Thursday, February 15, 2018

वैदेही वनवासी है

रघुपति राघव के चेहरे पर गहरी आज उदासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

राजसूय के आयोजन का वैभव आज पधारा है
इक राघव के मन से बाहर हर कोना उजियारा है
गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़े, शुभ-मंगल और छप्पन भोग
राम समझते हैं क्षणभंगुर हैं ये सब के सब संयोग
जनकसुता का प्रेम लब्ध है, बाकी सब आभासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

रघुकुल राघव की जय-जय से धरती-नभ आच्छादित है
कीर्ति ध्वजा की सजधज लखकर जन-गण-मन आह्लादित है
किन्तु सियावर राम हृदय को यह उत्सव इक तर्पण है
प्राणप्रिया सीता पीड़ित है, धोबी को आमंत्रण है
बाहर राजा-सा दिखता है, भीतर इक संन्यासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

पूजन में तो स्वर्णसिया से रीति निभा ली जाएगी
किन्तु हिया से नेह लुटाती प्रीति कहाँ से आएगी
उच्चारण होगा मंत्रों का, यज्ञ प्रखरता पाएगा
किन्तु वियोगी मन समिधा से पूर्व भस्म हो जाएगा
प्रियतम के बिन क्या उद्यापन, विरही मन उपवासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, February 14, 2018

मोल केवल ध्येय का है

प्रश्न तो उद्देश्य का है, मोल केवल ध्येय का है
जो मिला आशीष बनकर, अर्थ उस पाथेय का है
मात्र जीने के लिए सब लोग जीकर मर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।

जो सहजता से नियत पथ पार कर उजियार देगी
बस उसी पहली किरण को अर्घ्य का वैभव मिलेगा
बादलों के द्वंद से भी दामिनी उत्पन्न होगी
किन्तु इस हठधर्मिता को मान वैसा कब मिलेगा
एक प्राची की उपज है, एक गर्जन की सहेली
एक को जग पूजता है, एक से सब डर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।

एक गोवर्द्धन उठाकर कृष्ण गिरधारी कहाए
द्रोणपर्वत हाथ पर धर लाए थे हनुमान सारा
किन्तु जब कैलाश को लंका लिवाने चल दिया तो
शक्ति के मद में पगा लंकेश का अभिमान हारा
एक जग कल्याण का था, एक निज अभिमान का था
एक मन भीतर विराजे, एक मन बाहर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।

कृष्ण ने जिस काल में युग के हृदय पर छत्र पाया
कंस ने उस ही समय में लोकनिंदा पाई जग से
जब युधिष्ठिर धर्म की सीमा समझकर लड़ रहे थे
तब सुयोधन कर रहा था, धूर्तता-चतुराई जग से
एक रावण का अहम था, एक राघव की सरलता
एक ने कुल को डुबोया, एक के पत्थर बहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन

Monday, February 12, 2018

समझौता

अपने स्वर्ण सरीखे शब्दों में मैं अगर मिलावट कर लूँ
तो चमकीले पत्थर मेरे भी जीवन में जड़ जाएंगे
कुंदन जैसे शुद्ध विचारों में कुछ समझौता घुल जाए
तो मेरे हित नित्य सफलता के आभूषण गढ़ जाएंगे

चंदन कहकर कीकर बेचूँ -लाभ यही है, मंत्र यही है
लोभ प्रपंचों की दुनिया में धर्म यही है, तंत्र यही है
लेकिन ऐसी विजय पताका किन हाथों से फहराऊंगा
दर्पण के सम्मुख आया तो मैं कैसे मुख दिखलाऊँगा
जिस दिन मेरा पेट विवश कर देगा गर्दन के झुकने को
उस दिन मेरी ख़ुद्दारी के दावे झूठे पड़ जाएंगे

नैतिक शिक्षा की पुस्तक का ज्ञान भुलाना आवश्यक है
अपने आदर्शों के शव का कुचला जाना आवश्यक है
भौतिक सुख की नीरस आँखों में काजल शोभा पाएगा
लेकिन अपने अंतर्मन की भस्म बनाना आवश्यक है
मानव का तन कोरा शव है, शेष न हो यदि लाज ज़रा भी
दैहिक सुख तो यहाँ धरा पर पड़े-पड़े ही सड़ जाएंगे

महल-दुमहलों की रंगत से, नेह भरा छप्पर बेहतर है
रेशम के महंगे चोगों से कबिरा की चादर बेहतर है
भीष्म पितामह के सीने पर बाण चलाते अर्जुन से तो
पुत्रविरह में कट कर गिरता द्रोण तुम्हारा सिर बेहतर है
आश्रम में रहकर संन्यासी संबंधों की लाज रखेंगे
महलों में रहकर दो भाई आपस में ही लड़ जाएंगे

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, February 10, 2018

बेरोज़गारी का उपाय

यौवन के हाथ करछी-कड़ाही में घिरे तो
सीमाओं पे शत्रुओं के बान कौन थामेगा
चटनी के स्वाद चखने लगी जवानी गर
बैरियों की तिरछी जुबान कौन थामेगा
जनता के दुःख देखकर जब धरती पे
फटने लगेगा आसमान; कौन थामेगा
देश के युवा यदि पकौड़े बेचने लगे तो
देश के विकास की कमान कौन थामेगा
✍️ चिराग़ जैन

Ref : Prime minister states pakaude talo to berozgari nahi rahegi

Monday, January 29, 2018

अवसान

सुबह उगे सूरज का ढलना निश्चित है हर शाम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

जिनका जीवन ग्रंथ हुआ था
जिनका कीना पंथ हुआ था
जो रावण का काल बन गए
मानवता का भाल बन गए
जिनने दीन अहिल्या तारी
जिनने युग की भूल सुधारी
जिनके चिन्ह क्षितिज पर ठहरे
जिनके तप से पत्थर तैरे
सरयू की लहरों में उतरे वो पुरुषोत्तम राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

जिनकी कीर्ति युगों से ऊँची
आभारी थी सृष्टि समूची
गीता के उद्घोषक थे जो
पाण्डव दल के पोषक थे जो
यौवन पर उपकार रहे जो
कष्टों का उपचार रहे जो
भीषण रण के नायक थे जो
द्वापर के अधिनायक थे जो
केवल भ्रम की भेंट चढ़े थे वो माधव घनश्याम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

अपना क्या अस्तित्व यहाँ पर
जंगल में इक कीट बराबर
हम कितने भोले-भाले हैं
दायित्वों का भ्रम पाले हैं
कितने आए, कितने बीते
जग के कीर्ति कलश कब रीते
छिटका कर कुछ दिन को छींटे
थोड़े हारे, थोड़े जीते
हम भी छोड़ चले जाएंगे जीवन का संग्राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, January 28, 2018

इनबाॅक्स के शुभचिंतक

मेरे हितचिंतको!
रोज़ सुबह जब मैं मोबाइल उठाता हूँ तो मेरा व्हाट्सएप्प आपके संदेशों से लदा हुआ होता है। मेरे निरुत्तर रहने के बावजूद आप ‘मा फलेषु कदाचन’ का अनुगमन करते हुए बिना मतलब की ‘गुड मॉर्निंग’ भेजना नहीं भूलते। मेरे शुभाकांक्षियो, आपके द्वारा भेजे जा रहे लाल-पीले फूलों को गूगल पर देख-देखकर मैं ऊब चुका हूँ। और उसके नीचे जो टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में ‘गुड मॉर्निंग’ या ‘गुड नाईट’ लिखकर आप इतराते हैं वह सब इतना बासी हो गया है कि अब उन फूलों से सड़ांध उठने लगी है।
आपकी निष्ठा देखकर मन गंधाने लगता है कि आपके पास जैसे ही कोई कूड़ा-करकट टाइप का फॉरवर्डेड मैसेज आता है आप तुरंत ‘सर्वकार्य त्यक्तेन’ उसे मेरे व्हाट्सएप्प पर दे मारते हैं। तिल के तेल से लेकर अदरक, मेथी, गाजर, लहसुन और लौंग तक के इतने लाभ आप मुझे बता चुके हैं कि अब इन सबको एक साथ खाकर मर जाने का जी करने लगा है।
आपका सूचना तंत्र इतना प्रबल है कि दिल्ली पुलिस से लेकर रॉ तक को जैसे ही किसी संदिग्ध फोन नंबर की ख़बर मिलती है तो वो तुरंत आपको बताते हैं और आप मेरे प्रति अपने अनुराग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मुझे फॉरवर्ड कर देते हैं। पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद हो अथवा मिलावटखोरों की नई साज़िशें; आपके इनबॉक्स में हाज़िरी लगाए बिना पत्ता तक नहीं हिल पाता। और आप इन पत्तों से उत्पन्न आंधियों को मेरे व्हाट्सएप्प पर भेजकर मोक्ष पा लेते हैं।
वैष्णोदेवी के भवन से चला हुआ संदेश हो या अजमेर शरीफ के जिन्नात का हुक्म; हिन्दू धर्म पर मंडरा रहा ख़तरा हो या इस्लाम के खि़लाफ़ चल रही साज़िशें, अमरीका की गुप्तनीति हो या नासा की फ्यूचर प्लैनिंग ...सब कुछ सलीके से आपके व्हाट्सएप्प पर मत्था टेकने आता है और आप उसे मेरे मोबाइल पर फेंक देते हैं।
इतिहास के ऐसे-ऐसे तथ्य आप निकालकर लाते हैं कि अकबर से लेकर चंद्रगुप्त तक सबकी आँखे फट जाती हैं। खुशियाँ मनाने का कोई अवसर चूक न जाए इस उद्देश्य से आप दीपावली, होली, गणतंत्र दिवस, ईद, रमज़ान, गुरूपरब, स्वतंत्रता दिवस, वेलेंटाइन डे, नववर्ष, क्रिसमस, गुडी पड़वा, ओणम, पोंगल, आखा तीज, नरक चतुर्थी, सोमवती मावस, अहोई अष्टमी, करवा चौथ और यहाँ तक कि जलिकुट्टी की भी शुभकामनाएँ भेजने से पीछे नहीं रहते।
आप मुझे इतना प्यार करते हैं कि अपनी हर उपलब्धि मुझसे शेयर करना चाहते हैं। चूँकि मेरे बिना आपका हर त्योहार अधूरा है इसलिए आप न्यूनतम व्यवहार को भी अनदेखा करके अपने, अपनी पत्नी के, अपने बच्चों के, अपने रिश्तेदारों के और अपने दोस्तों के भी चित्र मेरे इनबॉक्स में चिपकाकर मुझसे जन्मदिन और वैवाहिक वर्षगाँठ की शुभकामनाओं की अपेक्षा करते हैं। आपके पड़ोस में भी कोई मर जाए तो उसकी उठावनी की सूचना मुझ तक अवश्य आती है कि न जाने कब मेरा उस अज्ञात दिवंगत के प्रति मोह जाग जाए।
आपके घर में नई गाड़ी आती है और मेरे इनबॉक्स में उसका चित्र टांग दिया जाता है। आप फ़िल्म देखकर आते हैं और सज़ा मेरे इनबॉक्स को मिलती है। आपका कहीं सम्मान होता है और आप मेरे इनबॉक्स में पहुँचकर प्रशंसा की अपेक्षा करने लगते हैं। आप किसी सेलिब्रिटी के साथ फोटो खिंचवाते हैं और मेरे इनबॉक्स में पिंग हो जाता है। आप खिचड़ी खाने का निर्णय लेते हैं और खिचड़ी के लाभ का रायता मेरे इनबॉक्स में बिखर जाता है। आप सब्ज़ी खरीदते हुए सेल्फी खींचते हैं और मेरे इनबॉक्स में सब्जी मंडी लगा दी जाती है।
आपके इतने अधिक अपनत्व के कारण मुझे व्हाट्सएप्प से डर लगने लगा है। आपकी निरंतरता और अनर्गल सक्रियता के कारण मैं व्हाट्सएप्प पर आनेवाले आवश्यक संदेशों की भी अनदेखी करने लगा हूँ।
मैं अपने प्रति आपकी इस चिंता से अनुग्रहित हूँ और आपको दोनों हाथ जोड़कर यह बता देना चाहता हूँ कि आप जिन बासी चुटकुलों को ‘मार्केट में नया है’ के टैग के साथ पेलते हैं उन्हें सुनकर मुझें पाँचवी कक्षा में भी हँसी नहीं आती थी। मैं आपको यह भी सूचित करना चाहता हूँ कि मेरा हास्यबोध और संवेदना बोध श्रेष्ठ साहित्य से सिक्त होकर काफी आगे बढ़ चुका है और आपके बेमतलब फॉरवर्डेड संदेश उस स्तर तक नहीं पहुँच पाते। आपके गुड मॉर्निंग मेसेज को डिलीट करने में जो समय नष्ट होता है उसका सदुपयोग करूँ तो मैं कुछ सृजन कर लूंगा।
आपकी प्रशंसा लोलुपता मुझे व्हाट्सएप्प से आपको ब्लॉक करने के लिए प्रेरित करती है किन्तु संचार माध्यमों के महत्व को समझते हुए मैं ऐसा नहीं कर पाता। संचार के माध्यम सूचनाओं के सम्प्रेषण हेतु आविष्कृत हुए थे किंतु आपकी कचरा उंडेल प्रतियोगिता ने इन्हें सिर का दर्द बना दिया है। यदि आप इस माध्यम का उपयोग सूचनाओं एवं सृजन के प्रसारार्थ करें तो आपका सम्मान भी बना रहेगा और इन माध्यमों की उपयोगिता भी। फॉरवर्ड करने की हड़बड़ी में आप न जाने कितने ही अपवाद, विवाद और अफ़वाह प्रचारित करने लगते हैं।
इनबॉक्स प्रत्येक व्यक्ति का निजी अधिकार क्षेत्र है। उसमें घुसकर ज़बरदस्ती अपनी मूर्खताएँ पढ़ने-देखने-सुनने को विवश करना आपका अपमान बढ़ाता है। फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे कई कूड़ेघर हैं जहाँ आप कुछ भी डालकर अपनी भड़ास निकाल सकते हैं।
चाकू का आविष्कार तरकारी बिनारने के लिए ही किया जाए तो बेहतर है। यदि आप उससे हत्या करने लगें तो इससे चाकू की साख भी ख़तरे में पड़ेगी और आपका चरित्र भी। आशा है आज के बाद आप या तो मुझे अपनी बेमतलब ब्रॉडकास्टिंग सूचियों से हटा देंगे अथवा मेरा नम्बर ब्लॉक कर देंगे ...दोनों ही स्थितियों में आपका आभारी रहूंगा।
✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 26, 2018

गणतंत्र दिवस

आज राजपथ पर महाराष्ट्र की झाँकी निकली तो महाकवि भूषण के घनाक्षरी से पूरा वातावरण काव्यमय हो गया। अभी भूषण की धमक गूंज ही रही थी कि छत्तीसगढ़ की झाँकी महाकवि कालिदास की विशाल मूर्ति और मेघदूत के श्लोकोच्चार के साथ पुनः कविता का जयघोष करती निकल गई। 

कल गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर भोपाल में था। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग ने राष्ट्रकवि प्रदीप सम्मान अर्पण समारोह का आयोजन किया था। जिस समय "अंग्रेजो भारत छोड़ो" के उद्घोष को राजद्रोह घोषित करके स्वाधीनता के नायकों को जेल में ठूसा जा रहा था उस समय एक ब्राह्मण के बेटे ने उसी नारे को थोड़ा सलीके से रचकर जनता के आक्रोश को जीवंत रखने का विद्वतकर्म किया। जब तक अंग्रेज सरकार को यह ज्ञात हुआ कि "दूर हटो ऐ दुनियावालो हिंदुस्तान हमारा है" एक फिल्मी गीत मात्र न होकर स्वाधीनता संग्राम का उद्घोष है; तब तक आज़ादी की ललक फिल्मी पर्दे पर चढ़कर पूरे देश में फैल चुकी थी। 

प्रदीप जी ने ऐसे ऐसे विलक्षण गीत रचे कि अनायास ही भारतीय शौर्य के अद्वितीय गायक बन गए। स्वाधीनता के बाद जब 62 की लड़ाई में भारतीय बेटों की अर्थियां पूरे देश को उद्वेलित कर रही थीं तब मेजर शैतान सिंह भाटी की शहादत से बेचैन होकर प्रदीप जी ने वह अमर तराना रच दिया जिसके बिना भारतीय राष्ट्रप्रेम की कथा लिखी ही नहीं जा सकती। 26 जनवरी 1963 को पहली बार लता जी ने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में "ऐ मेरे वतन के लोगो" को स्वर दिया तो ऐसा लगा जैसे किसी झुंझलाए हुए बच्चे से किसी ने उसका हाल पूछ लिया हो। एक गीत ने पूरे देश की आँखें नम कर दी। भारतीय सेना के शौर्य की गाथा इस करीने से बयान हुई कि युद्ध की पीर लोगों में सिहरन पैदा कर गई।

कल के समारोह में ये सारे किस्से एक-एक कर जीवंत हो गए। मंच पर प्रदीप जी की सुपुत्री मुटुल जी और कैफ भोपाली साहब की सहबज़ादी परवीन कैफ उपस्थित थीं। गत चार दशक से भारत में वीर रस के पर्याय के रूप में प्रतिष्ठापित डॉ हरिओम पँवार को राष्ट्रकवि प्रदीप सम्मान अर्पित किया गया।

सुबह गणतंत्र दिवस की परेड देखने के लिए टेलीविज़न ऑन किया तो लता जी वही अमर गीत गाती दिखीं। दूर कहीं किसी समारोह से 'कर चले हम फिदा' की स्वरलहरी सुनाई दी। अभी होशंगाबाद जाने के लिए टैक्सी मंगाई तो रेडियो पर "ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम" सुन रहा हूँ।

भारत की जनता में गहरे तक बसे इस देशभक्ति के जज़्बे को सलाम। ज़माने भर की व्यस्तताओं के बीच भी कैसे अचानक से हमारी देशभक्ति अपने विराट रूप में प्रकट होकर पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध जाती है; यह सुखकारी है। 

इस देशभक्ति के जीर्णोद्धार में "वंदेमातरम" से लेकर "जन-गण-मन" तक और "सारे जहाँ से अच्छा" से लेकर "ऐ मेरे प्यारे वतन" तक के असंख्य गीतों का योगदान हमारे कवि हृदय में नई ऊर्जा का संचरण कर देता है। 

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव तंत्र

एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
हम लोकतंत्र की ज़मीन बेच देते हैं
एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
जनता का धर्म और दीन बेच देते हैं
एक नेता बोला हम बन के मुंगेरी लाल
जनता को सपने हसीन बेच देते हैं
जनता ने कहा हम वायदों की बीन पर
काले कोबरा को आस्तीन बेच देते हैं

✍️ चिराग़ जैन

प्रतीक्षा

ओ मथुरा के राजा सुन ले, वैभव से फुरसत पाए तो
गोकुल की गलियों में अब भी फाग प्रतीक्षारत बैठा है
दरबारों के जयकारों से जब भी मन उकता जाए तो
राधा की पलकों में इक अनुराग प्रतीक्षारत बैठा है

राजमहल का स्वांग रचाकर मन भर जावे तो आ जाना
द्यूतभवन की घटना से जब जी घबरावे तो आ जाना
खाण्डववन के तक्षक का विषदंश सतावे तो आ जाना
जमुना तट पर कुंज-लता का बाग प्रतीक्षारत बैठा है

सोने के बर्तन में केवल षड्यंत्रों का द्वंद मिलेगा
पत्तल की सूखी रोटी में जग भर का आनंद मिलेगा
राजमहल के छप्पन भोगों में फंसकर बिसरा मत देना
विदुरों की पावन कुटिया में साग प्रतीक्षारत बैठा है

छींके पर माखन की मटकी अब भी राह निहार रही है
वृद्ध जसोदा आस लगाए आंगन-द्वार बुहार रही है
रण के शोर-शराबे से तुम यह कहकर उठकर चल देना
जसुमति मैया के घर में सौभाग प्रतीक्षारत बैठा है

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, January 24, 2018

लोक और तंत्र की रस्साकशी

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं - विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, पत्रकारिता।
विधायिका ने संसद में नोट लहराने से लेकर सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त तक के गरिमामयी मंज़र देखे हैं। गाली-गलौज, स्याही, पत्थर, जूते और थप्पड़ जैसे अलंकरणों से इस स्तम्भ की आभा कीचड़ को अंगूठा दिखा रही है। घोटालों और दलाली तक के नवरत्नों ने प्रधानमंत्री पद से वार्ड सदस्य तक की कांति दूनी कर रखी है। स्थितियाँ इतनी सुखद हैं कि पूरे विश्व में भारतीय राजनीति के भ्रष्टाचार की मिसालें दी जाती हैं। किसी भी फ़िल्म में इस स्तम्भ के भीतर की गंदगी दिखाने में कोई राष्ट्रद्रोह नहीं महसूस किया जाता।
न्यायपालिका की कुत्ता-फ़जीहत पिछले दिनों सुखिऱ्यों में प्रकाशित हुई। कभी कोई जज अपने दुर्व्यवहार के लिए सड़क पर जनता के कोप का भाजन बनता है तो कभी सरेआम रिश्वत लेते हुए बरामद होकर न्याय की आँखों पर बंधी काली पट्टी पर धूल झोंकता दिखाई देता है। फैसलों की ख़रीद-फरोख़्त बोलने की हिम्मत इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि इसमें न्यायालय को बेइज़्ज़ती महसूस होती है। फिल्मों में न्याय प्रक्रिया की जितनी चाहे धज्जियाँ उड़ा लो, कभी कोई अवमानना का नोटिस जारी नहीं होता क्योंकि आँखों पर पट्टी बांधे बैठी न्याय की मूर्ति टीवी नहीं देखती। शिवसैनिक, बजरंग दल, आशाराम के भक्त, राम रहीम के भक्त, विश्व हिंदू परिषद, करणी सेना और अन्य संगठन, न्यायालय के आदेश के साथ बलात्कार करते रहते हैं और सभी महकमे चुपचाप बैठे तमाशा देखते रहते हैं।
कार्यपालिका ने अपनी एक साख बनाई है। जनता को विश्वास है कि जब कहीं से भी कोई सहायता नहीं मिलेगी तो पुलिस ले-दे के काम करवा देगी। थाना एकमात्र ऐसा जगह है जहाँ आम आदमी बाली की तरह जाने से डरता है। पुलिसवालों से बात करने में लोगों की रूह काँपती है। फिल्में पुलिसवालों को दिन रात गालियाँ देती हैं लेकिन पुलिसवाले ऊपर की कमाई में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें फ़िल्म देखने की फुरसत ही नहीं है।
पत्रकारिता लोकतंत्र की आवाज़ है। सरकारी माध्यमों को सरकार का भौंपू कहने की परंपरा इंदिरा जी के ज़माने में ही डाल दी गई थी। अब विज्ञापनदाता की अभिरुचियों, सरकारी स्वार्थों की साधना और टीआरपी की अंधी होड़ में ‘कुछ भी’ दिखानेवाला मीडिया जनता से ‘बिकाऊ’ जैसा अलंकरण प्राप्त कर चुका है। मुद्दे, किरदार, खबर और यहाँ तक कि मौत को भी मंडी में बेचकर पैसा कमानेवाला मीडिया भारतीय लोकतंत्र की बर्बादी के गीत का आधार तत्व है।
इन चारों स्तंभों पर खड़ा लोकतंत्र निस्पृह भाव से लोक और तंत्र के मध्य की अनवरत रस्साकशी को तब-तक देखता रहेगा, जब तक हमारा तंत्र, लोक का आख़िरी कश नहीं मार लेगा।

✍️ चिराग़ जैन