Monday, June 13, 2016

प्यार का सम्प्रेषण

चीखने से 
शोर बढ़ता है
सम्बन्ध नहीं।

सुकून की खटिया
बुनी जाती है
सहजता की बाण से;
इसमें प्रयास की गाँठें हों
तो मुक्त नहीं हो सकती नींद 
चुभन से!

जताना
और बताना
व्यापार में होना चाहिए
व्यवहार में नहीं।

और प्यार में...
...वहाँ तो
आँखें मिलते ही
फिफ्थ गीयर लग जाता है
धड़कनों में!
ओंठ व्यस्त रहते हैं
कँपकँपाने और मुस्कुराने में।

शब्द और आवाज़
केवल शोर हैं
प्यार के सम्प्रेषण में।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, June 11, 2016

संतोष

बूंद भर जल नहीं दो भले तुम मुझे
दीखते ही रहो बस घड़ों की तरह

क्या हुआ गर कभी प्यास बाकी रही
ज़िन्दगी चुक गई आस बाकी रही
जिन ज़मीनों की अरदास बाकी रही
खोखली हो गई बीहड़ों की तरह

मंडियों में सजाया हुआ नेह हूँ
मैं शपथ में बसा एक संदेह हूँ
वक़्त के हाथ जर्जर हुई देह हूँ
बस लिपटते रहो चीथड़ों की तरह

वैभवों का बिखरता हुआ कक्ष हूँ
इक वृहन्नल के आगे खड़ा लक्ष हूँ
आँधियों का सताया हुआ वृक्ष हूँ
तुम बरसते रहो कंकड़ों की तरह

✍️ चिराग़ जैन

सेंसर बोर्ड

पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष हैं; इस हेतु उन्हें अपने दायित्व के निर्वाह हेतु सख्त होना पड़ेगा ही। भारत के दर्शकों को अश्लीलता से बचाना, अन्धविश्वास से बचाना उनका दायित्व है और भारत के लोगों अथवा समूहों की भावनाएं आहत न हों; यह देखना उनका काम है। किन्तु चूँकि मैं फिल्मों का आलोचक अथवा विद्वान न होकर एक सामान्य दर्शक हूँ इसलिए "उड़ता पंजाब" जैसे विवाद के बाद कुछ सामान्य प्रश्न करने की हिम्मत कर पा रहा हूँ। ये सब प्रश्न मैं इसलिए भी पूछ सकता हूँ कि इन्हें यह कहकर ख़ारिज भी नहीं किया जा सकेगा कि प्रश्नकर्ता अमुक पार्टी का सदस्य है।

उड़ता पंजाब में कई दृश्य यह कहकर कटवाए जा रहे हैं कि उनमें द्विअर्थी संवाद हैं अथवा उनमें अभद्र भाषा का प्रयोग है। मैं इस तर्क का पक्षधर हूँ लेकिन इस आपत्ति पर यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या पहलाज जी उसी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष हैं जिन्होंने निम्न फिल्मों को "ए" अथवा "यू/ए" प्रमाण पत्र के साथ पास किया था-

1) रागिनी एम एम एस (श्रृंखला)
2) मर्डर (श्रृंखला)
3) ग्रैंड मस्ती
4) रास्कल्स
5) द डर्टी पिक्चर
6) लेडीज़ वर्सिस रिकी बहल
7) विक्की डोनर
8) लाइफ की तो लग गई
9) गैंग्स ऑफ़ वासेपुर
10) जिस्म (श्रृंखला)
11) राज़
12) हीरोइन
13) अइया
14) फुकरे
15) लुटेरा
16) बी ए पास
17) बजाते रहो
18) नशा
19) शुद्ध देसी रोमांस
20) बूम
21) ऊप्स
22) गोलियों की रासलीला रामलीला
23) डेढ़ इश्किया
24) मस्तराम
25) हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया
26) मर्दानी
27) नो वन किल्ड जेसिका
28) सुलेमानी कीड़ा
29) गुड्डू रंगीला
30) प्यार का पंचनामा

इसके अतिरिक्त भी एक लंबी श्रृंखला है जिसमें द्विअर्थी संवादों औरअश्लीलता के शानदार उदाहरण देखने लो मिलते हैं। "लग गई"; "ले ली"; "फट जाएगी" और "दे रही है" जैसे संवादों को सामान्य मानने वाला बोर्ड किन संवादों को द्विअर्थी कह रहा है यह समझ से परे है। "तेरी कह के लूंगा" जैसे वाक्यांश फ़िल्मी पोस्टर की टैगलाइन हो सकती है तो बाकी सब में क्या समस्या है।

अभी टीवी पर 'डॉलर' का एक विज्ञापन आता है जिसमें अक्षय कुमार एकलकड़ी के फट्टे से खलनायक पर वार करते हैं। फट्टा खलनायक के गुप्तांग परलगता है और फिर घायल खलनायक अपने गुप्तांग पर हाथ रखकर संवाद बोलता है - "मेरे अखरोट भिंच गए"।

इन संवादों को द्विअर्थी माना जाए या नहीं।द्विअर्थी तो छोड़ो, अब तो ऐसे ऐसे संवाद आम हो चले हैं जिनमें दूसरा अर्थ खोजा ही नहीं जा सकता।

नो वन किल्ड जेसिका के प्रारंभ में ही रानी मुखर्जी ने दो बार स्पष्ट रूप से संवाद बोला है - "*** फट जाती है।"
सुलेमनी कीड़ा में काव्य पाठ के दौरान नायक कविता पढता है जिसका शीर्षक है - "मेरी *** में कीड़ा है।"

डेढ़ इश्किया में अरशद वारसी और नसीरुद्दीन शाह में "चूतियापा" शब्द को बारबार प्रयोग किया है। इसी फ़िल्म में अरशद का संवाद है - "समझ नहीं पा रिया हूँ कि लेकर आ रिया हूँ कि देकर आ रिया हूँ।"

फ़िल्म "फुकरे" में एक पात्र का नाम ही "चूचा" है। जिसके एकमात्र अर्थ को फ़िल्म में बार बार स्पष्ट किया गया है।
अरशद ही गुड्डू रंगीला फ़िल्म में नायिका से पूछते पाए गए हैं- "लेगी?" बाद में इसी संवाद को वे बदल कर बोलते हैं- "देगी?"

संवादों की अश्लीलता के नाम पर अगर सेंसर बोर्ड "बुरा न सुनो" का सिद्धांतपालन करने वाला बन्दर बन जाए तो इससे आगे बढ़कर हम उन फिल्मों पर आते हैंजिनके पोस्टर से क्लाइमेक्स तक सिवाय अश्लीलता कुछ ढूंढे नहीं मिलता।

यदि याददाश्त पर सरकारी बेरियर न लगा हो तो उस पोस्टर का संज्ञान ले लें जिसके पोस्टर पर भीगे बदन की नायिका नग्न केवल एक झीनी चद्दर ओढ़कर लेती हुईथी। उसके स्तनों का स्पष्ट प्रदर्शन फ़िल्म की सफलता की सीढ़ी बन गई थी।पीके में सिर्फ रेडियो की आड़ में छुपे आमिर खान पोस्टर पर आए तो वह बॉलीवुडकी विकसगाथा का अध्याय समझा गया।

बीए पास में शिल्पा शुक्ला और अन्यअभिनेत्रियों के साथ पूरे सम्भोग दृश्य अगर अश्लील नहीं थे तो फिर नैतिकताके शास्त्रों पर गुमराह करने का मुक़द्दमा चलाया जाना चाहिए। सनी लियोने, विद्या बालन, राखी सावंत, मल्लिका शेरावत जैसी अभिनेत्रियों के अभिनय ने जबअश्लीलता और अभद्रता की परिभाषाएँ बदलीं तब सेंसर बोर्ड की आँखें कौन सेसपने देखने में व्यस्त थीं। द डर्टी पिक्चर, बूम, ग्रैंड मस्ती, मर्डर, जिस्म, राज, रागिनी एम् एम् एस, शुद्ध देसी रोमांस और मस्तराम बनाने के बादजब हमारे सामने अश्लीलता के प्रश्न उठते हैं तो ऐसा लगता है कि विजयमाल्या लालकिले से राष्ट्र को ईमानदारी और संस्कारों का उपदेश दे रहे हों।

किस सीन पर प्रश्न उठाने वाले बोर्ड को आँखों की पट्टी हटाकर राजाहिंदुस्तानी, मुहब्बतें, कील दिल, 2 स्टेट्स, हंसी तो फँसी, हीरोपंती, पुरानी जीन्स, रिवॉल्वर रानी, बैंग बैंग, यारियां, फाइंडिंग फैनी, हेटस्टोरी 2, बेवकूफियां, धूम 3, हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया, रागिनी एम एम एस, एक विलेन, क्वीन, राजा नटवरलाल, ढिशक्याउँ, तेज़ाब, मानसून वेडिंग, ज़िद, दट्रेन, रास्कल्स और राज़ जैसी फ़िल्में दोबारा देखनी चाहियें।

उड़ता पंजाब पर दर्ज आपत्तियों में एक आपत्ति यह भी थी कि फ़िल्म के शीर्षक में "पंजाब"का नाम आने से पंजाब के लोगों की भावनाएं आहत होंगी। श्रीमान कृपया निम्न सूची पर भी नज़र डाल लें-

1) ज़िला ग़ाज़ियाबाद
2) मुम्बई मस्त कलंदर
3) पटियाला हाउस
4) चलो दिल्ली
5) दिल्ली बैली
6) मम्मी पंजाबी
7) गैंग्स ऑफ़ वासेपुर
8) दिल्ली सफारी
9) देहरादून डायरी
10) मुम्बई मिरर
11) बोम्बे टॉकीज़
12) गो गोआ गोन
13) बोम्बे टू गोआ
14) लव इन बोम्बे
15) चेन्नई एक्सप्रेस
16) वन्स अपॉन अ टाइम इन मुम्बई
17) वन्स अपॉन अ टाइम इन बिहार
18) चांदनी चौंक टू चाइना
19) मद्रास कैफे
20) वेक अप इण्डिया
21) चक डे इण्डिया
22) अहमदाबाद जंक्शन
23) परांठे वाली गली
24) मिड समर मिड नाईट मुम्बई
25) मुम्बई कनेक्शन
26) मुम्बई 125 केएम
27) पीपली लाइव
28) मुम्बई कैन डांस साला
29) मुम्बई दिल्ली मुम्बई
30) एनएच 10
31) एनएच 8 (रोड टू निधिवन)
32) बोम्बे वेलवेट
33) एंग्री इंडियन गॉडेस
34) लखनवी इश्क़ 

इस सूची को और भी लम्बा किया जा सकता है। "ज़रा हट के, ज़रा बच के ये है मुम्बई मेरी जान" जैसे गीतों ने किसी की भावनाएं आहत नहीं की।

इन सब सन्दर्भों के परिप्रेक्ष्य में मेरा प्रश्न केवल यह है कि किसी भीव्यक्ति अथवा विचारधारा अथवा दल अथवा संस्थान के चश्मे लगाकर बैठे लोग क्यावास्तव में किसी का हित कर सकते हैं।

निहलानी जी एक बार इस एहसास कोजी लें कि फ़िल्म उद्योग को निरंकुश होने से रोकने के लिए जब सेंसर बोर्ड कागठन किया गया था तब इस बोर्ड के प्रतिष्ठापकों की आँखों में सपना रहा होगाकि यह संस्था निष्पक्ष रहकर कार्य करेगी। 

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, June 9, 2016

बहुत आसां नहीं होता

कोई जब लौट कर आए तो उसकी आबरू रखना
बहुत आसां नहीं होता है फिर से लौट कर आना

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, June 7, 2016

ज़िन्दगी: एक लड़की

जिन्दगी
एक खूबसूरत लड़की है
इसकी प्रशंसा करोगे
तो ये चहक उठेगी।
इसे एकटक निहारोगे
तो इसके मुखड़ा सज उठेगा
हया के रंग से।
इसे अनदेखा करोगे
तो ये उदास हो जाएगी।
इसे कोसोगे
तो चुपके से
दूर चली जाएगी तुमसे।

बहुत प्यारी है रे जिन्दगी
इसे चहकने दो,
इससे मुस्कुरा कर मिलो
कभी कचमचा कर
चूम लोगे इसे
तो झूम उठेगी
इसकी चिरौरी करो
इसे चिकौटी काट लो

...लेकिन कोसना मत इसे कभी
कुम्हला जाएगी बेचारी।

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, June 5, 2016

पर्यावरण के नाम पर

विकासवादियो!
पर्यावरण के नाम पर
मुट्ठी न भींचो,
तुमसे किसने कहा है
कि दुनिया के भले के लिए
कोई पेड़ सींचो?
तुम तो अपनी बालकनी में
तुलसी का इक पौधा लगा लो
और अपने परिवार के लिए
थोड़ी सी सांसें उगा लो।
मत सोचो
कि किस तरह बचाई जाए
दादी नानी की कहानी,
पर ये तो विचार करो
कि तुम्हारे नौनिहाल
कहाँ से पिएंगे
साफ-शुद्ध पानी।
माना
कि तुम्हारी विकास उगलती फैक्ट्रियां
नहीं रोक सकती
काला जहरीला धुआँ,
लेकिन बचाई तो जा सकती है नदी
सहेजा तो जा सकता है कुआँ।
हमारी पढ़ी लिखी सोसाइटी से
ज्यादा समझ थी
पिछले जमाने के असभ्य-अनपढ़ों में
जो जानते थे
कि स्वस्थ भविष्य के बीज छुपे हैं
पीपल और बरगद की जड़ों में।
आओ
विकास और विनाश के बीच
एक स्पष्ट रेखा खींच आएं
आओ
स्मार्ट सिटी की ग्रीन बेल्ट पर लगे
गुलमोहर को सींच आएं।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, May 28, 2016

पैरा ग्लाइडिंग

दो घड़ी को
मैं किसी आकाश के रोमांच की
बांहें पकड़ कर;
उस धरा द्वारा मुझे सौगात में सौंपे गए
अविरल सुरक्षा भाव का
अपमान कर आया;
जो कि मुझको हर दफ़ा
अस्थिर उड़ानों से
पुनः नीचे उतर आने पे
बढ़कर थाम लेती है।
वे उड़ानें
(मैं जिन्हें उन्माद में
ऊँचाइयों पर ठहर जाने का
तरीका मान बैठा हूं)
महज ज़िद पर उतर आए
किसी बालक की ऐसी कूद भर है
जो थका कर मौन करती है मुझे
क्योंकि अभी
धरती के आकर्षण की सीमा
लांघ जाने का
अतुल साहस नहीं है
मेरी बचकाना उड़ानों में।

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, May 26, 2016

ख़बर का असर

जेब में दस का नोट लेकर भीखू छोले-कुल्चे के ठेले पर पहुँचा और बोला- "दस रुपये के छोले कुल्चे दे दो।"
ठेले वाला मुस्कुराकर बोला - "दस रुपये में छोले कुल्चे नहीं आते।"
भीखू उदास होकर पान की दुकान तक आया और टीवी पर चल रहा न्यूज़ बुलेटिन देखने लगा। पत्रकार बता रहा था कि भारत की विदेशमंत्री तीन दिन के दौरे पर जापान जा रहे हैं। ख़बर पढ़ते हुए समाचार वाचक के चेहरे पर जो ख़ुशी थी उससे भीखू को लगा कि अब शायद बात बन जाएगी। वह दौड़कर खोमचे पर पहुँचा और बोला - "लो भैया, विदेश मंत्री देश के विकास पर चर्चा करने जापान गई हैं, अब तो दस रुपये के छोले-कुल्चे आ जाएंगे?"
"अबे पगला गया है क्या?" ...खोमचे वाला झल्ला उठा। ..."उसके जापान जाने से मेरे ठेले का क्या लेना देना?"
भीखू अपना सा मुंह लिए वापस बुलेटिन देखने लगा। एक संवाददाता चीख-चीख कर उत्तेजना में बोल रहा था कि फलाने मंत्री के बयान पर विपक्ष ने दो दिन संसद का कामकाज नहीं होने दिया, लेकिन अभी-अभी ख़बर मिली है कि उस मंत्री ने अपने बयान पर खेद प्रकट कर दिया है और विपक्ष ने संसद चलने देने का आश्वासन दिया है।"
भीखू ख़ुश होकर फिर से ठेले तक पहुँचा और दुखी होते हुए फिर से वापस लौट आया।
बुलेटिन अभी भी चालू था। काफ़ी कुछ हुआ उस बुलेटिन में। एक नई फ़िल्म का ट्रेलर रिलीज़ हुआ; एक निजी चैनल के सर्वे से ये पता चला कि केंद्र सरकार की लोकप्रियता बढ़ रही है; यह भी पता चला कि रामायण युग की किष्किन्धा में आज भी सुग्रीव और बाली के सिंहासन सुरक्षित रखे हैं; एक अभिनेता को कोर्ट ने बरी भी कर दिया; एक समुदाय को सामूहिक रूप से अपना त्यौहार मनाने की इजाज़त भी मिल गई; एक विधायक ने रिजॉर्ट में प्राणायाम भी किया; एक संत को राममंदिर के शिलान्यास में शामिल होने का न्यौता भी मिल गया और एकाध अफ़सरों के तबादले भी हो गए।
इतना सब कुछ होने के बावजूद भीखू की जेब में पड़े दस के नोट की पहुँच में भूखा पेट भरने की जुगत न आ सकी। शाम हो गई। भूख ने भीखू की ऊर्जा पचा ली। अंतड़ियां सिकुड़ गईं। दिमाग़ थक गया। 
छोले कुल्चे वाला अपना खोमचा समेट कर जा चुका था। भीखू ने सड़क किनारे पड़ा अख़बार का एक टुकड़ा उठाया और खा गया। मैंने उसे अख़बार चबाते देखा और पूछा - "क्यों भई, अख़बार में भी कोई स्वाद है क्या?"
भीखू अख़बार पर लिसड़ा हुआ मसाला दिखाते हुए बोला - "अख़बार तो बेस्वाद है भाईसाहब, लेकिन मसाले में मज़ा आ गया।"
जो अख़बार भीखू खा रहा था उसी के तीन दिन बाद के संस्करण में छोटा सा समाचार छपा था - "राजधानी दिल्ली के अमुक इलाके में एक चालीस-बयालीस वर्ष के विकलांग की लावारिस लाश मिली है। उसकी जेब में दस रुपये का एक नोट बरामद हुआ है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में इस शख़्स की मौत की वजह भूख बताई गई है।"
जब पुलिस भीखू का पंचनामा कर रही थी तब पनवाड़ी की दुकान पर रखे टीवी पर समाचार चल रहा था कि विदेश मंत्री ने जापान के साथ अनेक महत्वपूर्ण डील्स पर हस्ताक्षर किये। 

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, May 21, 2016

पिताजी की भाषा की अलंकारिकता

यद्यपि उन गद्यांशों में मेरी कभी बहुत रुचि नहीं रही तथापि उनको सुनना मेरी विवशता है क्योंकि उनके वाचक मेरे पिताजी हैं, जो स्वयं को पूज्य बनाने की जुगत में समय की सूक्ष्मतम इकाई में भी मुझे प्रवचन पेलने से नहीं चूकते। गत 32 वर्ष में से प्रारम्भ के 4-5 वर्ष छोड़कर; जिनमें परमपिता परमात्मा की असीम अनुकम्पा से मुझे कुछ समझ नहीं आने की नैसर्गिक सुविधा प्राप्त थी; मैं यही समझने की कोशिश में लगा रहा हूँ कि आख़िर मुझ निर्दोष अर्जुन को अलग से बुलाकर बिना किसी कारण अष्टादश अध्यायी सुनाने का सिलसिला कब तक चलता रहेगा!
ये बातें मैं इतनी बार सुन चुका हूँ कि अब जब कभी इनकी पुनरावृत्ति होती है तो मैं उनका साहित्यिक और वैयाकरणिक अन्वेषण करने लगता हूँ। इस अन्वेषण के दौरान मुझे ज्ञात हुआ कि पिताजी की भाषा आश्चर्यजनक रूप से अलंकृत है।
बचपन में दो रुपये का नोट भी जब वे ये कहते हुए देते थे कि संभाल के रखियो कहीं खामाखा खो-खा न जाए; तब ख वर्ण की पुनरावृत्ति से अनुप्रास की छटा देखते ही बनती थी। कई बार तो मैं अनुप्रास की छटा देख ही रहा होता था कि पिताजी दो रूपये देने के अपने इरादे को पीठ दिखा देते थे।
दादाजी के खाना खाने बैठते समय दही लेने निकालना और आधी रोटी ख़त्म होने से पहले दही ले आने की घटना वे इतनी बार सुना चुके हैं कि पुनरूक्ति प्रकाश अलंकार का उदाहरण प्रस्तुत हो गया है। बाद में इसी घटना में दही वाले की दुकान को घर से डेढ़ किलोमीटर दूर बताकर वे लगे हाथ अतिशयोक्ति अलंकार भी चिपका देते हैं।
अकेले "नहीं" शब्द को वे इतने अलग-अलग बलाघात के साथ उच्चार लेते हैं कि यमक और श्लेष दोनों के अश्व उनके इस एक शब्द के अस्तबल में घास चरते बंधे रहते हैं। शब्द की प्रयोजनीयता का उनकी भाषा में ऐसा श्रेष्ठ उदाहरण मिलता है कि रसख़ान और कालिदास की रचनाएँ भी उकड़ू बैठ कर पिताजी का भाषाई कौशल देखती रह जाती हैं। मेरे घर में प्रवेश करते ही वे तीन शब्दों के एक युग्म का प्रयोग करते हैं। इस वाक्यांश से मुझे अनायास ही यह समझ आ जाता है कि आज डिनर करते समय कौन से उपनिषद का पाठ होगा।
"कहाँ गया था" या "घड़ी देखियो ज़रा"; इस प्रकार के वाक्यांश का अर्थ है कि स्थिति सामान्य है और भोजन के समय छुटपुट नीतिशतक से अधिक और कुछ नहीं सुनने को मिलेगा।
"आ गए हुज़ूर" अर्थात् मेरे अवतरण से कुछ पल पूर्व तक माँ के साथ मेरे भविष्य की चिंता को लेकर गरज के साथ छींटे पड़ चुके हैं और मुझे भोजन के समय श्रीमद्भागवत गीता का कर्मयोग सिखाया जायेगा जिसे स्थितप्रज्ञ होकर सह लेने में ही मेरा कल्याण है।
"आ जा बेटा" अथवा "लो आ गया" सुनते ही मैं समझ जाता हूँ कि आज गरुड़ पुराण से कम में पीछा नहीं छूटना। सही समय पर सही शब्द बरतने का यह कौशल उनकी भाषा को अन्य लोगों के पिताजियों की भाषा से विलग करता है। "हमने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये हैं" और "हम उड़ते पंछी के पर गिन लेते हैं" जैसे वाक्यों का प्रयोग कर वे सिद्ध करते हैं कि उनकी भाषा में मुहावरे और लोकोक्तियाँ सहज ही उतर आती हैं।
अपनी अभिव्यक्ति को अधिक समर्थ बनाने के लिए मेरे पिताजी संस्कृत के वैयाकरणिक सिद्धांतों का विलोमानुकरण करने में भी सिद्धहस्त हैं। जब वे मुझे संबोधित करते हुए मध्यम पुरुष एकवचन का हिंदी में प्रयोग करते हुए "तू/तेरा" आदि शब्द प्रयोग करते हैं तो वास्तव में मैं यथोचित सम्मान पा रहा होता हूँ किन्तु जैसे ही मेरे प्रति उनके सम्बोधन मध्यम पुरुष द्विवचन पर पहुँच कर "तुम/आप" आदि हो जाते हैं तो मेरे अपमान के प्रतिमान खड़े हो जाते हैं।
पिताजी के इस भाषाई कौशल में मेरी भंगिमा सदैव अवाक् और मेरे कंठ में घुँटा हुआ शब्द संस्कृत के सम्बोधन कारक का हिंदी अनुवाद ही होता है। लेकिन करत-करत अभ्यास के मेरी जड़मति इतनी सुजान अवश्य हो गई है कि जब वे पाणिनी होकर फलम् फले फलानि जपने लगते हैं तो मैं वरदराज बनकर अपने अंगूठे से फर्श की सिल पर पड़े निशान देखता रहता हूँ। 

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, May 12, 2016

डिग्रियों का बोलबाला

देश में डिग्रियों का बोलबाला है। कोई प्रधानमंत्री से डिग्री मांग रहा है तो कोई डिग्री से प्रधानमंत्री। ऐसे में मैं स्पष्ट कर दूँ कि डिग्री देखने की ललक छोड़ कर काम की क्षमता पर ध्यान दो।
प्रोडक्टिविटी और केपेसिटी हो तो डॉक्टरेट की डिग्रियाँ पांचवी फेल डिग्रीलेस को सलाम बजाती हैं। अंगूठा छाप मिनिस्टर हो गए और प्रशासनिक सेवा परीक्षा का अव्वल छात्र उनका सचिव। सर्वाधिक पढ़े लिखे प्रधानमंत्री का अध्यादेश एक मंदबुद्धि बालक फाड़ देता है और कोई कुछ नहीं कर पाता।
दंतकथाओं पर विश्वास करें तो कालिदास से अधिक विद्वान् 'विलोम' भाग्यहीन रह गया और विद्योत्तमा का मूढ़ पति युग का महाकवि हो गया। राजनीति में कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी असली डिग्री दिखा दें तो विश्वविद्यालय और शिक्षानीति दोनों की क्षमताएँ कठघरे में आ जाएंगी।
जिन गुणों से व्यक्ति महान बनता है उनकी शिक्षा डिग्रियों में नहीं लिखी होती। विजय जी माल्या को कला की कक्षा में नहीं पढ़ाया गया था कि कन्याओं के कितने कपडे उतरवाकर गले में हाथ डालोगे तो फोटो अच्छी आएगी। न ही उन्हें विज्ञान के अध्यापक ने बताया था कि बैंकों के पैसे में विटामिन होते हैं। और तो और फिज़िकल एजुकेशन में भी उन्हें यह पाठ नहीं पढ़ाया गया था कि संकट की स्थिति में किस देश की ओर दौड़ना उचित होगा। ...फिर भी माल्या साहब महान बने कि नहीं।
श्री मान केजरीवाल जी से ही पूछ लेते हैं कि उन्होंने अन्ना जी को अधन्ना बनाकर खुद हज़ारी हो जाने का कौशल किस स्कूल में सीखा था? अपने गले में मफलर बाँध कर भाजपा और कांग्रेस का गला घोंटने का पाठ NCERT की किस पुस्तक में शामिल था। अपनी कमीज़ बाहर निकाल कर बाकियों को विधानसभा से बाहर निकालना किस अभ्यास पुस्तिका में लिखा था। फिर भी केजरीवाल जी महान बने कि नहीं।
मोदी जी की विश्वविद्यालय की डिग्री देख कर भी क्या कर लोगे। जो पढ़कर डिग्री हासिल की वो उन्होंने कभी किया ही नहीं। बचपन से पढ़ते आए थे कि बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान करो, उन्होंने किया क्या? बचपन से पढ़ते आए कि 'अपना घर छोड़ कहीं और न जाया जाए'; वे माने क्या? बचपन से पढ़ते आए कि 'तोल-मोल कर बोल' ...किस किस चीज़ की डिग्री देखोगे?
सन्नी द्योल ने दामिनी फ़िल्म में एक डायलॉग बोला था। उसी अंदाज़ में समझ लो - "सिसोदिया समझा इसे, काग़ज़ पर छपी हुई ये डिग्रियाँ जमुनापार में बहुत मिलती हैं, लेकिन इनसे कुर्सी पाने का जो मुक़द्दर है ना, वो दुनिया के किसी स्कूल में नहीं मिलता; नेहरू-गांधी खानदान उसे लेकर पैदा होता है। पुलिस की थर्ड डिग्री जब दिखती है ना, तो आदमी बोलता नाहीं ...बोल जाता है।"

✍️ चिराग़ जैन