भारत की आज तस्वीर जो बनी हुई है
उसमें पुरानी हर रीत का भी रंग है
हल्दीघाटी वाली एक हार की कसक भी है
पोरस की स्वाभिमानी जीत का भी रंग है
चंद्रगुप्त मौर्य वाले साहस का नूर भी है
चाणक्य शिखा की कूटनीति का भी रंग है
झाँसी वाले शौर्य की कहानी तलवार पे है
पीठ पर ममता की प्रीत का भी रंग है
भारत की वीणा पे जो सरगम गूंजती है
उसमें वीणा के हर तार का भी योग है
क्रांति के बारूदों के धमाकों की धमक भी है
शांति का व मान-मनुहार का भी योग है
तलहट में छिपे खज़ानों की खनक भी है
अभिशाप झेलते बिहार का भी योग है
काम की प्रभावना की अजंता-एलोरा भी है
राम-कृष्ण योग के विचार का भी योग है
बरखा में नृत्यमग्न मोर अनिवार्य है तो
मोर की नमी से भरी कोर भी ज़रूरी है
तुंग हिमगिरि की विशालता आवश्यक है
सागर की गर्जना का रोर भी ज़रूरी है
अवध की सुरमई शाम अनिवार्य है तो
काशी के किनारों वाली भोर भी ज़रूरी है
देश की अखण्डता को पूर्ण करने के लिए
भारती का एक-एक पोर भी ज़रूरी है
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Wednesday, May 22, 2013
Saturday, May 11, 2013
रेशम है कविता
रेशम है कविता
झट से फिसल जाती है
उंगलियों को चूमती हुई।
झट से फिसल जाती है
उंगलियों को चूमती हुई।
थाम लेते हैं इसे
जीवन के
खुरदरे अनुभव।
दर्द रिसता तो होगा।
पीर बहती तो होगी।
कौन जाने
क्या ज़्यादा दुखदायी है
दर्द का रिसना
या रेशम का फिसलना?
...डर लगता है
गुलाबी छुअन से।
रेशम का कसता फंदा
सहला भर जाता है
खुरदरे अनुभवों को।
✍️ चिराग़ जैन
जीवन के
खुरदरे अनुभव।
दर्द रिसता तो होगा।
पीर बहती तो होगी।
कौन जाने
क्या ज़्यादा दुखदायी है
दर्द का रिसना
या रेशम का फिसलना?
...डर लगता है
गुलाबी छुअन से।
रेशम का कसता फंदा
सहला भर जाता है
खुरदरे अनुभवों को।
✍️ चिराग़ जैन
ख़ुशियाँ
आज
डिनर टेबल पर
गोल्डन एप्पल नहीं खाए
माँ ने।
बस कह भर दिया-
"मुझे ना अच्छे लगते सेब-पेब।"
और फिर
हम सब
चट कर गये
सारे सेब
हाथों-हाथ।
...रात में तकिये पर सिर टिकाए
छत पर चमकते रेडियम के सितारों में
अचानक उभरकर याद आई
माँ की बात-
"सुन रे!
सेब लिअइयो
भोत दिन हो गए सेब खाये!“
सम्पन्नता या विपन्नता से
कोई फ़र्क नहीं पड़ता
उसकी आदत पर
दूसरों को खिलाकर ही
ख़ुश होती है माँ।
✍️ चिराग़ जैन
डिनर टेबल पर
गोल्डन एप्पल नहीं खाए
माँ ने।
बस कह भर दिया-
"मुझे ना अच्छे लगते सेब-पेब।"
और फिर
हम सब
चट कर गये
सारे सेब
हाथों-हाथ।
...रात में तकिये पर सिर टिकाए
छत पर चमकते रेडियम के सितारों में
अचानक उभरकर याद आई
माँ की बात-
"सुन रे!
सेब लिअइयो
भोत दिन हो गए सेब खाये!“
सम्पन्नता या विपन्नता से
कोई फ़र्क नहीं पड़ता
उसकी आदत पर
दूसरों को खिलाकर ही
ख़ुश होती है माँ।
✍️ चिराग़ जैन
व्यस्तता
तुम आई थीं
सुख की गगरिया लिए
सुख लुटाने।
सुख की गगरिया लिए
सुख लुटाने।
पर मैं
बैठा ही रह गया
घात लगाए
जीवन के अहाते में
चुराने को
दो पल सुख।
अब सुख तो है
पर चोरी का है
तुम नहीं हो ना!
गगरिया नहीं है
मीठे सुख की।
✍️ चिराग़ जैन
बैठा ही रह गया
घात लगाए
जीवन के अहाते में
चुराने को
दो पल सुख।
अब सुख तो है
पर चोरी का है
तुम नहीं हो ना!
गगरिया नहीं है
मीठे सुख की।
✍️ चिराग़ जैन
Friday, April 12, 2013
नेह का दर्प
प्रेम की धारा में तुम निर्बाध बह पाते
काश मुझसे एक पल तुम सत्य कह पाते
जब कोई अपनत्व था चरितार्थ तुममें
जब कभी जागा हो कोई स्वार्थ तुममें
क्यों मेरा संकोच बदला आग्रहों में
कौन सा अधिकार था उनकी तहों में
काश उस मनुहार का तुम अर्थ गह पाते
जब किसी घटना से आहत हो गया मन
जब क्षणिक आवेश में रत हो गया मन
जब मेरे मन में घना विक्षोभ जागा
जब मेरी वाणी ने तुम पर क्रोध दागा
काश मेरे नेह का तुम दर्प सह पाते
काश मुझसे एक पल तुम सत्य कह पाते
जब कोई अपनत्व था चरितार्थ तुममें
जब कभी जागा हो कोई स्वार्थ तुममें
क्यों मेरा संकोच बदला आग्रहों में
कौन सा अधिकार था उनकी तहों में
काश उस मनुहार का तुम अर्थ गह पाते
जब किसी घटना से आहत हो गया मन
जब क्षणिक आवेश में रत हो गया मन
जब मेरे मन में घना विक्षोभ जागा
जब मेरी वाणी ने तुम पर क्रोध दागा
काश मेरे नेह का तुम दर्प सह पाते
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, April 9, 2013
उम्मीद के बिना
तुम हमेशा
मुझे दोषी ठहराती हो
कि मैं अपने रिश्तों में
उम्मीदें बहुत रखता हूँ
लेकिन समझ नहीं पाता हूँ मैं
कि उम्मीद के बिना
निभ ही कैसे सकता है
कोई रिश्ता
.....उम्मीद के बिना तो
दान तक नहीं दिया जाता!
✍️ चिराग़ जैन
मुझे दोषी ठहराती हो
कि मैं अपने रिश्तों में
उम्मीदें बहुत रखता हूँ
लेकिन समझ नहीं पाता हूँ मैं
कि उम्मीद के बिना
निभ ही कैसे सकता है
कोई रिश्ता
.....उम्मीद के बिना तो
दान तक नहीं दिया जाता!
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, April 2, 2013
कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
बीवी लड़ने कू तैयार
कम्मो ने मुस्का कर देखा
बीवी हो गई ढोल
चार दिनां से बोल रही ना
हमसे मीठो बोल
कम्मो ही बढ़िया थी यार
कम्मो मिली मगर की हमने
एक न मन की बात
एक तरफ बीवी लतियाये
एक तरफ जज़्बात
फिर से जागा सोया प्यार
ऐसी मिली घड़ी भर कम्मो
खड़ी हो गई खाट
बीवी मुँह फेरे लेटी है
घर के रहे न घाट
हमपे पड़ी दुतरफ़ा मार
हाल चाल तक पूछ न पाए
मुफ्त हुए बदनाम
कम्मो छूटी, बीवी रूठी
माया मिली न राम
उल्टे गले पड़ गई राड़
कर-कर हार गए मनुहार
बीवी लड़ने कू तैयार
कम्मो ने मुस्का कर देखा
बीवी हो गई ढोल
चार दिनां से बोल रही ना
हमसे मीठो बोल
कम्मो ही बढ़िया थी यार
कम्मो मिली मगर की हमने
एक न मन की बात
एक तरफ बीवी लतियाये
एक तरफ जज़्बात
फिर से जागा सोया प्यार
ऐसी मिली घड़ी भर कम्मो
खड़ी हो गई खाट
बीवी मुँह फेरे लेटी है
घर के रहे न घाट
हमपे पड़ी दुतरफ़ा मार
हाल चाल तक पूछ न पाए
मुफ्त हुए बदनाम
कम्मो छूटी, बीवी रूठी
माया मिली न राम
उल्टे गले पड़ गई राड़
कर-कर हार गए मनुहार
कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
अब तो डाल दिए हथियार
कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
✍️ चिराग़ जैन
अब तो डाल दिए हथियार
कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
✍️ चिराग़ जैन
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Location:
Mumbai, Maharashtra, India
Monday, March 18, 2013
पेशा
हर पेशे की अपनी-अपनी ब्यूटी है
हर पेशे की अपनी-अपनी ड्यूटी है
हर पेशे की अपनी-अपनी ड्यूटी है
हमें अक्सर
सामने वाले का पेशा
मज़ेदार लगता है
क्योंकि उसका सच
हमसे दूर होता है,
लेकिन हर पेशे में
कभी न कभी आदमी
बहुत मजबूर होता है।
जब कोई जज
किसी की ज़िन्दगी का
फैसला लिखता है
तो वो ऊपर से
बहुत आत्मविश्वासी दिखता है
लेकिन भीतर ही भीतर
उसका पसीना छूटता है
फैसले के बाद
कलम ही नहीं टूटती
फैसला लिखने वाला भी टूटता है
हर सर्जरी के बाद
जब तक मरीज़ का
जीवन संघर्ष चलता है
सर्जरी करने वाला डाॅक्टर भी
रात-रात भर करवटें बदलता है
सर्जरी से पहले
मरीज़ ही नहीं डरता
डाॅक्टर भी डरता है
और ज़रा-सी ग़लती होने पर
मरीज़ ही नहीं मरता
कुछ हिस्सों में
डाॅक्टर भी मरता है
सर्कस का जोकर
अपनी पीड़ा जता नहीं सकता
सीमा पर खड़ा जवान
अपनी समस्या बता नहीं सकता
फाँसी पर लटका इन्सान
जब धरती से दो फुट ऊपर
फड़फड़ाता होगा
तो एक बार तो
जल्लाद का कलेजा भी
हिल जाता होगा
लेकिन कोई फ़र्क नहीं पड़ता उनको
जो नफ़रत की फ़सल उगाते हैं
कलेजा नहीं थर्राता है उनका
जो नौजवानों को आतंकी बनाते हैं
दिल नहीं दहलता
लाशों के ढेर पर
राजनीति करने वालों का
दर्द नहीं दिखता है उन्हें
तड़प-तड़प कर
भूख से मरने वालों का
मुझे समझ नहीं आता है यार
कि हमनें क्यों उगाए हैं
नफ़रत के देवदार
दर्द, कराह और डर क्यों फैलाते हैं
हम सुख और चैन से रहना
क्यों नहीं सीख पाते हैं
मुझे यकीन है
कि जब तक आदमी में इंसान है
तब तक ज़िन्दगी बहुत आसान है
और जैसे ही हमारे भीतर का इंसान
मर जाता है
आदमी आसानी की सीमाओं से
आगे निकल जाता है
✍️ चिराग़ जैन
सामने वाले का पेशा
मज़ेदार लगता है
क्योंकि उसका सच
हमसे दूर होता है,
लेकिन हर पेशे में
कभी न कभी आदमी
बहुत मजबूर होता है।
जब कोई जज
किसी की ज़िन्दगी का
फैसला लिखता है
तो वो ऊपर से
बहुत आत्मविश्वासी दिखता है
लेकिन भीतर ही भीतर
उसका पसीना छूटता है
फैसले के बाद
कलम ही नहीं टूटती
फैसला लिखने वाला भी टूटता है
हर सर्जरी के बाद
जब तक मरीज़ का
जीवन संघर्ष चलता है
सर्जरी करने वाला डाॅक्टर भी
रात-रात भर करवटें बदलता है
सर्जरी से पहले
मरीज़ ही नहीं डरता
डाॅक्टर भी डरता है
और ज़रा-सी ग़लती होने पर
मरीज़ ही नहीं मरता
कुछ हिस्सों में
डाॅक्टर भी मरता है
सर्कस का जोकर
अपनी पीड़ा जता नहीं सकता
सीमा पर खड़ा जवान
अपनी समस्या बता नहीं सकता
फाँसी पर लटका इन्सान
जब धरती से दो फुट ऊपर
फड़फड़ाता होगा
तो एक बार तो
जल्लाद का कलेजा भी
हिल जाता होगा
लेकिन कोई फ़र्क नहीं पड़ता उनको
जो नफ़रत की फ़सल उगाते हैं
कलेजा नहीं थर्राता है उनका
जो नौजवानों को आतंकी बनाते हैं
दिल नहीं दहलता
लाशों के ढेर पर
राजनीति करने वालों का
दर्द नहीं दिखता है उन्हें
तड़प-तड़प कर
भूख से मरने वालों का
मुझे समझ नहीं आता है यार
कि हमनें क्यों उगाए हैं
नफ़रत के देवदार
दर्द, कराह और डर क्यों फैलाते हैं
हम सुख और चैन से रहना
क्यों नहीं सीख पाते हैं
मुझे यकीन है
कि जब तक आदमी में इंसान है
तब तक ज़िन्दगी बहुत आसान है
और जैसे ही हमारे भीतर का इंसान
मर जाता है
आदमी आसानी की सीमाओं से
आगे निकल जाता है
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, February 26, 2013
बजट का मौसम
बजट का मौसम आ गया है। बजट एक वार्षिक कार्यक्रम है, वार्षिक इसलिये कि यह हर वर्ष बनाया जाता है। और कार्यक्रम इसलिये कि इसके सभी कार्य एक क्रम में होते हैं। देश में एक रेलमंत्री होता है, जो मंत्री बनने के बाद रेल से यात्रा करना अमूमन छोड़ देता है, इसलिये जब कभी वह रेल से सफ़र करता है तो उसकी तस्वीर अख़बार में प्रकाशित की जाती है। अक्सर यह तस्वीर रेल से उतरते हुए खींची जाती है। इस तस्वीर को देखकर देश समझ लेता है कि जब वे रेल से उतर रहे हैं तो रेल में चढ़े भी ज़रूर होंगे। हालाँकि चढ़ने के लिये उतरना और उतरने के लिये चढ़ना कतई ज़रूरी नहीं है। जैसे रेल के किराये। इनका उतरते हुए चित्र कभी नहीं खींचा गया।
ख़ैर, हम बजट के कार्य के क्रम की बात के सफ़र पर थे, लेकिन बीच में जं़ंजीर खींच कर फालतू जंक्शन पर टहलने लग गए थे। आइये वापस ट्रेन में सवार होते हैं। तो जी एक रेलमंत्री नाम का आदमी देश में होता है, वो आम बजट से पहले रेल का ख़ास बजट लेकर संसद नामक स्थान पर जाता है। यह ठीक ऐसा होता है जैसे मिनिस्टर की मर्सिडीज़ के आगे बुलैरो में सिक्योरिटी वाले चलते हैं, मरेंगे तो वो मरेंगे और वित्तमंत्री नामक मर्सिडीज़ बच जाएगी।
जब ये रेलमंत्री नाम का व्यक्ति रेल बजट नाम का एक दस्तावेज़ लेकर संसद नामक स्थान पर जैसे ही पहुँचता है तो संसद में कार्रवाई नामक कोई चीज़ शुरू हो जाती है। इस कार्रवाई नामक चीज़ को सुचारु रूप से चलाने के लिये ज़रूरी होता है कि रेलमंत्री धीमे स्वर में बजट बोलना शुरू करते रहें, पक्ष वाले लोग मुस्कुराते हुए बैठे रहें, विपक्ष वाले विरोध करते रहें और लगे हाथ संसद के फ़र्नीचर की गुणवत्ता भी ठोक-बजा कर परखते रहें। अध्यक्ष शोर मचाने वालों को मुस्कुराते हुए डाँटते रहें और विपक्ष वाले मुस्कुराते हुए डँटते रहें।
दिन भर में कई बार इस क्रिया को दोहराने के बाद जब विपक्ष इस बात से आश्वस्त हो जाता है कि अंग्रेजों के ज़माने में भी फ़र्नीचर की क्वालिटी को लेकर कोई समझौता नहीं किया जाता था, और अध्यक्ष इस बात से आश्वस्त हो जाते हैं कि उनके जुमलों का समुचित रियाज़ द्रुतविलंबित से तीव्र तक हर प्रकार से हो चुका है तब सब मुस्कुराते हुए सदन से बाहर आ जाते हैं और बजट नामक मसौदा पास हो चुका होता है।
इसके बाद विपक्ष क्रम से इसको जन-विरोधी बजट बताते हुए सरकार को धिक्कारता है, सरकार विपक्ष की हरक़त को नासमझी बताते हुए विपक्ष को फटकारती है। मीडिया रात के प्राइम टाइम में वेल्ले लोगों के साथ बैठ कर बजट पर चर्चा करता है, जिसका अमूमन यही परिणाम निकलता है कि कोई परिणाम नहीं निकलता।
इस बार रेलमंत्री ने किराए नहीं बढ़ाए, क्योंकि किराए तो बजट से पहले ही बढ़ा दिए थे, लेकिन सरचार्ज बढ़ा दिए, क्योंकि सरचार्ज बजट से पहले नहीं बढ़ाए गए थे। रेलमंत्री ने फ़्यूल चार्ज बढ़ा दिया है क्योंकि डीजल महंगा हो रहा है। अब वित्तमंत्री डीजल के रेट बढ़ा देंगे क्योंकि रेल का किराया महंगा हो रहा है। जनता एक बार वित्तमंत्री की ओर देखती है, फिर रेलमंत्री की ओर। बार बार ऐसा करने के कारण जनता की गर्दन दर्द करने लगती है और उसमें झटका आ जाता है। जनता बजट का पंगा छोड़ कर बाम ढूंढने चली जाती है। बाम वाला बताता है कि वित्तमंत्री ने बजट में जिन चीज़ों के दाम बढ़ाए हैं, उनमें बाम भी शामिल है। सुनकर जनता बिना बाम लगाए योगा करने लगती है। योगा करते देख उसको बाबा रामदेव पकड़ लेते हैं। वहाँ से भागती जनता छुपती फिरती है, क्योंकि इस देश की जनता को बोलना तो सिखाया जाता है, लेकिन ये नहीं बताया जाता कि कब बोलना है। हम प्रतीक्षारत हैं कि कभी तो कोई बताएगा कि अब बोलो। इसी प्रतीक्षा में इसी प्रकार बजट बनते रहेंगे और हम बिना बाम लगाए चोरी-चोरी चुपके-चुपके योगा करके ख़ुश होते रहेंगे कि हमने बाबा रामदेव को बेवकूफ़ बना दिया।
✍️ चिराग़ जैन
Thursday, February 14, 2013
नसीब
राजकुमारी ने कहा-
‘बहुत नसीब वाला होगा
वो चांद
जो उतरेगा
तुम्हारे अंगना।
रे पथिक!
मेरा ऐसा नसीब कहाँ
जो पा सकूँ
तुम-सा
स्वतंत्र
और स्वच्छंद साथी!’
पथिक
कोसता रहा गया
अपनी ख़ुशनसीबी को
और राजकुमारी
सोने की पालकी में बैठ
उतर गई
किसी चांद के अंगना।
✍️ चिराग़ जैन
‘बहुत नसीब वाला होगा
वो चांद
जो उतरेगा
तुम्हारे अंगना।
रे पथिक!
मेरा ऐसा नसीब कहाँ
जो पा सकूँ
तुम-सा
स्वतंत्र
और स्वच्छंद साथी!’
पथिक
कोसता रहा गया
अपनी ख़ुशनसीबी को
और राजकुमारी
सोने की पालकी में बैठ
उतर गई
किसी चांद के अंगना।
✍️ चिराग़ जैन
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