अपना भी त्योहार है, उनका भी त्योहार।
अब तो मीठा कीजिये, आपस का व्यवहार॥
रथ पर शोभित हो गए, जगन्नाथ महाराज।
उनका रूप निहारने, ईद आई है आज॥
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Friday, July 17, 2015
त्योहार
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Friday, July 10, 2015
ज़िन्दगी का अर्थ
मंज़िल की धुन में राह के मंज़र निकल गये
ख़ुशियों के गाँव आए तो छूकर निकल गये
कुछ लोग ज़िन्दगी का अर्थ बूझते फिरे
कुछ लोग इसे शान से जीकर निकल गये
✍️ चिराग़ जैन
ख़ुशियों के गाँव आए तो छूकर निकल गये
कुछ लोग ज़िन्दगी का अर्थ बूझते फिरे
कुछ लोग इसे शान से जीकर निकल गये
✍️ चिराग़ जैन
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Sunday, June 28, 2015
लकीरें ग़ायब हैं
जब से कंधों पर कुछ भार पड़ा, तब से
हाथ बंधे हैं और ज़जीरें ग़ायब हैं
जिसने सख़्त ज़मीं पर चलकर देख लिया
उसकी बातों से तहरीरें ग़ायब हैं
जाने कैसे तुमने हाथ मिलाया है
हाथों की कुछ ख़ास लकीरें ग़ायब हैं
बस आईने लटके हैं दीवारों पर
और आईनों से तस्वीरें ग़ायब हैं
हाथ बंधे हैं और ज़जीरें ग़ायब हैं
जिसने सख़्त ज़मीं पर चलकर देख लिया
उसकी बातों से तहरीरें ग़ायब हैं
जाने कैसे तुमने हाथ मिलाया है
हाथों की कुछ ख़ास लकीरें ग़ायब हैं
बस आईने लटके हैं दीवारों पर
और आईनों से तस्वीरें ग़ायब हैं
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, June 21, 2015
भ्रष्टतंत्र का योग दिवस
विश्व योग दिवस की शुभकामनाएँ। योग पूरी दुनिया में नए आयामों को खोल रहा है किन्तु फिर भी योग के जितने आयामों से हमने पटाक्षेप किया है उसका कोई मुक़ाबला नहीं है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर देश भर में अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। एक बड़ा तबका इन कार्यक्रमों में योगाभ्यास ही करने जाता है। लेकिन उन लोगों के लिये भी इन कार्यक्रमों की उपयोगिता है जिन्हें योगाभ्यास से कोई सरोकार नहीं है।
विपक्ष इन कार्यक्रमों से दूर रहकर अपने हठयोग का प्रदर्शन करता है। अनेक छुटभैये इन कार्यक्रमों में अपना ‘राजयोग’ तलाशने जाते हैं। पार्क में जब कोई ख़ूबसूरत लड़की वज्रासन और पादहस्तासन करती है तो कई युवक वहाँ खड़े-खड़े ‘ताड़ासन’ करते पाए जाते हैं। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि कई एकड़ में फैले पार्क में योगिणियों के आसपास की वायु में ऐसा क्या विशेष होता है कि पूरे पार्क के साधक वहीं साधना करने को लालायित रहते हैं।
सवेरे पार्क में तो योगाभ्यास होता ही है, हम तो सामान्य जीवन में भी योग को छोड़ नहीं पाते। हमारी संसद में पूरे साल जिस मुद्दे पर सरकार अनुलोम करती है, विपक्ष उस पर विलोम कर रहा होता है। सरकारी दफ़्तरों में काम करने के नाम पर बाबू लोग योगनिद्रा में चले जाते हैं। थाने में रपट लिखाने जाओ तो पुलिसवाले ‘उष्ट्रासन’ करते मिलते हैं। आध्यात्मिक गुरुओं ने सिद्धासन लगाया और गहन साधना से कई एकड़ जमीनें हथिया लीं। बिल्डर्स ‘काकी मुद्रा’ और ‘शीतली प्राणायाम’ करके निवेशकों की गाढ़ी कमाई गड़प कर गए।
अफसर लोग टेबल के नीचे हाथ फैलाकर ‘भ्रष्टासन’ कर रहे हैं और ठेकेदार ये सन्देश दे रहे हैं कि यदि सही तरीके से अपने हाथों से दूसरों के पैर पकड़ लिए जाएँ तो पाचन शक्ति इतनी सुदृढ़ हो जाती है कि सीमेंट और लोहा भी पचाया जा सकता है। न्याय प्रक्रिया सात दशक से शिथिलासन का अभ्यास कर रही है। पत्रकारिता नॉन स्टॉप कपालभाति कर रही है। उनकी उच्छवास की गति इतनी तेज़ है कि लाख कोशिशों के बावजूद उनके कपाल में कुछ घुसता ही नहीं।
इस देश का सामान्य नागरिक भी अनवरत योगाभ्यास करता है। सुबह उठते ही वह उकड़ू बैठ कर योगाभ्यास करना शुरू करता है, उसके बाद दिन भर शीर्षासन, उत्तानपादासन, उपवास और वैवश्याभ्यास करते हुए उसका ‘ध्यान’ दो रोटियों पर केंद्रित हो जाता है। वह सरकार और व्यवस्था की ओर अपेक्षा की दृष्टि से ‘त्राटक’ करता है और तंत्र उससे नज़र बचाते हुए अपने कानों में अंगूठे घुसाता है और आँखों पर उँगलियाँ रखकर मुंह से घूँ-घूँ की ध्वनि निकालने लगता है।
✍️ चिराग़ जैन
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Sunday, June 14, 2015
ज़िंदगी है चार पहरों की तरह
कुल मिलाकर ज़िंदगी है चार पहरों की तरह
हर किसी का वक़्त चढ़ता है दुपहरों की तरह
हर किसी का वक़्त चढ़ता है दुपहरों की तरह
सांझ को दुल्हन सी सजती है सभी की ज़िंदगी
और फिर सूरज ढलक जाता है चेहरों की तरह
और फिर सूरज ढलक जाता है चेहरों की तरह
✍️ चिराग़ जैन
छल
मैंने
भीगी फुलवारी से पूछा-
"कोई आया था क्या?"
भीगी फुलवारी से पूछा-
"कोई आया था क्या?"
वो बोली-
"एक बादल आया था
...बरखा बनकर!"
✍️ चिराग़ जैन
"एक बादल आया था
...बरखा बनकर!"
✍️ चिराग़ जैन
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मन तो गोमुख है
Thursday, May 28, 2015
पीर के गाँव
प्रेम की राह में पीर के गाँव हैं
प्रेम फिर भी हमेशा लुभावन हुआ
एक सावन बिना प्रेम पतझर बना
पतझरों ने छुआ प्रेम; सावन हुआ
जब नदी ने समुन्दर छुआ झूम कर
तब नदी की सुधा को निचोड़ा गया
अपहरण कर लिया सूर्य ने देह का
और बादल उसे ओढ़ बौरा गया
हिमशिखर में ढली, आँसुओं-सी गली
छू सकूँ फिर समुन्दर -यही मन हुआ
एक अनमोल पल की पिपासा लिए
मौन साधक जगत् में विचरता रहा
घोर तप में तपी देह जर्जर हुई
श्वास से आस का स्रोत झरता रहा
चल पड़े प्राण आनन्द के मार्ग पर
जग कहे- ‘साधना का समापन हुआ’
एक राधा कथा से नदारद हुई
एक मीरा अचानक हवा हो गई
सिसकियाँ उर्मिला की घुटीं मन ही मन
मंथरा इक अमर बद्दुआ हो गई
बस कथा ने सभी को अमर कर दिया
फिर न राघव हुए ना दशानन हुआ
✍️ चिराग़ जैन
प्रेम फिर भी हमेशा लुभावन हुआ
एक सावन बिना प्रेम पतझर बना
पतझरों ने छुआ प्रेम; सावन हुआ
जब नदी ने समुन्दर छुआ झूम कर
तब नदी की सुधा को निचोड़ा गया
अपहरण कर लिया सूर्य ने देह का
और बादल उसे ओढ़ बौरा गया
हिमशिखर में ढली, आँसुओं-सी गली
छू सकूँ फिर समुन्दर -यही मन हुआ
एक अनमोल पल की पिपासा लिए
मौन साधक जगत् में विचरता रहा
घोर तप में तपी देह जर्जर हुई
श्वास से आस का स्रोत झरता रहा
चल पड़े प्राण आनन्द के मार्ग पर
जग कहे- ‘साधना का समापन हुआ’
एक राधा कथा से नदारद हुई
एक मीरा अचानक हवा हो गई
सिसकियाँ उर्मिला की घुटीं मन ही मन
मंथरा इक अमर बद्दुआ हो गई
बस कथा ने सभी को अमर कर दिया
फिर न राघव हुए ना दशानन हुआ
Monday, May 25, 2015
अच्छे दिन आने वाले हैं
"अच्छे दिन आने वाले हैं" का पर्यायवाची वाक्य आज मथुरा में गूँजा "बुरे दिन चले गए हैं। अब कहीं विपक्षी ये न कह दें कि "देख लो जी; आया कुछ भी नहीं, जो था वो भी चला गया।"
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, May 17, 2015
पुत्री के जन्म पर
इक किरण सूर्य की आई हो जैसे धरती के प्रांगण में
वैसे ही आई है बिटिया मेरे मुस्काते जीवन में
उसके आ जाने से मेरी मुस्कानों ने मआनी पाए
उसको गोदी में ले चूमा तो अन्तस् ने उत्सव गाए
शब्दों को ख़ूब निचोड़ लिया फिर भी यह गान अधूरा है
बिटिया के जन्मोत्सव के इस सुख का अनुमान अधूरा है
सारी ख़ुशियों से बढ़कर है उल्लास पिता बन जाने का
मन को बालक कर देता है अहसास पिता बन जाने का
तुलना करना नामुमक़िन है, जग के सब रिश्ते-नातों से
क्या मिलता है जब छूती है मुझको वो कोमल हाथोे से
उसकी किलकारी से बेहतर कोई मधुरिम संगीत नहीं
उसकी सुविधा से आवश्यक दुनिया की कोई रीत नहीं
जब वो अपना छोटा सा सिर सीने पर रखकर सोती है
उस क्षण धरती का राजा होने की अनुभूति होती है
दुनिया का सब ऐश्वर्य व्यर्थ सारा सुख-वैभव झूठा है
अपनी संतति की धड़कन सुनने का आनंद अनूठा है
✍️ चिराग़ जैन
वैसे ही आई है बिटिया मेरे मुस्काते जीवन में
उसके आ जाने से मेरी मुस्कानों ने मआनी पाए
उसको गोदी में ले चूमा तो अन्तस् ने उत्सव गाए
शब्दों को ख़ूब निचोड़ लिया फिर भी यह गान अधूरा है
बिटिया के जन्मोत्सव के इस सुख का अनुमान अधूरा है
सारी ख़ुशियों से बढ़कर है उल्लास पिता बन जाने का
मन को बालक कर देता है अहसास पिता बन जाने का
तुलना करना नामुमक़िन है, जग के सब रिश्ते-नातों से
क्या मिलता है जब छूती है मुझको वो कोमल हाथोे से
उसकी किलकारी से बेहतर कोई मधुरिम संगीत नहीं
उसकी सुविधा से आवश्यक दुनिया की कोई रीत नहीं
जब वो अपना छोटा सा सिर सीने पर रखकर सोती है
उस क्षण धरती का राजा होने की अनुभूति होती है
दुनिया का सब ऐश्वर्य व्यर्थ सारा सुख-वैभव झूठा है
अपनी संतति की धड़कन सुनने का आनंद अनूठा है
✍️ चिराग़ जैन
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Friday, May 15, 2015
पेट्रोल के दाम
राहुल गांधी से किसी ने पूछा :
सरकार ने पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए
इस पर आपकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई?
राहुल गांधी : आपको क्या लगता है कि मैं पदयात्रा किसानों के लिए कर रहा हूँ?
✍️ चिराग़ जैन
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