गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Friday, April 5, 2019
महंगा क्षण
Wednesday, April 3, 2019
गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे...
बुलेट ट्रेन और अंतरिक्ष यान की चर्चाओं के बीच आज कुछ वास्तविक यातायात साधनों की स्थिति ध्यान आ रही है। भारत में एक अदद रेल विभाग है। सड़ांध मारते स्टेशन और देर से चलने के लिए मशहूर रेलगाड़ियाँ इस विभाग की शान हैं। आज़ादी के सात दशक बाद भी भारतीय रेल ने लेटलतीफी की अपनी गौरवमयी परंपरा को बरक़रार रखा है। स्टेशन पर गठरियों की तरह पड़े लाचार यात्री भारतीय रेल की निष्ठा का शिलालेख है। यदि ट्रेन लेट हो जाए तो रेलवे की उद्घोषिका की रिकार्डेड आवाज़ सुनने को मिलती है कि आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है। यदि रेल विभाग किसी भी कारण से ट्रेन कैंसिल करता है तो यात्री को कोई मुआवजा देने का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन यदि यात्री किसी कारणवश अपना आरक्षण रद्द करवाए तो उससे जुर्माना लेने का प्रावधान है। इससे सिद्ध होता है कि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है। निजी सेवाओं की ओर देखें तो भारत में कुछ गिनी-चुनी विमानन सेवाएँ हैं जो नागर विमानन मंत्रालय तथा डीजीसीए की देखरेख में कार्य करती हैं। इनमें एयर इण्डिया सरकारी उपक्रम है और इंडिगो, गो एयरवेज़, जेट एयरवेज़, स्पाइस जेट, एयर विस्तारा तथा एयर एशिया निजी क्षेत्र की विमान सेवाएँ हैं। इन सभी कंपनियों का मुख्य कार्य मुनाफ़ा कमाना है, इसके साथ वे कुछ सवारियाँ भी ढो लेती हैं। एयर इण्डिया सरकारी विमान सेवा है। जो क्रमशः इण्डियन एयरलाइंस और एलाइंस एयर जैसी कंपनियों को लील लेने के बावजूद घाटे में चलती है। इसके यात्री अनियमितताओं और अव्यावसायिक रवैये से तंग होकर निजी सेवाओं का प्रयोग करने के लिए विवश हैं। इस कारण एयर इंडिया के जहाज सरकारी कर्मचारियों के दौरे के लिए ही उपयुक्त रहते हैं। निजी विमानन सेवाओं में किरायों को नियंत्रित तथा तर्कयुक्त बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। भारतीय रेल की तरह फ्लाइट कैंसिल होने की स्थिति में मुआवजे का कोई विकल्प नहीं है किंतु यात्री द्वारा आरक्षण रद्द कराने पर सामान्यतः उसके आरक्षण का लगभग सारा पैसा जब्त कर लेने की सुविधा विमानन सेवाओं के पास है। फ्लाइट विलंबित होने की स्थिति में यात्रियों को होने वाले आर्थिक, व्यावसायिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत नुक़सान के लिए न कोई पूछता है न ही इस संदर्भ में कोई दिशानिर्देश बनाए गए हैं। डीजीसीए और नागर विमानन मंत्रालय इन कम्पनियों के बकाया, उधारी और सुरक्षा मानदंडों के क्रियान्वयन में इतने तल्लीन हैं कि उनके पास यात्रियों के संकटों की ओर देखने का समय ही नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है। सड़क यातायात में हर राज्य का अपना सड़क परिवहन निगम है। इन निगमों की सामान्य बसों से सरकारी तंत्र की सूरत मिलाई जा सकती है। हाँ, अंतरराज्यीय बस सेवाओं में राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश जैसे अनेक राज्यों ने वॉल्वो तथा अन्य लग्जरी बसें मुहैया करवाई हैं जो समुचित किरायों में सुविधाजनक सफ़र की मिसाल हैं। स्थानीय सेवाओं में मुम्बई की बस सेवाओं की व्यवस्था उदाहरणीय है। शेष शहरों में स्थानीय बस परिवहन की दशा बेहद शोचनीय है। दिल्ली में तो ब्ल्यू लाइन, रेड लाइन, ग्रीन लाइन, व्हाइट लाइन जैसे विविध प्रयोग काफ़ी शानदार तरीके से विफल हुए हैं। हाँ डीटीसी की क्लस्टर बसों से आशा बंधी थी लेकिन ब्ल्यू लाइन (जिसे किलर लाइन भी कहा जाता था) के बेरोज़गार ड्राइवरों की कॉन्ट्रेक्ट बेस पर भर्ती होने के बाद से इन बसों का दिल्ली की सड़कों पर आतंक देखते ही बनता है। बीच में "अंडर डीटीसी परमिट' वाली योजना के तहत ऐसी बसें चलीं थीं जिनमें ड्राइवर बस मालिक का होता था और कण्डक्टर डीटीसी का। मेरे विचार में यह योजना सफल तथा निर्विवादित थी। इसको बन्द किये जाने का कारण मुझे ज्ञात नहीं हो पाता। दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई, जयपुर, नागपुर और लखनऊ जैसे कुछ शहरों में मेट्रो रेल भी पब्लिक परिवहन का एक विकल्प है। इनमें दिल्ली मेट्रो सर्वाधिक सफल है। कोलकाता मेट्रो पूर्णतः जीर्णोद्धार की मांग करती है। शेष अपने शुरुआती दौर में हैं। टैक्सी सेवाओं की स्थिति भी भाषाओं की तरह तीन कोस पर बदलती रहती है। मुम्बई और कोलकाता में ऑटो रिक्शा तथा टैक्सी सेवाएं सुव्यवस्थित तथा परिपक्व हैं। दिल्ली में टीएसआर सेवाएँ मनमाने किरायों, ड्राइवरों की गुंडागर्दी और पुरानी खटारा गाड़ियों के कारण नगण्य है। हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों तथा कुछ मुख्य स्थानों पर प्रीपेड बूथ बनाए गए हैं लेकिन आवश्यकता के सामने इनकी संख्या भी नगण्य ही है। टीएसआर की नाकामी और मनमानी के कारण भारत में रेडियो टैक्सी सेवाओं का तेज़ी से प्रचलन बढ़ा। सस्ते दामों के दावों, डोर टू डोर सर्विस, साफ़ सुथरी गाड़ियों और डिस्काउंट कूपन्स के विज्ञापनों ने सबके मोबाइल में ओला और ऊबर की एप्प साइन अप करवा दी। ऑटो रिक्शा चालकों ने अपने ऑटो रिक्शा बेच बेचकर इन कम्पनियों में गाड़ी चलानी शुरू कर दी। सवारियों ने फ्री राइड और सस्ते किरायों के लोभ में इन सेवाओं की आदत डाल ली। और एक बार आदत पड़ जाने के बाद इन कम्पनियों ने एक शब्द से हमारा परिचय करवाया, और वह शब्द था 'सर्ज'। यह सर्ज निरंतर हमारी जेब पर दर्ज होता रहता है। स्थिति यह है कि आठ रुपये प्रति किलोमीटर का विज्ञापन करने वाली ओला/ऊबर अब पन्द्रह से बीस रुपये प्रति किलोमीटर सामान्य स्थितियों में वसूल रही हैं और चालक को सवा छह से ग्यारह रुपये प्रति किलोमीटर अदा करके शेष गड़प कर रही हैं। सरकार ने इन कम्पनियों के नाम सर्ज न लगाने का फ़रमान जारी किया तो था लेकिन वह फ़रमान अब न तक सरकार को याद है, न ओला/ऊबर को और न ही सवारियों को। निजी कंपनियां धड़ल्ले से सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में चांदी कूट रही हैं और जनता इस लोककल्याणकारी गणराज्य के फटे जूते से अपना सिर पीट रही है। रोड टैक्स, टोल टैक्स, एमसीडी टैक्स, पार्किंग चार्ज और डीजल-पैट्रोल की क़ीमतें जैसी कीलों ने आम नागरिक के वाहनों में अनगिनत पंक्चर कर दिए हैं और देश के विकास की गाड़ी दौड़ने का शोर करते हुए रेंग रही है।
✍️ चिराग़ जैन
Monday, April 1, 2019
नए बिरवे
नए बिरवे ईसर बाबा के एक अनुयायी सेठ ने बड़ी मेहनत और लगन से एक ख़ूबसूरत बगीचा लगवाया। सेठ की बड़ी इच्छा थी कि किसी दिन ईसर बाबा स्वयं उसका बगीचा देखने आएँ। एक दिन उसकी इच्छा पूरी हुई और बाबा उसके साथ बगीचे में पहुँच गए। सेठ बड़े चाव से बगीचे का कोना-कोना बाबा को दिखा रहा था। फलों से लदे वृक्ष और फूलों से लदी लताएँ दिखाते हुए सेठ का उत्साह सातवें आसमान पर था। जिसका सफल परिश्रम देखने उसके आराध्य आए हों, उसका उत्साह स्वाभाविक भी था। अचानक उत्साह के उद्वेग से बाहर आकर सेठ ने ध्यान दिया कि बाबा न तो वृक्षों का सौंदर्य देख रहे हैं, न ही फूलों के गुच्छों से ही आकृष्ट हो रहे हैं। बस चुपचाप उसकी बातों पर हुंकारा भरते हुए नीचे देखते हुए चले जा रहे हैं। बाबा के इस व्यवहार से सेठ किंचित निराश हुआ, किन्तु निरंतर बगीचे की विशेषताओं का वर्णन करता रहा। बाबा पहले की तरह नीची निगाह किये टहलते रहे। थोड़ी देर बाद सेठ का धैर्य डोल गया। वह झल्लाते हुए बोला - "बाबा! मैं आपको वृक्षों का सौंदर्य दिखाना चाह रहा हूँ और आपकी बगीचे में कोई रुचि ही नहीं है।" उसकी बेचैनी देख बाबा रुक गए। उन्होंने मुस्कुराती हुई आँखों से सेठ की ओर देखा और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले- "जो सौंदर्य तुम मुझे दिखाना चाह रहे हो, वह इस बगीचे का वर्तमान मात्र है, मैं नीचे देखकर उन बिरवों को निहार रहा हूँ जिनमें इस बगीचे का भविष्य श्वास ले रहा है।" इतना कहकर बाबा नीचे झुके और मिट्टी के भीतर से फूट रहे एक नन्हें अंकुर को दुलारने लगे। सेठ ईसर बाबा के आशय को समझ गया और उस दिन के बाद उस बगीचे में उगने वाले हर नए बिरवे का अतिरिक्त ध्यान रखा जाने लगा।
✍️ चिराग़ जैन
Sunday, March 31, 2019
मज़ाकिया भारत
Thursday, March 28, 2019
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का आम चुनाव सामने है। यह संभवतः पहला ऐसा आम चुनाव है जिसमें मीडिया से अधिक प्रभाव सोशल मीडिया का है। अब से पहले राजनीति में एक जुमला चलता था कि जनता की याद्दाश्त बहुत कमज़ोर है। लेकिन अब राजनीति यह समझ गई है कि मोबाइल की याद्दाश्त कमज़ोर नहीं होती। इसी कारण राजनीति ने न केवल ढिठाई की कोटिंग मज़बूत करवा ली है, बल्कि भाषा का स्तर भी इतना गिरा लिया है कि जनता उनकी बातों के तथ्यों तक पहुंचने की बजाय, बातों के तरीकों में उलझ कर रह जाए। हमें फ़ख़्र है कि हमें जिन लोगों को क़ानून बनाने के लिए नियुक्त करने जा रहे हैं वे आधिकारिक बैठक में जूते से अपने सहकर्मी की पिटाई करते हैं। हमें गुमान है कि जिन लोगों के हाथ में सभ्यता की बागडोर थमानी है वे सार्वजनिक रूप से माँ-बहन की गाली बकते देखे जाते हैं। हम जिनसे देश को समृद्ध बनाने की उम्मीद कर रहे हैं वे अपने कुर्ते की जेब फाड़ कर जनता के सम्मुख वोट की भीख मांगते देखे गए हैं। ज़िनको वचन निभाने की मिसाल क़ायम करनी थी, वे ओछे स्वार्थों के लिए बेशर्मी से दल बदलते फिर रहे हैं। राष्ट्रसेवा की आड़ में राजनीति का धंधा करने वाले सियारों का असली रंग तब सामने आता है जब उन्हें उनकी पार्टी चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देती। जनता के सम्मुख चुनावी रैलियों में प्रतिद्वंदियों की चरित्र हत्या की जाती है और फिर सरकार बनाने के जोड़-तोड़ में उन्हीं चरित्रहीन लोगों से गलबहियां डाली जाती हैं। बेशर्मी के साथ चुने हुए प्रतिनिधि ख़रीदे जाते हैं और हम लोकतंत्र की अरथी पर सजी हुई मूल्यों की लाशों को सरकार मानने लगते हैं। हमारी जनता पन्द्रह लाख, बहत्तर हज़ार और मुफ्त राशन की मरीचिका में अपना वोट वायदों के रेगिस्तान में फेंक आती है और राजनीति के गिद्ध वोटों के चीथड़ों को नोच नोच कर अपना पेट भरते रहते हैं। हमारे चुनावों में या तो अंतरिक्ष की उपलब्धियां गिनाई जाती हैं या फिर हवाई जुमले उछाले जाते हैं। यह हमारे नेताओं की ईमानदारी है कि चुनाव ख़त्म होते ही वे जनता को बता देते हैं कि उनके सारे वायदे केवल चुनावी जुमले थे। इस बार भी यही जुमले उछलेंगे और हम टेलिविज़न की बहस देखकर अपने राहुल या अपने मोदी के दांव देखकर ख़ुश होते रहेंगे। हम मोदी, राहुल, माया, अखिलेश, ममता, ओवैसी, उद्धव, नीतीश, शिवपाल, पासवान, अब्दुल्ला, महबूबा, नायडू, केजरीवाल या चौटाला की अंधभक्ति में देशभक्ति बिसरा चुके हैं। हमें किसी अभिनेता या अभिनेत्री की शक्ल दिखाकर प्रभावित किया जाएगा और हम हो जाएंगे। एक पार्टी दिल्ली के पुरबियों को साधने के लिए भोजपुरी के एक गायक को प्रदेश अध्यक्ष बनाती है और पुरबियों की वोट साध लेती है। दूसरी पार्टी पंजाबी वोटर को ख़ुश करने के लिए गणित भिड़ाती है और पंजाबी वोट साध लिया जाता है। जिस देश में जातीय आधार पर राजनैतिक दल बनाना अपराध है, उस देश में टीवी चैनल सरेआम जातीय गणित और चुनाव के जातीय समीकरणों पर घंटों चर्चा करते हैं और हमारे न्यायालय आँख पर पट्टी बांधे बैठे रहते हैं। हमारे लोकतंत्र में सबके गिरेबान चाक हैं। जनता को अपने टुच्चे लालच की साध में राजनेताओं के शिकंजे में स्वयं फंसने में कोई आपत्ति नहीं है तो राजनीति के इस नंगे नाच पर आक्षेप करना जनता को भी कतई शोभा नहीं देता।
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, March 26, 2019
छलायण
Tuesday, March 12, 2019
एयर इण्डिया
आइए साहब
एयर इंडिया का जहाज देखिए
जब ये जहाज उड़ता है ना आसमान में
तो यह अकेला नहीं उड़ता
इसके साथ उड़ती हैं
हज़ारों आँखों की आशाएं
सुरक्षा की सारी परिभाषाएं
किसी की प्रतीक्षा से किया गया वादा
किसी का जीवन बचा लेने का इरादा
किसी का सपना पूरा करने की चाह
किसी का कॅरियर बना देने की परवाह
इस जहाज को
हम भारतीयों ने अपने श्रम से पोसा है
यह जहाज हर मंज़िल पर
सुरक्षित पहुँचने का भरोसा है
जब कोई विदेश जाता है इस जहाज से
तो यात्रा में उसको
अपनत्व का परिवेश मिलता है
विदेश की धरती पर कदम रखने से
एक क्षण पहले तक
उसे आसपास अपना देश मिलता है
सिपाही को मोर्चे पर पहुँचाना हो
आपदा के समय पर
मानव धर्म निभाना हो
मुसीबत में फँसे अभागों की
मदद का सवाल हो
बाढ़ हो, सूनामी हो,
अकाल हो या भूचाल हो
एयर इंडिया का जहाज
हर समय तैनात रहता है
हर मुश्किल में
अपने देशवासियों के साथ रहता है
भीतर झाँको
तो यात्रा की थकान के बीच
सुकून भरी निंदिया है
बाहर से देखो तो
आसमान के माथे पर
सजावटी बिंदिया है
जी साहब
ये एयर इंडिया है
जी हुज़ूर
ये एयर इंडिया है
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, March 6, 2019
हम तो भाप से भाँप लेते हैं
सामान्यीकरण
Friday, March 1, 2019
पश्चिम से सूरज उगता
धीरज ने बदला अपनी क़िस्मत का लेखा
दहशत के अंधियारे ने दम तोड़ दिया है
दुनिया ने पश्चिम से सूरज उगता देखा
✍️ चिराग़ जैन