Tuesday, May 16, 2017

फिर आया सूरज

दिन भर आग बबूला होकर
दम्भ दहक का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से शीतलता पाने

मरना देखा, जीना देखा
सबका दामन झीना देखा
दौलत के सिर छाया देखी
श्रम के माथ पसीना देखा
रूप गया क़िस्मत के द्वारे, दो रोटी खाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

भोर भये मैं सबको भाया
सांझ ढले जग ने बिसराया
दोपहरी में कोई मुझको
आँख उठा कर देख न पाया
जिसने इस जग को गरियाया, जग उसको जाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

चंदा डूबा दूर हुआ था
मैं अम्बर का नूर हुआ था
शाम हुई फिर चाँद उगा तो
मान तड़क कर चूर हुआ था
ढलते की सुधि छोड़ चले सब, उगते को माने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, May 11, 2017

हिन्दी पढ़ने वाली लड़की

हिंदी पढ़ने वाली लड़की
हिंदी पढ़ने वाली लड़की
सीधी-सादी, सहज-सलोनी, कभी न तड़की-भड़की

बातों का भावार्थ समझ लेती है वो झटपट से
उसके सरल वाक्य अपराजित रहते सदा कपट से
स्वाद बढ़ाते हैं बातों का उसके बोले व्यंजन
देवनागरी की अक्षर लिपटे रहते हैं लट से
अनुपम है अनुभूति भाव की
सक्षम है अभिव्यक्ति भाव की
कविता पढ़-पढ़ स्वयं हो गई कविता किसी सुगढ़ की

नियम छोड़ कर रोमन हो गई हैं जब शीला-मुन्नी
ऐसे में भी उसे सुहाए शिरोरेख सी चुन्नी
भीतर-बाहर एक सरीखी उसकी जीवनचर्या
ना कठोर, ना जटिल, न दूभर, ना अभद्र, ना घुन्नी
वो इक रोचक उपन्यास है
वो उत्सव का अनुप्रास है
शायद वो है किसी निराले कवि की बिटिया बड़की

उसको है आभास सभी की लघुता-गुरुता द्वय का
उसे पता है अर्थ शब्द संग अलंकार परिणय का
छंद भंग हों संबंधों के यह संभव कब उससे
ध्यान हमेशा रखती है वो यति-गति का सुर-लय का
कभी अकड़ है पूर्णछन्द सी
कभी रबड है मुक्तछन्द सी
भाषा से सीखी हैं उसने सब बातें रोकड़ की

नवरस की अनवरत साधना उसका धर्म ग़ज़ब है
भाषा से अनुराग उसे जो है, अन्यत्र अलभ है
मात्र भंगिमा के बल पर वह श्लेष साध लेती है
उसे यमाताराजभानसलगा से फुर्सत कब है
हीरामन-होरी से परिचित
हर गौरा-गोरी से परिचित
उसने कंधों से समझी है पावनता काँवड़ की

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, May 10, 2017

दीवारों की दरकन

कैसे मैं अनदेखा कर दूं संबंधों के नित्य क्षरण को
कंगूरों से कब तक ढाँपूँ इन दीवारों की दरकन को

तिनका-तिनका मन जोड़ा था, तब जाकर ये नीड़ सजा था
श्वासों में सुर-ताल सधे थे, तब मधुरिम संगीत बजा था
रोज़ बिखरते देख रहा हूँ, स्वप्न सुधा के इक-इक कण को
कंगूरों से कब तक ढाँपूँ इन दीवारों की दरकन को

एक शिरा के बहकावे में, दिल की धड़कन ऊब गई है
देह पहेली बूझ न पाए, श्वास भला क्यों डूब गई है
केवल एक घुटन ने घेरा, जर्जर तन को, पीड़ित मन को
कंगूरों से कब तक ढाँपूँ इन दीवारों की दरकन को

दलदल ने डेरा डाला तो, कँवलों से यह ताल सजाया
इक दिन दलदल ने बेचारे, कँवलों को जंजाल बताया
बांझ धरा ने जी भर कोसा, मौसम के पहले सावन को
कंगूरों से कब तक ढाँपूँ इन दीवारों की दरकन को

✍️ चिराग़ जैन

Friday, May 5, 2017

गुनगुनाते रहो

जो मिले बस उसे ही निभाते रहो
वक़्त के साज पर गुनगुनाते रहो
सुख मिले तो ख़ुशी के तराने रचो
दुख मिले दर्द के गीत गाते रहो

दर्द हद से गुज़रने लगे जिस घड़ी
उस घड़ी लेखनी से शरण मांग लो
और टूटे हुए स्वप्न को बीनकर
शब्द से काव्य की सीपियाँ टाँक लो
भाग्य जब दर्द से आज़माए तुम्हें
तुम सृजन कर उसे जगमगाते रहो

क्या मिला, क्या अचानक पराया हुआ
इन सवालों का दामन नहीं थामना
जब कभी धड़कनों में विकलता बढ़े
ताल की चाल जैसा उसे साधना
अश्रुओं को रसों में अनूदित करो
और फिर देर तक मुस्कुराते रहो

एक दिन जब कथा मौन हो जाएगी
गीत ही ये कहानी पुनः गाएगा
तुम समर्पित हुए प्रीति की राह पर
पीढ़ियों को यही बात बतलाएगा
तुम सदा स्वार्थ के लोभ से हीन थे
इस अकथ की गवाही बनाते रहो

तुम अगर चाह लो पीर से टूटकर
जीवनी शक्तियों का अनादर करो
तुम अगर चाह लो दर्द की भेंट का
बाँह फैलाए सत्कार सादर करो
तुम अगर चाह लो छटपटाते रहो
तुम अगर चाह लो जग सजाते रहो

✍️ चिराग़ जैन

Monday, May 1, 2017

सुधार

आप इस नाराज़गी की फिक्र करना छोड़ भी दो
मैं अब अपनी चाहतों को डाँट कर बहला रहा हूँ

ये सही है, मैं हठी होने लगा हूँ बालकों सा
किन्तु हठ को आपकी अनुमति मिले, निश्चित नहीं है
मैं न जाने कौन सा अधिकार अनुभव कर रहा हूँ
आपकी इस भाव को स्वीकृति मिले, निश्चित नहीं है
आप मेरी अनुनयों के साथ जो जी चाहे कीजे
मैं प्रणय की प्रार्थना को साध कर टहला रहा हूँ

एक जंगल काटकर निकला नगर निर्माण करने
किन्तु उस वन की किसी शाखा ने अपनापन जताया
किस तरह उसको कुचल कर भूमि को श्रीहीन कर दूँ
जिस लचकती डाल पर मैं मन समूचा टाँक आया
लक्ष्य का संधान करने के समय है मोह शर से
मैं कदाचित् इस तरह का आदमी पहला रहा हूँ

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, April 26, 2017

शोर-शराबा क्यों है?

रे सागर! सच-सच बतला दे
इतना शोर शराबा क्यों है
भीतर तो चुप-चुप रहता है
तट पर मार दिखावा क्यों है

मीठी नदिया के पानी को, तू है इतना प्यारा सागर
वो तो तुझमें डूब गई पर, तू ख़ारा का ख़ारा सागर
इन लहरों में इक नदिया की कलकल का परछावा क्यों है

दिन भर सूरज की गर्मी का चुप-चुप तूने भार उठाया
चंदा शीतल था तो तूने कितना भीषण ज्वार उठाया
उद्दण्डों से भय कैसा है, भद्रजनों पर धावा क्यों है

तू जग में सर्वाधिक विस्तृत, तू जग में सर्वाधिक गहरा
तू ही दुनिया भर के मोती-मूंगों का भी स्वामी ठहरा
इतना सब वैभव पाकर भी, सबसे अधिक अभागा क्यों है

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, April 20, 2017

कुछ ग़लत भी नहीं

कुछ सही भी नहीं, कुछ ग़लत भी नहीं
प्रेम फंसता नहीं ज्ञान-अज्ञान में
प्राण तो सृष्टि भर से अधर हो गए
देह उलझी रही मान-अपमान में

प्रेम ने जब हृदय को सहज कर दिया
कोई सीमा बची ही नहीं लाज की
श्याम के बालपन पर सलोनी लगी
नग्नता और निर्लज्जता आज की
लाज दो हालतों में सताती नहीं
एक अपनत्व में एक अज्ञान में

जब कभी भी समर्पण की नौका चढ़ा
प्यार बैकुंठ की देहरी पा गया
फँस गया जब कभी स्वार्थ के जाल में
बस तभी वासना का धुआं छा गया
कुछ समस्याओं में ही फँसे रह गए
कुछ मगन हो रहे हैं समाधान में

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, April 18, 2017

सैनिक का दावा

ये शेरों की दहाड़ें झूठ हैं, कोरा दिखावा है
हमें अपनों से ख़तरा है, ये हर सैनिक का दावा है
बहुत लाचार हैं; पैरों में बेड़ी है सियासत की
वगरना हाथ में बंदूक है, सीने में लावा है

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, April 8, 2017

आकांक्षा

मैं तुम्हारी आँख में कुछ स्वप्न अपने आँज आया
तुम मेरे सपनों को अपने आँसुओं में मत बहाना

जब तुम्हें आभास हो, गंतव्य दुर्गम हो रहा है
या सफलता के प्रयासों के जकड़ ले पाँव कोई
राह का मौसम गुलाबी हो करे कर्तव्य विस्मृत
या तुम्हें आकृष्ट कर बैठे, मनोहर गाँव कोई
तब घड़ी भर देखना दर्पण में अपनी पुतलियों को
तब घड़ी भर इस अनोखे स्वप्न से आँखें मिलाना

एक दिन तुमको समूची साधना मिथ्या लगेगी
एक दिन उलझाएगी तुमको इसी पथ की पहेली
एक दिन थककर तुम्हारे पाँव भी दुखने लगेंगे
एक दिन तुम भी चलोगी साधना-पथ पर अकेली
बस उसी दिन जान लेना, है बहुत नज़दीक मंज़िल
बस उसी दिन और भी जीवट जुटाकर पग बढ़ाना

मन्त्र हैं निष्प्राण उनमें साधना के प्राण भर दो
शब्द को अनुभूतियों का स्पर्श दो, वह जी उठेगा
जिस समंदर ने तुम्हारे वक़्त की नैया डुबोई
चंद्रमा की ओर बढ़ता ज्वार उससे ही उठेगा
जब नई आभा छलक आए सफलता के नयन में
तब नयन की कोर पर उसको सजाकर मुस्कुराना

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, April 6, 2017

परलोक की अवधारणा

सत्य तो लगती नहीं, परलोक की अवधारणा पर
आपसे मिलने की हर इक आस इस ही पर टिकी है
हाथ की रेखाओं का कोई नहीं हो अर्थ फिर भी
आपसे आजन्म दूरी की कथा इनमें लिखी है

कुछ नहीं होता है करवा चौथ के निर्जल व्रतों से
किन्तु अपनी आस्था को घोल देना अर्घ्य जल में
पत्थरों के कान सुन पाते नहीं हैं प्रार्थनाएँ
किन्तु संशय आप मत रखना तपश्चर्या के बल में
आस्था होगी विजय, तो मान्यता यह ध्वस्त होगी
है वही सच, जो मेरी आँखों के आगे भौतिकी है

इस जनम में चूक हो जाए किसी सम्बन्ध की तो
कोई भव उसकी सटीकी के लिए होता तो होगा
जिस कृषक ने शुष्क भू पर धान रोपी मूढ़ता से
वह कभी बिल्कुल सही फसलें कहीं बोता तो होगा
कर्मकाण्डों की निठुरता से सदा ही क्षुब्ध हूँ मैं
किन्तु व्यवहारिक जगत् में भावना सस्ती बिकी है

✍️ चिराग़ जैन