Thursday, August 29, 2013

डर लगता है

सूप पर
अनाज उछालती माँ
डाँट देती थी मुझे
जब मैं कोशिश करता था
उछलते अनाज को
छू लेने की।

डाल पर बैठी चिड़िया
फुर्र से उड़ जाती थी
जब मैं उचकता था
उसे छूने के लिए।

कई बार मन करता है
तुमको छूने का।

लेकिन डर लगता है
कहीं तुम अनाज न निकलो!
कहीं तुम चिड़िया न निकलो!

✍️ चिराग़ जैन

Friday, August 16, 2013

सियासत पनप रही है

नसीहतें अनसुनी रहेंगी, यही रवायत पनप रही है
पुरानी आफ़त तो टल गई पर नई मुसीबत पनप रही है

कहीं तिज़ारत, कहीं ज़रूरत, कहीं पे वहशत पनप रही है
अमां हटाओ भी दौरे-नौ में कहाँ शराफ़त पनप रही है

इधर मेरे घर में एक नन्हीं, हसीं नज़ाक़त पनप रही है
उधर मेरे मन में सुर्ख़ियों की तमाम दहशत पनप रही है

किसी की मजबूरियों के घुटने कभी टिकें तो ये याद रखना
जहाँ दबाया था हसरतों को वहीं बग़ावत पनप रही है

वो एक हिंदू, ये एक मुस्लिम, वो इसका दुश्मन, ये उसका दुश्मन
इसी तरह के फ़िज़ूल जुमलों पे अब सियासत पनप रही है

हरेक सच को बयान कर दें, पलट के रख दें हरेक बाज़ी
तुम्हारी मजबूरियों के दम पर, हमारी हिम्मत पनप रही है

जो एक आदत-सी हो गई है, तुम्हें हमारी ख़ुशामदों की
तुम्हारी आदत की आड़ लेकर, हमारी चाहत पनप रही है

बहुत दिनों तक संभाले रखी, तो ये मरासिम को लील लेगी
अभी मिटा दो दिमाग़ो-दिल से, अगर शिक़ायत पनप रही है


✍️ चिराग़ जैन

Saturday, August 10, 2013

लफंडर-लबाड़ी

चाहती है अगर प्यार जारी रहे
मैं लफ़ंडर रहूँ, तू लबाड़ी रहे
एक ही शर्त पर है ये मुमकिन अगर
मैं कुँआरा रहूँ, तू कुँआरी रहे

घर-गृहस्थी के पचड़ों से बचकर रहें
तो मुहब्बत का नुक़सान टल जाएगा
हो गई चिल्ल-पौं बालकों की शुरू
तो हमारा दिवाला निकल जाएगा
आशिकी के लिए है ज़रूरी बहुत
पाँव हल्के रहें, जेब भारी रहे

जब कभी कोई मुझको छिछोरा कहे
तू तभी थोड़ी-थोड़ी छिछोरी बने
मैं तेरे प्यार में कुछ जुगाड़ू बनूं
तू मेरे इश्क़ में कुछ टपोरी बने
मैं मुहल्ले में रिक्शा चलाता फिरूं
तू मेरी फिक्स सिंगल सवारी रहे

लड़कियां देखकर सोचते हैं सभी
इनसे शादी करें या मुहब्बत करें
साल में एक दो गिफ़्ट देते रहें
या कि हर रोज़ की मोल आफ़त करें
पाव भर बेर से काम चल जाए तो
क्या ज़रूरी है आंगन में झाड़ी रहे

हो ज़रूरी अगर ब्याह करना तुझे
तो किसी और के नाम हो जाइयो
मैं जमूरे सा चुपचाप तकता रहूँ
तू बंदरिया सी गुमनाम हो जाइयो
फिर मेरी डुगडुगी पर मटक लीजियो
जब कभी घर से बाहर मदारी रहे

प्रेमिका के लिए मुस्कुराते रहे
और पत्नी से हम नकचढ़े हो गए
वाइफ ने टच किया, बाल चिपके रहे
प्रेमिका ने छुआ तो खड़े हो गए
प्रेमिका एक एडवांस पेमेंट है
और पत्नी हमेशा उधारी रहे

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, July 28, 2013

अपनेपन का स्वांग

यूं तो सारी राहें मैंने सोच समझ कर चुन रखी थीं
चंद मुश्क़िलें अपनेपन का स्वांग रचाकर साथ आ गईं

पथ में कोई बवेला कब था
राही भला अकेला कब था
किसको, कब, क्या कहना होगा
-इन प्रश्नों का रेला कब था
किस बीहड़ में, किस पोखर पर, कितना पानी, कब पीना है
इन सारे प्रश्नों की चिंता आंख बचाकर साथ आ गई

जीवन में संत्रास न होता
पीड़ा का एहसास न होता
राहों से भी बातें करते
मंज़िल का ही पास न होता
इसकी ख़ातिर ये करना है, उसकी ख़ातिर वो करना है
कई योजनाएँ ऐसी ही, नेह बढ़ाकर साथ आ गई

केवल श्वास ज़रूरी रहती
और न कुछ मजबूरी रहती
दुनिया वाले क्या सोचेंगे
-इन प्रश्नों से दूरी रहती
इस दुनिया की जो परिपाटी, हम दुनिया को दे आए थे
वो परिपाटी भी दुनिया से, हाथ छुड़ाकर साथ आ गई

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, July 24, 2013

भीगा मन

झमाझम बारिश
दिल्ली यूनिवर्सिटी कैम्पस
भीगते हुए लड़के-लड़कियाँ
लटों से फिसल कर टपकती बूंदें
फर्राटे से पानी उछालती गाड़ियाँ
मस्ती में किलकारता यौवन
मोटर-बाइक पर आलिंगनबद्ध प्रेम
ग्वाॅयर हाॅल कैंटीन की मैगी
चाय की चुस्कियाँ
काॅलेज-डेज़ की यादें
किसी पुराने परिचित से मुलाक़ात।

...और भीगे मन की
भीगी-सी आवाज़
...चल, भीगते हैं यार।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, July 23, 2013

यकीन का धागा

या तो रिश्तों में सवालात को शुमार न कर
या जवाबों की हक़ीक़त पे ऐतबार न कर
पार ले जाएगा तुझको यकीन का धागा
तू किसी और सफ़ीने का इंतज़ार न कर

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, July 21, 2013

बंदिशें मुस्कान पर

लोग अब दौलत तिजोरी में कमाकर रख रहे हैं
और कुछ हैं जो बाज़ारों में धमाके रख रहे हैं
रख रही है जब सियासत बंदिशें मुस्कान पर
तब यहाँ कुछ लोग जीवन में ठहाके रख रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, July 18, 2013

मिलावट

ढाया है दरिंदों ने क्या कहर निवालों में
बच्चों को परोसा है, कल ज़हर निवालों में
क्या सोच के आया था, वो पहर निवालों में
किस क़द्र ठगा सा है, इक शहर निवालों में
✍️ चिराग़ जैन

Monday, July 8, 2013

बामियान के घाव

बहुत भयानक सपना था
साक्षात् बुद्ध सामने थे
...लहूलुहान।

उनके पीछे एक भीड़ थी
...पूरी भीड़।

हताश से महावीर
परास्त से गांधी
और शर्मिंदा से पैग़म्बर
किसी गहरे सदमे से सन्न राम
किसी आशंका से त्रस्त कृष्ण
और
ख़ुद से नज़रें चुराते अम्बेडकर।

सब थे
...पर बदहवास।

सबके जिस्म छलनी थे
ज़ख़्म ही ज़ख़्म
हाँ, बुद्ध के ज़ख़्म कुछ ताज़ा थे

भयंकर मंज़र था
साँस तक का शोर नहीं था
तभी सन्नाटे में
टप्प से टपकी
लहू की एक बूंद।

...बस सपना टूट गया
बाॅलकनी में
अख़बार आकर गिरा था
...टप्प से।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, July 6, 2013

धर्म-युद्ध

पुरखों ने उदाहरण प्रस्तुत किया कि युद्ध के माहौल में भी धर्म की चर्चा की जा सकती है, हमने उदाहरण प्रस्तुत किया कि धर्म की चर्चा में भी युद्ध किये जा सकते हैं।

✍️ चिराग़ जैन