दिल बच्चा है; सपनों के संग पिकनिक करता रहता है
बूढ़ा एक दिमाग़ हमेशा चिकचिक करता रहता है
वक़्त; जिसे तुम पूरी दुनिया का सरताज समझते हो
मेरी इक दीवार घड़ी में टिकटिक करता रहता है
✍️ चिराग़ जैन
गत दो दशक से मेरी लेखनी विविध विधाओं में सृजन कर रही है। अपने लिखे को व्यवस्थित रूप से सहेजने की बेचैनी ही इस ब्लाॅग की आधारशिला है। समसामयिक विषयों पर की गई टिप्पणी से लेकर पौराणिक संदर्भों तक की गई समस्त रचनाएँ इस ब्लाॅग पर उपलब्ध हो रही हैं। मैं अनवरत अपनी डायरियाँ खंगालते हुए इस ब्लाॅग पर अपनी प्रत्येक रचना प्रकाशित करने हेतु प्रयासरत हूँ। आपकी प्रतिक्रिया मेरा पाथेय है।
Wednesday, February 5, 2020
वक़्त
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Sunday, February 2, 2020
एक सवाल था
एक
सवाल था।
अनदेखी की
गोद में पलकर बड़ा हुआ,
और लापरवाही की
उंगली पकड़ कर
धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा हुआ।
जैसे ही सवाल पर
यौवन का ज्वार चढ़ा,
वह अपना
समाधान ढूंढने निकल पड़ा।
समाधान की चाह में,
उसे कुछ दोस्त मिल गए राह में।
समाजसेवा ने
उसे आवारागर्दी की लत लगाई,
राजनीति ने उसे
नशा करने की कला सिखाई।
मीडिया ने
समय बर्बाद करने का हुनर सिखाया,
तकनीक ने
अफवाह से उसका परिचय करवाया,
और आंदोलनों ने
उसके साथ मिलकर
सड़कों पर दंगा मचाया।
जवानी का महत्वपूर्ण समय
नष्ट करने के बाद,
जब सवाल बिल्कुल अकेला रह गया
तो उसे फिर से आई
समाधान की याद।
चक्कर काटते-काटते
देश की चिंता में व्यस्त दरबारों के,
उसे समझ आ गया
कि टोटके एक जैसे ही हैं इन सारों के।
एक दिन
दिन-दहाड़े
एक मीडिया स्टूडियो में
सभी राजनैतिक दलों ने
सवाल को घेर लिया,
फिर एंकर के साथ मिलकर
बंद स्टूडियो में
ऑन कैमरा उसे ढेर किया।
अपने पुराने यार की लाश देख
समाजसेवा और आंदोलन की आँख भर आईं,
उद्योगपतियों ने अनुदान देकर
उस सवाल की चिता सजाई,
लेखकों ने उसकी मौत पर
अलग-अलग तेवर के लेख लिखे,
संसद और विधानसभा
उसकी शवयात्रा में बहुत उदास दिखे।
एक नन्हें से नए सवाल के हाथों
उसकी चिता जली,
और इस दाह-संस्कार में
एक अदद समाधान की अनुपस्थिति
सबको खली।
अगले दिन
देश जब उसके फूल चुनने गया
तो देश का मन खिन्न था,
चिता की सुलगती हुई राख में
अस्थियों से बना
केवल एक प्रश्नचिन्ह था।
✍️ चिराग़ जैन
सवाल था।
अनदेखी की
गोद में पलकर बड़ा हुआ,
और लापरवाही की
उंगली पकड़ कर
धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा हुआ।
जैसे ही सवाल पर
यौवन का ज्वार चढ़ा,
वह अपना
समाधान ढूंढने निकल पड़ा।
समाधान की चाह में,
उसे कुछ दोस्त मिल गए राह में।
समाजसेवा ने
उसे आवारागर्दी की लत लगाई,
राजनीति ने उसे
नशा करने की कला सिखाई।
मीडिया ने
समय बर्बाद करने का हुनर सिखाया,
तकनीक ने
अफवाह से उसका परिचय करवाया,
और आंदोलनों ने
उसके साथ मिलकर
सड़कों पर दंगा मचाया।
जवानी का महत्वपूर्ण समय
नष्ट करने के बाद,
जब सवाल बिल्कुल अकेला रह गया
तो उसे फिर से आई
समाधान की याद।
चक्कर काटते-काटते
देश की चिंता में व्यस्त दरबारों के,
उसे समझ आ गया
कि टोटके एक जैसे ही हैं इन सारों के।
एक दिन
दिन-दहाड़े
एक मीडिया स्टूडियो में
सभी राजनैतिक दलों ने
सवाल को घेर लिया,
फिर एंकर के साथ मिलकर
बंद स्टूडियो में
ऑन कैमरा उसे ढेर किया।
अपने पुराने यार की लाश देख
समाजसेवा और आंदोलन की आँख भर आईं,
उद्योगपतियों ने अनुदान देकर
उस सवाल की चिता सजाई,
लेखकों ने उसकी मौत पर
अलग-अलग तेवर के लेख लिखे,
संसद और विधानसभा
उसकी शवयात्रा में बहुत उदास दिखे।
एक नन्हें से नए सवाल के हाथों
उसकी चिता जली,
और इस दाह-संस्कार में
एक अदद समाधान की अनुपस्थिति
सबको खली।
अगले दिन
देश जब उसके फूल चुनने गया
तो देश का मन खिन्न था,
चिता की सुलगती हुई राख में
अस्थियों से बना
केवल एक प्रश्नचिन्ह था।
✍️ चिराग़ जैन
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Friday, January 31, 2020
प्रमोद तिवारी
कितना बोलते थे प्रमोद जी। नॉन स्टॉप। सुननेवाले का सिर दुःखने लगता था लेकिन बोलते-बोलते उनका मुँह नहीं दुःखता था। और अब ऐसी चुप्पी धार ली है कि साँसों तक की आवाज़ नहीं आ रही। एक-एक मंज़र आँखों के सामने तैर रहा है। लालकिले की वीडियो यूट्यूब पर डलवाने के लिए उनकी बेचैनी और मेरी लापरवाही की जुगलबंदी से जो गालियाँ निर्मित हुईं, उनकी मिठास मुझे अभी तक जस की तस याद है। और वह वीडियो अपलोड करने के बाद जब मैंने उनके लेखन पर लेख लिखा तो उनका अपनत्व, फोन पर मुझे डेढ़ घंटे तक झेलना पड़ा था। सिंगरौली यात्रा में बनारस से सिंगरौली तक अनवरत प्रवचन, आगरा में तेज भाई, संपत जी और रमेश भाई के सम्मुख मेरे गीतों की प्रशंसा का क्रम शुरू किया तो कार्यक्रम में विलम्ब हो जाने की क़ीमत पर भी उसे समाप्त करने को राज़ी न हुए। और पिछली 1 मार्च को दिल्ली के बीएसएफ ग्राउंड में मुरादाबादी दाल के चटखारे लेते हुए एक आँख मीचकर हौले से प्रशंसात्मक सवाल -‘क्या खाए हो गुरु, रोज़ ही लपक के गीत प गीत पेले जा रहे हो। ये वरदान है, जब तक मिल्ला है लपकते रहो। जब मिलना बंद हो जाएगा तो हमाई तरह फक्खड़ हो जाओगे।’
पहेली सी बूझ रहा हूँ कि मैं अपने साथ उनके इस अंतिम संवाद को आशीर्वाद मानूँ, सुझाव मानूँ या चेतावनी ...काश उस ही रात उनसे पूछ लेता। उनकी यादें अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के साथ जीवन की पूंजी बन गई हैं।
अपने कवि होने पर उन्हें अहंकार बिल्कुल नहीं था, लेकिन ठसक पूरी थी। मूलतः पत्रकारिता से जुड़े रहे इसलिए उनके आँख, नाक, कान हमेशा तैनात रहते थे। ज़िन्दगी की किताब के इतने पृष्ठ पलट चुके थे कि अपने अनुभव साझा करते हुए वे कभी थकते ही नहीं थे।
मंचीय जोड़-तोड़ से वे अक्सर खिन्न रहा करते थे लेकिन उनकी प्रस्तुति और मंच पर उनकी धमक से यह खिन्नता कभी अनर्गल नहीं लगती थी। नॉन-स्टॉप बोलने में उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था। किसी यात्रा में यदि उन्हें ड्राइवर के साथ न बैठने को मिले तो वे पूरी यात्रा के दौरान आगे की दोनों सीटों के बीच ही स्थापित रहते थे ताकि संवाद की सम्प्रेषणीयता में कोई बाधा न आ सके।
किसी के व्यक्तिगत जीवन में झाँकना उन्हें बहुत पसंद नहीं था लेकिन मंचीय व्यवहार की कोई भी हरक़त उनकी नज़र से बच नहीं सकती थी। मन को भरपूर जीनेवाले प्रमोद तिवारी जी हिंदी कवि सम्मेलनीय जगत् में गीत का एक अनोखा तेवर स्थापित कर गए हैं।
आज भी जब कोई नया साधक उनके बिंब-विधान और उनकी मस्ती को गीत में साधने का प्रयास करता है तो भीतर से आवाज़ आती है कि कानपुर-लखनऊ हाइवे पर घटी दुर्घटना में उस सुबह केवल उनका शरीर ध्वस्त हुआ था, उनका मन आज भी गीत रच रहे बालकों को डपटकर बोलता है- ‘मस्ती भरे गीत लिखो बे!’
✍️ चिराग़ जैन
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Thursday, January 30, 2020
लोकतंत्र का बकासुर
यह लोकतंत्र का सौंदर्य है कि जिस प्रदेश में चुनाव होते हैं, पूरे देश की चिंताएँ और चिंतन उसी प्रदेश पर केंद्रित हो जाते हैं। बाक़ी पूरे देश में सब कुछ अपने आप ठीक चल रहा होता है।
हमारे संविधान निर्माताओं ने कितनी दूरदर्शिता के साथ यह व्यवस्था की होगी कि देश के तमाम खुराफ़ाती मस्तिष्कों से देश को बचाए रखने के लिए एक बार में किसी एक प्रदेश की भेंट दे दी जाए। यूँ भी गाँव को बकासुर के आतंक से बचाने के लिए स्वतः ही एक व्यक्ति को बकासुर की भेंट चढ़ा देने के क़िस्से हमें सुनाए गए हैं। शोले में गब्बर सिंह जी ने भी यही समझाया था कि - ‘राजनीति के प्रकोप से हमें अगर कोई बचा सकता है तो वह स्वयं राजनीति ही है। अगर इसके बदले में राजनीति एक बार में एक प्रदेश को तहस-नहस कर देती है तो इसमें क्या बुराई है!’
हमारा लोकतंत्र देश के एक प्रदेश को छकड़े पर लादकर बकासुर के द्वार तक पहुँचा देता है। राजनीति प्रदेश का शिकार करने से पहले उसके साथ किलोल करती है। हम इस किलोल में बकासुर की सहृदयता, देशभक्ति, जनहित-भावना, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा ढूंढने लगते हैं। देर तक बकासुर हमें दौड़ाते रहते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम वह भेंट है जिसे कच्चा चबाकर यह असुर अपना पेट भरेगा। जब हम यह बात पूरी तरह भूल जाते हैं तब मुस्कुराते हुए बकासुर ठहाका लगाते हैं, हम कालिया और उसके साथियों की तरह ठहाके में डूब जाते हैं, पूरे वातावरण में शिकार और शिकारी के ठहाके गूंजने लगते हैं और फिर ठांय-ठांय-ठांय की आवाज़ के साथ सिनेमाघर में सन्नाटा पसर जाता है और बकासुर अगली भेंट के स्वागत में खर्राटों का स्वागत-गान गाने लगता है।
बकासुर कहते हैं ‘शू गाय’; हम गाय बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू लिंगायत’; हम धर्म बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू धर्मनिरपेक्षता’; हम मानवता बचाने दौड़ पड़ते हैं। ‘शू सीएए’; ‘शू जनलोकपाल’; ‘शू शाहीन बाग़’; ‘शू पैट्रोल के दाम’; ‘शू प्याज़’; ‘शू चौकीदार’; ‘शू पप्पू’; ‘शू मफ़लर’; ‘शू चायवाला’; ‘शू खाँसी’; ‘शू सीलिंग’; ‘शू पद्मावत’; ‘शू पटेल आरक्षण’; ‘शू जाट आरक्षण’; ‘शू गुर्जर आरक्षण’; ‘शू जीएसटी’; ‘शू बिहारी’; ‘शू पंद्रह लाख’; ‘शू हिन्दू राष्ट्र’; ‘शू गांधी’; ‘शू गोडसे’; ‘शू सावरकर’; ‘शू पटेल’... सरदार बोलता है और हम भागने लगते हैं। हमें लगता है सरदार खुश होगा, शाबासी देगा! लेकिन सरदार ठाने बैठा है कि उसने हमें कहाँ पहुँचाना है। सरदार जानता है कि जो डर गया वो मर गया। इसलिए सरदार हिंदुओ को बताता है कि मुसलमान तुम्हें मार देंगे। मुसलमानों को समझाता है कि हिन्दू तुम्हें भगा देंगे। सरदार कालिया को बताता है कि पद्मावती रिलीज़ हो गई तो संस्कृति का सत्यानाश हो जाएगा। कालिया पद्मावती की रिलीज़ रोकने के लिए जान दे देता है। कालिया के मरते ही सरदार पद्मावती को पद्मावत बनाकर रिलीज़ करवा देता है।
हर बकासुर अपने शिकार को बताता है कि फलां पार्टी का बकासुर शिकार की एक-एक उंगली को तोड़-तोड़ कर खाता है। मैं इतना निर्मम नहीं हूँ कि अपने शिकार को दस बार अलग-अलग नोचूँ। मैं एक ही बार में पूरी बाँह उखाड़ कर चबा जाता हूँ। इतनी करुणा देख हमारी आँखें भीग जाती हैं और हम ख़ुशी-ख़ुशी अपनी बाँह आगे बढ़ा देते हैं ताकि करुणा का यह पुंज हमारी बोटियाँ नोचकर, हमें उंगलियाँ चबानेवाले बकासुर से बचा ले!
✍️ चिराग़ जैन
वसंतोत्सव
सृष्टि के समस्त सर्जकों को सृजन की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती का अनवरत आशीष मिले!
वसंत की पहली दस्तक और सरस्वती पूजन के पर्व का सुयोग इस बात का द्योतक है कि सौंदर्य और सकारात्मकता ही सृजन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं।
प्रकृति पर आच्छादित वासंती रंग की सुवास श्वास के साथ घुलकर मन को स्वस्थ करे ताकि सृजन का मानस स्वस्थ हो और तूलिका, लेखनी, वाद्य, कण्ठ, अंगुलियाँ, हथेलियां और ओष्ठ सब कुछ सकारात्मक हो उठे!
बाँस को बाँसुरी न बनाया गया तो वह या तो हथियार बन जाएगा या ज्वाला को जन्म देगा!
✍️ चिराग़ जैन
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टिप्पणी
Wednesday, January 29, 2020
बहुत टॉप रमेश मुस्कान
ज़िन्दगी जीने के एक रवैये का नाम है - 'रमेश मुस्कान'! आडम्बर, झूठ, परिश्रम, महत्वाकांक्षा और औपचारिकता से रहित एक सहज, प्रसन्न, उन्मुक्त और संतुष्ट जीवन का सटीक उदाहरण है रमेश मुस्कान का जीवन।
मंच पर जमने और कविता लिखने की कला किसी से भी सीखी जा सकती है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी तनाव से मुक्त रहने की स्थितप्रज्ञता सिखाने के लिए रमेश मुस्कान के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति मेरे आसपास नहीं है।
दृष्टि इतनी तेज़ कि सामने वाले की आँखों में यदि एक पल के लिए भी कोई रंग उतरा हो तो वह अनदेखा नहीं रह सकता। कान इतने तेज़ कि बात करने वाले के शब्दों की सरसराहट में छिपे हुए भाव की आहट भी सुन लें। आकलन इतना स्पष्ट कि उठने के अंदाज़ से किसी के गिरने की अवस्था भाँप लें और अन्वेषण इतना ईमानदार कि जो व्यक्ति अभी-अभी हानि पहुँचा कर गया हो उसके वार की भी प्रशंसा करने से न चूकें।
एक व्यक्ति के रूप में बेहद शानदार और एक कवि के रूप में उतने ही आलसी। शब्द चयन और अन्वेषण की विलक्षण क्षमताओं को देखते हुए अनेक नक्षत्रों ने ठहर कर इनके किसी परिधि पर आने की प्रतीक्षा की, लेकिन पूरी आकाशगंगा चक्कर खाती फिर रही है कि कोई ध्रुवतारा रंचमात्र भी हिले बिना कैसे प्रकाशमान रह पाता है!
जब कोई शुभचिंतक इनके लाभ के लिए इनके श्रमरूप का दर्शन करने की प्रतीक्षा करने लगता है तो ये और अधिक स्थिर होकर उस शुभचिंतक के थक जाने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। इतिहास साक्षी है कि प्रतीक्षाओं की इस स्पर्धा में आज तक रमेश मुस्कान विजयस्थल से टस-से-मस नहीं हुए हैं।
पर्यटन और बतरस उनके प्रिय चाव हैं। यदि पर्यटन का लोभ न होता तो कदाचित इनकी लेखनी से हिंदी साहित्य के हाथ उतना भी ख़ज़ाना न लगा होता, जितने लिखे को ये महाशय बहुत माने बैठे हैं। बतरस में निश्चित ही इनका कोई विकल्प नहीं है, लेकिन माइक के समक्ष ये एकदम सीरियस हो जाते हैं और माइक के विकिरण से अपनी रक्षार्थ शीघ्रातिशीघ्र अपने आसन पर आ विराजते हैं। माइक से दूर होते ही मंच पर इनकी प्रत्युत्पन्नमति पुनः बांबी में से बाहर निकल आती है।
चूँकि लाभ और रमेश मुस्कान के मध्य आलस्य की एक गहरी खाई है, अतएव सत्य बोलते हुए इन्हें कभी डर नहीं लगता। ये जानते हैं कि कोई चाहकर भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि इस कार्य के लिए ये पूर्णतया आत्मनिर्भर हैं।
इतने सब के बावजूद एक सत्य अकाट्य है कि जिसके पास रमेश मुस्कान जैसा दोस्त हो वह कभी असफल नहीं हो सकता क्योंकि असफल होने के सारे रास्ते रमेश मुस्कान जानते हैं और अपने दोस्तों को कभी उन रास्तों पर जाने नहीं देते।
✍️ चिराग़ जैन
Tuesday, January 28, 2020
सफ़र
आगे बढ़ने वाला हर पैर अपने ही दूसरे पैर को पीछे छोड़ता है। अगर पीछे वाला पैर स्वयं आगे आने की बजाय दूसरे पैर की निंदा में लग जाएगा तो सफ़र वहीं रुक जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
✍️ चिराग़ जैन
Friday, January 24, 2020
हो रही है थकान पानी को
किसलिए है गुमान पानी को
मारता है उफ़ान, पानी को
कुछ नमी हो तो घर हुआ जाए
ढूंढता है मकान पानी को
चैन से बैठती नहीं लहरें
हो रही है थकान पानी को
रेत में दफ़्न हो गया क़तरा
देने निकला था जान पानी को
सबके अंदर का सच बयां होगा
मिल गई गर ज़ुबान पानी को
✍️ चिराग़ जैन
मारता है उफ़ान, पानी को
कुछ नमी हो तो घर हुआ जाए
ढूंढता है मकान पानी को
चैन से बैठती नहीं लहरें
हो रही है थकान पानी को
रेत में दफ़्न हो गया क़तरा
देने निकला था जान पानी को
सबके अंदर का सच बयां होगा
मिल गई गर ज़ुबान पानी को
✍️ चिराग़ जैन
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देश का भला
"भाई! देश का भला कब होगा?"
"जब आपके वोट से हम चुनाव जीतेंगे।"
"भैया जी! चुनाव में जीत मुबारक़ हो। अब देश का भला कीजिये!"
"अभी तो जीते हैं यार। चुनावों में रात-दिन काम किया है। साँस तो ले लें।"
"सर जी! आपको चुनाव जीते एक साल हो गया, अब देश का भला कीजिये।"
"विपक्ष ने हमारा जीना मुहाल कर रखा है। रोज़ सरकार के कामकाज पर हंगामा हो रहा है। इनसे निबटना पड़ेगा, तब देश का भला करेंगे।"
"जनाब! सरकार बने दो साल हो गए, अब तो देश...!"
"अरे यार तुम तो पीछे ही पड़ गए। सरकार के पास बहुत काम हैं। इतनी सारी समितियां हैं, इतने सारे विभाग हैं, इतने सारे अफसर हैं। इनसे फुर्सत मिले तब तो कुछ करें।"
"सरकार, तीन साल बीत गए। महंगाई बढ़ रही है, सड़कें टूट रही हैं, ग़रीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, अपराध से जनता त्रस्त है।"
"तुम बार-बार यहाँ क्यों चले आते हो। अपने गिरेबान में झाँको। सरकार सड़कें बनवाती है, तुम उन्हें तोड़ देते हो। सरकार कहाँ तक करेगी। तुम लोग इस लायक हो ही नहीं कि तुम्हारे लिए कुछ किया जाए। जाओ पहले समाज को जागरूक करो, हर बार मुँह उठा कर सरकार के पास मत आया करो।"
"माई-बाप! एक साल रह गया है आपकी सरकार का। जनता आपसे नाराज़ है। लोगों में ग़ुस्सा है कि आपने जनता के लिए कोई काम नहीं किया।"
"ये सब हमारे ख़िलाफ़ विपक्ष का षड्यंत्र है। हमारी अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। दफ़्तरों में भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है। चारों तरफ़ ख़ुशहाली है। ग़रीब आदमी सुखी हो गया है। पूरी दुनिया में हमारे नाम का डंका बज रहा है। और आप कहते हैं कि सरकार ने काम नहीं किया। यह विपक्ष का फैलाया हुआ भ्रम है।"
"हाँ भई! अब क्यों आए हो? हम तुम्हें वोट नहीं देंगे।"
"आप हमारी विचारधारा के मजबूत स्तम्भ हैं। आप हमसे नाराज़ हो गए तो देश ग़लत हाथों में चला जाएगा। हम आपसे वादा करते हैं कि आपकी सारी शिकायतें दूर कर देंगे।"
"रहने दीजिए, ऐसे वादे आपने पिछली बार भी किये थे।"
"तो ठीक है। दे दीजिए उन लोगों को वोट जो हमारी जाति के विरोधी हैं। बैठा दीजिये उन्हें कुर्सी पर जो हमारे धर्म के दुश्मन हैं। होने दीजिए देश को ग़ुलाम। आप देश की हानि से पहले अपने स्वार्थ की सोचते हैं। हमें शर्म आती है कि आप जैसे लोगों के लिए हमारे महापुरुषों ने अपने प्राण दिए।"
नेताजी की लताड़ सुनकर वोटर शर्मिंदा हो गया और चुपचाप गर्दन नीचे करके वोट और देश नेताजी के हाथों में दे आया ।
✍️ चिराग़ जैन
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लघुकथा
Sunday, January 12, 2020
धर्म की राजनीति और राजनीति का धर्म
जो चांद करवा चौथ का अर्घ्य लेता है
वही ईद की इत्तिला भी देता है
क्योंकि चांद को वोट नहीं चाहियें
✍️ चिराग़ जैन
वही ईद की इत्तिला भी देता है
क्योंकि चांद को वोट नहीं चाहियें
✍️ चिराग़ जैन
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