सुलगते ही रहें तो ठीक हैं जज़्बात, रहने दो
हुए खाली तो रोटी मांग लेंगे हाथ, रहने दो
कोई मुद्दा उठाकर आप अपनी कुर्सियां जोड़ो
वतन की फ़िक्र किसको है, अमां ये बात रहने दो
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Monday, July 17, 2017
Sunday, July 16, 2017
अपना कहकर मिलते थे
अपने क़द के भीतर रहकर मिलते थे
नाराज़ों से आप सुलह कर मिलते थे
हम तो उनसे उस मुद्दत से वाकिफ़ हैं
जब वो हमको अपना कहकर मिलते थे
✍️ चिराग़ जैन
नाराज़ों से आप सुलह कर मिलते थे
हम तो उनसे उस मुद्दत से वाकिफ़ हैं
जब वो हमको अपना कहकर मिलते थे
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Hippocratic,
Muktak,
Poetry,
Pseudo,
Relations,
Website,
पद्य,
मुक्तक
Thursday, July 6, 2017
हिंदी-चीनी भाई-भाई
ओ मगरमच्छ के भ्रष्ट रूप, ओ दानव के कल्पित स्वरूप
इतिहास हमें बतलाता है, बड़बोला हानि उठाता है
बासठ की याद दिलाते भी, क्या बिल्कुल लाज नहीं आई
तब तेरे पुरखे भजते थे, हिंदी-चीनी भाई-भाई
ऊपर-ऊपर मीठा बनता, भीतर से खड़े सरौते सा
कहने भर को चीनी है पर, कड़वा है सड़े चिरौते सा
तिब्बत को आँख दिखाता है, लतियाता है शरणागत को
छल-द्वेष-धूर्तता ओढ़-ओढ़, शर्मिंदा किया तथागत को
क्या पता कौन सा दाँव कहाँ, कब कैसा मंज़र ले आए
ये सड़क बनाने का चस्का, कब तुझे सड़क पर ले आए
ओ चीनी मिट्टी से चिकने, ओ ड्रैगन से अस्तित्वहीन
ये बात भलाई की सुन ले, मत अहंकार में फूल चीन
तुझसे बातें करने में भी, नज़रें नीची करता भारत
ये बासठ वाला दौर नहीं, लड़ने से कब डरता भारत
ये समय विश्व-बंधुत्व का है, अब झगड़ा-वगड़ा ठीक नहीं
मानवता के उन्नति पथ पर, आपस का रगड़ा ठीक नहीं
भारत के सिंह दहाड़े तो, तेरा ड्रैगन डर जाएगा
दिल्ली शॉपिंग बंद कर दे तो, पीकिंग भूखा मर जाएगा
फिर भी मन बना चुका है तो तू देख लड़ाके भारत के
तू बस माचिस को हाथ लगा, फिर झेल धमाके भारत के
हम अनुनय भी कर सकते हैं, हम तीर चलाना भी जानें
सागर पूजन करते-करते, सागर लंघ जाना भी जानें
सागरमाथा फिर देखेगा बल-पौरुष कंचनजंगा का
फिर से गौरव गुंजित होगा दुनिया में अमर तिरंगा का
हम संख्या में हैं न्यून किन्तु हिम्मत में तुझसे न्यारे हैं
पाण्डव हर युग में जीते हैं कौरव हर युग में हारे हैं
है शांतिपर्व अंतिम अवसर समझौते वाली बोली का
इसके उपरांत महोत्सव है माँ रणचण्डी की डोली का
आमंत्रण मत दे मातम को ओ हठधर्मी दो पल डट जा
तेरा हित सिर्फ़ इसी में है सेना लेकर पीछे हट जा
✍️ चिराग़ जैन
बासठ की याद दिलाते भी, क्या बिल्कुल लाज नहीं आई
तब तेरे पुरखे भजते थे, हिंदी-चीनी भाई-भाई
ऊपर-ऊपर मीठा बनता, भीतर से खड़े सरौते सा
कहने भर को चीनी है पर, कड़वा है सड़े चिरौते सा
तिब्बत को आँख दिखाता है, लतियाता है शरणागत को
छल-द्वेष-धूर्तता ओढ़-ओढ़, शर्मिंदा किया तथागत को
क्या पता कौन सा दाँव कहाँ, कब कैसा मंज़र ले आए
ये सड़क बनाने का चस्का, कब तुझे सड़क पर ले आए
ओ चीनी मिट्टी से चिकने, ओ ड्रैगन से अस्तित्वहीन
ये बात भलाई की सुन ले, मत अहंकार में फूल चीन
तुझसे बातें करने में भी, नज़रें नीची करता भारत
ये बासठ वाला दौर नहीं, लड़ने से कब डरता भारत
ये समय विश्व-बंधुत्व का है, अब झगड़ा-वगड़ा ठीक नहीं
मानवता के उन्नति पथ पर, आपस का रगड़ा ठीक नहीं
भारत के सिंह दहाड़े तो, तेरा ड्रैगन डर जाएगा
दिल्ली शॉपिंग बंद कर दे तो, पीकिंग भूखा मर जाएगा
फिर भी मन बना चुका है तो तू देख लड़ाके भारत के
तू बस माचिस को हाथ लगा, फिर झेल धमाके भारत के
हम अनुनय भी कर सकते हैं, हम तीर चलाना भी जानें
सागर पूजन करते-करते, सागर लंघ जाना भी जानें
सागरमाथा फिर देखेगा बल-पौरुष कंचनजंगा का
फिर से गौरव गुंजित होगा दुनिया में अमर तिरंगा का
हम संख्या में हैं न्यून किन्तु हिम्मत में तुझसे न्यारे हैं
पाण्डव हर युग में जीते हैं कौरव हर युग में हारे हैं
है शांतिपर्व अंतिम अवसर समझौते वाली बोली का
इसके उपरांत महोत्सव है माँ रणचण्डी की डोली का
आमंत्रण मत दे मातम को ओ हठधर्मी दो पल डट जा
तेरा हित सिर्फ़ इसी में है सेना लेकर पीछे हट जा
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
China,
Chirag Jain,
Indo-China Dispute,
Kavita,
Patriotic,
Poetry,
War,
Website,
कविता,
पद्य
Wednesday, July 5, 2017
लतीफ़ा
सभी होठों पे इक मुस्कान धरता है लतीफ़ा
हरेक महफ़िल में सुन्दर रंग भरता है लतीफ़ा
किसी मनहूस के कानों में पड़कर घुंट न जाए
इसी इक बात से हर रात डरता है लतीफ़ा
गली, नुक्कड़, सफ़र, महफ़िल, महोत्सव और दफ़्तर
अमां हर मोड़ से खुलकर गुज़रता है लतीफ़ा
उछलता है, हंसाता है, ख़ुशी देता है सबको
भला बदले में कब कुछ मांग करता है लतीफ़ा
लतीफ़े का अगर भावार्थ समझाना पड़े तो
अरे इस हाल में तिल-तिल के मरता है लतीफ़ा
लतीफ़ागोई के उस्ताद ही ये जानते हैं
बड़ी मुश्क़िल से होंठों पर संवरता है लतीफ़ा
लतीफ़े यूज़ करके जो लतीफ़े को हिकारें
उन्हीं लोगों की संगत से सिहरता है लतीफ़ा
✍️ चिराग़ जैन
हरेक महफ़िल में सुन्दर रंग भरता है लतीफ़ा
किसी मनहूस के कानों में पड़कर घुंट न जाए
इसी इक बात से हर रात डरता है लतीफ़ा
गली, नुक्कड़, सफ़र, महफ़िल, महोत्सव और दफ़्तर
अमां हर मोड़ से खुलकर गुज़रता है लतीफ़ा
उछलता है, हंसाता है, ख़ुशी देता है सबको
भला बदले में कब कुछ मांग करता है लतीफ़ा
लतीफ़े का अगर भावार्थ समझाना पड़े तो
अरे इस हाल में तिल-तिल के मरता है लतीफ़ा
लतीफ़ागोई के उस्ताद ही ये जानते हैं
बड़ी मुश्क़िल से होंठों पर संवरता है लतीफ़ा
लतीफ़े यूज़ करके जो लतीफ़े को हिकारें
उन्हीं लोगों की संगत से सिहरता है लतीफ़ा
✍️ चिराग़ जैन
Saturday, July 1, 2017
मेरी डायरी से पूछ लो
सच समझते आदमी की बेक़ली से पूछ लो
नेकियाँ ख़ामोश क्योंकर हैं, बदी से पूछ लो
मैं कहाँ कह पाऊँगा अपनी हकीक़त मंच से
यूँ करो तुम जा के मेरी डायरी से पूछ लो
एक गिरते आदमी पर हँस पड़ी तो क्या हुआ
पुत्र के शव पर बिलखती द्रौपदी से पूछ लो
दूसरों की बेहतरी का मोल क्या होगा जनाब
फैक्टरी के पास से गुज़री नदी से पूछ लो
इल्म का कोरा दिखावा हो चुका हो तो हुज़ूर
मसअले का हल चलो अब सादगी से पूछ लो
ज़िन्दगी जीने का सबसे ख़ूबसूरत क्या है ढंग
जिस सदी में हम हुए हैं, उस सदी से पूछ लो
✍️ चिराग़ जैन
नेकियाँ ख़ामोश क्योंकर हैं, बदी से पूछ लो
मैं कहाँ कह पाऊँगा अपनी हकीक़त मंच से
यूँ करो तुम जा के मेरी डायरी से पूछ लो
एक गिरते आदमी पर हँस पड़ी तो क्या हुआ
पुत्र के शव पर बिलखती द्रौपदी से पूछ लो
दूसरों की बेहतरी का मोल क्या होगा जनाब
फैक्टरी के पास से गुज़री नदी से पूछ लो
इल्म का कोरा दिखावा हो चुका हो तो हुज़ूर
मसअले का हल चलो अब सादगी से पूछ लो
ज़िन्दगी जीने का सबसे ख़ूबसूरत क्या है ढंग
जिस सदी में हम हुए हैं, उस सदी से पूछ लो
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Draupdi,
Ghazal,
Mahabharata,
Mythology,
Poet,
Poetry,
Pollution,
Website,
Writers,
ग़ज़ल,
पद्य
Thursday, June 22, 2017
समय-समय का फेर
सुबह-सवेरे देवालय में जो धुल-धुल अर्पित होते थे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
ना राघव के तीर बहुत था, ना सीता का त्रास बहुत था
रावण के मरने की ख़ातिर, अपनों का विश्वास बहुत था
अवसर पाकर बहुत विभीषण, भाईचारा तजते देखे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
जो तूती के स्वर में अपनी, ताल मिलाकर इतराते थे
यश-वैभव के हर उत्सव में ठुमक-ठुमक सोहर गाते थे
महल ढहा तो वो ही घुंघरू, ढोल सरीखे बजते देखे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
आँच चिता की रोटी सेंके तो जिनको परहेज नहीं था
निज हितसाधन में कोई मरता हो तनिक गुरेज़ नहीं था
एक दिवस हमने वे सारे, रामभजन भी भजते देखे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
✍️ चिराग़ जैन
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
ना राघव के तीर बहुत था, ना सीता का त्रास बहुत था
रावण के मरने की ख़ातिर, अपनों का विश्वास बहुत था
अवसर पाकर बहुत विभीषण, भाईचारा तजते देखे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
जो तूती के स्वर में अपनी, ताल मिलाकर इतराते थे
यश-वैभव के हर उत्सव में ठुमक-ठुमक सोहर गाते थे
महल ढहा तो वो ही घुंघरू, ढोल सरीखे बजते देखे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
आँच चिता की रोटी सेंके तो जिनको परहेज नहीं था
निज हितसाधन में कोई मरता हो तनिक गुरेज़ नहीं था
एक दिवस हमने वे सारे, रामभजन भी भजते देखे
शाम तलक वे रंग बदलकर वेश्यालय में सजते देखे
✍️ चिराग़ जैन
Saturday, June 17, 2017
सफ़हे पलटते रहते हैं
ज़िन्दगानी है, या कोई किताब अनजानी
साँस चलती है या सफ़हे पलटते रहते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Couplet,
Ghazal,
Philosophy,
Poetry,
Website,
ग़ज़ल,
पद्य
Wednesday, June 14, 2017
ओछी हथेली
कंकडी को यदि तिजोरी में रखोगे
वो कनक का मूल्य जाँचेंगी यक़ीनन
क़ामयाबी से जुडी ओछी हथेली
सभ्यता का मुँह तमाचेंगी यक़ीनन
एक नग़्मा लिख लिया जिसने वही अब
वेद के वैभव पर अपना रौब झाड़े
डीप फ्रीज़र में पड़ा टुकड़ा ज़रा सा
हिमशिखर की श्वेत चादर को लताड़े
वेदियों में नगरवधुएँ मत बिठाओ
महफ़िलों में रोज़ नाचेंगी यक़ीनन
कृष्ण की रणनीति से अर्जुन लड़ेगा
कीर्ति फिर भी कर्ण के मस्तक चढ़ेगी
चक्रव्यूहों में जयी हो या नहीं हो
रीति तो अभिमन्यु का ही यश गढ़ेगी
आज तुम छल से समर को जीत जाओ
कल कथाएँ सत्य बाँचेंगी यक़ीनन
✍️ चिराग़ जैन
वो कनक का मूल्य जाँचेंगी यक़ीनन
क़ामयाबी से जुडी ओछी हथेली
सभ्यता का मुँह तमाचेंगी यक़ीनन
एक नग़्मा लिख लिया जिसने वही अब
वेद के वैभव पर अपना रौब झाड़े
डीप फ्रीज़र में पड़ा टुकड़ा ज़रा सा
हिमशिखर की श्वेत चादर को लताड़े
वेदियों में नगरवधुएँ मत बिठाओ
महफ़िलों में रोज़ नाचेंगी यक़ीनन
कृष्ण की रणनीति से अर्जुन लड़ेगा
कीर्ति फिर भी कर्ण के मस्तक चढ़ेगी
चक्रव्यूहों में जयी हो या नहीं हो
रीति तो अभिमन्यु का ही यश गढ़ेगी
आज तुम छल से समर को जीत जाओ
कल कथाएँ सत्य बाँचेंगी यक़ीनन
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Geet,
Hippocratic,
Mahabharata,
Opportunist,
Poetry,
Selfish,
Website,
गीत,
छूकर निकली है बेचैनी,
पद्य
Location:
Mussoorie, Uttarakhand, India
Tuesday, June 13, 2017
सघन तलाशी
सघन तलाशी समय करेगा, धीरज के गठरी-झोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
देख रही हैं उनकी आँखें, षड्यंत्रों के दृश्य घिनौने
फिर भी त्याग नहीं पाए वे, अपने संयम के मृगछौने
सूरज पूजा करता होगा, श्वासों में भड़के शोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सच जबड़े भींचे बैठा है, झूठ निरंतर बोल रहा है
अपराधों के उत्सव में बस, निर्दोषों का मोल रहा है
मासूमों की किलकारी ही, आज चुनौती हथगोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सहना है तो सह ही लेंगे, कठिन समय की पीर विजेता
कुछ मुठभेड़ों से उकताकर, तनिक न खोते धीर विजेता
प्राण गँवाकर और बढ़ेगी, रंगत बासंती चोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
✍️ चिराग़ जैन
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
देख रही हैं उनकी आँखें, षड्यंत्रों के दृश्य घिनौने
फिर भी त्याग नहीं पाए वे, अपने संयम के मृगछौने
सूरज पूजा करता होगा, श्वासों में भड़के शोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सच जबड़े भींचे बैठा है, झूठ निरंतर बोल रहा है
अपराधों के उत्सव में बस, निर्दोषों का मोल रहा है
मासूमों की किलकारी ही, आज चुनौती हथगोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सहना है तो सह ही लेंगे, कठिन समय की पीर विजेता
कुछ मुठभेड़ों से उकताकर, तनिक न खोते धीर विजेता
प्राण गँवाकर और बढ़ेगी, रंगत बासंती चोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Challenges,
Chirag Jain,
Fortune,
Geet,
Motivation,
Poetry,
Positivity,
Struggle,
Success,
time,
Website,
गीत,
छूकर निकली है बेचैनी,
पद्य
Location:
Delhi, India
Sunday, June 11, 2017
संयम का उपदेश
जब मन में ताण्डव करते हों संबंधों के क्लेश
तब कोई भी दे सकता है संयम का उपदेश
धीरज संग ढहने लगते जब यादों के अवशेष
ऐसे में पीड़ा देता है संयम का उपदेश
भाई का शव देख हुआ जब एक विभीषण क्लांत
तब यह ज्ञान मिला संकट में मन को रखिये शांत
ओछे हैं जो पीड़ा लखकर खो देते हैं धीर
दारुण दुख पाकर संयत हों वे ही सच्चे वीर
लक्ष्मण पर मूच्र्छा छाई तो बदल गया परिवेश
जो अर्जुन को समझाते थे, है संसार असार
पूर्व नियत घटनाओं का ही आभासी विस्तार
बंधु, सखा, परिवार, पितामह, शैशव के अनुबंध\
जो समझाते थे मिथ्या हैं ये सारे संबंध
वो रो-रोकर भिजवाते थे राधा को संदेश
✍️ चिराग़ जैन
तब कोई भी दे सकता है संयम का उपदेश
धीरज संग ढहने लगते जब यादों के अवशेष
ऐसे में पीड़ा देता है संयम का उपदेश
भाई का शव देख हुआ जब एक विभीषण क्लांत
तब यह ज्ञान मिला संकट में मन को रखिये शांत
ओछे हैं जो पीड़ा लखकर खो देते हैं धीर
दारुण दुख पाकर संयत हों वे ही सच्चे वीर
लक्ष्मण पर मूच्र्छा छाई तो बदल गया परिवेश
जो अर्जुन को समझाते थे, है संसार असार
पूर्व नियत घटनाओं का ही आभासी विस्तार
बंधु, सखा, परिवार, पितामह, शैशव के अनुबंध\
जो समझाते थे मिथ्या हैं ये सारे संबंध
वो रो-रोकर भिजवाते थे राधा को संदेश
✍️ चिराग़ जैन
Labels:
Chirag Jain,
Geet,
Gita,
Hippocratic,
Krishna,
Lakshmana,
Loneliness,
Mahabharata,
Mythology,
Poetry,
Ram,
ramayana,
Website,
गीत,
छूकर निकली है बेचैनी,
पद्य
Location:
आगरा, उत्तर प्रदेश, भारत
Subscribe to:
Posts (Atom)