किरणों के बूते गहरा अंधियार मिटाना नामुमकिन है
दिनकर अब तुमको ख़ुद ही अंधियारे बीच उतरना होगा
युग-युग से तुम जिन घोड़ों के रथ पर थे असवार दिवाकर!
उनका चाल-चलन भी जाँचो अब फिर से इक बार दिवाकर!
इनके चारे की थैली पर अंधियारे के चिन्ह मिले हैं
इनकी हर हरक़त पर तुमको पूरा अंकुश धरना होगा
ओ दिनकर! कानाफूसी में ये बातें उड़ने लगती हैं
इक निश्चित पथ पर कुछ किरणें इधर-उधर मुड़ने लगती हैं
कोष तुम्हारे श्वेत पसीने का यदि उलझा तंत्र-भँवर में
तुमको लाँछन की पीड़ा से आहत होकर मरना होगा
तुम बरसों से धधक रहे हो, फिर भी अंधियारा जीवित है
कुछ अंधी गलियों में शायद उजियारे का रथ कीलित है
पूरब से पश्चिम तक की निगरानी की मर्यादा छोड़ो
अब नभ से धरती तक तुमको आँखे खोल विचरना होगा
तुम तक आने की हर कोशिश की पाँखें घायल होती हैं
उजियारे की ओर निहारें तो आँखें घायल होती हैं
ख़ूब भरा है तुम पर उठने वाली आंखों में अंधियारा
पर अंधियारे की आँखों में आज उजाला भरना होगा
तुम ही तो इस अंधियारे की रक्षा हेतु नियुक्त नहीं हो
तुम ही ख़ुद काले वैभव के वेतन से तो युक्त नहीं हो
इन सब प्रश्नों के उत्तर दे-देकर अपमानित हो जाओ
इससे पहले तुमको जग का हर अंधियारा हरना होगा
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Friday, March 16, 2018
Monday, March 12, 2018
पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
फ्यूचर के सब थॉट अधूरे पीछे छूट गए
संबंधों की स्नेह आर्टरी की ब्लॉकेज हटी
बने रहे जो क्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
अनुभव और आकलन से जो सोच बनी वो छूटी
युग की क्यारी में महकेंगी दो गीतों की बूटी
गमले, हैंगर, पॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
शेष रहेगा चर्चा बस अच्छाई की जगमग में
याद रखेगी दुनिया केवल कुछ मिठास, कुछ नग्मे
कड़वाहट के डॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
भीतर घुमड़ रही थीं जाने कितनी सारी बातें
ख़ुद से बतियाते कट जाती थीं अंधियारी रातें
बतरस के सब लॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
पदक, चिन्ह, सम्मान, दुशाले, नकदी और लिफाफे
जिनके लिए उनींदे भटके, दौड़-दौड़ कर हाँफे
व्हाट एवर वी गॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
✍️ चिराग़ जैन
फ्यूचर के सब थॉट अधूरे पीछे छूट गए
संबंधों की स्नेह आर्टरी की ब्लॉकेज हटी
बने रहे जो क्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
अनुभव और आकलन से जो सोच बनी वो छूटी
युग की क्यारी में महकेंगी दो गीतों की बूटी
गमले, हैंगर, पॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
शेष रहेगा चर्चा बस अच्छाई की जगमग में
याद रखेगी दुनिया केवल कुछ मिठास, कुछ नग्मे
कड़वाहट के डॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
भीतर घुमड़ रही थीं जाने कितनी सारी बातें
ख़ुद से बतियाते कट जाती थीं अंधियारी रातें
बतरस के सब लॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
पदक, चिन्ह, सम्मान, दुशाले, नकदी और लिफाफे
जिनके लिए उनींदे भटके, दौड़-दौड़ कर हाँफे
व्हाट एवर वी गॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
✍️ चिराग़ जैन
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Sunday, March 11, 2018
प्रमोद तिवारी जी के निधन पर
कवि सम्मेलन के सफर में फिर से दो साथी ज़ंजीर खींच कर बीच में ही उतर गए। रायबरेली से कानपुर लौटते हुए एक बार फिर रात के तीसरे पहर का अंधेरा हमसे हमारे दो कवियों को छीन ले गया। यादों के चुलबुले गीतकार श्री प्रमोद तिवारी एक ही झटके में हमारा साथ छोड़ गए। उनके साथ श्री के डी शर्मा हाहाकारी भी इसी दुर्घटना में विदा हो गए। लखनऊ हाइवे पर गीत और हास्य लहूलुहान हो गया। सुनते हैं रात को रायबरेली में गुड्डे-गुड़ियों वाले दिनों की याद दिलाकर लौट रहे थे और फिर यादों के अंधे खोह में विलीन हो गए। सफ़र में अनवरत जीवंत रहने वाले प्रमोद तिवारी चले गए। सद्भाव का संदेश देने वाले प्रमोद जी चले गए। गीत को उत्सव की तरह प्रस्तुत करने वाले प्रमोद जी चले गए। मन खिन्न भी है और विधिना के प्रति आक्रोशित भी। कवि सम्मेलन में हर रात उत्सव जीने वालों के जीवन का ऐसा दुर्दांत समापन। तालियों की गड़गड़ाहट के अंत में इतना भयावह चीत्कार। क्षणभंगुरता का इतना भयानक उदाहरण। बस करो मेरे विधाता! इस वर्ष का उदय अश्रुओं से हुआ है। सब लोग जा रहे हैं कपड़े बदल बदल के। जीवन पर मृत्यु का यह ग्रहण क्रम समाप्त कर दो प्रभु। बहुत प्यारे साथी गए हैं हमारे बीच से। कई रातों के उनींदे होंगे। सफर की थकन अभी उनकी पोरों में भरी होगी। उन्हें अपने नेह से दुलारना प्रभु!
✍️ चिराग़ जैन
Saturday, March 3, 2018
मीडिया में कवि सम्मेलन
हिंदी कवि-सम्मेलन भारतीय समाज में एक परंपरागत संचार माध्यम के रूप में प्रतिष्ठापित है। आधुनिक और अत्याधुनिक माध्यमों के प्रचलन से पूर्व ही कवि-सम्मेलनों ने भारतीय जनमानस में गहरी पैंठ बना ली थी। समय के साथ काव्यमंचों पर रासानुपत में परिवर्तन अवश्य हुए किन्तु ये सब परिवर्तन कवि-सम्मेलन के मूल स्वरूप के इर्द-गिर्द ही बने रहे।
प्रारम्भ में साहित्य और पत्रकारिता के हस्ताक्षर अलग-अलग नहीं थे किंतु समय के साथ ये दोनों ही क्षेत्र अलग चिह्नित किये जाने लगे। हिंदी की पत्रकारिता का तो उद्भव ही साहित्य के साधकों ने किया। माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, धर्मवीर भारती और अन्य तमाम ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने भारत में पत्रकारिता की आधारशिला रखी। यह वह समय था जब साहित्य और पत्रकारिता को अलग करना असंभव जान पड़ता था।
बाद में "साहित्यिक पत्रकारिता" पत्रकारिता के बड़े क्षितिज का छोटा-सा अंश बनकर रह गई। इस कालखंड में प्रतिष्ठित साहित्यकारों को समाचार-पत्र के संपादन-मंडल में इसलिए स्थान मिलता था क्योंकि पत्र में नियमित प्रकाशित होने वाली कहानियां, कविताएं, संपादकीय, व्यंग्य और भाषा का स्तर पत्र की गरिमा तय करता था। धीरे-धीरे समाचार-पत्रों में साहित्य एक कोना मात्र बनकर रह गया। अधिकतर समाचार-पत्रों में यदा-कदा कोई कविता छापकर साहित्य की हाज़िरी लगा दी जाती थी और कुछ समूहों ने तो यह हाज़िरी भी बंद कर दी।
इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया जब साहित्य, कविता, कहानी, नाटक और उपन्यास की कड़ियाँ समाचार-पत्रों में बाक़ायदा "बैन" हो गईं। कुछ संपादकीय मंडलों ने तो साहित्यिक गोष्ठियों, कवि-सम्मेलनों आदि की ख़बर तक प्रकाशित करने से परहेज किया। अंततः इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक की शुरुआत होते-होते देश के प्रमुख हिंदी दैनिक पत्रों से साहित्य-बीट ही समाप्त हो गई।
मीडिया की अनदेखी के इस दौर में दूरदर्शन एकमात्र ऐसा माध्यम बचा था जिससे प्रसारित होनेवाली काव्य-गोष्ठियों में साहित्य जीवित था। नववर्ष की पूर्वसंध्या पर प्रसारित होनेवाले रंगारंग कार्यक्रमों में हुल्लड़ मुरादाबादी, सुरेन्द्र शर्मा और शैल चतुर्वेदी जैसे चेहरे अक्सर दिखाई देते थे। अशोक चक्रधर और गोविंद व्यास ने दूरदर्शन की इन काव्य-गोष्ठियों में विविध प्रयोग किये। हर दूसरे मंगलवार को प्रसारित होने वाले 'कहकहे' कार्यक्रम में अशोक चक्रधर, सुरेश नीरव और सरोजिनी प्रीतम ने हास्य-कविता का नया अध्याय प्रारम्भ किया। अनेक कवियों की वर्तमान लोकप्रियता की नाल दूरदर्शन की इन्हीं गोष्ठियों में गड़ी हुई है। युवा काव्य-गोष्ठी, फुलझड़ी एक्सप्रेस और अन्य काव्य आधारित कार्यक्रम टेलीविज़न पर कवियों की हाज़िरी लगवाते रहे। दृश्य-श्रव्य संचार माध्यम पर यह उपस्थिति साहित्यिक अनुष्ठानों के मनोबल की दृष्टि से "डूबते को तिनके का सहारा" सिद्ध हुई।
बाद में सेटेलाइट टेलीविज़न की अतिवृष्टि में जैसे-जैसे दूरदर्शन के रंग फीके पड़े, वैसे-वैसे ही काव्य गोष्ठियों और अन्य साहित्यिक अनुष्ठानों के प्रचार-प्रसार का कारवां भी थम गया। शुद्ध व्यावसायिकता और ग्लैमर की तेज़ रौशनी में मसनद पर विराजित बिना संगीत-साज के कवि-सम्मेलन को मिसफिट करार दे दिया गया। देश भर में कवि-सम्मेलन होते रहे किन्तु मीडिया की फोकस लाईट का छोटा-सा घेरा कवि-सम्मेलन तक पहुँचने से कतराता रहा। NDTV ने कुमार संजोय सिंह के संचालन में "अर्ज़ किया है" शीर्षक से एक कवि-सम्मेलन की सर्जना की भी थी किन्तु इस प्रयास की यात्रा बहुत लम्बी न हो सकी। इसके तुरंत बाद डॉ अशोक चक्रधर ने SAB TV पर "वाह-वाह" प्रारम्भ किया। कवि सम्मेलन की परंपरागत छवि की तर्ज़ पर तैयार यह कवि-सम्मेलन एक नए भवन की नींव मजबूत कर गया।
इसी समय में STAR ONE पर द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज नामक एक कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ जिसने TRP के सभी रेकॉर्ड तोड़ डाले। इस कार्यक्रम में लतीफों और भाव-भंगिमा से लोगों को हँसाने की एक अपेक्षाकृत नवीन विधा की प्रतियोगिता का संयोजन था। इस कार्यक्रम को जब मीडिया के पुराने लोगों ने देखा तो वह साथी याद आया जिसे वे मसनद पर बैठा छोड़ आए थे।
"आउट ऑफ साइट, आउट ऑफ माइंड" में यक़ीन करनेवाले मीडिया ने कवि-सम्मेलन को लुप्त मान लिया था। इसलिए जब पीछे जाकर उसने कवि-सम्मेलन के सिर पर लगी फोकस-लाइट का स्विच ऑन किया तो वहाँ सब कुछ बदल चुका था। मसनद के गोल तकियों ने सोफे का रूप ले लिया था। कवियों का कुर्ता-पायजामा सूट-बूट में तब्दील हो चुका था। टैंट हाउस के माइक सिस्टम अब ग्लैमरस माइक्रोफोन और लेपल के आकार में ढल गए थे, दरी पर बैठे श्रोताओं की दरियां] कुर्सियां बन चुकी थीं और लोकल टैंटहाउस की व्यवस्थाएं भव्य ऑडिटोरियम में सुव्यवस्थित हो चली थीं।
इस दौर तक SAB TV पर अशोक चक्रधर द्वारा संचालित "वाह-वाह" का दर्शक वर्ग TRP के आंकड़ों में अपनी सम्मानजनक पहचान बना चुका था। उधर "जनमत" टीवी के माध्यम से दीपक गुप्ता और नीरज पुरी; टीवी इंडिया और दबंग टीवी से शैलेश लोढ़ा; तथा अन्यान्य चैनल्स से अरुण जैमिनी भी सेतुनिर्माण में गिलहरी के योगदान की कथा लिख रहे थे। विवेक गौतम के संचालन में "जैन टीवी" पर चल रहा "इंडिया कॉलिंग" लम्बा चला किंतु अपनी पहचान क़ायम करने में विफल रहा। साधना टीवी पर प्रवीण आर्य के संयोजन में चल रहे "कवियों की चौपाल" कार्यक्रम का उपक्रम भी बहुत फलदायी सिद्ध न हो सका।
इसी उठापटक के बीच सब टीवी को सोनी एंटरटेनमेंट जैसे बड़े समूह ने ख़रीद लिया और अशोक चक्रधर का "वाह-वाह" सुभाष काबरा के हाथों से होता हुआ शैलेष लोढ़ा के हाथों में आ गया। अनेक प्रयोग करने के बाद शैलेष जी ने इसे "वाह-वाह क्या बात है" शीर्षक से बिल्कुल नए प्रारूप में प्रारम्भ किया। ठीक इसी कालखण्ड में लाफ्टर चैम्पियन की अचानक से उभरी मांग का जादू धीमा पड़ने लगा था। और इसी दौर में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना आंदोलन में डॉ कुमार विश्वास की अग्रणी भूमिका ने उन्हें लोकप्रियता के शीर्ष पर ला खड़ा किया था।
वाह-वाह क्या बात है ने TRP के मोर्चे पर कवि सम्मेलन की महती उपस्थिति दर्ज की और कुमार विश्वास ने कवि सम्मेलनों को उस तबके तक पहुंचा दिया जिसको कविता से कोई ख़ास लेना-देना नहीं था।" वाह-वाह क्या बात है" के संचालक शैलेश लोढ़ा भी लोकप्रिय धारावाहिक "तारक मेहता का उल्टा चश्मा" के मुख्य पात्र के रूप में लोकप्रियता के प्रतिमान स्थापित कर चुके थे।
ऐसे संयोगों के बल पर SAB TV का "वाह-वाह क्या बात है" कवि सम्मेलनों के खोए हुए ग्लैमर का लॉन्चिंग पैड साबित हुआ। नए रूप-रंग और ग्लैमर के साथ प्रसारित होता परंपरागत कवि-सम्मेलन कॉर्पोरेट और मल्टी नेशनल्स को भी आकृष्ट करने लगा। उधर कुमार विश्वास की ख्याति भी कवि-सम्मेलनों की सिल्वर स्क्रीन प्रेजेंस के लिए प्रायोजक जुटाने में सहायक सिद्ध हुई।
इधर "वाह-वाह क्या बात है" के सौ से अधिक एपिसोड प्रसारित हो चुके थे, उधर धूमिल होते लाफ्टर शो के एक सादा से नुमाइंदे कपिल शर्मा ने एक कॉमेडी शो लांच करके भारतीय टेलीविज़न जगत के TRP अन्वेषकों को चौंका दिया। चूँकि कवि-सम्मेलन और लाफ्टर शो के स्वरूप में बहुत सी समानताएं हैं इसलिए इन दोनों प्रकार के कार्यक्रमों के श्रोतावर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा समान ही है।
कपिल शर्मा के शो की टीआरपी के चलते कोई नया कार्यक्रम तो टेलीविज़न पर नहीं शुरू हुआ किन्तु कवि-सम्मेलन के प्रति उदासीन मीडिया का बर्ताव पूरी तरह बदल गया। टीवी न्यूज़-चैनल्स ने कवि-सम्मेलनों को अनियमित प्रसारण के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। एकाध वर्ष में ही प्रत्येक न्यूज़ चैनल में होली के अवसर पर कवि-सम्मेलन अनिवार्य-सा हो गया। इसी बीच न्यूज़-नेशन ने "चुनावी-चकल्लस" शीर्षक से कवियों का एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक चुनावी घटनाक्रम पर कवियों की चुटकियां कार्यक्रम की सफलता का माध्यम बनी। 16वीं लोकसभा के चुनाव में यह कार्यक्रम ख़ासा लोकप्रिय हुआ। चुनाव सम्पन्न होने के बाद इसे "चकल्लस" शीर्षक से संजय झाला ने संचालित किया।
उधर कुमार विश्वास ने दो कदम और आगे बढ़कर "महाकवि" शीर्षक से दिवंगत कवियों के जीवनवृत्त की एक श्रृंखला ABP NEWS पर प्रारम्भ की। इस कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार ने कवियों के ग्लैमर को और ऊपर उठाने में सहायता की।
कुछ समय बाद NEWS 18 INDIA ने "लपेटे में नेताजी" शीर्षक से एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को स्टूडियो में कवियों के सामने बैठाया जाता था और कवि अपने चुटीले अंदाज़ में उनसे प्रश्न पूछते थे। इस कार्यक्रम में पहली बार कविता और राजनीति का ON AIR आमना सामना हुआ।
न्यूज़ मीडिया में कवि-सम्मेलन अब पूरी तरह चस्पा हो चुका है। किसी भी मुद्दे पर कवियों को बुलाकर एक एपिसोड शूट कर लेना प्रोग्रामिंग हेड के लिए आसान भी होता है और इस कार्यक्रम की सफलता की गारंटी भी पूरी होती है। कई लाख रुपये ख़र्च करके प्रोग्रामिंग कोटे का एक बुलेटिन तैयार करने की बजाय मौलिक कंटेंट, सरल समन्वय और अपेक्षाकृत कम व्यय में शानदार कवि-सम्मेलन शूट करने में प्रोडक्शन की अधिक रुचि दिखने लगी है। आज तक, एबीपी, न्यूज़ नेशन, ज़ीन्यूज़, ज़ी बिज़नेस, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ 24 और अन्य सभी न्यूज़ चैनल्स पर समय-समय पर कवि-सम्मेलनों की उपस्थिति यह घोषणा करती है कि साहित्य और मीडिया का जो बिछोह प्रिंट मीडिया के मेले में प्रारम्भ हुआ था वह अब इलैक्ट्रोनिक मीडिया की गलियों में समाप्त हो गया है। मीडिया के पास नए कंटेंट का टोटा था और कवि-सम्मेलनों के पास उचित प्रचार तकनीकों का। दोनों ने आपस में हाथ मिलाकर एक नए युग की शुरुआत की है।
✍️ चिराग़ जैन
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Thursday, March 1, 2018
प्रह्लाद जीवित है
हार भी है, जीत भी है
पीर भी है, प्रीत भी है
अनवरत इक शोर भी है
आपदा घनघोर भी है
किन्तु अन्तस् में अमर आह्लाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
मानता हूँ उत्सवों का दौर थोड़ा कम हुआ है
आंधियों से आम्रवन का बौर थोड़ा कम हुआ है
किन्तु कलरव ने चहकने की प्रथा त्यागी नहीं है
मांगलिक वेला अभी सब हार कर भागी नहीं है
कोयलों का आम से संवाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
दृष्टि की सीमा तलक अनजान वीराना पड़ा है
कान के उस पार सीमाहीन सन्नाटा खड़ा है
किन्तु हाथों पर तनिक रंगीन-सा एहसास भी है
‘पीर का भी अंत होगा’ -एक ये उल्लास भी है
मौन का आनंद अंतर्नाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
धीर टूटेगा लखन की चेतना को लुप्त पाकर
मन विकल होगा किसी अभिमन्यु को समिधा बनाकर
किन्तु द्रोणाचल किसी संजीवनी को जन्म देगा
शौर्य को अमरत्व युग-युग तक समूचा धर्म देगा
सत्य का यश मौत के भी बाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
✍️ चिराग़ जैन
पीर भी है, प्रीत भी है
अनवरत इक शोर भी है
आपदा घनघोर भी है
किन्तु अन्तस् में अमर आह्लाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
मानता हूँ उत्सवों का दौर थोड़ा कम हुआ है
आंधियों से आम्रवन का बौर थोड़ा कम हुआ है
किन्तु कलरव ने चहकने की प्रथा त्यागी नहीं है
मांगलिक वेला अभी सब हार कर भागी नहीं है
कोयलों का आम से संवाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
दृष्टि की सीमा तलक अनजान वीराना पड़ा है
कान के उस पार सीमाहीन सन्नाटा खड़ा है
किन्तु हाथों पर तनिक रंगीन-सा एहसास भी है
‘पीर का भी अंत होगा’ -एक ये उल्लास भी है
मौन का आनंद अंतर्नाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
धीर टूटेगा लखन की चेतना को लुप्त पाकर
मन विकल होगा किसी अभिमन्यु को समिधा बनाकर
किन्तु द्रोणाचल किसी संजीवनी को जन्म देगा
शौर्य को अमरत्व युग-युग तक समूचा धर्म देगा
सत्य का यश मौत के भी बाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
✍️ चिराग़ जैन
Monday, February 26, 2018
प्यास ठहरी है
रेत का साम्राज्य है बस
हो चुके हैं घाट बेबस
पर्वतों पर जल नहीं है
दूर तक बादल नहीं है
चल रहे हैं रेत पर, तपती दुपहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
पत्थरों के आख़िरी कण तक नहीं है बून्द जल की
याद रख पाए नमी को इस जतन में आँख छलकी
आँख के नीचे बची है शेष, झरनों की निशानी
पाँव के छाले सुनाते हैं जलाशय की कहानी
खेत से उठती हर इक आवाज़ बहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
स्रोत सूने हो गए हैं, बस्तियों में हैं शिकारी
थक चुका सागर तरस कर, प्यास जीती, आस हारी
जोड़ रखती थीं धरा को, वे जड़ें बिखराव में हैं
इक सदी का दर्द जीवित इन जड़ों के घाव में है
मर गया कलरव नदी की पीर लहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
श्रम जलाशय खोजता है रेत से सूखे क्षणों में
पीढ़ियाँ घिरने लगी हैं आग के आकर्षणों में
फूँक दे जो ज़िन्दगी को, अब न ऐसा स्वप्न पालो
हो सके तो नौनिहालों को झुलसने से बचा लो
हर नमी को सोखता सूरज सुनहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
✍️ चिराग़ जैन
हो चुके हैं घाट बेबस
पर्वतों पर जल नहीं है
दूर तक बादल नहीं है
चल रहे हैं रेत पर, तपती दुपहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
पत्थरों के आख़िरी कण तक नहीं है बून्द जल की
याद रख पाए नमी को इस जतन में आँख छलकी
आँख के नीचे बची है शेष, झरनों की निशानी
पाँव के छाले सुनाते हैं जलाशय की कहानी
खेत से उठती हर इक आवाज़ बहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
स्रोत सूने हो गए हैं, बस्तियों में हैं शिकारी
थक चुका सागर तरस कर, प्यास जीती, आस हारी
जोड़ रखती थीं धरा को, वे जड़ें बिखराव में हैं
इक सदी का दर्द जीवित इन जड़ों के घाव में है
मर गया कलरव नदी की पीर लहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
श्रम जलाशय खोजता है रेत से सूखे क्षणों में
पीढ़ियाँ घिरने लगी हैं आग के आकर्षणों में
फूँक दे जो ज़िन्दगी को, अब न ऐसा स्वप्न पालो
हो सके तो नौनिहालों को झुलसने से बचा लो
हर नमी को सोखता सूरज सुनहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
✍️ चिराग़ जैन
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Sunday, February 25, 2018
इतनी भी नाराज न होना
अभी गुलाबी रंगत वाले फूल नहीं मुरझाए होंगे
अभी मेज से तुमने मेरे तोहफे नहीं हटाए होंगे
अभी फोन में मेरा नम्बर उसी नाम से दर्ज मिलेगा
अभी गैलरी में केवल मेरे फोटो का सर्च मिलेगा
तुम तक मेरा प्यार न पहुँचे, तुम ऐसी परवाज न होना
इतनी भी नाराज न होना
प्यार भरे पल याद आएं तो अनबन को सुलझा ही लेना
बार-बार मैं फोन करूँ तो मन ही मन मुस्का ही लेना
पीछे पड़ जाने की मेरी आदत से तो वाकिफ हो ही
दाँत पीसकर, झुंझलाकर तुम मेरा फोन उठा ही लेना
समय बिताने भर को विंडो शॉपिंग की मोहताज न होना
इतनी भी नाराज न होना
कोई फिल्मी गीत बजेगा तो मेरी याद आ जाएगी
जब फूलों पर नूर सजेगा तो मेरी याद आ जाएगी
जिस खिड़की पर बैठे हम-तुम घंटों बतियाते रहते थे
जब उस पर सावन बरसेगा तो मेरी याद आ जाएगी
मुझे भूल जाने की कोशिश में अपना सुख साज न खोना
इतनी भी नाराज न होना
मीठे मीठे झगड़ों को सबकी चर्चा तक मत ले जाना
किसी सहेली को अपने मन की ये बातें मत बतलाना
भीगी पलकों से जो कंधा ढूंढोगी वो धुंधला होगा
अनबन कड़वाहट बन जाए इतने आँसू नहीं बहाना
जिद के कारण प्यार भुला दो, ऐसा कठिन रिवाज न होना
इतनी भी नाराज न होना
फिर भी यदि नाराज रहो तो थोड़ी रस्म निभाती रहना
अगर अकेली बैठी हो तो झूठा फोन मिलाती रहना
कॉलेज की कैंटीन हमारे झगड़े को पब्लिक ना कर दे
मेरे खाते में चढ़वाकर कभी-कभी कुछ खाती रहना
मुझे देखकर खुश हो जाने का अपना अंदाज न खोना
इतनी भी नाराज न होना
✍️ चिराग़ जैन
अभी मेज से तुमने मेरे तोहफे नहीं हटाए होंगे
अभी फोन में मेरा नम्बर उसी नाम से दर्ज मिलेगा
अभी गैलरी में केवल मेरे फोटो का सर्च मिलेगा
तुम तक मेरा प्यार न पहुँचे, तुम ऐसी परवाज न होना
इतनी भी नाराज न होना
प्यार भरे पल याद आएं तो अनबन को सुलझा ही लेना
बार-बार मैं फोन करूँ तो मन ही मन मुस्का ही लेना
पीछे पड़ जाने की मेरी आदत से तो वाकिफ हो ही
दाँत पीसकर, झुंझलाकर तुम मेरा फोन उठा ही लेना
समय बिताने भर को विंडो शॉपिंग की मोहताज न होना
इतनी भी नाराज न होना
कोई फिल्मी गीत बजेगा तो मेरी याद आ जाएगी
जब फूलों पर नूर सजेगा तो मेरी याद आ जाएगी
जिस खिड़की पर बैठे हम-तुम घंटों बतियाते रहते थे
जब उस पर सावन बरसेगा तो मेरी याद आ जाएगी
मुझे भूल जाने की कोशिश में अपना सुख साज न खोना
इतनी भी नाराज न होना
मीठे मीठे झगड़ों को सबकी चर्चा तक मत ले जाना
किसी सहेली को अपने मन की ये बातें मत बतलाना
भीगी पलकों से जो कंधा ढूंढोगी वो धुंधला होगा
अनबन कड़वाहट बन जाए इतने आँसू नहीं बहाना
जिद के कारण प्यार भुला दो, ऐसा कठिन रिवाज न होना
इतनी भी नाराज न होना
फिर भी यदि नाराज रहो तो थोड़ी रस्म निभाती रहना
अगर अकेली बैठी हो तो झूठा फोन मिलाती रहना
कॉलेज की कैंटीन हमारे झगड़े को पब्लिक ना कर दे
मेरे खाते में चढ़वाकर कभी-कभी कुछ खाती रहना
मुझे देखकर खुश हो जाने का अपना अंदाज न खोना
इतनी भी नाराज न होना
✍️ चिराग़ जैन
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Wednesday, February 21, 2018
पूरी राजनीति हो गई मवाली
पूरी राजनीति हो गई मवाली,
सभी के सब जाली
हैं होली के रंग रसिया
एक-दूसरे को मार मार ताली,
सुनावें रोज़ गाली
ये ठीक नहीं ढंग रसिया
अभी चाय का शोर थमा था, तभी पकौड़ा आ पहुंचा
देसी गदहे नहीं चले तो, अरबी घोड़ा आ पहुंचा
नरसिम्हा से मुक्त हुए तो देवेगौड़ा आ पहुंचा
पहला पकड़ा नहीं गया था, नया भगौड़ा आ पहुंचा
जाने कैसी करी रे रखवाली,
थमा के उन्हें ताली
क्यों छान रहे भंग रसिया
पहले हमसे वोट, अनोखे स्वप्न दिखाकर छुड़वा ली
कांग्रेस की करतूतों का राग सुनाकर छुड़वा ली
भारत में रहकर दी राहत, बाहर जाकर छुड़वा ली
सब्सिडी भी ऊँची-ऊँची बात बनाकर छुड़वा ली
करी डीजल की टंकी भी खाली,
चिढ़ाने लगी थाली
ज़माना हुआ तंग रसिया
हाथ बांधकर घर बैठे हैं लालकृष्ण आडवाणी जी
अच्छे अच्छे मांग गए थे जिनके आगे पानी जी
बंद कर दिए नोट अचानक खूब करी मनमानी जी
सबको समझा दिया मिनिट में माया आनी जानी जी
सबने सड़कों पे लाइनें लगा ली,
मशीनें नोटों वाली
महीनों रहीं दंग रसिया
मंगलयान गया तो उसका पूरा क्रेडिट ले भागे
बुलेट ट्रेन को कर्जा लेने तुम दौड़े आगे-आगे
जिसने तुम पर प्रश्न उठाया उस पर ही गोले दागे
न्याय मीडिया तक आ पहुंचा बस उस रोज़ नहीं जागे
बेच खाई विरोधियों की गाली,
बिगड़ती संभाली
तू पूरा मलंग रसिया
सुखरामों की किस्मत खुल गई, मुफ़्ती से इंसाफ हुआ
नीतिश बाबू से झगड़े का ऊँचा पर्वत हाफ हुआ
अच्छा-बुरा चरित्र धुल गया, नीति-नियम का लाफ़ हुआ
जिसने बीजेपी जॉइन की उसका दामन साफ हुआ
आधी कांग्रेस खुद में मिला ली,
ये चाय वाली प्याली
हुई है बदरंग रसिया
योगी ने भगवा रंग डाला बाकी रंग निचोड़ दिया
अमित शाह ने हर प्रदेश में बीजेपी बम फोड़ दिया
नोट बंद कर जीएसटी से सब व्यापार झिंझोड़ दिया
जनता की पॉकेट पे तुमने अरुण जेटली छोड़ दिया
हाय कैसी ये चौकड़ी बना ली,
हुए हैं सब ठाली
मचाया हुड़दंग रसिया
✍️ चिराग़ जैन
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Tuesday, February 20, 2018
निर्माण-प्रक्रिया
टूट कर बिखरे हुए व्यक्तित्व पर
आँसुओं ने कर दिया छिड़काव
गूंद डाला मुट्ठियों से भाग्य ने
हो गईं सब ग्रंथियाँ समभाव
अनुभवों में सन गईं जब कर्म की दोनों हथेली
तब समय के चाक पर निस्तेज ने आकार पाया
उंगलियों ने दाब दे-देकर दुलारा पोरवों से
तब कहीं संज्ञा हुई हासिल, तभी किरदार पाया
जो हुआ साकार उससे लोक ने
ठीक ऐसा ही किया बर्ताव
जो दहकती आग से गुजरे उन्हीं में पूर्णता है
सौंधता है बाँह में उनकी ठहर कुछ देर पानी
जो लपट के ताप से बचकर निकल आए अधूरे
उन घड़ों से आस रखकर डूब जाती है जवानी
सोहनी की प्रीत प्यासी रह गई
भर न पाया माहियों का घाव
टूट जाना ही प्रथम सोपान है निर्माण क्रम का
दर्द से धुलकर चमक आती पिघलती पुतलियों में
विष पचा लेगा जगत तो क्षीर से अमृत मिलेगा
घर्षणों का दर्द पत्थर को सजाता उंगलियों में
रेत पर बैठी निरर्थक ही रही
भीगकर ही पार होती नाव
✍️ चिराग़ जैन
आँसुओं ने कर दिया छिड़काव
गूंद डाला मुट्ठियों से भाग्य ने
हो गईं सब ग्रंथियाँ समभाव
अनुभवों में सन गईं जब कर्म की दोनों हथेली
तब समय के चाक पर निस्तेज ने आकार पाया
उंगलियों ने दाब दे-देकर दुलारा पोरवों से
तब कहीं संज्ञा हुई हासिल, तभी किरदार पाया
जो हुआ साकार उससे लोक ने
ठीक ऐसा ही किया बर्ताव
जो दहकती आग से गुजरे उन्हीं में पूर्णता है
सौंधता है बाँह में उनकी ठहर कुछ देर पानी
जो लपट के ताप से बचकर निकल आए अधूरे
उन घड़ों से आस रखकर डूब जाती है जवानी
सोहनी की प्रीत प्यासी रह गई
भर न पाया माहियों का घाव
टूट जाना ही प्रथम सोपान है निर्माण क्रम का
दर्द से धुलकर चमक आती पिघलती पुतलियों में
विष पचा लेगा जगत तो क्षीर से अमृत मिलेगा
घर्षणों का दर्द पत्थर को सजाता उंगलियों में
रेत पर बैठी निरर्थक ही रही
भीगकर ही पार होती नाव
✍️ चिराग़ जैन
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छूकर निकली है बेचैनी,
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Nagpur, Maharashtra, India
Monday, February 19, 2018
क्षोभ के वातावरण में
सभ्यताओं के क्षरण में; क्षोभ के वातावरण में
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
व्यस्तताओं को हृदय का भान कमतर ही रहेगा
मुद्रिका में प्रेम का क्षण तो सहेजा जाएगा पर
भूल जाएगा मिलन के सौख्य को दुष्यंत इक दिन
प्रीति की उजड़ी हुई क्यारी पुनः पुष्पित न होगी
हर कथा है नियत इक छोर पर तो अंत इक दिन
विष पिलाया जाएगा भी; गीत गाया जाएगा भी
बावरी की प्रीति से विज्ञान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
जीतकर लंका अवध को लौट आए राम लेकिन
जानकी के त्याग की लौ से हृदय जलता रहेगा
न्याय की वेदी जिसे अपनत्व कहकर ठग चुकी है
वो अहम संबंध मन की टीस बन गलता रहेगा
याद हर बाकी रहेगी; रात एकाकी रहेगी
इस पराभव का जगत् को ज्ञान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
जो नहीं सीखा अभी संवेदना से पार पाना
अपशकुन है उस धनंजय का महारण में उतरना
हाथ में गाण्डीव लेकर भी नयन जो नम करेगा
है नियत उसका निज अन्तर आत्मा के हाथ मरना
शस्त्र सब तूणीर में हो; और अंतस पीर में हो
तो शरों का लक्ष्य हित संधान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
साधना को भंग करने मेनकाएँ आएंगी ही
इंद्र लेंगे सत्यवादी की बहुत दुष्कर परीक्षा
हर सृजन की राह में शीशा बिछाया जाएगा फिर
युग करेगा सत्व की उपलब्धियों की भी समीक्षा
कष्ट के बादल फटेंगे; राह में पर्वत डटेंगे
आत्मबल के शौर्य से व्यवधान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
✍️ चिराग़ जैन
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
व्यस्तताओं को हृदय का भान कमतर ही रहेगा
मुद्रिका में प्रेम का क्षण तो सहेजा जाएगा पर
भूल जाएगा मिलन के सौख्य को दुष्यंत इक दिन
प्रीति की उजड़ी हुई क्यारी पुनः पुष्पित न होगी
हर कथा है नियत इक छोर पर तो अंत इक दिन
विष पिलाया जाएगा भी; गीत गाया जाएगा भी
बावरी की प्रीति से विज्ञान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
जीतकर लंका अवध को लौट आए राम लेकिन
जानकी के त्याग की लौ से हृदय जलता रहेगा
न्याय की वेदी जिसे अपनत्व कहकर ठग चुकी है
वो अहम संबंध मन की टीस बन गलता रहेगा
याद हर बाकी रहेगी; रात एकाकी रहेगी
इस पराभव का जगत् को ज्ञान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
जो नहीं सीखा अभी संवेदना से पार पाना
अपशकुन है उस धनंजय का महारण में उतरना
हाथ में गाण्डीव लेकर भी नयन जो नम करेगा
है नियत उसका निज अन्तर आत्मा के हाथ मरना
शस्त्र सब तूणीर में हो; और अंतस पीर में हो
तो शरों का लक्ष्य हित संधान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
साधना को भंग करने मेनकाएँ आएंगी ही
इंद्र लेंगे सत्यवादी की बहुत दुष्कर परीक्षा
हर सृजन की राह में शीशा बिछाया जाएगा फिर
युग करेगा सत्व की उपलब्धियों की भी समीक्षा
कष्ट के बादल फटेंगे; राह में पर्वत डटेंगे
आत्मबल के शौर्य से व्यवधान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
✍️ चिराग़ जैन
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छूकर निकली है बेचैनी,
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Khamgaon, Maharashtra, India
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