Sunday, October 18, 2015

जोकर का तमाशा कभी नहीं रुकता

लड़ाई क़ायम रहनी चाहिये। जंग चलती रहनी चाहिये। जोकर का तमाशा कभी नहीं रुकता। हिन्दू-मुस्लिम के खेल से ऊब जाओ तो विचारधाराओं का खेल खेलो। उनसे मन भर जाए तो जातियों का पंगा डाल दो। जाति हटे तो भाषा, भाषा हटे तो उत्तर-दक्षिण, ये नहीं तो कुछ और, कुछ और नहीं तो कुछ भी और। लेकिन मनोरंजन होता रहना चाहिये। 

कई बार तो फ़ख़्र होता है। कोई ज़र्रा नहीं छोड़ा जहाँ कलेस न हो। जम्मू वालों को घाटी वालों का दुश्मन बना दिया। यदि किसी बेवक़ूफ़ ने जम्मू-कश्मीर के बीच सौहार्द क़ायम करने में सफ़लता पा ली तो जम्मू-कश्मीर को पूरे भारत का दुश्मन बना दिया। पंजाब वाले भाषा पर नहीं लड़ते तो उनको ख़ालिस्तान की सौगात दे दी। राजस्थान वाले भाषा-धर्म पर नहीं लड़ते तो उनको आरक्षण पर लपेटे में ले लिया। गुजराती शांतिप्रिय होने का दावा कर बैठे तो उनको पटेल आरक्षण में बिज़ी कर दिया। हरियाणा को खाप देकर हिल्ले से लगा रखा है तो बिहार को ऊँच-नीच के चक्रव्यूह में गोल-गोल घुमा रखा है। उत्तर प्रदेश इस मामले में काफ़ी समृद्ध है। वहाँ मुज़फ़्फ़रनगर, दादरी, दनकौर वगैरा कई ऐसे उत्पादक प्रदेश हैं जहाँ कुछ न कुछ चलता ही रहता है। ये सब दबेगा तो देवबंद उछल जाएगा। वो दबेगा तो मथुरा या काशी बोल पड़ेगी। और सब कुछ दब गया तो राम जी के भरोसे लड़ाई जारी रहेगी। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश को लेकर कोई चिंता नहीं है। उत्तराखंड पलायन से जूझ रहा है। उधर बंगाल भी जैसे तैसे अपना काम चला ही लेता है। वहाँ भाषा को लेकर इतनी निष्ठा है कि उनको भेदभाव करने के लिये प्रवासी मिल जाते हैं। पूर्वोत्तर के पास लड़ने के लिये अन्तरराष्ट्रीय सपोर्ट है। उड़ीसा ने अमीर ग़रीब वाली पुरातन पद्धति को ज़िंदा रखने का महती कार्य किया है। झारखंड के पास लड़ने के लिये बिहार वाली ऊँच नीच की परंपरा भी है और उड़ीसा वाली आर्थिक असमानता की भी। छत्तीसगढ़ जंगल और शहर की लड़ाई में मशगूल है। मध्य प्रदेश हिन्दू और नॉन-हिन्दू से पेट पाल रहा है। महाराष्ट्र उत्तर भारतीयों और किसानों के दम पर ख़बरों में बना रहता है। तेलांगाना का मुद्दा निपटा तो एक बार लगा था कि आंध्रवासी निठल्ले हो जाएंगे लेकिन भाषा ने उनको भी बेरोज़गारी से बचा लिया। तमिलों को भाषा के रहते कोई दूसरा कुँआ खोदने की ज़रूरत ही क्या है। कर्नाटक में भी कोई न कोई राजनैतिक नाटक चलता ही रहता है। हाँ केरल ने एक अदद शाश्वत कलेस के अभाव में थोड़ा निराश किया है लेकिन वहाँ के लिये भी कोई न कोई कलेसी पैदा हो ही जाएगा। भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं…!

महापुरुषों को पहले ही भाजपाई, कांग्रेसी, बसपाई, सपाई कर के निपटाया जा चुका है। इस बीच कुछ नया करने की छटपटाहट होने लगी थी। तभी कुछ लोगों का ध्यान इस बात पर गया कि कई दिनों से ये बुद्धिजीवी नहीं लड़े। इन कलाकारों में कोई कलेस नहीं हुआ। फिर क्या था, एक बार ठान ली तो क्या नहीं हो सकता। साहित्यकार विचारधारा के नाम पर अपने-अपने पुरस्कार लेकर पिल पड़े। कलाकार हिन्दू-मुस्लिम बनकर अपने-अपने अलग राग अलापने लगे। 

रसख़ान ने जब "लाम के मानिंद हैं गेसू मेरे घनश्याम के…" कहकर सोच को व्यापक किया था तब उनको नहीं पता था कि आख़िरकार लड़ना पड़ेगा। तब उनका क्या हश्र होगा। उनसे हिन्दू नफ़रत करेंगे क्योंकि उनके नाम में ख़ान है, और मुस्लिम उनको क़ाफ़िर कहकर लानत भेजेंगे क्योंकि उन्होंने बुतपरस्ती का गुनाहे-अज़ीम पेश फ़रमाया। ऐसी ही भूलें अब्दुर्रहीम ख़ाने-ख़ाना और अमीर ख़ुसरो से भी हो गई। क़बीर तो ख़ैर जन्म के कलेसी थे ही। दूरदर्शिता का सर्वथा अभाव था इन सबमें। समझ ही नहीं आ पा रहा कि इनके नाम पर कौन पक्ष में लड़े कौन विपक्ष में। इधर हाल के दशकों में भी कुछ ऐसे हो गए जिनको सौहार्द का शौक़ चर्राया। क्या ज़रूरत थी शक़ील को ये कहने की कि "मन तरपत हरि दर्सन को आज…! तुम तो लिख कर चलते बने। उस पर नौशाद ने इसको सुरों में पिरो दिया। फिर मुहम्मद रफ़ी… तुम तो कम से कम रौ में न बहते। पूरे कुएँ में ही भांग पड़ गई थी क्या। चंद रुपैयों के लिये कितने नीचे गिर गए। क़ाफ़िर हो गए। 

ऐसे ही पापी रहे रघुपति सहाय। फ़िराक़ गोरखपुरी बनकर कैसे इतराते फिरे। अरे भई, हिन्दी में रहकर क्या प्रतिष्ठा नहीं मिलती थी। जा पड़े मुसलमानों की भाषा में। शर्म आनी चाहिये। हमें देखो। लिखा चाहे एक अक्षर न हो, लेकिन किसी को इतना मौक़ा न दिया कि हमें हमारे धर्म से अलग कर सके। हमने किसी के आगे सिर नहीं झुकाया। आग लगे ऐसी प्रसिद्धि में। अरे तुमसे बढ़िया तो वो छोकरे हैं जो ज़रा सा इशारा पाते ही दूसरे धर्म वालों के लिये मौत बन जाते हैं। इसे कहते हैं समर्पण। ये नहीं कि सारी ज़िंदगी दूसरे धर्म के लोगों की चमचागिरी में गुज़ार दो।

उधर ये बोलते हैं कि ग़ुलाम अली को सुन लो। क्यों सुन लें भई। हमारे पास जगजीत सिंह नहीं हैं क्या। जो आदमी पाकिस्तानी होगा उसके लिये यहाँ कोई जगह नहीं है। हम हम हैं। अपनी गायकी पाकिस्तानियों को सुनाओ। हम जगजीत सिंह से संतुष्ट हैं। हमारी मजबूरी न होती तो भगत सिंह को भी पाकिस्तान में पैदा होने के जुर्म में देश निकाला दे देते। लेकिन बस हमारी चल नहीं पा रही।

हमने बहुत दिन सहिष्णु होने का ढोंग कर लिया। अब हमसे न होगा ये सब। भाग जाओ यहाँ से। कोई गजल-वजल नहीं सुनी जाएगी। हमारे पास यही काम रह गया क्या। बड़े आए गजल सुनाने वाले। हम तुम्हारी गजल सुनेंगे या साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने के मुद्दे पर ध्यान देंगे।

इनको अपनी पड़ी है। क्या आफ़त आ गई। किसने चिकौटी काट ली। नहीं चाहिये पुरस्कार तो मत लो। हम किसी और को दे देंगे। अपनी विचारधारा वाले को दे देंगे। दस-पाँच साल बाद कोई और सरकार आएगी तो हमारे वाले भी लौटा देंगे। फिर तुम ले लेना। अब एक पुरस्कार एक ही जगह धरा-धरा धूल खाए… ये कोई अच्छी बात है क्या। 

वामपंथी और राष्ट्रवादी, दोनों की ही एक-दूसरे के बारे में एक जैसी राय है। 'तुमने लिखा भी क्या है। सब अल्लम-गल्लम। कोई सार नहीं है तुम्हारे साहित्य में। साहित्य तो हमारे वालों ने रचा है।'

एक बताएगा, "गांधी वध और मैं" ...अहा! क्या पुस्तक है। बखिया उधेड़ कर रख दी। और साहित्य पढ़ना है तो गीताप्रेस गोरखपुर जाओ। जा में नहीं राम को नाम, वा कविता किस काम की। देश को समझना है तो झण्डेवालान जाओ। सुरुचि प्रकाशन की पुस्तकें पढ़ो। वीर सावरकर की क़ुर्बानी के आगे क्या किसी की क़ुर्बानी टिकेगी। माननीय हेडगेवार जी, गुरुजी, मुखर्जी जी, दीनदयाल उपाध्याय जी… अरे इनकी जीवनीयाँ पढ़ो। तो कुछ संस्कार आवें। इनके सिवाय देश में न तो कोई महापुरुष है न ही कोई साहित्य। कम से कम जब तक हमारी चलेगी तब तक तो नहीं ही होने देंगे। जब तुम्हारी चले तो तुम हमारे वालों को मत मानना। 
दूसरा कहेगा, पेरियार! क्या लिखा है, सच की परतें खोल दीं। रशियन लिटरेचर नहीं पढ़ा तो क्या ख़ाक़ पढ़ा! लेनिन, मार्क्स... हीरे हैं साहित्य के। 'बम का दर्शन' पढ़ो। जनचेतना प्रकाशन की किताबें ख़रीदो! ग़रीब के दर्द की बात न हुई तो काहे का साहित्य। सत्ता को गाली देने की हिम्मत न हो तो चाट का ठेला लगा लो, ज़रूरी थोड़े ही है साहित्य रचना।

…

…

…ये सब देख कर मदारी अट्टहास करते हैं। उन्हें इस बात की संतुष्टि है कि सब जमूरे बढ़िया से काम में लगे हैं। सबने सबको व्यस्त कर रखा है। ये सब इन बातों से ऊपर उठने नहीं चाहियें। क्योंकि अगर इन कलेसों से बाहर आए तो ये सब विकास मांगेंगे। फिर ठहाके लगाने तो दूर साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलेगी। इसलिये जंग जारी रहनी चाहिये। डुगडुगी बजती रहनी चाहिये। तमाशा होता रहना चाहिये।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, October 14, 2015

दंगे

बाज़ी बिछी हुई है और दांव हैं दंगे
होते हों, आदमी पे अगर घाव हैं दंगे
कुछ लोग हैं बेचैन सियासत की भूख से
जिस पर सिकेगी रोटी वो अलाव हैं दंगे 

✍️ चिराग़ जैन

Monday, October 12, 2015

अनदेखी

कैसा था वो अनुभव तुमने
सबसे पहले जब मेरे
संदेशों की अनदेखी की थी

जब सम्बन्ध प्रगाढ़ रहा था
सहज मिला करते थे हम-तुम
पहरों जाने कितनी बातें
रोज़ किया करते थे हम-तुम
तब भी मुझको डर लगता था
तब भी मैं सोचा करता था
आपस में दूरी आई तो
तुम उत्तर ना दे पाई तो
तब कैसे रातें काटेंगे
किससे अपना मन बाँटेंगे
तब भी तुमने बेफ़िक्री से
मेरे मन के ऐसे सब
अंदेशों की अनदेखी की थी

पहले सोचा व्यस्त हुई हो
दुनियादारी की बातों में
फिर जाना अभ्यस्त हुई हो
कोमलता पर आघातों में
जब संदेशा पहुँचा होगा
तुमने ये तो सोचा होगा
उत्तर बिना उदास रहेंगे
वो मुझसे नाराज़ रहेंगे
मैं उनको समझा ही लूँगी
कारण एक बना ही लूँगी
ख़ुद को लापरवाह बनाकर
तुमने उन अपनत्व भरे
आदेशों की अनदेखी की थी

जब मेरा सन्देश तुम्हारी
दिनचर्या में खो जाता हो
कुछ पल मेरी याद जगाकर
आख़िर धूमिल हो जाता हो
तब उत्तर की प्यास जगाए
हर आहट से आस लगाए
मन व्याकुल होता जाता था
सब धीरज खोता जाता था
खीझ, तड़प, चिंता, आकुलता
क्रोध, प्रलय, संशय, आतुरता
मत पूछो क्या क्या होता था
जब तुमने अधिकार भरे
परिवेशों की अनदेखी की थी

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, September 20, 2015

व्यक्तित्व

एक अज्ञात कलाकार ने
हवा में कुछ लकीरें बनायीं

कुछ खड़ी रेखाएँ
जैसे भृकुटि के मध्य त्यौरियाँ पड़ती हैं
कुछ आड़ी रेखाएँ
जैसे ललाट पर बौद्धिकता उभरती है।
कुछ अर्द्धवृत्ताकार
जैसे नयनों के नीचे की चिन्ताएँ
कुछ हल्की पनियाई
जैसे आँखों की कोरों पर तैरती इच्छाएँ

कुछ होंठों पर बिखरी मुस्कानों की
सुखद यादों जैसी
और कुछ कसमसाते हुए
पूरे न हो सके वादों जैसी।

कुछ ख़ुशियों की
कुछ ग़म की
कुछ आशाओं के उजियारे की
कुछ निराशाओं के तम की
कुछ अप्राप्य के प्रति रोष की
और कुछ असीम संतोष की

...इन आड़ी-तिरछी रेखाओं में 
जाने कब एक व्यक्तित्व उभर आया
मैं रेखाएँ देखता रह गया
और हवा में मेरा चेहरा उकर आया!

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, September 10, 2015

संवाद कविता

आगे के सफ़हों पर जो कुछ है वह भी है तो गोमुख निसृत गंगाजल ही, लेकिन इसका संचय जिस पात्र में किया गया है वह किंचित आधुनिक है। यह खण्ड फेसबुक पर हुई चर्चाओं का यथावत् संकलन है। इसमें मित्रों से हुई काव्यात्मक चैटिंग को जस का तस समायोजित किया गया है। इस खण्ड में केवल उन्हीं अंशों का सृजन-श्रेय मेरा है, जो मेरे नाम/चित्र के साथ प्रकाशित हैं। अन्य अंशों के सर्जकों को अपने नाम उजागर करने में संकोच था, सो फिलहाल उनको ‘अज्ञात’ जानकर ही आनंद लें।

✍️ चिराग़ जैन

       

Tuesday, August 25, 2015

दशरथ मांझी

वाह वाह!
नाम ही दशरथ था
काम तो
शतरथ वाला किया।
जुनून; लगन; मेहनत; सनक; दीवानगी
...इन सबसे आगे का शब्द खोज
बे शब्दकोश!

हुए होंगे कहीं पत्थर
जिनको तराशता था आदमी
मैंने तो आज
पत्थरों को
इक आदमी तराशते देखा।
सचमुच यार
सितार की झंकार
और बंसी की तान पर
थिरकती मुहब्बत से
ज़्यादा महँगी लगी
छैनी-हथौड़े की टंकार पर
उकरती मुहब्बत!

-✍️ चिराग़ जैन

Saturday, August 22, 2015

संथारा

चलो बताएं आज तुम्हें वैज्ञानिक धर्म हमारा है
क्या हैं व्रत उपवास और क्या नियम त्याग संथारा है
हमें फर्क पड़ता है छोटी चींटी तक की पीर से
हमें अहिंसा मिली विरासत में भगवन् महावीर से
वृक्षों में जीवन होता है; अब ढूंढा विज्ञान ने
हमें बताया युगों पूर्व ये ऋषभदेव भगवान् ने
हमें लैंस की नहीं ज़रूरत जल के जीव बांचने को
हमें मिले हैं गुणस्थान अन्तस् का ताप जांचने को
शाकाहारी जीवन शैली, परहित का उपदेश मिला
हमें हमारे पुरखों से मानवता का सन्देश मिला
श्रावक श्रमण व्यवस्था वाला इक समाज विज्ञान मिला
जियो और जीने दो जैसा अद्भुत अविरल ज्ञान मिला
परिग्रह को जब पाप कहा तो साम्यवाद को नींव मिली
क्षमाभाव सर्वोपरि रक्खा; प्रेम-प्यार को जीभ मिली
हमने राणा के प्रताप को दानी भामाशाह दिए
जो अणुव्रत की नाव चलाएं तुलसी से मल्लाह दिए
हमने भारत के गौरव को चन्द्रगुप्त का मान दिया
बिम्बिसार, संप्राति, भोज और वीर अशोक महान दिया
हमने दिव्य प्रकाश पुंज; जब जब अंधियारी छाई; दिए
हमने अंतरिक्ष को भेदा विक्रम साराभाई दिए
जो हिंसा के घोर विरोधी, जन-गण के उन्नायक थे
वो बाबा गांधी भी तो इस जैन धर्म के गायक थे
अर्थमार्ग और मोक्षमार्ग का इक समतल आभास दिया
हमने अपनी भारत माँ को गौरवमयी इतिहास दिया
किसी जीव को नहीं सताएँ ये पावन संकल्प लिया
तर्कहीन धर्मांध न होवें ऐसा शास्त्र प्रकल्प लिया
जो मानवता की द्योतक है, मानव मन तक फैली है
वही अहिंसा जैनधर्म की मौलिक जीवन शैली है
लखनऊ में महावीर की प्रतिमा टूटी तब क्यों मौन रहे
वोटों की मंडी में सत्तर लाख की पीड़ा कौन कहे
भीतर माल ठूंस कर बाहर दाँत दिखाने बंद करो
मानवता की चिंता है तो बूचड़खाने बंद करो
हमने सदा पैरवी की है; पुरखों के सन्देश की
हमें ज़रूरत नहीं किसी न्यायालय के आदेश की
हम मानवता की रक्षा हित नियमों के मोहताज नहीं
हम तन-मन-धन से मानव हैं, कोरे ड्रामेबाज़ नहीं
हमने कभी नहीं पोसा है कर्मकांड के दूषण को
हमने शीश चढ़ाया केवल तर्कयुक्त आभूषण को
लो महत्व समझो सागर में मिलती जीवन धारा का
लो वैज्ञानिक मतलब समझो जैनों की संथारा का
जब शरीर अक्षम हो जाए बचने का कुछ ठौर न हो
जब मृत्यु प्रत्यक्ष खड़ी हो, राह कहीं पर और न हो
तब बेचैनी त्याग आत्मचिंतन दायित्व हमारा है
जीवन के अंतिम क्षण में निज का चिंत्वन संथारा है
जीवन के अंतिम अवसर का मधुर गान है संथारा
स्वास्थ्य शोथ कर देह समर्पण का विधान है संथारा
यह ऐसी तकनीक है जिससे जीवन का सुख नष्ट न हो
देह और अशरीर छूटने लगें तो किंचित कष्ट न हो
आत्मघात और संथारा के चिंतन में है इतना भेद
आत्मघात में मृत्यु प्रमुख है संथारा में मृत्यु निषेध
आत्मघात जैसी कायरता वीरों का तो तौर नहीं
हम वंशज हैं महावीर के कायर या कमज़ोर नहीं

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, August 16, 2015

भारत-पाक विभाजन

किसी की बात में आकर बँटा आँगन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे

जहाँ के खेत में बंदूक बोते थे भगत बाबा
जहाँ की जेल में जगते थे, सोते थे भगत बाबा
जहाँ हमको मिला दुश्मन की दहशत का नमूना था
जहाँ फाँसी के फंदे को भगतबाबा ने चूमा था
उसी लाहौर को अब जुर्म का घर दिया तुमने
जहाँ पुरखों की यादें थीं वहाँ डर भर दिया तुमने
हमारे तीरथों को ख़ून से तर कर दिया तुमने
न जाने किसके बहकावे में ये अनबन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे

नहीं भूले अभी तुम चावड़ी बाज़ार की गलियाँ
कराची की हमें भी याद हैं दिन रात रंगरलियाँ
हुई तक़सीम तो जैसे ज़फ़र का ख़्वाब टूटा था
बिलख उट्ठे थे लाला लाजपत, पंजाब टूटा था
पुराने दिन करोगे याद तो ये पीर समझोगे
छिनी है प्यार की कितनी बड़ी जागीर समझोगे
तुम्हें क्योंकर नहीं देते हैं हम कश्मीर समझोगे
जहाँ ख़ुशियाँ मनानी थी वहीं मातम मना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे

ज़रा सी जि़द बड़ी कर ली, वतन छोटा बना डाला
खरी आज़ादी की ख़ुशियों को भी खोटा बना डाला
ख़ज़ाना छोड़ कर अब ठीकरों की मांग करते हो
ज़ेह्न में नफ़रतें रख दोस्ती का स्वांग करते हो
सभी गर सब्ज़ हैं तो फिर बताओ ज़र्द कितने हैं
करोड़ों प्यार वाले हैं तो दहशतगर्द कितने हैं
ये दहशतगर्द अपनी क़ौम के हमदर्द कितने हैं
अमां तुम पीतलों को सोच में कुन्दन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे

चलो छोड़ो ये बातें क्या हुआ होगा आज़ादी पर
किसे किस बात ने गहरे छुआ होगा आज़ादी पर
कहीं जिन्ना अड़े होंगे, कहीं नेहरू अड़े होंगे
मगर इक़बाल, गांधी और आगा रो पड़े होंगे
खुले आँगन में इक परिवार जब हारा सही था क्या
यहाँ जब भाई ने ही भाई को मारा सही था क्या
ज़रा सोचो हुआ था जो वो बँटवारा सही था क्या
अरे, ताउम्र ना मिलने का कैसे मन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, August 12, 2015

स्वराज पर्व

बधाई हो!
दिल्ली सरकार का 'स्वराज पर्व' रद्द हो गया। मतलब यह कि केन्द्र सरकार स्वतंत्रता दिवस मनाएगी, और सारी सरकारें भी स्वतंत्रता दिवस मनाएंगी, लेकिन दिल्ली सरकार स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाएगी। अख़बार में आया है। 

पहली बार पता चला है कि स्वतंत्रता दिवस भी सबका अलग-अलग है। सुना है कि दिल्ली पुलिस ने "दिल्ली सरकार के स्वतंत्रता दिवस" पर सुरक्षा मुहैया करने से इनक़ार कर दिया है, कारण यह कि वह केन्द्र सरकार के स्वतंत्रता दिवस को सुरक्षित रखने में व्यस्त रहेगी।

दिल्ली सरकार के मंत्री ने और भी आगे की बात कही है। उनका बयान आया है कि मौसम की भविष्यवाणी को देखते हुए स्वराज पर्व रद्द किया गया है। ये बात तार्किक लगती है। दरअस्ल 15 अगस्त इस बार पहली बार 15 अगस्त के दिन पड़ रहा है। यह भी पहली बार है कि अगस्त के महीने में बरसात हो रही है। लेकिन केन्द्र सरकार के मौसम विभाग को ऐसी बातों की कोई परवाह नहीं है। वह जानता है कि बादल और वर्षा दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर लालक़िले की प्राचीर तक आ भी गए तो माननीय प्रधानमंत्री जी उन दोनों को अपनी लच्छेदार भाषा और रोचक शैली में उलझा लेंगे और बरसने का मौक़ा ही नहीं देंगे। लेकिन दिल्ली सरकार के आयोजनों में ऐसी क्षमता का सर्वथा अभाव है।

दशकों से चले आ रहे "स्वतंत्रता दिवस कवि-सम्मेलन" को भी इसी रद्दीकरण की टोकरी में पटक दिया गया है। इत्तिफ़ाक़न अगले वर्ष गणतंत्र दिवस कवि-सम्मेलन भी गणतंत्र दिवस के ही अवसर पर आयोजित होना है। उस समय भी पुलिस केन्द्र सरकार के गणतंत्र दिवस की सुरक्षा में व्यस्त रहेगी और नेहरू जी के समय से चला आ रहा गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन "दिल्ली सरकार के गणतंत्र दिवस" का हिस्सा होने की वजह से रद्द कर दिया जायेगा। उस समय दिल्ली सरकार के मंत्री भयंकर ठंड का पूर्वानुमान देखते हुए ऐसा निर्णय ले लेंगे।

मोदी जी की किताब का लोकार्पण बारिश से प्रभावित नहीं हुआ; बिहार की चुनावी सभाओं पर मौसम ने कोई कुठाराघात नहीं किया; संसद के बाहर प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस को सुरक्षा मुहैया कराने में दिल्ली पुलिस को कोई कष्ट नहीं हुआ। लेकिन दिल्ली की जनता को आज़ादी का पर्व मनाने के लिये संकट खड़ा हो गया।

आतंक की इस देश में यह पहली जीत है। अब तक धमाकों के बावजूद हमने आतंकियों की दहशत को कोई प्रमाण-पत्र नहीं दिया था। इस बार विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी "केजरीवाल बनाम जंग" की जंग में आतंकियों की आड़ में छिपकर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के पौरुष की शहादत पर तीन दिन का मौन रखेगी और "दिल्ली सरकार के स्वतंत्रता दिवस" को विफल करने की ख़ुशी में नज़ीब जंग आतंकवाद को शौर्य पुरस्कार से नवाज़ेंगे। 

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, August 9, 2015

हिन्दुस्तान हमारा है

दुर्घटना घटे सड़क पर तो हम रुकने को तैयार नहीं
आँखों के आगे जुल्म बढ़े तो हम करते प्रतिकार नहीं
अब हमको फर्क नहीं पड़ता चालीस मरे या चार मरे
पानी बन गया लहू वह जो बढ़कर भीषण हुंकार भरे
जब भूखी उम्मीदें टूटीं खलिहान जले हम मौन रहे
जब धनिया की अस्मत लूटी पत्थर पिघले हम मौन रहे
लालच ने जब नैतिकता का दर्पण तोड़ा हम मौन रहे
लाचारी को ताक़त ने जब बेघर छोड़ा हम मौन रहे
निर्बल की आह-कराह सुनी, दिल दहल गया, हम मौन रहे
टीवी पर चर्चाएँ सुन ली, मन बहल गया, हम मौन रहे
अपराध घटित होता है तो देखा करते हैं मौन खड़े
फिर ये कहकर बढ़ जाते हैं, छोड़ो पचड़े में कौन पड़े
शोषित पर अत्याचार हुआ, शोषक ने अट्टाहास किया
नुक्कड़ पर खड़े बतोलों ने, उपहास किया, परिहास किया
अख़बारों को हेडलाइन मिली, टीवी ने ख़ूब विलास किया
हम भी संवेदनहीन हुए, हमने भी टाइमपास किया
उम्मीद कभी चलकर अपने द्वारे तक आई तो होगी
रातों में किसी बिचारी ने साँकल खटकाई तो होगी
हमने ख़ुद बंद किया बढ़कर सब खिड़की रौशनदानों को
गुलदस्ते लेकर पहुँच गए जब बेल मिली सलमानों को
छोड़ो ये चर्चा कब कितना नुकसान हुआ घोटालों से
पहले ये सोचो औलादें क्यों सस्ती हुई निवालों से
छोड़ो इन बातों की चर्चा सरकार हमें क्या दे पाई
पहले ख़ुद से ये तो पूछो क्यों भूखा मरा सगा भाई
कुछ रंग-बिरंगे चोलों ने भड़काया तो हम भड़क गए
पत्थर की गिरी इमारत तो हम सबके बाजू फड़क गए
लेकिन तब ख़ून नहीं उबला, ना गुस्से को सुर-साज मिला
जब पन्द्रह दिन की बच्ची को दिल्ली में नहीं इलाज मिला
हमने कब किसकी रक्षा की, अपराधों से, आघातों से
निष्क्रियता पर पर्दे डाले कुछ रटी रटाई बातों से
शासन पर प्रश्न उठाएंगे, सत्ता को जी भर कोसेंगे
सिस्टम से आस लगाएंगे, अपने आलस को पोसेंगे
क्या ये सचमुच आवश्यक है हम सच से पीठ किए बैठें
क्या से सचमुच आवश्यक है अवसर पर होंठ सिए बैठें
ये क्या हो गया हमें आख़िर, धमनी में ख़ून नहीं है क्या
निष्क्रियता को बंदी कर ले, ऐसा क़ानून नहीं है क्या
खादी, खाकी, व्हाइट कालर, ये सब हममें से ही तो हैं
इक्के, बेग़म, राजा, जोकर, ये सब हममें से ही तो हैं
केवल इतना भर अंतर है, केवल इसके ही हैं झगड़े
कुछ खिड़की के इस पार खड़े, कुछ खिड़की के उस पार खड़े
यूँ तो हममें से हर कोई बढ़-चढ़कर बात बनाता है
जिसका जिस पर वश चलता है, वो उससे स्वार्थ सधाता है
हम किस दिन ये सच समझेंगे सारा नुक्सान हमारा है
जिसको दिन-रात कोसते हैं, वो हिन्दुस्तान हमारा है

✍️ चिराग़ जैन