Wednesday, October 19, 2016

उत्सव के करवे

करवाचौथ बीत गई। उत्सव निशा के बाद की भोर बेहद उबाऊ होती है। जीवन की आपाधापी का राहु जब उत्सव के प्रकाश पुंज को ग्रसता है तो एक क्षण को स्मृति हीरे की तरह चमक उठती है लेकिन उसके बाद अंतर्मन पर एक निविड़ वीराना छा जाता है। उत्सव और दिनचर्या के संगम की कथा ऐसी ही है ज्यों अर्घ्य के करवों की कचरे के ढेर में परिवर्तित हो जाने की यात्रा।  संसार के सबसे सफलतम लोग वे हुए हैं जिन्होंने एक बार उत्सव का करवा उठा लिया तो फिर अन्य तमाम अनर्गल व्यस्तताओं को कचरे की पेटी में डाल दिया और पूरा जीवन करवे के श्रृंगार में खपा डाला।  एक हाथ में करवा और दूसरे हाथ में दिनचर्या साध लेने वालों को विधाता ने जनक की संज्ञा प्रदान की। अर्थात् उनके लिए कुछ भी उत्पन्न करना कठिन नहीं है। जीवन कुल कुछ दशकों का एक जीवंत चलचित्र है। जिसने इसमें अपनी भूमिकाओं के करवे सुसज्जित रखे उन्हें इतिहास की ज्यूरी ने आराध्य और पूज्यनीय बनाकर पुरस्कृत किया है। तथागत और महावीर ने एक करवा अपने भीतर स्थापित कर लिया था। उसके बाद उन्हें किसी बाहरी दिनचर्या से कोई प्रभाव नहीं पड़ा। हम लोग अपने उत्सवों के करवे सहेजने की कला से अनभिज्ञ हैं। यही कारण है कि हमारा विषाद हमें जकड कर आनंद से दूर ले जाने में सफल हो जाता है। यह समय उत्सवों का समय है। हमने इन उत्सवों को औपचारिकताओं और लेन-देन की मारामारी से दूषित कर दिया है। इस मारामारी के बाद हम थककर उत्सवों से ऊबने लगे हैं। हम उत्सवों में झूमना भूल गए हैं। उपहारों की अदला बदली को हमने उत्सव मान लिया है।  आह्लाद की जगह उन्माद को हम उत्सव मान बैठे हैं। उत्सव जटिलताओं से मुक्त होकर सहज हो जाने की प्रक्रिया है। किन्तु हम सहज जीवन को कोरे दिखावे के लिए जटिल बना बैठते हैं और फिर उत्सवों को कोसते हैं। कई वर्ष हो गए। दूसरों के हिसाब से परंपराएं निभाते निभाते हमने अपने भीतर के उत्सव का दम घोंट दिया है। इस बार अनर्गल औपचारिकताओं को विस्मृत कर भीतर के आह्लाद को वरीयता देने का संकल्प लें तो संभवतः हमारे उत्सव के करवों को कचरे की पेटी न देखनी पड़े।  

© चिराग़ जैन

Tuesday, October 18, 2016

करवा चौथ दाम्पत्य जीवन की कृष्णकथा का मीरा सर्ग

प्रश्न यह है कि पत्नी के भूखे रहने से पति की उम्र कैसे बढ़ सकती है! प्रतिप्रश्न यह है कि बेटे के भूखे होने पर माँ की छाती में दूध कहाँ से आ जाता है? किसी अनहोनी की सूचना मिलने से पूर्व ही मन विह्वल कैसे हो जाता है? धरती पर अगरबत्ती जलाने से परमात्मा तक संदेशा कैसे पहुँच जाता है? प्रेम देह से इतर एक अर्चना है। प्राप्ति की कामना का विदेह रूप प्रेम की ड्योढ़ी तक पहुंचता है। करवा चौथ दाम्पत्य जीवन की कृष्णकथा का मीरा सर्ग है। इस पर्व में प्रेम समर्पण की सीमाओं से पार होकर अपरता के चरम को स्पर्श करता है।  चन्द्रमा को अर्घ्य देकर इस विश्वास में वृद्धि की जाती है कि यदि अधोगामी जल को यान बनाकर चन्द्रमा की शीतलता को अनुभूत किया जा सकता है तो दैहिक क्षुधा तपस्या की लेखनी से पारलौकिक संबंधों की पटकथा भी लिखी जा सकती है। 

Wednesday, October 12, 2016

साँवरिया सेठ जी का धाम

पूजन की थाली में सँवरने की होड़ हो तो 
गुलमोहरों से दूब घास जीत जाती है 
मन की उमंग का हो सामना अभाव से तो 
भीतर संजो के मधुमास, जीत जाती है 
मीरा की दीवानगी पे धन पानी भरता है 
साँवरे के दर्शनों की प्यास जीत जाती है 
साँवरिया सेठ जी का धाम बनने लगे तो 
जमुना के तीर से बनास जीत जाती है 

© चिराग़ जैन

Wednesday, October 5, 2016

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला कर

षड्यंत्र जब शौर्य को लज्जित करने का कुचक्र रचता है तो उसकी ऊर्जा के सम्मुख अनर्गल प्रश्न खड़े कर देता है। सामान्यतया ऐसे कुचक्रों में उलझ कर शौर्य की साधना भंग भी हो जाती है किन्तु यदि शौर्य इन प्रश्नों की मंशा को भांप ले तो एक ही वार में लक्ष्य के साथ षड्यंत्र को भी खण्ड-खण्ड कर डालता है। ये प्रश्न ऐसे ही अनर्गल होते हैं जैसे रंगभूमि में कर्ण से उसका परिचय पूछ लिया जाए। ये ऐसे ही अन्यायी होते हैं ज्यों किसी एकलव्य से गुरुदक्षिणा का अंगूठा कटवा लिया जाए। ये इतने ही बेमानी होते हैं ज्यों हनुमान की उड़ान के मध्य कोई सुरसा मुँह फाड़ने लगे या किसी गौतम ऋषि को पारिवारिक क्लेशों में उलझा कर लोकनिंदा का पात्र बना दिया जाए। इन प्रश्नों के रचयिताओं की समाज में उतनी ही भूमिका होती है जो रामकथा के आदि में मंथरा और रामकथा के अंत में धोबी की थी। लेकिन यह सत्य है कि ये मंथरा और धोबी रामकथा की दिशा निर्धारित करने में सक्षम होते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक पर सबूत मांगने की घटना भी इन्हीं अनर्गल प्रश्नों की श्रृंखला में समाहित है। किन्तु शौर्य के पक्ष में राष्ट्रकवि दिनकर का यह काव्यांश उद्धरणीय है:-  

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला कर 

पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला कर  

© चिराग़ जैन

सबूत पेश करो!

मुल्ला नसीरुद्दीन ने पूरे कॉमिक जगत का सुकून छीन रखा था। वह जब-तब उनके घर में घुसकर दंगा करता और पूरी दुनिया की नज़र में शरीफ बनकर अपनी कोठरी में जा छुपता। एक रात, अँधेरे में कोई आया और मुल्ला नसीरुद्दीन के कान पर ज़ोरदार झापड़ चिपका गया। मुल्ला सारी रात गाल सहलाता हुआ सोचता रहा कि हमलावर उस तक पहुँचा कैसे!

सुबह लोगों ने मुल्ला से पूछा - "क्यों मुल्ला गाल कैसे सूज गया?"

मुल्ला खिसिया कर बोला - "क क कुछ नहीं, मच्छर काट गया।"

सुनकर पास खड़े चाचा चौधरी की हँसी छूट गई। वे शरारती लहजे में मुल्ला से बोले - "मच्छर को क्यों इल्ज़ाम दे रहे हो, साफ़-साफ़ बताओ शेर ने पंजा मारा है।"

मुल्ला समझ गया कि रात के अँधेरे में जो शेर आया था उसके नाख़ून चाचा चौधरी ने ही तराशे थे। झेंप मिटाते हुए मुल्ला बोला - "ऐसा कक.. कुछ नहीं है। ये चौधरी झूठ बोल रिया है, शेर ने पंजा मारा है तो शेर ये बात साबित करे।"

मुल्ला की खिसियाई हालत पर चाचा चौधरी भीतर ही भीतर हँसते रहे। शेर तो सबूत लेकर नहीं आया लेकिन मुल्ला पूरे गाँव में बताता फिर रहा है कि शेर ने पंजा मारा होता तो सबूत लेकर ज़रूर आता।

उधर बिल्लू, मोटू-पतलू, पिंकी, घसीटाराम ये सोच कर हैरान हैं कि हमारे बिना मतलब के सवालों से चाचा चौधरी को इतना वक़्त कैसे मिल गया कि वे मुल्ला को उसके घर में जाकर धुन आए। हाल ही में घसीटाराम ने चाचा को नीचा दिखाने के लिए मुल्ला के सुर में सुर मिलाया है - "यदि शेर ने पंजा मारा है तो चाचा चौधरी उससे आक्रमण के सबूत पेश करने को क्यों नहीं बोलते!" 

* इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। इनका किसी भी सर्जीकल स्ट्राइक से कोई सम्बन्ध नहीं है। 

© चिराग़ जैन

Saturday, October 1, 2016

दीवारों की आपबीती

आज पिताजी लड़कर निकले
दिन भर घर में मौन समाए
दीवारों पर क्या बीती है
छत को जाकर कौन बताए

माँ से कुछ नाराज़ी होगी
उनको सूझी चिल्लाने की
मुझे देखा तो कोशिश की
उनने थोड़ा मुस्काने की
होंठ हिले, त्यौरी भी पिघली
आँखों में आंसू भर आए
झट से अंतर्धान हुए फिर
गुस्से में हर कष्ट छुपाए
दीवारों पर क्या बीती है
छत को जाकर कौन बताए

कहने-सुनने की जल्दी में
कौन सुने बचपन के मन की
सहम गए सब फूल अचानक
मौसम में ज्वाला-सी भभकी
माँ पहले रूठी फिर रोई
गुस्से में रोटी भी पोई
छोड़ टिफिन को निकले घर से
कुछ भी बिन बोले, बिन खाए
दीवारों पर क्या बीती है
छत को जाकर कौन बताए

धीरे-धीरे ठण्डा होगा
संबंधों का ताप पता है
वरदानों से धुल जाएगा
जीवन का अभिशाप पता है
ऐसा ना हो इस घटना की
बचपन को आदत पड़ जाए
ऐसा ना हो ऐसी घटना
बचपन के मन पर छप जाए
दीवारों पर क्या बीती है
छत को जाकर कौन बताए

© चिराग़ जैन

Thursday, September 29, 2016

भारतीय सेना की कार्रवाई

एक शरारती लड़का पूरे मोहल्ले के लोगों को तंग करता रहता था। वो रात में चैन से सोते लोगों के घर की घंटी बजाकर भाग जाता था। कई बार उसे समझाया गया। पंचायत में भी उसे टोका गया। लेकिन वो समझने को तैयार नहीं था। रोज़ की तरह एक दिन वह किसी की घंटी बजाने की सेंध लगाए बैठा था। उसी मौके का लाभ उठाकर एक दबंग पड़ोसी ने उस शरारती लड़के के घर पर खुजली का पाउडर बिखेर दिया। सूना है कि वो लड़का गाँव के जोहड़ में खुजा-खुजा कर खूनमखून बरामद हुआ है।   

नोट : इस घटना का भारतीय सेना की कार्रवाई से कोई सम्बन्ध नहीं है।  

✍️ चिराग़ जैन

भारत-पाकिस्तान संबंध

मोदी जी - "नवाज़ साहब, आप ये बार बार सीमा की शांति क्यों भंग करते हो?"
नवाज़ - "अरे मोदी जी, हमारे यहाँ 8 राज्य हैं, उनमें चुनाव होते हैं तो जनता का समर्थन जुटाने के लिए हमें भारत से छेड़ छाड़ करनी पड़ती है।"
मोदी जी - "ऐसा करके क्या सचमुच चुनाव जीता जा सकता है?"
नवाज़ - "100℅"
मोदी जी - "तो बेट्टा, अब तू देख। हमारे यहां 29 तो राज्य हैं, फिर 7 केंद्र शासित प्रदेश, फिर राज्यसभा के चुनाव, फिर नगर निगम ...और हम तो यूनिवर्सिटी इलेक्शन तक को सीरियसली लेते हैं। तुम छेड़छाड़ की बात कर रहे हो हम तो छू छू कर ही मार डालेंगे।"

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, September 24, 2016

पिंक

पिंक इस दौर की एक बेहतरीन फ़िल्म है। लेकिन कुछ अर्थों में मुझे फ़िल्म देखकर ऐसा लगा कि एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा स्त्री-विमर्श की आड़ में छुपकर रह गया है। फ़िल्म में पुरुष मानसिकता और नारी की स्थिति से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह उजागर होता है कि इस देश का पुलिसिया तंत्र किस तरह काम कर रहा है। थाने में एक पहुंच विहीन नागरिक के साथ क्या व्यवहार होता है। पीड़ित व्यक्ति को किस तरह पुलिसवाले डराते हैं। किस भाषा में वे नागरिकों से बात करते हैं। कैसे रसूखदार लोगों की सेवा की जाती है। कैसे बैक डेट में रिपोर्ट लिखी जाती है। कैसे चार्जशीट बनाई जाती है। और भी ढेर सारे सवाल फ़िल्म में छूट से गए हैं।

मुझे लगता है कि पुलिसिया भ्रष्टाचार और सिस्टम की नपुंसकता पर यदि चर्चा उठे तो किसी नागरिक को न्याय की गुहार के लिए न तो स्त्री बनना पड़ेगा, न पुरुष; न उसे दलित बनना होगा न सवर्ण, न उसे हिन्दू होकर न्याय मांगना होगा न मुसलमान होकर इन्साफ की गुहार लगानी होगी।

इंसाफ़ सिर्फ सही अथवा ग़लत की परिभाषा जानता है। और उस इन्साफ के रखवाले हमारे थाने किसी नेता, किसी उद्योगपति या किसी बाहुबली के इशारों की नचैया बनकर रह गए हैं। ऐसे में यदि कोई सरकार पुलिस को जनता के हित में काम करने के लिए बाध्य कर सकेगी तो किसी रसूखदार टपोरी की इतनी हिम्मत नहीं होगी कि वह कानून को जेब में रखकर विटनेस बॉक्स में खड़ा हो। 

✍️ चिराग़ जैन

Friday, September 23, 2016

रामधारी सिंह दिनकर

भारत के ओज स्वरावतार
जनता के मन की दृढ़ पुकार
कविता के तेजस्वी सपूत
वाणी में शौर्य सुधा अकूत
ज्वाला से जब भर गए नेत्र
शब्दों में उतरा कुरुक्षेत्र
गाया करुणा की भृकुटि तान
वह रश्मिरथी का महागान
गीतों में सामधेनी धधकी
जनहित की ज्यों दामिनी दमकी
श्रृंगार रचा उर्वशी सजी
कविता के घर पाजेब बजी
ऐसा शब्दों का प्यार सधा
श्रृंगार सधा, अंगार सधा
शोध अरु इतिहास मिलाय रचे
संस्कृति के चार अध्याय रचे
शासन से आँख मिलाय जिया
नभपिण्डो से बतियाय जिया
है कौन निविड़ जो हरा नहीं
दिनकर जीवत है मरा नहीं
जब भी सत्ता बौराती है
जनता दिनकर को गाती है
जब भी अंधियारा गहरेगा
दिनकर प्राची में प्रहरेगा
रश्मियाँ नहीं लेतीं विराम
दिनकर को शत्-शत् है प्रणाम

✍️ चिराग़ जैन