Tuesday, March 8, 2016

दिल्ली का मौसम

आजकल दिल्ली का मौसम कुछ अजीब हो गया है। इस बार धूप गुलाबी होने से पहले ही चिलचिलाने लगी है। वसन्त की फुलवारी अभी ठीक से मुस्कुरा ही पाई थी कि आकाश में मंडराती चीलों की आवाज़ ने माहौल को एक मनहूस वीराने से ढाँप लिया। रंगों के नाम पर कुछ है तो बस पलाश, वो भी रह रहकर ऐसे टूट कर भूशायी होते हैं कि सौंदर्य की डोर पकड़ कर उभरता काम, क्षणभंगुरता के तथागत भाव से वनोन्मुखी हुआ जाता है। दिल्ली की सडकों पर निकलो तो पता चलता है कि पलाश के ही दो रंगों का सारा खेल चल रहा है। ज़्यादातर पेड़ों पर गहरा लाल रंग बड़बोला सा आसमान से बातें करता दिखाई देता है। कहीं-कहीं भगवा रंग भी है, लेकिन इस भगवा की ख़ूबसूरती लाल वाले दरख्तों की भीड़ में दब रही है। हाँ, हरे पत्ते दोनों ही से पूरी तरह नदारद हैं। कहीं किसी पेड़ पर दो-चार पत्ते बचे भी हैं, तो वे वृक्ष को फूलते देख उनके रंग पीले पड़ गए हैं। नीम, पीपल और जामुन के पुराने दरख़्त नए मौसम में उपेक्षित से खड़े हैं। बेपरवाह हवाओं ने उनके पास से गुज़रते हुए जो शरारत की है, उससे शर्मिंदा होकर वे ज़मीन में गड़े जा रहे हैं। ज़मीन अपने मूल से कटकर गिरे पत्तों की जर्जर देह से पट गई है। हवा का झोंका इन सूखे पत्तों को ज़रा सा छेड़ देता है तो ये एक दूसरे से टकराने लगते हैं। इससे एक खड़खड़ाहट की आवाज़ पैदा होती है। धरती ठहाका मार कर अपने जिस्म पर रेंगते इन कृतघ्नों पर हँसती है और हवाएँ मौसम की नमी सोखती हुईं दूर निकल जाती हैं। 

✍️ चिराग़ जैन

शिखरों का निर्माण

सिद्धांतों की बलिवेदी पर, अपनापन बलिदान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

लंका हो या अवधपुरी हो, सब ही ने ली अग्निपरीक्षा
धोबी के आक्षेपों की भी, मन में कर ली स्वयं समीक्षा
नष्ट सभी ने सीताओं का, सारा सुख-सौभाग किया है
रावण ने अपहरण किया था, राघव ने परित्याग किया है
जो मर्यादित थे उनका भी, पल में अलग विधान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

मथुरा जाने के निर्णय में, राधा की स्वीकृति भी थी क्या
राजपथों पर बढ़ते पग ने, पगडण्डी की पीर सुनी क्या
कौरव, पाण्डव, शकुनी, गीता, नगरी स्वर्ग लजाने वाली
याद नहीं आई पल भर भी, वो पगली बरसाने वाली
उदय किसी का तब ही संभव, जब कोई अवसान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

लक्ष्मण ने निजधर्म निभाया, उर्मिल भीतर-भीतर रोई
घिरा इधर अभिमन्यु अगर तो, उधर उत्तरा सिसकी कोई
गौतम की कुण्ठा को झेले एक अहिल्या पत्थर बनकर
रजवाड़ों की आन बचाई, पद्मिनियों ने जौहर रचकर
आधारों पर पैर टिकाकर, शिखरों का निर्माण हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, March 5, 2016

हमें ज़िद है

हम अपनापन जताए जा रहे हैं
वो बस रस्में निभाए जा रहे हैं
हमें ज़िद है कि उनको ख़ुश रखेंगे
वो हमको आज़माए जा रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन

Friday, March 4, 2016

आग की ख़बर

अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे
तो अपने मुल्क़ को इस आग की ख़बर से बचा 

मीडिया की ख़बरों की भूख किस हद तक इस देश की रीढ़ में दीमक की भूमिका अदा कर रही है; इसका अगला उदाहरण है कन्हैया कुमार। कोई भी शख़्स अराजकता के उदाहरण प्रस्तुत करके सुर्ख़ियाँ बटोरे, राष्ट्रीय अस्मिता की लाश पर पाँव रखकर लाइम लाइट में आए और मीडिया द्वारा बने जन समर्थन के आधार पर "बेचारा" अथवा "पीडित" बनकर जेल से बाहर आकर देशभक्ति की जुमलेबाज़ी करे और हीरो बन जाए। और सफ़र सिर्फ़ यहीं ख़त्म नहीं होगा। अचानक से मिली पब्लिसिटी से फूल कर जब यह सद्यजात देशभक्त मीडिया को गाली बके तो यही मीडिया पाला बदल कर उसके पीछे पड़ जाए।

ऐसा क्या हो गया इस देश में कि अख़बार के बैनर से लेकर प्राइम टाइम तक सिवाय कन्हैया कुमार कुछ बचा ही नहीं। और कन्हैया भी वो जो अपने भाषण के दौरान जब मीडिया का धन्यवाद ज्ञापन करता है तो उसमें प्राइमटाइम पर छा जाने की गर्वोक्ति व्यंग्य की शक्ल लेकर उभरती है, जिसे सुनकर वहाँ बैठे अन्य देशभक्त ठहाका लगाते हैं। पूरे देश की मीडिया एक विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष की पीसी कवर करने के लिये ओबी लेकर रिरियाने लगेगी तो कौन स्थितप्रज्ञ रह सकेगा।

"वो बहुत अच्छा बोलताहै"; "वो सबको धो देता है"; वो नया लीडर है" आदि आदि… इन जुमलों को वे समाचार प्रस्तोता और पत्रकार मंत्र की तरह जप रहे हैं, जिन्हें हमने इस देश में सूचनाएँ पहुँचाने का दायित्व सौंपा है।

वो कैसा बोलता है, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिये कि वो क्या बोलता है। एक तरफ़ वह कहता है कि उसे असमानता से आज़ादी चाहिये। दूसरी तरफ़ वह कहता है कि उसे संघवाद से एलर्जी है। एक तरफ़ उसे बोलने की आज़ादी चाहिये दूसरी तरफ़ वह दक्षिणपंथियों को ख़ामोश कर देना चाहता है। एक तरफ़ वह जातिवाद और लिंगभेद से मुक्ति चाहता है, दूसरी तरफ़ वह जातीय आधार पर सुनिश्चित दलितों को प्राथमिकता देना चाहता है।

क्यों भई, समानता की कौन सी सार्वभौमिक परिभाषा में किसी को भी विशेष मानने की वक़ालत मिलती है। कहाँ लिखा है कि दक्षिणपंथी विचारधारा का कोई भी शख़्स किसी भी स्थिति में कोई सही बात बोल ही नहीं सकता।

एक तरफ़ तुम स्वयं को इस देश के हितों का वक़ील घोषित करते हो दूसरी तरफ़ आप आँखो पर पट्टी बांध कर कहते हो कि उमर और अनिर्वाण पर देश द्रोह का मुक़द्दमा इसलिये नहीं चलाया जाना चाहिये क्योंकि जेएनयू का कोई भी विद्यार्थी देशद्रोह होही नहीं सकता। एक तरफ़ आपको इस देश के क़ानून में विश्वास है, दूसरी तरफ़ आप न्यायालय को लगभग चेतावनी देते हुए कहते हैं कि देशद्रोह क़ानून का ग़लत इस्तेमाल नहीं होना चाहिये। अगर तुम्हें इस देश के क़ानून में विश्वास है तो गिरफ़्तारी के बाद तुम्हारी परछाई पकड़ कर लोकप्रियता का बैकुण्ठ तलाशते कुर्ताधारकों को सड़कों पर उतरने की क्या ज़रूरत थी।

तुम इस देश कीराजनीति से निराश नहीं हो कन्हैया। तुम भाजपा, संघ, एवीबीपी और पूरी दक्षिणपंथी विचारधारा के ख़िलाफ़ हो। तुम तथ्य उद्घटित करो, उसमें कोई किसी भी विचारधारा का व्यक्ति अपराधी सिद्ध होकर शीशे में उतरता हो तो स्वीकार है, लेकिन किसी को सिर्फ़ इसलिये अपराधी कहकर उसका मख़ौल नहीं उड़ाने दिया जा सकता कि वह राष्ट्रवादी है।

ये तुम्हारी सोच होगी मिस्टर कन्हैया कुमार, कि जेएनयू का कोई विद्यार्थी देशद्रोही हो ही नहीं सकता। हम इस देश की मूल आत्मा के पक्षधर हैं। हम उन उदाहरणों का अनुकरण करते हैं कि सगा भाई भी अपराधी हो तो उसका विरोध करना हमारा धर्म है।

तुम कहते हो कि स्मृति ईरानी जेएनयू को फ़ैलोशिप देती रहतीं तो उनके ख़िलाफ़ मुर्दाबाद के नारे नहीं लगते। इस बात को खुली धमकी न माना जाए तो और क्या कहा जाएगा। मतलब जो तुम्हें पैसे देगा, वो ज़िंदाबाद और जो नहीं देगा वो मुर्दाबाद। शर्म करो मिस्टर कन्हैया कुमार्। चंद पैसों के लिये किसी की ख़िलाफ़त करने वाले लोग इस मुल्क़ के ख़िलाफ़ कितनी आसानी से खड़े हो सकते हैं; इसकी पोल तुम ख़ुद खोल रहे हो। ख़ैरातों को अधिकार मानने की आदत डाल तो ली है तुमने, इस आदत से बच कर रहना। इन आदतों की नींव पर खड़े किलों की दीवारों का खोखलापन अक्सर ख़ुद ही चीख़-चीख़ कर बता देता है कि हमारे सहारे मत खड़े होना, हम बहुत जल्दी ढह जाएंगे। 

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, February 21, 2016

आंदोलन या उपद्रव

जाटों के उपद्रव को 'आंदोलन' कहकर मिडिया भी कम नुक़सान नहीं कर रहा। मैं सरकार से गुर्जरों, जाटों और पटेलों को नौकरियों में आरक्षण देने की मांग करते हुए अपेक्षा करता हूँ कि इनसे तब तक "बिना वेतन नौकरी" करवाई जाए जब तक इनके उपद्रवों से हुए नुक़सान की भरपाई न हो जाए।

जेएनयू में कुछ लोगों ने भारत की बर्बादी के नारे लगाए। हरियाणा में कुछ लोगों ने जनता की संपत्ति को बर्बाद किया। पम्पोर में आतंकियों से निपटने को सेना सक्रिय। हरियाणा में जाट उपद्रवियों से निपटने के लिए सेना सक्रिय। क्या इन ख़बरों में कुछ साम्य है? क्या राष्ट्रद्रोह और आतंकवाद जैसे शब्दों की पुनर्व्याख्या नहीं होनी चाहिए? हिंसा और अराजकता किसी भी स्थिति में किसी भी तंत्र के सुचारू रहने में सहायक नहीं हो सकती।
मांग क्या है, इससे ज़्यादा बड़ा प्रश्न यह हो गया है कि मांगने का तरीका क्या है। पीने का पानी रोकने जैसी घटना ने बर्बरता का वह अमानवीय चेहरा प्रस्तुत किया है जिससे कम से कम अपनत्व तो महसूस नहीं किया जा सकता।
आरक्षण का कटोरा उठाकर अधिकारों की बात करने वाली जातियों के भीतर की ग्रन्थियां स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। यदि अपनी जायज़/नाजायज़ मांगें मनवाने के लिए अराजक हो जाना तर्कसंगत होता तो मानवीय समाज में सभ्यता और शांति कीआकांक्षा रखने वाले पुरखे अपराधी हो गए होते।

जातीय विभेद और बाहुबल की दुहाइयाँ देकर लाठी भांजने की परम्पराओं ने कई सद्दामों और गद्दाफियों को धूल चटाई है। संविधान के अधिकारों की माला जपने वाले यह न भूलें किसंविधान में कर्तव्यों का भी ज़िक्र है। स्वार्थों की जठराग्नि यदि राष्ट्रबोध और बहुजनहिताय के संस्कारों को पचाने में सक्षम हो जाए तो आपके अस्तित्व को लीलने में भी वह संकोच न करेगी।


✍️ चिराग़ जैन

Sunday, February 14, 2016

आवाज़ बग़ावत की

शिक्षा के आँगन में गूंजी जब आवाज़ बग़ावत की
तब सीमाएँ पार हुईं थीं ज़्ाुर्रत और हिमाक़त की
उन हाथों ने कीचड़ फेंकी हिंदुस्तानी शानों पर
जिनका रोम-रोम गिरवी है भारत के एहसानों पर
जिस धरती पर चले गुडलने वो धरती भारत की है
जिसे पकड़ कर लगे संभलने, वो उंगली भारत की है
जिस बगिया से आम चुराए, वो बगिया भारत की है
जिस पर इस दुनिया में आए, वो खटिया भारत की है
जिससे पिट कर पढ़ना सीखे, सख्त छड़ी भारत की है
जिसमें तुमने पुरखे फूंके वो लकड़ी भारत की है
बचपन में जो माटी चाटी वो माटी भारत की है
जिस पर घात लगा बैठे हो, वो घाटी भारत की है
आतंकों के आका तुममें कैसी प्यास बढ़ा बैठे
जिस छाती से दूध पिया उसमें ही दाँत गढ़ा बैठे
हमें शांति से प्यार बहुत है, हिम से ढंके शिखर हैं हम
लेकिन ठण्डी हिम के नीचे ज्वालामुखी प्रखर हैं हम
मूढ़ समझकर छोड़ रहे थे शिशुपालों के पापों को
क्षण में दंतहीन कर देंगे आस्तीन के साँपों को
ग़लती अब अपराध बन गई, सब हिसाब हो जाएगा
जिसकी जड़ में पले सपोले, वृक्ष साफ हो जाएगा

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Anti national activity caught in Jawaharlal Nehru University Campus.

Wednesday, February 3, 2016

वीज़ा-वीज़ा

एक गुजराती का वीज़ा अमरीका ने ठुकराया था।
...गुजराती ने प्रधानमंत्री बनकर अमरीका को मजबूर कर दिया।
अब एक कश्मीरी का वीज़ा पाकिस्तान ने ठुकराया है।
...सुरक्षा एजेंसियाँ ध्यान रखें, भाई ने यू ट्यूब पर वीडियो अपलोड करना तो सीख लिया है।

चलो इस बहाने ये तो पता चला कि पाकिस्तान जाने के लिए भी वीज़ा की ज़रूरत पड़ती है, वरना अब तक मैं समझता था कि राष्ट्रगान का अपमान ही पर्याप्त है।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, February 2, 2016

भावों का अवसान

सच जब किरच-किरच कर बिखरा
भावों का अवसान हो गया
उसको शब्दों तक लाने में
कवि भी लहूलुहान हो गया

सच के टुकड़े हाथ उठाए
जिसने उन्हें निकट से देखा
उसकी हुई हथेली घायल
भंग हुई जीवन की रेखा
अक्षर साथ छोड़कर भागे
वाणीकुल वीरान हो गया

सब सिद्धांत तड़ककर टूटे
झूठे पर्दों ने सुख लूटे
बड़े हुए तो हमने पाए
बचपन के सब किस्से झूठे
मछली जल की रानी है; ये
घड़ियालों को ज्ञान हो गया

मटके में जो कंकड़ डाले
उनने सारा पानी सोखा
प्यासा कौआ श्रम कर करके
अब भी खा जाता है धोखा
कछुओं के तप से भी ऊँचा
खरगोशों का स्थान हो गया
✍️ चिराग़ जैन

Sunday, January 31, 2016

शिक्षा की रौशनी

पहाड़ की
घुमावदार पगडंडी पर
स्कूल जा रही हैं
छोटी-छोटी बच्चियाँ

...मतलब
बचपन में
झूठ बोला था
विज्ञान के अध्यापक ने
कि हमेशा
सीधी रेखा में ही यात्रा करती है
रौशनी

© चिराग़ जैन

प्रतिशोध

ओ धोबी
सच बताना
क्या तुम्हारे पुरखे भी गए थे
राम के पीछे-पीछे
विह्वल होकर
वनवास की हठ लिए

या फिर
तुम ही चले आए थे
राम के पीछे-पीछे
लंका से
प्रतिशोध लेने

© चिराग़ जैन