Sunday, April 7, 2019

सम्मानित भारत का ड्राफ्ट

सम्मानित भारत का ड्राफ्ट किसी भी देश की समृद्धि संसाधनों के समुचित वितरण पर निर्भर करती है। भारत में संसाधनों की बहुतायत के बाद भी ग़रीबी, अव्यवस्था, अपराध, भुखमरी, बेघरी, बेरोज़गारी, अराजकता और रिश्वतखोरी जैसी समस्याएं कम नहीं हो पा रही हैं। सरकारी योजनाएं केवल कोरा प्रचार बनकर रह जाती हैं और जनता की स्थिति जस की तस रहती है। सड़कें चौड़ी की जाती हैं लेकिन जाम कम नहीं होता, रोज़ नए अस्पताल खोले जा रहे हैं लेकिन मरीजों को अस्पतालों के बरामदों में मरना पड़ता है, खूब रेलगाड़ियां चलती हैं लेकिन आरक्षण नहीं मिलता, स्कूल खुलते जा रहे हैं लेकिन एडमिशन की मारामारी है, खेती ख़ूब होती है लेकिन थालियां रीती हैं। हम इन सब समस्याओं का निदान ढूंढने निकलते हैं और राजनैतिक इच्छाशक्ति, भ्रष्टाचार, जमाखोरी और लालफीताशाही की निंदा में उलझ कर रह जाते हैं। सरकारें आत्मप्रचार के लिए अरबों रुपये के विज्ञापन कर देती है और समस्या वहीं की वहीं रहती है। विपक्ष सरकार के कार्यों की आलोचना करता है पर समस्या वहीं की वहीं रहती है। अफ़सर जैसे तैसे काग़ज़ों का पेट भरते भरते ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं पर समस्या वहीं की वहीं रहती है। इतना पैसा, इतनी योजनाएं, इतने अफसर, इतने कर्मचारी, इतनी समाजसेवी संस्थाएं, इतने घोषणापत्र और इतने आंदोलन मिलकर भी देश की किसी समस्या का निदान इसलिए नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि समस्या की जड़ पर कोई चर्चा ही नहीं कर रहा। चमड़ी पर लगे कोढ़ को हटाने के लिए मरहम लेपा जा रहा है पर ख़ून साफ़ करने का उपचार कोई नहीं कर रहा। भारत की किसी भी समस्या को पकड़ कर उसके प्रारंभिक छोर तक कि यात्रा की जाए तो हमें एक ही शब्द दिखाई देगा - "जनसंख्या"। इस एक शब्द के आधार पर भारतीय समस्याओं का मकड़जाल बुना हुआ है। यह एक ऐसी समस्या है जिसको नियंत्रित किये बिना देश के विकास की बातें चुनावी जुमलेबाज़ी से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। हमें हिन्दू-मुस्लिम बनाकर ज़्यादा बच्चे पैदा करने के बयान दिए जाते हैं। यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो ऐसा हर बयान राष्ट्रद्रोह जैसा अपराध है। भारतीय लोकतंत्र में वोट की संख्या को ही सत्ता का मापदंड बना दिया गया है। इसके स्थान पर यदि वोट की गुणवत्ता को तवज्जोह दी जाती तो स्थिति इतनी भयावह कभी नहीं होती। किसी भी परिवार के पहले बच्चे को ही मतदान का अधिकार हो, पहले बच्चे को ही सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, पहले बच्चे की सरकारी नौकरी की गारंटी हो, पहले बच्चे को आयकर में छूट मिले, पहले बच्चे की शिक्षा तथा स्वास्थ्य मुफ्त हो... यह सुनने में थोड़ा कठोर लग सकता है लेकिन सोचने पर ज्ञात होगा कि जानवरों की तरह अस्पतालों, स्टेशनों, फुटपाथों और झुग्गियों में घिसट रहे भारत को सम्मानजनक जीवन देने के लिए इसके सिवाय अन्य कोई उपाय नहीं है। आज ही कि तिथि से ठीक दस माह के बाद की तारीख़ निर्धारित करके सरकार "एक बालक विधेयक" लागू कर दे कि इस तिथि के बाद जो भी बच्चे जन्म लेंगे उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा यदि वे पहली संतान होंगे। यह कानून अब तक जन्म चुके या गर्भस्थ किसी भी मनुष्य के साथ अन्याय किये बिना जनसंख्या नियंत्रण का चमत्कार कर देगा। अभी भी सरकारी नौकरी में मेटरनिटी तथा चाइल्ड केयर लीव के संदर्भ में इस प्रकार के नियम सफलतापूर्वक क्रियान्वित हैं, इसलिए ऐसे नियमों के क्रियान्वयन में कोई विशेष बाधा नहीं आएगी। सरकार के कुल विज्ञापन बजट का तीस प्रतिशत व्यय इस कानून के प्रसार पर ख़र्च हो तो आज से बीस साल बाद हम उस भारत के दर्शन कर पाएंगे जिसके हर नागरिक को सम्मानपूर्ण जीवन का अर्थ पता होगा।  

✍️ चिराग़ जैन

Friday, April 5, 2019

महंगा क्षण

आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया
आज समझ आया चूड़ी बिन
कैसे कंगन जी पाया

जिस पल मथुरा का आकर्षण वृंदावन से ज़्यादा था
कर्तव्यों का मोह किसी को अपनेपन से ज़्यादा था
निर्णय ले बैठा निर्मोही, बिरहन याद नहीं आई
दाँतों ने अधरों को काटा, नयनों में लाली छाई
आज तुम्हारा निर्णय सुनकर
राधा का मन जी आया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया

राघव स्वयं नहीं सक्षम थे, जो सच्चाई कहने में
वैदेही पर क्या बीती थी, वो सच्चाई सहने में
जब लक्ष्मण वन में ले जाकर, सीता को बतलाते हैं
उस पल सिय के मन में क्या क्या, भाव उमड़कर आते हैं
पाँव जमे, आँखें पथराईं
ख़ुद का तर्पण जी आया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया

आंधी से मिलकर जब अमुआ, बौर गिराने लगता है
तब सहमी सहमी कोयल का, मन घबराने लगता है
अब समझा जब कोहरे में छुप सूरज को बिसराते हैं
तब इन हरियाले पेड़ों से पत्ते क्यों झड़ जाते हैं
आज अचानक मैं मन ही मन
रूठा सावन जी पाया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी पाया

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, April 3, 2019

गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे...

बुलेट ट्रेन और अंतरिक्ष यान की चर्चाओं के बीच आज कुछ वास्तविक यातायात साधनों की स्थिति ध्यान आ रही है। भारत में एक अदद रेल विभाग है। सड़ांध मारते स्टेशन और देर से चलने के लिए मशहूर रेलगाड़ियाँ इस विभाग की शान हैं। आज़ादी के सात दशक बाद भी भारतीय रेल ने लेटलतीफी की अपनी गौरवमयी परंपरा को बरक़रार रखा है। स्टेशन पर गठरियों की तरह पड़े लाचार यात्री भारतीय रेल की निष्ठा का शिलालेख है। यदि ट्रेन लेट हो जाए तो रेलवे की उद्घोषिका की रिकार्डेड आवाज़ सुनने को मिलती है कि आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है। यदि रेल विभाग किसी भी कारण से ट्रेन कैंसिल करता है तो यात्री को कोई मुआवजा देने का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन यदि यात्री किसी कारणवश अपना आरक्षण रद्द करवाए तो उससे जुर्माना लेने का प्रावधान है। इससे सिद्ध होता है कि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है। निजी सेवाओं की ओर देखें तो भारत में कुछ गिनी-चुनी विमानन सेवाएँ हैं जो नागर विमानन मंत्रालय तथा डीजीसीए की देखरेख में कार्य करती हैं। इनमें एयर इण्डिया सरकारी उपक्रम है और इंडिगो, गो एयरवेज़, जेट एयरवेज़, स्पाइस जेट, एयर विस्तारा तथा एयर एशिया निजी क्षेत्र की विमान सेवाएँ हैं। इन सभी कंपनियों का मुख्य कार्य मुनाफ़ा कमाना है, इसके साथ वे कुछ सवारियाँ भी ढो लेती हैं।  एयर इण्डिया सरकारी विमान सेवा है। जो क्रमशः इण्डियन एयरलाइंस और एलाइंस एयर जैसी कंपनियों को लील लेने के बावजूद घाटे में चलती है। इसके यात्री अनियमितताओं और अव्यावसायिक रवैये से तंग होकर निजी सेवाओं का प्रयोग करने के लिए विवश हैं। इस कारण एयर इंडिया के जहाज सरकारी कर्मचारियों के दौरे के लिए ही उपयुक्त रहते हैं। निजी विमानन सेवाओं में किरायों को नियंत्रित तथा तर्कयुक्त बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। भारतीय रेल की तरह फ्लाइट कैंसिल होने की स्थिति में मुआवजे का कोई विकल्प नहीं है किंतु यात्री द्वारा आरक्षण रद्द कराने पर सामान्यतः उसके आरक्षण का लगभग सारा पैसा जब्त कर लेने की सुविधा विमानन सेवाओं के पास है। फ्लाइट विलंबित होने की स्थिति में यात्रियों को होने वाले आर्थिक, व्यावसायिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत नुक़सान के लिए न कोई पूछता है न ही इस संदर्भ में कोई दिशानिर्देश बनाए गए हैं। डीजीसीए और नागर विमानन मंत्रालय इन कम्पनियों के बकाया, उधारी और सुरक्षा मानदंडों के क्रियान्वयन में इतने तल्लीन हैं कि उनके पास यात्रियों के संकटों की ओर देखने का समय ही नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है। सड़क यातायात में हर राज्य का अपना सड़क परिवहन निगम है। इन निगमों की सामान्य बसों से सरकारी तंत्र की सूरत मिलाई जा सकती है। हाँ, अंतरराज्यीय बस सेवाओं में राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश जैसे अनेक राज्यों ने वॉल्वो तथा अन्य लग्जरी बसें मुहैया करवाई हैं जो समुचित किरायों में सुविधाजनक सफ़र की मिसाल हैं। स्थानीय सेवाओं में मुम्बई की बस सेवाओं की व्यवस्था उदाहरणीय है। शेष शहरों में स्थानीय बस परिवहन की दशा बेहद शोचनीय है। दिल्ली में तो ब्ल्यू लाइन, रेड लाइन, ग्रीन लाइन, व्हाइट लाइन जैसे विविध प्रयोग काफ़ी शानदार तरीके से विफल हुए हैं। हाँ डीटीसी की क्लस्टर बसों से आशा बंधी थी लेकिन ब्ल्यू लाइन (जिसे किलर लाइन भी कहा जाता था) के बेरोज़गार ड्राइवरों की कॉन्ट्रेक्ट बेस पर भर्ती होने के बाद से इन बसों का दिल्ली की सड़कों पर आतंक देखते ही बनता है। बीच में "अंडर डीटीसी परमिट' वाली योजना के तहत ऐसी बसें चलीं थीं जिनमें ड्राइवर बस मालिक का होता था और कण्डक्टर डीटीसी का। मेरे विचार में यह योजना सफल तथा निर्विवादित थी। इसको बन्द किये जाने का कारण मुझे ज्ञात नहीं हो पाता। दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई, जयपुर, नागपुर और लखनऊ जैसे कुछ शहरों में मेट्रो रेल भी पब्लिक परिवहन का एक विकल्प है। इनमें दिल्ली मेट्रो सर्वाधिक सफल है। कोलकाता मेट्रो पूर्णतः जीर्णोद्धार की मांग करती है। शेष अपने शुरुआती दौर में हैं। टैक्सी सेवाओं की स्थिति भी भाषाओं की तरह तीन कोस पर बदलती रहती है। मुम्बई और कोलकाता में ऑटो रिक्शा तथा टैक्सी सेवाएं सुव्यवस्थित तथा परिपक्व हैं। दिल्ली में टीएसआर सेवाएँ मनमाने किरायों, ड्राइवरों की गुंडागर्दी और पुरानी खटारा गाड़ियों के कारण नगण्य है। हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों तथा कुछ मुख्य स्थानों पर प्रीपेड बूथ बनाए गए हैं लेकिन आवश्यकता के सामने इनकी संख्या भी नगण्य ही है। टीएसआर की नाकामी और मनमानी के कारण भारत में रेडियो टैक्सी सेवाओं का तेज़ी से प्रचलन बढ़ा। सस्ते दामों के दावों, डोर टू डोर सर्विस, साफ़ सुथरी गाड़ियों और डिस्काउंट कूपन्स के विज्ञापनों ने सबके मोबाइल में ओला और ऊबर की एप्प साइन अप करवा दी। ऑटो रिक्शा चालकों ने अपने ऑटो रिक्शा बेच बेचकर इन कम्पनियों में गाड़ी चलानी शुरू कर दी। सवारियों ने फ्री राइड और सस्ते किरायों के लोभ में इन सेवाओं की आदत डाल ली। और एक बार आदत पड़ जाने के बाद इन कम्पनियों ने एक शब्द से हमारा परिचय करवाया, और वह शब्द था 'सर्ज'। यह सर्ज निरंतर हमारी जेब पर दर्ज होता रहता है। स्थिति यह है कि आठ रुपये प्रति किलोमीटर का विज्ञापन करने वाली ओला/ऊबर अब पन्द्रह से बीस रुपये प्रति किलोमीटर सामान्य स्थितियों में वसूल रही हैं और चालक को  सवा छह से ग्यारह रुपये प्रति किलोमीटर अदा करके शेष गड़प कर रही हैं। सरकार ने इन कम्पनियों के नाम सर्ज न लगाने का फ़रमान जारी किया तो था लेकिन वह फ़रमान अब न तक सरकार को याद है, न ओला/ऊबर को और न ही सवारियों को। निजी कंपनियां धड़ल्ले से सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में चांदी कूट रही हैं और जनता इस लोककल्याणकारी गणराज्य के फटे जूते से अपना सिर पीट रही है। रोड टैक्स, टोल टैक्स, एमसीडी टैक्स, पार्किंग चार्ज और डीजल-पैट्रोल की क़ीमतें जैसी कीलों ने आम नागरिक के वाहनों में अनगिनत पंक्चर कर दिए हैं और देश के विकास की गाड़ी दौड़ने का शोर करते हुए रेंग रही है।  


✍️ चिराग़ जैन

Monday, April 1, 2019

नए बिरवे

नए बिरवे  ईसर बाबा के एक अनुयायी सेठ ने बड़ी मेहनत और लगन से एक ख़ूबसूरत बगीचा लगवाया। सेठ की बड़ी इच्छा थी कि किसी दिन ईसर बाबा स्वयं उसका बगीचा देखने आएँ। एक दिन उसकी इच्छा पूरी हुई और बाबा उसके साथ बगीचे में पहुँच गए। सेठ बड़े चाव से बगीचे का कोना-कोना बाबा को दिखा रहा था। फलों से लदे वृक्ष और फूलों से लदी लताएँ दिखाते हुए सेठ का उत्साह सातवें आसमान पर था। जिसका सफल परिश्रम देखने उसके आराध्य आए हों, उसका उत्साह स्वाभाविक भी था। अचानक उत्साह के उद्वेग से बाहर आकर सेठ ने ध्यान दिया कि बाबा न तो वृक्षों का सौंदर्य देख रहे हैं, न ही फूलों के गुच्छों से ही आकृष्ट हो रहे हैं। बस चुपचाप उसकी बातों पर हुंकारा भरते हुए नीचे देखते हुए चले जा रहे हैं। बाबा के इस व्यवहार से सेठ किंचित निराश हुआ, किन्तु निरंतर बगीचे की विशेषताओं का वर्णन करता रहा। बाबा पहले की तरह नीची निगाह किये टहलते रहे। थोड़ी देर बाद सेठ का धैर्य डोल गया। वह झल्लाते हुए बोला - "बाबा! मैं आपको वृक्षों का सौंदर्य दिखाना चाह रहा हूँ और आपकी बगीचे में कोई रुचि ही नहीं है।" उसकी बेचैनी देख बाबा रुक गए। उन्होंने मुस्कुराती हुई आँखों से सेठ की ओर देखा और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले- "जो सौंदर्य तुम मुझे दिखाना चाह रहे हो, वह इस बगीचे का वर्तमान मात्र है, मैं नीचे देखकर उन बिरवों को निहार रहा हूँ जिनमें इस बगीचे का भविष्य श्वास ले रहा है।" इतना कहकर बाबा नीचे झुके और मिट्टी के भीतर से फूट रहे एक नन्हें अंकुर को दुलारने लगे। सेठ ईसर बाबा के आशय को समझ गया और उस दिन के बाद उस बगीचे में उगने वाले हर नए बिरवे का अतिरिक्त ध्यान रखा जाने लगा।  

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, March 31, 2019

मज़ाकिया भारत

हम भारत के लोग बहुत मज़ाकिया हैं, इसलिए हमने भारतीय तंत्र और भारतीय लोकतंत्र दोनों का मज़ाक़ बना दिया है। 
हम भारत के लोग संविधान की शपथ लेकर झूठ बोलने में दक्ष हो चुके हैं। हमने इतना विश्वास कमाया है कि जब हम झूठ बोलते हैं तो सब बिना सुने ही समझ जाते हैं कि हम झूठ ही बोल रहे हैं। सब यह भी समझ चुके हैं कि हम किसी भी कीमत पर झूठ बोलना नहीं छोड़ेंगे, इसलिए कोई हमारे झूठ पर ऐतराज भी नहीं करता।
हम भारत के लोग परंपराओं के पोषक हैं। इसलिए हम आज भी जाति, ऊँच-नीच और धर्म के नाम पर बँटे हुए हैं। इस बँटवारे के कारण देश और समाज का बंटाधार होता हो, तो भी हम परंपराओं से मुख मोड़ने वाले नहीं हैं।
हम भारत के लोग परस्पर जुड़े हुए हैं इसलिए अपने दोष देखे बिना दूसरों को दोषी सिद्ध करके प्रसन्न रहते हैं। न्यायालय निर्णय सुनाते हुए प्रशासन को लापरवाह बताकर प्रसन्न है, प्रशासन रिश्वत लेते हुए विधायिका को अपराधी बताकर प्रसन्न है, विधायिका वोट मांगते समय जनता को कामचोर बताकर प्रसन्न है, और जनता कानून तोड़ते समय सबको भ्रष्ट बताकर प्रसन्न है। इस प्रकार हमारा देश एक प्रसन्न राष्ट्र बन चुका है।
हम भारत के लोग कर्मशील हैं, इसलिए हम ऐसी नौकरी की तलाश में रहते हैं जिसमें टेबल के ऊपर और नीचे हर तरफ काम किया जा सके। हम दूसरों को कर्मशील बनाना चाहते हैं अतएव अपनी कर्मण्यता का बखान करने में गर्व की अनुभूति करते हैं।
हम भारत के लोग अपने संविधान तथा तंत्र के प्रति आश्वस्त हैं इसलिए कोई भी अपराध करते हुए निडर रहते हैं। हमारा नेतृत्व तथा मीडिया हमें अपराधी हो जाने के लिए निरंतर प्रेरित करता रहता है। लाखों-करोड़ों रुपयों के घोटाले हमें निरंतर धिक्कारते हैं कि देश के कर्णधार कितना श्रम कर रहे हैं और हम एक अदद कार लोन की भी किश्तें चुकाकर देश के विकास को अवरुद्ध कर रहे हैं।
हम भारत के लोग मंदिर, मस्जिद, गाय, जनेऊ, धर्म, जाति, बुआ, भतीजा, शिवपाल-अखिलेश, उत्तर-दक्षिण, राहुल का धर्म, मोदी की डिग्री और पद्मावती जैसे मुद्दों पर चुनाव करते हैं ताकि विश्व समुदाय को यह संदेश मिले कि हमारे देश में रोटी, कपड़ा, मकान, रोज़गार, सुरक्षा, न्याय, शिक्षा, सड़क, बिजली, पानी जैसी समस्याओं पर पार पा लिया गया है। क्योंकि विश्व समुदाय जानता है कि इन समस्याओं के रहते कोई देश बेमतलब के मुद्दों को तूल नहीं दे सकता। इससे विश्व समुदाय में हमारा सम्मान बढ़ता है।
हम भारत के लोग बेहद भावुक हैं और वर्तमान में जीने में विश्वास रखते हैं। इसलिए किसी भी आतंकवादी घटना के बाद हमें सेना का शौर्य याद आने लगता है। और कुछ ही दिनों में हम चुनाव के खिलवाड़ और नेताओं की गाली-गलौज के चक्कर में व्यस्त होकर सेना को पुनः भुला देते हैं।
हम भारत के लोग देशप्रेमी हैं। इसलिए हर नुक्कड़ पर मोदीभक्त या राहुलभक्त होकर घंटों चर्चा करते हैं। यदि ग़लती से कोई देशभक्त हमारे बीच में बोल पड़े तो उसे कांग्रेस या भाजपा का दलाल सिध्द करने में जुट जाते हैं।
हम भारत के लोग केवल एक प्रश्न स्वयं से कभी नहीं पूछते, कि हमें अपने बच्चों को ईमानदार नागरिक बनने की शिक्षा देनी चाहिए या बेईमान अवसरवादी बनने की?

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, March 28, 2019

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का आम चुनाव सामने है। यह संभवतः पहला ऐसा आम चुनाव है जिसमें मीडिया से अधिक प्रभाव सोशल मीडिया का है। अब से पहले राजनीति में एक जुमला चलता था कि जनता की याद्दाश्त बहुत कमज़ोर है। लेकिन अब राजनीति यह समझ गई है कि मोबाइल की याद्दाश्त कमज़ोर नहीं होती। इसी कारण राजनीति ने न केवल ढिठाई की कोटिंग मज़बूत करवा ली है, बल्कि भाषा का स्तर भी इतना गिरा लिया है कि जनता उनकी बातों के तथ्यों तक पहुंचने की बजाय, बातों के तरीकों में उलझ कर रह जाए। हमें फ़ख़्र है कि हमें जिन लोगों को क़ानून बनाने के लिए नियुक्त करने जा रहे हैं वे आधिकारिक बैठक में जूते से अपने सहकर्मी की पिटाई करते हैं। हमें गुमान है कि जिन लोगों के हाथ में सभ्यता की बागडोर थमानी है वे सार्वजनिक रूप से माँ-बहन की गाली बकते देखे जाते हैं। हम जिनसे देश को समृद्ध बनाने की उम्मीद कर रहे हैं वे अपने कुर्ते की जेब फाड़ कर जनता के सम्मुख वोट की भीख मांगते देखे गए हैं। ज़िनको वचन निभाने की मिसाल क़ायम करनी थी, वे ओछे स्वार्थों के लिए बेशर्मी से दल बदलते फिर रहे हैं। राष्ट्रसेवा की आड़ में राजनीति का धंधा करने वाले सियारों का असली रंग तब सामने आता है जब उन्हें उनकी पार्टी चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देती। जनता के सम्मुख चुनावी रैलियों में प्रतिद्वंदियों की चरित्र हत्या की जाती है और फिर सरकार बनाने के जोड़-तोड़ में उन्हीं चरित्रहीन लोगों से गलबहियां डाली जाती हैं। बेशर्मी के साथ चुने हुए प्रतिनिधि ख़रीदे जाते हैं और हम लोकतंत्र की अरथी पर सजी हुई मूल्यों की लाशों को सरकार मानने लगते हैं। हमारी जनता पन्द्रह लाख, बहत्तर हज़ार और मुफ्त राशन की मरीचिका में अपना वोट वायदों के रेगिस्तान में फेंक आती है और राजनीति के गिद्ध वोटों के चीथड़ों को नोच नोच कर अपना पेट भरते रहते हैं। हमारे चुनावों में या तो अंतरिक्ष की उपलब्धियां गिनाई जाती हैं या फिर हवाई जुमले उछाले जाते हैं। यह हमारे नेताओं की ईमानदारी है कि चुनाव ख़त्म होते ही वे जनता को बता देते हैं कि उनके सारे वायदे केवल चुनावी जुमले थे। इस बार भी यही जुमले उछलेंगे और हम टेलिविज़न की बहस देखकर अपने राहुल या अपने मोदी के दांव देखकर ख़ुश होते रहेंगे। हम मोदी, राहुल, माया, अखिलेश, ममता, ओवैसी, उद्धव, नीतीश, शिवपाल, पासवान, अब्दुल्ला, महबूबा, नायडू, केजरीवाल या चौटाला की अंधभक्ति में देशभक्ति बिसरा चुके हैं। हमें किसी अभिनेता या अभिनेत्री की शक्ल दिखाकर प्रभावित किया जाएगा और हम हो जाएंगे। एक पार्टी दिल्ली के पुरबियों को साधने के लिए भोजपुरी के एक गायक को प्रदेश अध्यक्ष बनाती है और पुरबियों की वोट साध लेती है। दूसरी पार्टी पंजाबी वोटर को ख़ुश करने के लिए गणित भिड़ाती है और पंजाबी वोट साध लिया जाता है। जिस देश में जातीय आधार पर राजनैतिक दल बनाना अपराध है, उस देश में टीवी चैनल सरेआम जातीय गणित और चुनाव के जातीय समीकरणों पर घंटों चर्चा करते हैं और हमारे न्यायालय आँख पर पट्टी बांधे बैठे रहते हैं। हमारे लोकतंत्र में सबके गिरेबान चाक हैं। जनता को अपने टुच्चे लालच की साध में राजनेताओं के शिकंजे में स्वयं फंसने में कोई आपत्ति नहीं है तो राजनीति के इस नंगे नाच पर आक्षेप करना जनता को भी कतई शोभा नहीं देता। 


✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, March 26, 2019

छलायण

अहमपुरी के उपद्रव से व्यथित होकर दशरथ कोपभवन में बैठ गए। मन्थरा और आर्यसुमन्त ने बहुत समझाया किन्तु दशरथ न माने। कोई उपाय न सूझने पर कैकेयी ने उन्हें वचन दिया कि अहमपुरी के राजकुँवर को सिंहासन से उतार दिया जाएगा। दशरथ, कैकेयी तथा मंथरा पुष्पक विमान में बैठ अहमपुरी की ओर उड़ चले।
मानवता के पक्षधर तथा सत्ता के निर्लाेभी दशरथ की भावुकता को कैकेयी भली-भाँति समझती थी। आधे रास्ते में वह दशरथ के पास जाकर बोली- ‘स्वामी, मैंने जीवन भर तुम्हारी सेवा की है। कभी कुछ नहीं मांगा। आज एक वरदान मांगने की हिम्मत कर रही हूँ, राजकुँवर को सिंहासन से मत उतारो।’
कैकेयी की कुटिलता समझकर भी भावुक दशरथ ने मौन स्वीकृति दे दी। अहमपुरी का शासक बच गया। कैकेयी ने उसे अभयदान दे दिया। दशरथ आत्मग्लानि से भरकर दुर्बल हो गए। कुछ समय पश्चात उस राजकुँवर ने राजमहल में से दशरथ का पत्ता साफ़ कर दिया और कैकेयी तथा मन्थराओं को मार्गदर्शक बनाकर स्वयं शासक बन बैठा।
कैकेयी ने जब-जब उसे अपने उपकार याद दिलाने का प्रयास किया तब-तब उसने कैकेयी को उसी के अभयदान का सर्टिफिकेट दिखाकर चुप करा दिया। अब राजकुँवर जान-बूझकर कैकेयी, मंथरा, आर्यसुमन्त तथा ऋषि वशिष्ठ का सार्वजनिक अपमान करने लगा। एक दिन आर्यसुमंत राजकुँवर के व्यवहार से आहत होकर राजमहल छोड़ गए। कुछ समय पश्चात मंथरा भी परेशान होकर कथा से ओझल हो गई।
शत्रुघ्न ने इस निरंकुशता का विरोध किया किन्तु कैकेयी और ऋषि वशिष्ठ मौन रहे। एक दिन जब राजभवन में कक्षों का पुनर्वितरण हो रहा था तो अचानक पता चला कि कैकेयी और ऋषि वशिष्ठ को न केवल कक्ष सूची से वंचित किया गया अपितु राजभवन के बाहर चबूतरे पर भी बैठने की अनुमति नहीं दी गई।
आज कैकेयी उस दिन को कोस रही है जब उसने दशरथ से छल करके राजकुँवर को अभयदान दिलवाया था। बाबा तुलसी ने लिखा भी है- ‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा जो जस करहिं तसहु फल चाखा।’

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, March 12, 2019

एयर इण्डिया

बादलों के बीच तैरता 
भारतीयता का रिवाज़ देखिए
आइए साहब
एयर इंडिया का जहाज देखिए

जब ये जहाज उड़ता है ना आसमान में
तो यह अकेला नहीं उड़ता
इसके साथ उड़ती हैं
हज़ारों आँखों की आशाएं
सुरक्षा की सारी परिभाषाएं
किसी की प्रतीक्षा से किया गया वादा
किसी का जीवन बचा लेने का इरादा
किसी का सपना पूरा करने की चाह
किसी का कॅरियर बना देने की परवाह
इस जहाज को
हम भारतीयों ने अपने श्रम से पोसा है
यह जहाज हर मंज़िल पर
सुरक्षित पहुँचने का भरोसा है

जब कोई विदेश जाता है इस जहाज से
तो यात्रा में उसको
अपनत्व का परिवेश मिलता है
विदेश की धरती पर कदम रखने से
एक क्षण पहले तक
उसे आसपास अपना देश मिलता है

सिपाही को मोर्चे पर पहुँचाना हो
आपदा के समय पर
मानव धर्म निभाना हो
मुसीबत में फँसे अभागों की
मदद का सवाल हो
बाढ़ हो, सूनामी हो,
अकाल हो या भूचाल हो
एयर इंडिया का जहाज
हर समय तैनात रहता है
हर मुश्किल में
अपने देशवासियों के साथ रहता है

भीतर झाँको
तो यात्रा की थकान के बीच
सुकून भरी निंदिया है
बाहर से देखो तो
आसमान के माथे पर
सजावटी बिंदिया है
जी साहब
ये एयर इंडिया है
जी हुज़ूर
ये एयर इंडिया है

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, March 6, 2019

हम तो भाप से भाँप लेते हैं

किसी एक घटना से पूरे व्यक्ति का, किसी एक व्यक्ति से पूरे समुदाय का, किसी एक समुदाय से पूर समाज का और किसी एक समाज से पूरे राष्ट्र का चरित्र आकलन करना हमारा अभ्यास है। इस अभ्यास में हम तर्कहीन हो जाते हैं। प्रत्येक बहस में हम अपनी बुद्धिमत्ता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से कूदते हैं और जब बुद्धिमत्ता बहस से पहले समाप्त हो जाती है तो ऐसे तर्क करने लगते हैं जिनसे सबको पता चल जाए कि हम केवल बुद्धिमत्ता के भरोसे बहस में नहीं आए हैं, देर तक टिके रहने के लिए हमारे पास मूर्खता भी है।
एक सांसद ने अपनी पार्टी के ही एक विधायक का जूतों से अभिनन्दन कर दिया। विवाद का कारण वही था- ‘तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफेद कैसे!’ इस सम्मान समारोह में बाकायदा मंत्रोच्चार के बीच अनुशासन की आहुति दी गई। इस घटना को सोशल मीडिया पर ट्रोल करते समय लोग पूरी पार्टी पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगे। यह ग़लत बात है। किसी भी एक व्यक्ति के आचरण से पूरी पार्टी का आचरण तय नहीं किया जा सकता। कोई भी एक व्यक्ति पूरी विचारधारा का चरित्र नहीं हो सकता। ऐसा करना अपने आकलन के साथ बेईमानी करना है।
यह हम पूर्व में भी करते रहे हैं। एक मणिशंकर अय्यर के बयान से पूरी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। एक साध्वी के बयान से पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। इस आचरण के कारण लोकतंत्र का जनमत भीड़ के उन्माद में परिवर्तित हो जाता है। यह हमने जातियों में भी किया है।
एक गांधी, महात्मा हो गए तो सारे गांधी ख़ुद को संत बताने पर उतारू हो गए। एक मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो सारे मोदी देश का पैसा लेकर घूमने निकल लिए। ऐसा करना ग़लत है। एक राहुल गांधी पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं हैं। एक नरेंद्र मोदी पूरी भाजपा का चरित्र नहीं हैं। एक लोहिया के वैचारिक कुनबे में सारे लोहिया जन्म नहीं लेते।
अम्बेडकर के बैनर तले इकट्ठा होकर लोग अम्बेडकर के बनाए कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। लोहिया की विरासत को बपौती माननेवाले सत्ता की वसीयत को लेकर सिर फुटव्वल करते मिले। भगवा पहनने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता और चरखा चलाने से कोई गांधी नहीं हो जाता। इस बाह्य ढोंग के सहारे ही सियासत की गाड़ी चलती है।
हम सब जानते हैं कि मुसलमानों के मंच पर टोपी पहनकर चढ़नेवाले लीडर, हिंदुओं के मंच पर पहुँचते ही रामनामी ओढ़ लेते हैं। हम सबको मालूम है कि राहुल गांधी केवल वोट पाने के लिए दलितों के घर खाना खाने गए। हम सबको पता है कि सफाई कर्मियों के पैर धोकर मोदी जी ने चुनावी चाल चली है। हम सबको सब पता है। हम सब कुछ जानकर भी इस अभिनय को चरित्र के झरोखे से निहारते रहते हैं।
राहुल गांधी बैंगकॉक जाते हैं, नरेंद्र मोदी मिसेज अम्बानी से हाथ मिलाते हैं, राहुल गांधी ने शादी नहीं की, नरेंद्र मोदी ने पत्नी को छोड़ दिया, राहुल गांधी को भाषण देना नहीं आता, नरेंद्र मोदी ने अमरीका के प्रेजिडेंट को झूला झुलाया, राहुल गांधी के कुर्ते की जेब फटी है, नरेंद्र मोदी का सूट बहुत महंगा है ...इन मुद्दों पर हम वोट देते हैं। एक दरवाज़े से निकलता हुआ हर शख़्स एक जैसा हो, यह सम्भव नहीं है। एक बगीचे में उगनेवाले सारे फूल एक जैसे नहीं होते। कई बार चमेली भी केवल झाड़ बनकर रह जाती है और कई बार नागफनियों पर भी खूबसूरत फूल खिल जाते हैं।
एक ही व्यक्ति एक विषय पर सही और दूसरे विषय पर ग़लत हो सकता है। लेकिन हम इतने ज़िद्दी हैं कि या तो किसी को शत प्रतिशत सही मानेंगे या शत प्रतिशत ग़लत। हर शख़्स में, हर समुदाय में, हर पंथ में, हर दल में, हर विचारधारा में, हर आंगन में, हर देश में, हर घटना में कुछ सही और कुछ ग़लत ज़रूर होता है। इन दोनों को अलग-अलग न किया जाए तो अंधभक्ति और अंधविरोध जन्म लेता है, सुचारु व्यवस्थाएँ नहीं।


✍️ चिराग़ जैन

सामान्यीकरण

हम घटनाओं का सामान्यीकरण करने के अभ्यस्त हैं। किसी एक घटना से पूरे व्यक्ति का, किसी एक व्यक्ति से पूरे समुदाय का, किसी एक समुदाय से पूर समाज का और किसी एक समाज से पूरे राष्ट्र का चरित्र आकलन करना हमारा अभ्यास है। इस अभ्यास में हम तर्कहीन हो जाते हैं। प्रत्येक बहस में हम अपनी बुद्धिमत्ता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से कूदते हैं और जब बुद्धिमत्ता बहस से पहले समाप्त हो जाती है तो ऐसे तर्क करने लगते हैं जिनसे सबको पता चल जाए कि हम केवल बुद्धिमत्ता के भरोसे बहस में नहीं आए हैं, देर तक टिके रहने के लिए हमारे पास मूर्खता भी है। संत कबीर नगर में भाजपा के एक सांसद ने भाजपा के ही एक विधायक का अभिनन्दन कर दिया। विवाद का कारण वही था - "तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफेद कैसे!" इस सम्मान समारोह में बाकायदा मंत्रोच्चार के बीच अनुशासन की आहुति दी गई। इस घटना को सोशल मीडिया पर ट्रोल करते समय लोग पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। यह ग़लत बात है। किसी भी एक व्यक्ति के आचरण से पूरी पार्टी का आचरण तय नहीं किया जा सकता। कोई भी एक व्यक्ति पूरी विचारधारा का चरित्र नहीं हो सकता। ऐसा करना अपने आकलन के साथ बेईमानी करना है। यह हम पूर्व में भी करते रहे हैं। एक मणिशंकर अय्यर के बयान से पूरी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। एक साध्वी के बयान से पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। इस आचरण के कारण लोकतंत्र का जनमत भीड़ के उन्माद में परिवर्तित हो जाता है। यह हमने जातियों में भी किया है। एक गांधी महात्मा हो गए तो सारे गांधी ख़ुद को संत बताने पर उतारू हो गए। एक मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो सारे मोदी देश का पैसा लेकर घूमने निकल लिए। ऐसा करना ग़लत है। एक राहुल गांधी पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं हैं। एक नरेंद्र मोदी पूरी भाजपा का चरित्र नहीं हैं। एक लोहिया के वैचारिक कुनबे में सारे लोहिया जन्म नहीं लेते। अम्बेडकर के बैनर तले इकट्ठा होकर लोग अम्बेडकर के बनाए कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। लोहिया की विरासत को बपौती मानने वाले सत्ता की वसीयत को लेकर सिर फुटव्वल करते मिले। भगवा पहनने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता और चरखा चलाने से कोई गांधी नहीं हो जाता। इस बाह्य ढोंग के सहारे ही सियासत की गाड़ी चलती है। हम सब जानते हैं कि मुसलमानों के मंच पर टोपी पहनकर चढ़ने वाले लीडर हिंदुओं के मंच पर पहुँचते ही रामनामी ओढ़ लेते हैं। हम सबको मालूम है कि राहुल गांधी केवल वोट पाने के लिए दलितों के घर खाना खाने गए। हम सबको पता है कि सफाई कर्मियों के पैर धोकर मोदी जी ने चुनावी चाल चली है। हम सबको सब पता है। हम सब कुछ जानकर भी इस अभिनय को चरित्र के झरोखे से निहारते रहते हैं। राहुल गांधी बैंगकॉक जाते हैं, नरेंद्र मोदी मिसेज अम्बानी से हाथ मिलाते हैं, राहुल गांधी ने शादी नहीं की, नरेंद्र मोदी ने पत्नी को छोड़ दिया, राहुल गांधी को भाषण देना नहीं आता, नरेंद्र मोदी ने अमरीका के प्रेजिडेंट को झूला झुलाया, राहुल गांधी के कुर्ते की जेब फटी है, नरेंद्र मोदी का सूट बहुत महंगा है ...इन मुद्दों पर हम वोट देते हैं। एक दरवाज़े से निकलता हुआ हर शख़्स एक जैसा हो, यह सम्भव नहीं है। एक बगीचे में उगने वाले सारे फूल एक जैसे नहीं होते। कई बार चमेली भी केवल झाड़ बनकर रह जाती है और कई बार नागफनियों पर भी खूबसूरत फूल खिल जाते हैं। एक ही व्यक्ति एक विषय पर सही और दूसरे विषय पर ग़लत हो सकता है। लेकिन हम इतने जिद्दी हैं कि या तो किसी को शत प्रतिशत सही मानेंगे या शत प्रतिशत ग़लत। हर शख़्स में, हर समुदाय में, हर पंथ में, हर दल में, हर विचारधारा में, हर आंगन में, हर देश में, हर घटना में कुछ सही और कुछ ग़लत ज़रूर होता है। इन दोनों को अलग-अलग न किया जाए तो अंधभक्ति और अंधविरोध जन्म लेता है, सुचारु व्यवस्थाएं नहीं।

✍️ चिराग़ जैन