किसी बिल पर बिना मतलब अड़ंगा ही सही
प्याज की कीमत बढ़ा दो, तेल को मंदा करो
शेयरों का खेल खेलो, गोल्ड का धंधा करो
हाय स्टेबल हो गया बाज़ार, कुछ लफड़ा करो
सबको सेटिस्फाई क्यों करने लगा बाज़ार भी
बिन बहस बढ़ता नहीं, टीआरपी का ग्राफ भी
सनसनी के फेस पर मनहूसियत सी छा गई
पूज्य भ्रष्टाचार जी को कौन डायन खा गई
मर गए क्या देश के गद्दार, कुछ लफड़ा करो
हाय रे फैशन जगत् कैसा रिसाला पढ़ गया
सुंदरी के पब्लिकल चुंबन पे ताला जड़ गया
कोई कास्टिंग काउच का मसला-मसाला भी नहीं
कोई एमएमएस किसी ने क्यों उछाला भी नहीं
बोर सा लगने लगा अख़बार, कुछ लफड़ा करो
एक तो लफड़े बिना, ख़बरें ख़तम होने लगीं
और कमर्शियल ब्रेक की इनकम भी कम होने लगी
आंकड़ों के खेल की पुड़िया असर करती नहीं
मीडिया विश्लेषकों की दाल अब गलती नहीं
पत्रकारों का चले घर बार, कुछ लफड़ा करो
जब से पूरे मुल्क में फैला हुआ आनंद है
आउटपुट एडीटरों की आउटगोइंग बंद है
हम समझते थे कि बस हम ही यहां चंगेज़ हैं
हम बताते थे कि हम दुनिया में सबसे तेज़ हैं
आज अपनी रुक गई रफ्तार, कुछ लफड़ा करो
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, September 18, 2012
नास्तिक
कितनी आसानी से
समझा जा सकता है
नास्तिक
और आस्तिक की
पहचान को।
आस्तिक मानता है
कि भगवान ने
इंसान को बनाया है
और नास्तिक मानता है
कि इंसान ने
भगवान को।
✍️ चिराग़ जैन
समझा जा सकता है
नास्तिक
और आस्तिक की
पहचान को।
आस्तिक मानता है
कि भगवान ने
इंसान को बनाया है
और नास्तिक मानता है
कि इंसान ने
भगवान को।
✍️ चिराग़ जैन
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