Sunday, August 7, 2016

मित्रता

सुदामा जैसा मित्र मुझे नहीं चाहिए
जो बचपन में मित्र के हिस्से के चने खा गया
और जवानी में मित्रता का हिस्सा मांगने आ गया

कृष्ण जैसा मित्र भी मुझे नहीं चाहिए
जो बचपन में मित्र की चालाकी पर प्रतिकार किया
और जवानी में मित्र के गिड़गिड़ाने का इंतज़ार किया

मित्रता तो दुर्योधन की बड़ी थी
जिसने कर्ण को तब अंगराज बनाया
जब उसकी प्रतिभा रंगक्षेत्र में असहाय खड़ी थी

मित्रता तो कर्ण सी होनी चाहिए
जिसने दुर्योधन का साथ देते हुए यह विचारा ही नहीं
कि उसका मित्र ग़लत है या सही

✍️ चिराग़ जैन

दोस्त वो है

दोस्त वो नहीं जिसका आपके पास फ्रेंडशिप डे का सबसे पहला मेसेज आए। दोस्त वो जो फ्रेंडशिप डे के दिन आपसे फोन मिलाकर बोले - "साले तूने मुझे याद क्यों नहीं दिलाया कि आज फ्रेंडशिप डे है, कमीने तेरी भाभी को रात 12 बजे wish नहीं कर सका।"

और भी गहरा दोस्त वो है जो आपको बोले - "अबे मेरी एफबी से अपनी भाभी को कोई मस्त सा फ्रेंडशिप डे मेसेज भेज दे यार।"

और भी गहरा दोस्त वो है जो फ्रेंडशिप डे के दिन तुम्हें 20 बार फोन करे लेकिन उसे तुमको फ्रेंडशिप डे wish करना याद न रहे। 

...दोस्त वो है, जो तुम्हारे साथ formal होने की बात सोच भी न सके; दुनियादारी तो दुनिया निभाती है। 

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, August 3, 2016

बुलंदशहर बलात्कार कांड

फट गया कलेजा धरती का
आकाश हिला दिग्गज डोले
ममता की कोरें बिलख उठीं
पत्थर पिघले, पर्वत बोले
फिर क्यों ऐसा कुछ नहीं हुआ
जो हवस की तंद्रा तोड़ सके
ऐसी आंधी क्यों नहीं उठी
जो वहशत को झखझोर सके
मजबूर पिता की चीखों से
अम्बर तक चोट हुई होगी
लाचार बिलखती बेटी जब
बर्बर ने हाय छुई होगी
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
भीषण हुंकार हुआ होता
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
कैसा संहार हुआ होता
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
वहशत की लाश पड़ी होती
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
ताण्डव की एक घड़ी होती
वह क्रुद्ध पिता उस इक पल में
उन सबकी बलि चढ़ा देता
वह क्रुद्ध पिता उस इक क्षण में
सारा ब्रह्माण्ड हिला देता
उसने अरदास लगाई थी
पर हाय विधाता सोता था
और वो रस्सी से बंधा हुआ
बस फूट फूट कर रोता था
उसकी पत्नी, उसकी बेटी
वहशत से रौंदी जाती थी
उसकी रग-रग में ज्वाला की
बिजली सी कौंधी आती थी
उस माँ की पीड़ा कौन कहे
जो ख़ुद वहशत की ज़द में थी
और उसकी छोटी सी बेटी
बर्बरता की सरहद में थी
उसकी पीड़ा लिखना चाहूँ
तो शब्द गौण हो जाते हैं
भाषा हिचकी भर रोती है
व्याकरण मौन हो जाते हैं
यह वह क्षण था जिसको सहना
मानव के वश का रोग नहीं
यह वह क्षण था जिसका जग की
सारी पीड़ा से जोग नहीं
यह वह क्षण था जिसको लखकर
खुद काल आत्महत्या करता
यह वह क्षण था जिसको सुनकर
ईश्वर भी लज्जा से मरता
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ
धरती अब तक जस की तस है
अख़बार टीस से रंगे मगर
मजबूरी अब तक बेबस है
इस घटना से ज़्यादा बर्बर
इस पर हो रही सियासत है
इस घटना से ज़्यादा बर्बर
सब सह लेने की आदत है
जिनने मानवता जर्जर की
वे तो समाज की व्याधि हैं
लेकिन जो अब ख़ामोश रहे
वे भी समान अपराधी हैं
इतनी दहशत आवश्यक है
वहशत इज़्ज़त से दूर रहे
बेटी-बहनें घर से निकलें
तो हिम्मत से भरपूर रहें
वहशी ने आँख उठाई तो
गर्दनें छाँट दी जाएंगी
इज़्ज़त को हाथ लगाया तो
बोटियाँ काट दी जाएंगी

✍️ चिराग़ जैन

ओके साहब।

साहब जी, बिहार में चुनाव होने वाला है, क्या करें?
गाय का मुद्दा खड़ा करो।
ओके साहब। 

साहब जी, दिल्ली में चुनाव होने वाला है, क्या करें?
फ्री वाई-फाई बांटने का प्रचार करो।
ओके साहब। 

साहब जी, पंजाब में चुनाव होने वाला है, क्या करें?
ड्रग्स की समस्या को भड़का दो।
ओके साहब। 

साहब जी, यूपी में चुनाव होने वाला है, क्या करें?
दलितों के शोषण की घटनाओं को हवा दो।
ओके साहब। 

सारे चुनाव हो गए साहब, अब क्या करें।
अब आराम से सो जाओ।
लेकिन साहब जनता की सेवा कब करेंगे?
नींद पूरी होने के बाद।
ओके साहब। 

साहब वो बिहार वाली गाय रंभा रही है, नींद में खलल पड़ रहा है।
उसे वाई फाई की आदत डाल दो, इंटरनेट पर व्यस्त हो जाएगी।
लेकिन साहब वाई फाई तो मिला ही नहीं। 
तो उसे ड्रग्स की लत लगा दो।
लेकिन साहब ड्रग्स तो हमने चुनाव में बाँट दी।
तो उसे दलितों के यहाँ बाँध आओ, लेकिन मुझे सोने दो।
ओके साहब।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, August 2, 2016

रे बुलंदशहर!

रे बुलंदशहर!
इतनी बुलंदी तैने कहाँ से पाई कि अपनी बेटी के बलात्कार को अपनी आँखों से देखने वाले बाप की चीत्कार से तेरा कलेजा नहीं काँपा। उस माँ की चीख तुझे सुनाई नहीं दी जिसे समझ नहीं आ रहा था कि अपनी देह पर लिपटे दरिंदों की आँखें पहले फोडूं या अपनी 13 साल की बेटी के जिस्म पर टूटते दुःशासनों की छाती पहले फाडूँ।

इस घटना को पढ़ने के बाद सिहर कर अपनी बिटिया को गले लगा लेने वाले हर पिता को सड़क पर उतर कर व्यवस्था से प्रश्न करना चाहिए कि सिर्फ स्वार्थी राजनीति की रोटियां सेंकने वाले इस तंत्र ने हमें क्या दिया है। हर माँ को व्यवस्था की गिरेबान पकड़ कर पूछना चाहिए कि जनता को सिर्फ वोट समझने वाले इस सिस्टम ने हमारी मेहनत की कमाई किन अय्याशियों पर खर्च की है? हर बेटी को मंत्रियो के कुर्ते खींच कर पूछना चाहिए कि अंकल बलात्कार किसे कहते हैं?

थाने में जाते हुए हम डरते हैं, अदालत के नाम से हमारी रूह कांपती है। ये कौन सा लोकतंत्र है भाई? ये किस व्यवस्था की जकड ने हमें नपुंसक बना दिया है। ऐसे तंत्र के खिलाफ सड़क पर उतरना यदि अराजकता है तो एक बार इस मुल्क की जनता को अराजक होकर भी देख लेना चाहिए।

ये अराजक लोग, कम से कम उस 13 साल की बच्ची से आँख तो मिला सकेंगे जिसे रौंदकर हवस मिटाने वाले लोग हमारी ही टेक्स की दौलत से चल रहे सिस्टम से डरना भूल गए हैं। 

✍️ चिराग़ जैन

जीवन नदिया

जीवन का प्रारम्भ जब होता है, तो वह नदिया की सद्यप्रवाहित धारा-सा अविरल और निष्कलंक होता है। उसकी कलकल मनमोहक होती है। उसका स्पर्श शीतल होता है। ज्यों-ज्यों धारा आगे बढ़ती है, त्यों-त्यों उसका आकार बढ़ता जाता है। गुडलने चलने के प्रयास में बचपन के घुटने मैले हो जाते हैं, लेकिन उसकी प्रवृत्ति और निष्कपटता उसे जीवंत और सर्वप्रिय बनाए रखती है। फिर एक मोड़ पर ये धारा पर्वत की सीमा लांघकर ख्याति अर्जित करने मैदान में उतरती है।
यहाँ इसका संसर्ग धर्म, उद्योग, गृहस्थी, व्यापार और अन्य सांसारिक उद्यमों के अवशेष से होता है। यहाँ इसकी गति मंथर होने लगती है। घाट, पुल और बैराज की नियमावलियाँ इसके यौवन के आह्लाद को विधानों के आघात से जर्जर कर देते हैं। मन पर भारी बोझ लिए जीवन आगे बढ़ने की कोशिश करता है कि तभी विवशता के गारे और अवसाद के कीचड़ का बड़ा सारा नाला इसको रोक लेता है। इसका कलकल करता प्रवाह ठहर जाता है। इसकी शीतलता से सड़ांध उठने लगती है। इसके वातावरण में साँस लेना दूभर हो जाता है। नाम भर की नदी घिसट-घिसटकर आगे बढ़ती है। अब तक इसके भीतर का उन्माद पूरी तरह समाप्त हो चुका होता है। स्मृतियों का ढेर सारा कचरा इसका अभिन्न अंग बन चुका होता है और बीमारियों से जर्जर होते होते इसकी देह हारकर किसी खारे श्मशान में अपने अस्तित्व को समाप्त कर डालती है।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, July 27, 2016

साहित्य को कालजयी बनाने में व्यवस्था का योगदान

जो लोग इस देश में व्यवस्था की शिक़ायत करते नहीं थकते, मैं उन्हें साफ़-साफ़ कह देना चाहता हूँ कि इस देश की व्यवस्था पूरी तरह कला और साहित्य के पक्ष में है। यह व्यवस्था की ही मेहरबानी है कि हमारी हर फ़िल्म, हर उपन्यास, हर कहानी और हर व्यंग्य कविता कालजयी हो जाती है। सुधारवादी और विकासवादी व्यवस्थाओं में इसकी संभावना शून्यप्रायः होती है।
अंग्रेजी में कोई लेखक यदि अपने समाज में व्याप्त किसी समस्या पर कहानी लिख दे, तो सरकार तुरंत उस समस्या को ठीक करने में लग जाती है और समस्या के ठीक होते ही वह कहानी सन्दर्भविहीन होकर काल के गाल में समा जाती है। हमारे देश में साहित्य के साथ ऐसा दुर्व्यवहार न हो, इसीलिए हमने एक ऐसे सिस्टम को बढ़ावा दिया है जिसमें कोई भी लेखक किसी भी समस्या पर अपनी क़लम चलाए तो कम से कम अपने जीते जी वह उस कृति को मरते हुए न देखे।
पुलिसिया भ्रष्टाचार को समाप्त करना हमारे लिए बाएँ हाथ का काम है। सरकार आज चाहे तो अपने पुलिस महकमे को बोल सकती है कि अब हमारा पेट भर गया है और घर भी। हमारे पास रिश्वत की कमीशन का धन रखने को तिल भर भी स्थान शेष नहीं है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए कृपया सभी पुलिसवाले सुधर जाएँ और जनता को प्रताड़ित करना बंद करके जनता की सेवा हेतु समर्पित हो जाएँ। ...कितना आसान तरीक़ा है। लेकिन सरकार ऐसा करती नहीं है। क्योंकि कुछ लाख रुपये की कमीशन के बोझ से अपना पीछा छुड़ाकर वह अमूल्य साहित्य की हत्या नहीं कर सकती। इसलिए हमारी ब्यूरोक्रेसी और राजनीति अपने घरों में, दीवारों में, नींव में, छतों पर और यहाँ तक कि टॉयलेट में भी धन भरे जा रहे हैं, लेकिन साहित्य की अविरल धारा पर आँच नहीं आने दे रहे।
ज़रा सोचो, यदि पुलिस-वकील-अदालतें और सरकारी दफ्तर सुधरकर जनता की सेवा में जुट गए, तो मुंशी प्रेमचंद, सआदत अली मंटो, मोहन राकेश, महाश्वेता देवी और ऐसे ही हज़ारों लोगों को ऊपर जाकर क्या मुँह दिखाएंगे इस देश के कर्णधार? यदि भारत पुनः सोने की चिड़िया बन गया तो भारतेंदु की ‘भारत दुर्दशा’ की क्या दुर्गति होवेगी। यदि घरेलू हिंसा में लड़कियों का मारा जाना बंद हो गया तो निराला की ‘सरोज स्मृति’ पढ़कर किसे सिहरन होगी। यदि मुसलमानों का जीवन स्तर पूरी तरह से विकास के पथ पर बढ़ निकले तो राही मासूम रज़ा का ‘आधा गाँव’ किस मुहर्रम में जाकर अपना ताज़िया निकालेगा। यदि हिन्दू मान्यताओं में बढ़ते आडम्बर को समाप्त कर दिया गया तो गाय की पूँछ पकड़कर वैतरणी पार करता होरी, प्रेमचंद की खिल्ली नहीं उड़ाएगा!
साहित्य और कला के प्रति अनुराग ने हमारी व्यवस्था को न कभी बदलने के लिए प्रेरित होने दिया, और न ही कभी किसी प्रकार के भ्रष्टाचरण पर शर्म महसूस होने दी। इससे एक लाभ और है कि हमें अपनी बात में कविता और शेर उद्धृत करने के लिए हर दो साल बाद किताबें नहीं पलटनी पड़तीं। चार-पाँच शेर याद करके ख़ुद पर ‘हाज़िरजवाबी’ का तमगा लगवाने की सुविधा इसी व्यवस्था ने हमें दी है। कुछ लोग तो दुष्यंत के एक शेर के भरोसे पूरा जीवन बिता लेते हैं-

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो

सब जानते हैं कि अव्वल तो कोई पत्थर उछालनेवाला ही नहीं है और अगर कहीं उछल भी गया तो मुल्क़ की तबीयत इतनी ख़राब कर के छोड़ दी गई है कि कोई भी उछला हुआ पत्थर उछालनेवाले की ख़ुद की खोपड़ी में सूराख़ करने से अधिक कमाल नहीं दिखा सकता।
अंत में, दुष्यंत कुमार का एक ऐसा ही शेर मैं भी उद्धृत कर देता हूँ, जिससे इस देश के सत्तर प्रतिशत चिंतित लेख पिछले तीस साल से प्रारम्भ या अंत करते रहे हैं-

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

✍️ चिराग़ जैन

Monday, July 25, 2016

सलमान की रिहाई

आज जोधपुर कोर्ट ने दो दो मुजरिम एक साथ बरी किये। पहला, जनाब सलमान खान साहब, जिन्होंने दो चिंकारा मार दिए थे। दूसरा इंसाफ़, जो दशकों से अदालतों की चौखट पर उम्मीद का दीया जलाए बैठा था। 

सलमान की रिहाई से यह सबक मिलता है कि क़ानून की आँखों पर बंधी काली पट्टी एक्चुअली काले धन की कोटिंग है।

कुछ भी हो, लेकिन हमारे न्यायलय ने 'समानता के अधिकार' का सम्मान करते हुए फुटपाथ पर मरने वालों और काले हिरणों को समान दृष्टिकोण से देखा है। 

बड़ा उछल रहा था रजनीकांत कि उसकी फ़िल्म जब रिलीज़ होती है तो छुट्टी घोषित हो जाती है। ज़्यादा मत उछल बे, कहीं सलमान ने देख लिया तो काला हिरण समझ कर मार देगा। 

✍️ चिराग़ जैन

जज साहब की इगो

आज सुबह टेलीविज़न बुलेटिन ने बताया कि एक जज साहब जनता के आक्रोश के शिकार हुए और भीड़ ने उन्हें सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर मारा। मुआमला सिर्फ इतना था कि जज साहब की इगो को इस बात से ठेस पहुंची कि एक ट्रक ड्राईवर ने उनको ओवरटेक करने के लिए साइड नहीं दी। ट्रक ड्राईवर जैसे तुच्छ प्राणी की इस बदतमीज़ी से हिज़ हाइनेस क्रोधित हो गए और उन्होंने उसे सबक सिखाने के लिए कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी गाडी फ़िल्मी स्टाइल में ट्रक के आगे अड़ा दी। सड़क पर अचानक लगी इस अदालत का ट्रक वाला अंदाज़ा नहीं लगा सका और उसका फुटपाथी ट्रक जज साहब की आलिशान गाड़ी से जा टकराया। टक्कर से उत्पन्न हुए मोमेंटम ने गाड़ी को डिवाइडर की ओर धकेल दिया जहाँ एक बच्चा जज साहब की इगो के नीचे कुचला गया।

यह घटना अनेक प्रश्न खड़े करती है। चूँकि प्रश्न हमारी न्याय प्रणाली को कठघरे में खड़ा करते हैं, इसलिए मैं उनके उठने से पूर्व ही बिना शर्त मुआफ़ी मांग रहा हूँ। हमारे न्याय के मंदिरों में जिन लोगों को न्यायाधीश बनाकर अनेकानेक विशेषाधिकार दिए गए हैं; उनके व्यक्तिगत अहंकार, सर्वोपरि होने की उनकी भावना, अवमानना जैसा अस्त्र क्या वास्तव में आवश्यक हैं? 

प्रश्न यह भी है कि उन्हीं गवाहों, उन्हीं सबूतों और उन्हीं कानूनों के तहत निचली अदालत में किसी को दोषी ठहराया जाता है, जिनके आधार पर ऊंची अदालत उसे निर्दोष साबित कर देती है; तब क्या निचली अदालत ने न्यायाधीश के विरुद्ध गलत फैसला देने के अपराध में कोई कार्रवाई होती है?

क्या इस न्याय प्रणाली ने कुछ हम-तुम जैसे सामान्य मानवों को नियामक बनाकर स्वयं को भगवान मान लेने की ग़लतफ़हमी के बीज नहीं बोए हैं? क्या अहम् और आत्ममुग्धता की ज़मीन पर उगने वाली वल्लरियों के पर्णों को संविधान की ऊँगली थाम कर न्याय के कंगूरों तक पहुँचना स्वीकार होता होगा? जो जज साहब ट्रक वाले के साइड न देने पर आपा खो सकते हैं, वे मुजरिम या मुलाजिम द्वारा सलाम न किये जाने पर क्या कुछ नहीं कर सकते! 

प्रश्न यह भी है कि एक आम आदमी न्याय प्रक्रिया और अदालती माहौल पर विमर्श करने की सोचे तो इसमें अदालत की अवमानना कैसे हो सकती है? हिंदी फिल्मों ने कई दशकों तक अदालती प्रक्रियाओं को पैसे के कोठे पर मुजरा करते दिखाया है। दामिनी, इंसाफ का तराजू, आखिरी रास्ता, अदालत, जॉली एलएलबी, मेहंदी, मेरा साया और मेरी जंग जैसी तमाम फिल्मों ने वकीलों और जजों की लापरवाही व भ्रष्टाचार के अनगिनत उदाहरण पेश किये हैं। फिर किसी लेखक द्वारा इस प्रक्रिया की समालोचना को अपराध कैसे ठहराया जा सकता है।

पहली बार किसी लेख में पाठकों से जानना चाहता हूँ कि क्या आपको अदालत और अदालती लोगों पर एक स्वतन्त्र विमर्श की आवश्यकता महसूस नहीं होती? 

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, July 23, 2016

मेह-निमंत्रण

ओ रे बदरा बरस
बन के सावन सरस
राह धरती ने कबसे तकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की

हल ने काटी चिकौटी बहुत
पर धरा में नमी ही न थी
ख़ूब टपका पसीना मगर
प्यास में कुछ कमी ही न थी
प्रश्न बढ़ते रहे
हल सिसकते रहे
एड़ियाँ फट गईं खेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की

हिमशिखर का धवल कारवां
कौन जाने कहाँ लुट गया
पर्वतों पर लकीरें बनीं
और झरनों का दम घुँट गया
स्रोत सूखे सभी
घाट रूखे अभी
हर नदी हो गई रेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की

गीत बरखा नहाने चला
तो पसीना-पसीना हुआ
प्रीत जिस डाल पर झूलती
उसका हर पात झीना हुआ
गुलमुहर झर चुका
नीम का सर झुका
हाय मुरझा गई केतकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की

जब तू आया तेरी राह में
घास का इक गलीचा सजा
मेंढ़कों ने धमक छेड़ दी
पत्तियों पर तराना बजा
फूल के संग झरी
नीम ने रसभरी
इक निम्बोली तुझे भेंट की
प्यास तू ही बुझा जेठ की

✍️ चिराग़ जैन