Tuesday, July 5, 2016

आतंकवाद का दंश

इस कदर नफ़रत बढ़ी है, हो गये त्योहार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

ईद को डर है, वजू की हौद में तेज़ाब ना हो
शाम की मजलिस कहीं बस दो घड़ी का ख़्वाब ना हो
रह नहीं जाएँ नयी नस्लें मिठासों से नदीदी
दे न दे कोई क़फ़न की शक्ल में इस बार ईदी
मस्जिदों की सीढ़ियाँ ज़ख़्मी हैं, कुल बाज़ा घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

सावनी उत्सव सभी दहशत के रंगों में रंगे हैं
जिस जगह झूला पड़ा था, अब वहाँ मातम टंगे हैं
तीज पर बाबुल के घर का रास्ता मुश्किल कटा है
जिस डगर आएगी लाडो, उस डगर कल बम फटा है
भाई-बहनों का कलाई पर सँवरता प्यार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

आयतों की आड़ में गोली चली रमज़ान रोया
स्वर्ण मंदिर में बहा खूँ, शौर्य का बलिदान रोया
मौत का तांडव मिला है, धर्मगुरुओं के दरों पर
सब पे शासन की तमन्ना छा गई गिरजाघरों पर
शस्त्र से सब शास्त्र आहत, स्वार्थ से अवतार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

आपसी सद्भाव इतना हो कि नफ़रत टिक न पाये
फूल का बाज़ार यूँ पनपे कि असला बिक न पाये
ज़ख़्म को मरहम मिला तो दम घुँटेगा दहशतों का
आदमीयत ही पढ़ेगी फ़ातिहा इन नफ़रतों का
काश मानवता दरिंदों को करे इक बार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

✍️ चिराग़ जैन

Monday, July 4, 2016

नये घर में

सुनो!
सब कुछ तो बटोर लाया हूँ
अपने पुराने मकान से
नये मकान में;
फिर भी
काफ़ी कुछ छूट गया है वहीं
...जस का तस।

अलमारी के पीछे
जाला पूरती रहती थी एक मकड़ी
उसका घर तहस-नहस कर आया हूँ
अपना घर बदलते हुए।

दीवाली की सुबह
रसोई की चौखट पर
सरस की टहनियाँ टाँकते थे पिताजी;
उनकी सूखी हुई डंडियाँ
चुभती हुई सी छूट गई हैं
चौखट की झिरियों में।

राखी के सोन चिपकाने से
एक निशान बन जाता था दीवार पर
वो साथ न आ सका।

और छोटी बहन ने
पूजा वाले कमरे में
थापे लगाए थे
विदा होते हुए।
...जिन्हें देखने भर से
जीवंत हो जाती थी बहन की विदाई;
...उन्हें सहेजने का 
कोई ज़रिया न हुआ।

पड़ोस वाले अंकल
यूं भी
कभी बतियाते तो नहीं थे,
लेकिन आज
जब ट्रक में चढ़ रहा था उनका पड़ोस,
तो वे अपनी बालकनी में
रोज़ से 
कुछ ज़ियादा ख़ामोश नज़र आए।

नये घर की दीवारें
एकदम नयी हैं।
फ़र्श पर नहीं है 
किसी दीये की चिकनाई के घेरे।
ट्यूब के पीछे 
अभी नहीं बसा है 
किसी छिपकली का घरौंदा।
यहाँ सामने वाले छज्जे से
लुंगी पहने कोई अधेड़
आते-जाते घूरता भी नहीं है।

एक बड़े से ट्रक में
लाद तो लाए हम
एक पूरा युग
लेकिन वक़्त लगेगा
उस युग को
इन दीवारों पर छाने में
अभी वक़्त लगेगा
इस मकान को
घर बनाने में।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, July 2, 2016

अविनय

जो अकारण ही किसी अपमान के भागी बने हैं
हो न हो उनसे किसी सम्मान की अविनय हुई है
जो बिना चाहे पतन-पथ पर चले आए अचानक
उन अभागों से किसी उत्थान की अविनय हुई है

थी अतुल क्षमता विजय की, पर पराजय का रहा डर
सामने गांडीवधारी थे, तभी रथचक्र जर्जर
यदि अचानक मार्ग बदले लक्ष्य को बढ़ता हुआ शर
स्पष्ट इंगित है कहीं संधान की अविनय हुई है

भाग्य से हारे हुए, मस्तक पकड़ जो रो रहे हैं
सम्पदा से रिक्त होकर खंडहर में सो रहे हैं
जो विवशता के किसी अभिशाप को ढोता रहा हो
उस तपस्वी से किसी वरदान की अविनय हुई है

न्याय का पलड़ा कुतर्कों से प्रभावित हो गया हो
तंत्र सारा चाटुकारों को समर्पित हो गया हो
सत्य जिनका मूढ़ताओं से पराजित हो गया हो
वो समझ जाएँ किसी विद्वान की अविनय हुई है

जो ज़रूरत पर सभी के अजनबी दृग्कोण देखे
चीख जिसकी व्यर्थ जाए, सृष्टि सारी मौन देखे
जो स्वयं निष्ठुर रहा हो, पीर उसकी कौन देखे
स्पष्ट है उससे स्वयं भगवान की अविनय हुई है

✍️ चिराग़ जैन

Friday, July 1, 2016

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं
मुझ पर रस्मों का ज़ोर नहीं
मेरे सपनों को बांध सके
ऐसी दुनिया में डोर नहीं

कोमल हूँ कन्यापूजन में
चण्डी हूँ दुष्टों से रण में
जब ठान लिया तो मिला दिया
धरती को अम्बर से क्षण में
मुश्किल की कोई भी आंधी
मुझको सकती झकझोर नहीं

मेरे सपनों का देश अलग
मेरा ख़ुद का परिवेश अलग
सारी दुनिया की बात अलग
मेरे मन का संदेश अलग
कुछ भी सुनकर चुप रह जाऊँ
ऐसा अब होगा और नहीं

अर्पण की घड़ी अगर आई
अपना सर्वस्व लुटा दूंगी
धोखे से छलना चाहोगे
भारी विध्वंस मचा दूंगी
हर पल कोमल भी नहीं मगर
हर पल को बहुत कठोर नहीं

आँखों में सपना पलता है
दिल हिरण चैकड़ी भरता है
क़दमों में बिजली सी तेज़ी
मन में बेहद चंचलता है
मैं दौड़ जिसे छू नहीं सकूं
ऐसा तो कोई छोर नहीं

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, June 26, 2016

कला का मुँह काला कर दिया जाए

"कला का मुँह काला कर दिया जाए" -ये हुक्म अपने आप को दिया है कलयुग के कुकर्मियों ने। कोलाहल पर किलोल की विजय न हो जाए। अपनी महत्वाकांक्षाओं को मनोरंजन के सत्य भाषण से बचाने के लिए सियासत रोज़ नए पैंतरे खेल रही है। कोई मुज़फ्फरनगर के दंगों पर बोलने लगे तो उलेमाओं का फ़तवा उछाल दो, कोई पंजाब के सुट्टे पर बोले तो उसे सेंसर की देहरी पर रगड़ दो। कोई दिल्ली की समस्याओं पर कलम चलाए तो उसे मोदी का चापलूस कहकर अपमानित करो। कोई केंद्र सरकार की किसी नीति पर ऊँगली उठाए तो उसे "कांग्रेसी कुत्ता" कहो। कोई कांग्रेस की हरकतों पर लिखने की कोशिश करे तो उसे संघी कहकर प्रताड़ित करो। कोई फकीरों की मज़ार पर क़व्वाली गाने लगे तो उसे गोली मार दो।
ऑल इण्डिया बकचोद, बिग बॉस, ग्रैंड मस्ती और सनी लियोने जैसे प्रतिमानों की खिड़की से कला का आकलन करो ताकि कलाकार ख़ुद ब ख़ुद शर्मसार होकर ख़ुदकुशी कर ले। कला फिल्मों को आर्थिक विपन्नता से घोंट दो और फिर व्यावसायिक फिल्मों के उदाहरण प्रस्तुत कर फिल्मों की अनुपयोगिता का ढोल पीटो।
कोई हँसने-हँसाने की कोशिश में व्यंग्य के चौबारे में टहलने लगे तो उस पर मानहानि का मुक़द्दमा दर्ज कर दो। कोई न्यूज़ चैनलों से उत्तरदायित्वहीनता का कारण पूछ ले तो उसे चैनल पर दिखाना बंद कर दो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जुमला झूठे सर्वेक्षण और अश्लील विज्ञापनों के पक्ष में मुखर होना चाहिए। कला, कलाकार और सत्य... -इन सबको तो फांसी चढ़ा देना चाहिए।

✍️ चिराग़ जैन


Ref : Comedian got arrested for his sarcasm

Thursday, June 23, 2016

मुहब्बत के पैगम्बरों के लिए सुकून

ख़ुद को ख़ुदा के बन्दे और जेहादी कहने वाले खूंखारों ने ख़ुदा की इबादत और ख़ुदा से मुहब्बत का पैग़ाम देने वाली एक बेहतरीन आवाज़ को ख़ामोश कर दिया। रूह से उठने वाला वो अलाप जो सुनने वालों को सीधे रूहानियत के गलियारों तक लिए जाता था, वो अलाप स्वयंभू जेहादियों पर एक धिक्कार के साथ हमेशा के लिए बंद हो गया। 

दहशतगर्दी की दुनिया रूहानियत को नहीं समझ सकती, क्योंकि रूहानियत का तअल्लुक़ रूह से होता है। ईश्वर, अल्लाह, ख़ुदा या जो भी कोई पारलौकिक सत्ता इस सृष्टि के पीछे है; उसके कोप की इस समय आवश्यकता है। अब इस दुनिया को समझना होगा कि संसार में सिर्फ दो ही तरीके के लोग हैं- 1) दहशतगर्द और 2) इंसान।

दहशतगर्दी के खिलाफ इंसानियत को एक होकर लड़ना होगा; तभी मुहब्बत के पैगम्बरों के लिए सुकून मुहैया हो सकेगा। 
✍️ चिराग़ जैन

Ref : Death of Amjad Farid Sabri

Monday, June 20, 2016

क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी

क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
क्या तुम ख़ुद तक लौट सकोगी
अपनेपन की बाग़ छोड़ के


मेरे संदेशों की दस्तक
तुम सुनकर भी ध्यान नहीं दो
मेरे स्वर के आकर्षण को
अपने मन में मान नहीं दो
नदिया, नदिया ही रहती है
चाहे निकले धार मोड़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के

तुम प्रतिबंध लगा सकती हो
सब तकनीकी संचारों पे
लेकिन कैसे रोक लगेगी
अंतर्मन वाली तारों पे
क्या हिचकी को रोक सकोगी
इक झूठी मुस्कान ओढ़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के

संबंधों में खटपट होगी
मन बेचारा पीर सहेगा
किंतु कहीं संवाद रुका तो
हर अपनापन मौन रहेगा
दिल दुखने पर ऐसे चीखो
चुप्पी चल दे राह छोड़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, June 19, 2016

अपशब्दों का सत्र

तुमने कड़वे शब्द कहे हैं, कैसे इस सच को झुठलाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

वाणी कड़वी, मन खट्टा है और कसैला रूप-लवण है
किस आसन पर रख पाओगी, प्यार भरा जो मीठा क्षण है
कण-कण में विष व्याप्त हुआ है, किस कण पर अमृत टपकाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

आँखों में अब तक ताज़ा है, प्रेम सुसज्जित पत्र तुम्हारा
पर कानों में गूँज रहा है, अपशब्दों का सत्र तुम्हारा
पाती पढ़-पढ़ मुस्काता हूँ, वाणी सुन-सुन बुझता जाऊँ
समझ नहीं आता इस इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

गहरी खाई में ला पटका, तुमने मेरे मन-पर्वत को
सारी रात पढ़ा है मैंने, प्रेम सुधा में भीगे ख़त को
अपने हाथों से उस ख़त का कोई कोना फाड़ न पाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

तुमको पीड़ा पहुँचाने का, मैं भी अगर इरादा रखता
तो भी वाणी पर संयम की, थोड़ी तो मर्यादा रखता
अंतर्मन पर घाव हुए हैं, कैसे इनकी टीस भुलाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

कष्ट हुआ हो तो तुम मुझसे झगड़ा कर के रो सकती हो
मैं ये सोच नहीं सकता तुम तुम इतनी कड़वी हो सकती हो
अब मैं ख़ुद भी चाहूँगा तो, तुम तक शायद लौट न पाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

✍️ चिराग़ जैन

पिता

अब कवि सम्मेलन में आना-जाना मेरे लिए सामान्य हो चुका है। एक काम जैसा अनुभव रह गया है कवि सम्मेलनीय यात्राओं का। लेकिन आज भी मेरे घर लौटने पर मेरी अटैची से जब कोई प्रतीक चिन्ह मिलता है तो वे लपक कर उसे उठा लेते हैं और उसका एक एक अक्षर आद्योपान्त पढ़ जाते हैं। जब किसी निमंत्रण पत्र में छपता है मेरा नाम तो देर तक उसे निरखते रहते हैं। मुझे याद है, मेरी सातवीं किताब के प्रकाशन पर भी वे उतने ही ख़ुश थे जितना मैं अपनी पहली किताब के प्रकाशन पर था। कवि सम्मेलन में मिली मोतियों की मालाओं और दुशालों को आज भी वे सहेज कर उठाते हैं और जी भर निरखने के बाद हर बार बोलते हैं - "लो, इन्हें संभाल कर रख दो।" जब कभी मैं श्रृंखलाबद्ध यात्रा पर निकलता हूँ तो वे आह्लाद में सारे रूट मैप देखते हैं। मुझे कोई सम्मान मिलता है तो उनकी आँखों में वो चमक आती है जो शायद मेरी पहली किलकारी पर मेरी माँ की आँखों में आई होगी। ...सच बताऊँ, मेरे पिता मेरी उपलब्धियों को भोगते हैं और मैं हर उपलब्धि पर उनके आह्लाद को।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, June 15, 2016

विभक्त

सृजन की जाह्नवी
विभक्त होकर भी
गंगा ही रहेगी।

तुम देखना
उन्मुक्त बहती संवेदना से
विभक्त होती धार
मोक्षदायिनी होकर पुजेगी
...हर की पौड़ी पर।

कविता से विभक्त काव्यांश
सूक्ति हो जाते हैं
और श्लोक से विभक्त वर्ण
मंत्र बन जाते हैं।

एक सृजन ही तो है
जहां विभक्तियां
धातुओं को अर्थ की
पहचान देती हैं।

✍️ चिराग़ जैन