Sunday, February 16, 2020

सच और विकास के बीच दीवार

एक वर्ग है जो दीवार के पीछे बनी झुग्गियों पर प्रश्न पूछना चाहता है। दूसरा वर्ग है, जो झुग्गियों के आगे बनी दीवार को विकास समझ कर झुग्गी के प्रश्न पूछने वालों को राष्ट्रद्रोही कह रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Donald Trump's India Visit

Thursday, February 13, 2020

लोकतन्त्र की नयी परिभाषा

भारतीय लोकतंत्र अपने सर्वाधिक वैभवशाली दौर से गुज़र रहा है। एक राजनैतिक दल ने जनता को बिजली-पानी मुफ़्त देने का ब्लूप्रिंट दिया। दूसरे राजनैतिक दल ने आटा फ्री बाँटने की घोषणा की। एक समय था जब चुनाव जीतने के लिए शराब, पैसा, सिलाई मशीन, साइकिल, लैपटॉप और साड़ियाँ बाँटी जाती थी। इस चुनावी रिश्वत का बोझ राजनैतिक दलों या प्रत्याशियों के निजी कोष को उठाना पड़ता था। उस बोझ से बचने के लिए राजनैतिक दलों ने योजनाओं की आड़ में यह ख़र्च सरकारी कोष से करने का रास्ता निकाल लिया। 
एक सरकार ने किसानों के कर्ज़ मुआफ़ कर दिए। अर्थात कृषि की दशा को सुधारने की बजाय, कृषक के स्वाभिमान को ध्वस्त करने की शुरुआत की। एक सरकार ने अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित कर दिया। अर्थात पाई-पाई जोड़कर जो सरकार को रजिस्ट्री की स्टैम्प ड्यूटी, हाउस टैक्स, इनकम टैक्स चुकाकर घर बना रहा है, उसको यह संदेश दिया कि तुम मूर्ख हो जो मेहनत करके घर बना रहे हो, तुमसे अच्छे तो वे लोग हैं जो कहीं भी घेर-घारकर मकान मालिक़ बने बैठे हैं। एक सरकार ने रोज़गार देने की बजाय चावल दो रुपये किलो बाँटने शुरू कर दिए।
जो ईमानदारी से टैक्स चुका रहा है, उसके लिए कोई सुविधा नहीं; उसे कोई प्रोत्साहन नहीं। बल्कि ऐसी व्यवस्था कर छोड़ना कि वह टैक्स चुराने की सोचे। लेकिन जिसने केवल सरकार से लेना सीखा है, उनके हाथ जोड़-जोड़कर उन्हें अकर्मण्यता की प्रवृत्ति के लिए प्रोत्साहित करते रहो। इस देश का वित्तमंत्री अपने बजट भाषण में कहता है कि ‘मध्यम वर्ग अपना ध्यान ख़ुद रखे!’
क्यों भाई? जब मध्यम वर्ग को अपना ध्यान ख़ुद रखना है तो वह सरकार को पैसा क्यों दे? इस देश की राजनीति ने घर के कमाऊ पूत को नोच-नोच कर नाकारा बेटों की रोटी में घी भरा है। इस देश की राजनीति ने मांगनेवालों को बाबाजी कहा है और देनेवालों को तमंचा दिखाया है। यह काम सबने किया। कोई भी इसमें कमतर नहीं है। 
इसी ट्रेंड पर जब दिल्ली में एक पार्टी की सरकार बन गई तो पराजितों ने सोशल मीडिया पर दिल्ली को मुफ्तखोर घोषित कर दिया। यह पहली बार हुआ है कि किसी दल विशेष के समर्थक जनमत को कोस नहीं रहे, बल्कि धिक्कार रहे हैं। यह पहली बार है कि लोकतंत्र में जनमत को गाली दी जा रही है। यह पहली बार है कि पूरे प्रदेश को एक ही शब्द से हाँका जा रहा है।
सामान्यीकरण की यही प्रवृत्ति है जिसके कारण दस-पाँच लोगों की हरक़त पर पूरे विश्वविद्यालय को ग़द्दार घोषित कर दिया जाता है। जनारालाइज़ेशन की यही प्रवृत्ति है कि एक पूरी कौम को बुरा मान लिया जाता है और दूसरी पूरी कौम को अच्छा मान लिया जाता है। सामान्यीकरण की यही बीमारी है जो कपड़े देखकर डीएनए बताने लगती है, जो नाश्ते की थाली देखकर भविष्य बताने लगती है, जो पोहा खानेवालों का अतीत बताने लगती है।
इन्हीं पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों ने राजनैतिक माहौल में कटुता भर दी है। इन्हीं धारणाओं के कारण समाज में विद्वेष भरता जा रहा है। और इस अभ्यास का दुष्परिणाम यह है कि आज सोशल मीडिया पर खुलकर बोला जा रहा है कि दिल्लीवाले मुफ़्तखोर हैं, दिल्लीवाले स्वार्थी हैं, दिल्लीवाले राष्ट्रद्रोही हैं, दिल्लीवाले हिंदूविरोधी हैं। 
अजीब मानसिकता के लोकतांत्रिक हैं आप। जो हमें वोट न दे, वह राष्ट्रद्रोही! जब इसी दिल्ली ने सातों लोकसभा सीटें जिताई थीं तब यही जनता राष्ट्रभक्त थी। जब अपने धुर विरोधियों के साथ मिलकर सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाते हो तब जनता से नहीं पूछते कि वह कैसा महसूस करती है? अपनी पराजय के कारणों का मंथन करने की बजाय जनता को गाली देना तो सभ्यता का द्योतक नहीं हैं। सौ-पचास लोगों की हठधर्मिता को लताड़ने की बजाय दो करोड़ लोगों को दुत्कारना तो लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। यह जनता है साहब, यहाँ आपकी पार्टी का संविधान नहीं चलता कि ‘या तो मूकदर्शक बन जाओ, नहीं तो मार्गदर्शक बना दिये जाओगे।’
इसी जनता ने अभूतपूर्व बहुमत देकर आपको सत्ता दी है। इस जनता को कोसने की बजाय अपनी नीतियों, अपने नेताओं की भाषा, अपनी कार्यशैली और अपनी ऐरोगेन्सी का आकलन करो; नहीं तो लोकतंत्र की धरती आपकी फसल को खरपतवार घोषित करके उखाड़ फेंकेगी। भारत के लोकतंत्र में आप भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। आपकी विचारधारा इस देश के एक बड़े जन का मानसिक पोषण करती है। लेकिन अकेले आपकी ही विचारधारा का नाम भारत नहीं है। भारत विविध विचारों, विविध पंथों, विविध भाषाओं, विविध धर्मों, विविध पहनावों, विविध खानपान, विविध रंगों, विविध मान्यताओं और विविध ऋतुओं के साथ एक रहनेवाला देश है। इसे एक ही रंग में पोतकर इसके सौंदर्य का ह्रास करने का प्रयास न करो, यह आत्मघाती क़दम है। इसे एक ही ऋतु में सीमित करके, इसके वातावरण को प्रभावित करने का दुस्साहस न करो, यह स्वास्थ्य के प्रतिकूल है।
कृष्ण ने जिनका वध किया, वे यवन नहीं थे। राम ने जिनका वध किया, उनमें कोई मुसलमान नहीं था। महावीर ने जिन्हें अहिंसा का उपदेश दिया वे सब बाहर से नहीं आए थे। राममोहनराय ने जिन कुरीतियों पर आघात किया वे हमारे ही समाज में मौजूद थीं। दयानन्द सरस्वती ने जिस कर्मकांड को दर्पण थमाया, वह हमारे ही समाज का अंश था। हर समय में, हर समाज में कुछ नकारात्मकता अवश्य होती है। इस नकारात्मकता को किसी वर्ग विशेष से जोड़कर प्रचारित करना समाज के स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है। कोई भी हर बार सही नहीं होता, और हर बार ग़लत नहीं होता। लोगों को मत देने के अधिकार से वंचित न करो, उनके जनमत को धिक्कारना बन्द करो, नहीं तो यह लोकतंत्र इस अहमन्यता को सिरे से नकार देगा!

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, February 11, 2020

दिल्ली के चुनाव परिणाम

चुनाव आयोग इस बात पर एक्शन ले कि केजरीवाल ने यह बात छुपाए रखी कि मुहल्ला क्लीनिकों में बीजेपी का इलाज किया जा रहा है

झाड़ू को धुआँदार सफ़ाई की बधाई
कमल को कुछ नई पाँखुरियाँ खुलने की बधाई
और हाथ को हाथ न हिलाने की बधाई

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Delhi Election Result

Friday, February 7, 2020

मतदान क्यों ज़रूरी है

राजनीति किसी भी दल की हो, उसकी बदतमीज़ी जनता की निष्क्रियता के बल पर ढिठाई बनने लगती है। भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप में ‘मतदान’ ही एकमात्र अस्त्र है जो जनता के पास है। शेष तंत्र से हताश होकर इस अस्त्र को भी नष्ट कर देना, भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा देने जैसा है।
जिस क्षेत्र की जनता पूर्ण मतदान कर देगी, उसकी अभिरुचियों और आकांक्षाओं को अनदेखा करना किसी भी दल के लिए असंभव होगा। मध्यमवर्ग की ज़रूरतें किसी भी राजनैतिक दल की वरीयता सूची में इसी कारण नहीं शामिल हो पातीं क्योंकि मध्यमवर्गीय नागरिक मतदान प्रक्रिया से सर्वाधिक उदासीन हैं। राजनीति हमें लोकतंत्र से बाहर करना चाहती है, ताकि अपने कैडर और कार्यकर्ताओं के वोट से ही विधानसभाओं और संसद की सूरत तैयार हो सके। आम मतदाता यदि वोटिंग की प्रक्रिया से न जुड़ा तो उसकी ओर किसी का ध्यान न जाएगा।
इस देश में, आयकर देनेवालों से किसी सरकार को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, इसीलिए बजट बनाते समय आयकर देनेवालों को ही घोड़े से खच्चर बनाया जाता है। इस देश में नियमों का पालन करनेवाले भी सरकार के किसी काम के नहीं हैं, इसीलिए पूरी न्याय व्यवस्था अपराधियों के बचाव में जुट जाती है और पीड़ित को सिद्ध करना पड़ता है कि उसके साथ अपराध हुआ है।
लेकिन इस देश में वोट देनेवाले से हर सरकार को फ़र्क़ पड़ता है, इसीलिए झुग्गियों की पीड़ा हर पार्टी सुन पाती है और हाउस टैक्स भरनेवाला बेचारा दफ़्तरों के चक्कर लगा-लगाकर टूट लेता है; इसीलिए अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित किया जाता है और बिल्डरों को पूरी क़ीमत चुकानेवाला नागरिक किराये के मकान में रहकर, अदालतों के चक्कर काट रहा है। वोट को अनावश्यक समझोगे तो राजनीति के लिए अनावश्यक हो जाओगे। इस देश के लिए न सही, लोकतंत्र के लिए न सही; अपने अस्तित्व के लिए ही सही, वोट ज़रूर डालें।
इससे पहले कि लोकतंत्र फीका हो जाए, अपनी उंगली पर नीला निशान लगवा आओ।

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, February 6, 2020

कवि प्रदीप

भारतीय सिनेमा की बुनियाद में जो नगीने जड़े हुए हैं, उनमें कवि प्रदीप भी एक हैं। जिन दिनों स्वाधीनता संग्राम चरम पर था, तब भारतीय सिनेमा भी राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग गया था। जनता में राष्ट्रभक्ति का ज्वार भरने के लिए सिनेमा ब्रिटिश हुक़ूमत के खि़लाफ़ मुखर हो उठा।
सन 1940 में बंधन फ़िल्म के लिए कवि प्रदीप ने हिम्मत से भरी चेतावनी को गीत में पिरो दिया। गीत के बोल थे, ‘दूर हटो ऐ दुनियावालो, हिन्दुस्तान हमारा है’! यही भारतीय स्वाधीनता संग्राम का मूल स्वर भी था। अपनी क़लम के इस तेवर से जब वे ब्रितानिया हुकूमत की आँखों में खटकने लगे तो गिरफ़्तारी से बचने के लिए उन्हें भूमिगत रहना पड़ा।
प्रदीप जी की लेखनी आमूल-चूल राष्ट्रबोध से सुसज्जित थी। युवाओं में जोश भरने के लिए ‘चल-चल रे नौजवान’ भी लिखा और बच्चों को भारत का दर्शन कराने के लिए ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की’ भी लिखा; गांधीहत्या से आहत होकर ‘दे दी हमें आज़ादी’ भी लिखा और गिरते हुए मानवीय मूल्यों से त्रस्त होकर ‘आज के इस इंसान को ये क्या हो गया’ भी लिखा; आज़ादी की क़ीमत ज़ाहिर करने के लिए ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के’ भी रचा और भारत-चीन युद्ध के शहीदों को नमन करते हुए ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ भी लिखा। ‘चल अकेला, चल अकेला’ जैसा उत्साहवर्धक गीत भी प्रदीप जी की ही लेखनी का वरदान था और ‘सैंया प्यारा है अपना मिलन’ सरीखा प्रेमगीत भी उसी लेखनी का क़माल है।
कवि प्रदीप ने फिल्मों में कुछ गीत गाए भी हैं- ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान’; ‘पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय’ और ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ’ जैसे गीत उनके कण्ठ से सँवर उठे हैं।
जब दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में चीन युद्ध के शहीदों की याद में कार्यक्रम आयोजित हुआ, तब लता जी ने एक गीत प्रस्तुत किया- ‘ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आँख में भर लो पानी’; भावुक माहौल में वह गीत लोगों के दिल को छू गया। प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की आँखें छलछला आईं। पण्डित जी ने अधिकारियों से कहा कि इस गीत के रचनाकार को बुलाओ। अधिकारियों ने बताया कि प्रदीप जी को इस कार्यक्रम का निमंत्रण ही नहीं भेजा गया। इतना सुनते ही पंडित जी नाराज़ हो गए, और अधिकारियों को डाँटते हुए बोले- ”कवि की कविता इस्तेमाल करते हो और कवि को निमंत्रण भी नहीं भेजते।“
सुनते हैं कि नेहरू जी पहली फ़ुरसत में ही मुंबई जाकर कवि प्रदीप से मिले, उस गीत की रचना के लिए उन्हें बधाई दी और अधिकारियों की लापरवाही के लिए क्षमा मांगी। समंदर के किनारे बैठकर माचिस की डिब्बी पर लिखा गया विचार एक अमर गीत में कैसे तब्दील हुआ यह कहानी कवि प्रदीप ने लम्हा-लम्हा जी है। भारतीय गीतों के इतिहास में कवि प्रदीप का योगदान नक्षत्रों के चूर्ण से अंकित है।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, February 5, 2020

वक़्त

दिल बच्चा है; सपनों के संग पिकनिक करता रहता है
बूढ़ा एक दिमाग़ हमेशा चिकचिक करता रहता है
वक़्त; जिसे तुम पूरी दुनिया का सरताज समझते हो
मेरी इक दीवार घड़ी में टिकटिक करता रहता है

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, February 2, 2020

एक सवाल था

एक
सवाल था।

अनदेखी की
गोद में पलकर बड़ा हुआ,
और लापरवाही की
उंगली पकड़ कर
धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा हुआ।

जैसे ही सवाल पर
यौवन का ज्वार चढ़ा,
वह अपना
समाधान ढूंढने निकल पड़ा।
समाधान की चाह में,
उसे कुछ दोस्त मिल गए राह में।

समाजसेवा ने
उसे आवारागर्दी की लत लगाई,
राजनीति ने उसे
नशा करने की कला सिखाई।
मीडिया ने
समय बर्बाद करने का हुनर सिखाया,
तकनीक ने
अफवाह से उसका परिचय करवाया,
और आंदोलनों ने
उसके साथ मिलकर
सड़कों पर दंगा मचाया।

जवानी का महत्वपूर्ण समय
नष्ट करने के बाद,
जब सवाल बिल्कुल अकेला रह गया
तो उसे फिर से आई
समाधान की याद।

चक्कर काटते-काटते
देश की चिंता में व्यस्त दरबारों के,
उसे समझ आ गया
कि टोटके एक जैसे ही हैं इन सारों के।

एक दिन
दिन-दहाड़े
एक मीडिया स्टूडियो में
सभी राजनैतिक दलों ने
सवाल को घेर लिया,
फिर एंकर के साथ मिलकर
बंद स्टूडियो में
ऑन कैमरा उसे ढेर किया।

अपने पुराने यार की लाश देख
समाजसेवा और आंदोलन की आँख भर आईं,
उद्योगपतियों ने अनुदान देकर
उस सवाल की चिता सजाई,
लेखकों ने उसकी मौत पर
अलग-अलग तेवर के लेख लिखे,
संसद और विधानसभा
उसकी शवयात्रा में बहुत उदास दिखे।
एक नन्हें से नए सवाल के हाथों
उसकी चिता जली,
और इस दाह-संस्कार में
एक अदद समाधान की अनुपस्थिति
सबको खली।

अगले दिन
देश जब उसके फूल चुनने गया
तो देश का मन खिन्न था,
चिता की सुलगती हुई राख में
अस्थियों से बना
केवल एक प्रश्नचिन्ह था।

✍️ चिराग़ जैन

Friday, January 31, 2020

प्रमोद तिवारी

कितना बोलते थे प्रमोद जी। नॉन स्टॉप। सुननेवाले का सिर दुःखने लगता था लेकिन बोलते-बोलते उनका मुँह नहीं दुःखता था। और अब ऐसी चुप्पी धार ली है कि साँसों तक की आवाज़ नहीं आ रही। एक-एक मंज़र आँखों के सामने तैर रहा है। लालकिले की वीडियो यूट्यूब पर डलवाने के लिए उनकी बेचैनी और मेरी लापरवाही की जुगलबंदी से जो गालियाँ निर्मित हुईं, उनकी मिठास मुझे अभी तक जस की तस याद है। और वह वीडियो अपलोड करने के बाद जब मैंने उनके लेखन पर लेख लिखा तो उनका अपनत्व, फोन पर मुझे डेढ़ घंटे तक झेलना पड़ा था। सिंगरौली यात्रा में बनारस से सिंगरौली तक अनवरत प्रवचन, आगरा में तेज भाई, संपत जी और रमेश भाई के सम्मुख मेरे गीतों की प्रशंसा का क्रम शुरू किया तो कार्यक्रम में विलम्ब हो जाने की क़ीमत पर भी उसे समाप्त करने को राज़ी न हुए। और पिछली 1 मार्च को दिल्ली के बीएसएफ ग्राउंड में मुरादाबादी दाल के चटखारे लेते हुए एक आँख मीचकर हौले से प्रशंसात्मक सवाल -‘क्या खाए हो गुरु, रोज़ ही लपक के गीत प गीत पेले जा रहे हो। ये वरदान है, जब तक मिल्ला है लपकते रहो। जब मिलना बंद हो जाएगा तो हमाई तरह फक्खड़ हो जाओगे।’
पहेली सी बूझ रहा हूँ कि मैं अपने साथ उनके इस अंतिम संवाद को आशीर्वाद मानूँ, सुझाव मानूँ या चेतावनी ...काश उस ही रात उनसे पूछ लेता। उनकी यादें अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के साथ जीवन की पूंजी बन गई हैं।
अपने कवि होने पर उन्हें अहंकार बिल्कुल नहीं था, लेकिन ठसक पूरी थी। मूलतः पत्रकारिता से जुड़े रहे इसलिए उनके आँख, नाक, कान हमेशा तैनात रहते थे। ज़िन्दगी की किताब के इतने पृष्ठ पलट चुके थे कि अपने अनुभव साझा करते हुए वे कभी थकते ही नहीं थे।
मंचीय जोड़-तोड़ से वे अक्सर खिन्न रहा करते थे लेकिन उनकी प्रस्तुति और मंच पर उनकी धमक से यह खिन्नता कभी अनर्गल नहीं लगती थी। नॉन-स्टॉप बोलने में उनका कोई प्रतिद्वंदी नहीं था। किसी यात्रा में यदि उन्हें ड्राइवर के साथ न बैठने को मिले तो वे पूरी यात्रा के दौरान आगे की दोनों सीटों के बीच ही स्थापित रहते थे ताकि संवाद की सम्प्रेषणीयता में कोई बाधा न आ सके।
किसी के व्यक्तिगत जीवन में झाँकना उन्हें बहुत पसंद नहीं था लेकिन मंचीय व्यवहार की कोई भी हरक़त उनकी नज़र से बच नहीं सकती थी। मन को भरपूर जीनेवाले प्रमोद तिवारी जी हिंदी कवि सम्मेलनीय जगत् में गीत का एक अनोखा तेवर स्थापित कर गए हैं।
आज भी जब कोई नया साधक उनके बिंब-विधान और उनकी मस्ती को गीत में साधने का प्रयास करता है तो भीतर से आवाज़ आती है कि कानपुर-लखनऊ हाइवे पर घटी दुर्घटना में उस सुबह केवल उनका शरीर ध्वस्त हुआ था, उनका मन आज भी गीत रच रहे बालकों को डपटकर बोलता है- ‘मस्ती भरे गीत लिखो बे!’

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, January 30, 2020

लोकतंत्र का बकासुर

यह लोकतंत्र का सौंदर्य है कि जिस प्रदेश में चुनाव होते हैं, पूरे देश की चिंताएँ और चिंतन उसी प्रदेश पर केंद्रित हो जाते हैं। बाक़ी पूरे देश में सब कुछ अपने आप ठीक चल रहा होता है।
हमारे संविधान निर्माताओं ने कितनी दूरदर्शिता के साथ यह व्यवस्था की होगी कि देश के तमाम खुराफ़ाती मस्तिष्कों से देश को बचाए रखने के लिए एक बार में किसी एक प्रदेश की भेंट दे दी जाए। यूँ भी गाँव को बकासुर के आतंक से बचाने के लिए स्वतः ही एक व्यक्ति को बकासुर की भेंट चढ़ा देने के क़िस्से हमें सुनाए गए हैं। शोले में गब्बर सिंह जी ने भी यही समझाया था कि - ‘राजनीति के प्रकोप से हमें अगर कोई बचा सकता है तो वह स्वयं राजनीति ही है। अगर इसके बदले में राजनीति एक बार में एक प्रदेश को तहस-नहस कर देती है तो इसमें क्या बुराई है!’
हमारा लोकतंत्र देश के एक प्रदेश को छकड़े पर लादकर बकासुर के द्वार तक पहुँचा देता है। राजनीति प्रदेश का शिकार करने से पहले उसके साथ किलोल करती है। हम इस किलोल में बकासुर की सहृदयता, देशभक्ति, जनहित-भावना, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा ढूंढने लगते हैं। देर तक बकासुर हमें दौड़ाते रहते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम वह भेंट है जिसे कच्चा चबाकर यह असुर अपना पेट भरेगा। जब हम यह बात पूरी तरह भूल जाते हैं तब मुस्कुराते हुए बकासुर ठहाका लगाते हैं, हम कालिया और उसके साथियों की तरह ठहाके में डूब जाते हैं, पूरे वातावरण में शिकार और शिकारी के ठहाके गूंजने लगते हैं और फिर ठांय-ठांय-ठांय की आवाज़ के साथ सिनेमाघर में सन्नाटा पसर जाता है और बकासुर अगली भेंट के स्वागत में खर्राटों का स्वागत-गान गाने लगता है।
बकासुर कहते हैं ‘शू गाय’; हम गाय बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू लिंगायत’; हम धर्म बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू धर्मनिरपेक्षता’; हम मानवता बचाने दौड़ पड़ते हैं। ‘शू सीएए’; ‘शू जनलोकपाल’; ‘शू शाहीन बाग़’; ‘शू पैट्रोल के दाम’; ‘शू प्याज़’; ‘शू चौकीदार’; ‘शू पप्पू’; ‘शू मफ़लर’; ‘शू चायवाला’; ‘शू खाँसी’; ‘शू सीलिंग’; ‘शू पद्मावत’; ‘शू पटेल आरक्षण’; ‘शू जाट आरक्षण’; ‘शू गुर्जर आरक्षण’; ‘शू जीएसटी’; ‘शू बिहारी’; ‘शू पंद्रह लाख’; ‘शू हिन्दू राष्ट्र’; ‘शू गांधी’; ‘शू गोडसे’; ‘शू सावरकर’; ‘शू पटेल’... सरदार बोलता है और हम भागने लगते हैं। हमें लगता है सरदार खुश होगा, शाबासी देगा! लेकिन सरदार ठाने बैठा है कि उसने हमें कहाँ पहुँचाना है। सरदार जानता है कि जो डर गया वो मर गया। इसलिए सरदार हिंदुओ को बताता है कि मुसलमान तुम्हें मार देंगे। मुसलमानों को समझाता है कि हिन्दू तुम्हें भगा देंगे। सरदार कालिया को बताता है कि पद्मावती रिलीज़ हो गई तो संस्कृति का सत्यानाश हो जाएगा। कालिया पद्मावती की रिलीज़ रोकने के लिए जान दे देता है। कालिया के मरते ही सरदार पद्मावती को पद्मावत बनाकर रिलीज़ करवा देता है।
हर बकासुर अपने शिकार को बताता है कि फलां पार्टी का बकासुर शिकार की एक-एक उंगली को तोड़-तोड़ कर खाता है। मैं इतना निर्मम नहीं हूँ कि अपने शिकार को दस बार अलग-अलग नोचूँ। मैं एक ही बार में पूरी बाँह उखाड़ कर चबा जाता हूँ। इतनी करुणा देख हमारी आँखें भीग जाती हैं और हम ख़ुशी-ख़ुशी अपनी बाँह आगे बढ़ा देते हैं ताकि करुणा का यह पुंज हमारी बोटियाँ नोचकर, हमें उंगलियाँ चबानेवाले बकासुर से बचा ले!

✍️ चिराग़ जैन

वसंतोत्सव

सृष्टि के समस्त सर्जकों को सृजन की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती का अनवरत आशीष मिले!

वसंत की पहली दस्तक और सरस्वती पूजन के पर्व का सुयोग इस बात का द्योतक है कि सौंदर्य और सकारात्मकता ही सृजन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं।

प्रकृति पर आच्छादित वासंती रंग की सुवास श्वास के साथ घुलकर मन को स्वस्थ करे ताकि सृजन का मानस स्वस्थ हो और तूलिका, लेखनी, वाद्य, कण्ठ, अंगुलियाँ, हथेलियां और ओष्ठ सब कुछ सकारात्मक हो उठे!

बाँस को बाँसुरी न बनाया गया तो वह या तो हथियार बन जाएगा या ज्वाला को जन्म देगा!

✍️ चिराग़ जैन