Tuesday, March 24, 2020

लाॅकडाउन

घर पर रहोगे, तो रहोगे

जिस घर के सपने देखे थे, आओ कुछ दिन उस घर में सपने देखें

यह एकांतवास नहीं, तपस्या है

कवि सम्मेलनों को कोरोना से नुक़सान हुआ है, कविता को नहीं

आपदा की इस घड़ी में "ख़ुद को भी छूने से बचें"

कर्फ्यू खुलते ही सबको आधार कार्ड का फोटो बदलवाने के लिए लाइन में लगना पड़ेगा क्योंकि 21 दिन में तो असली चेहरे निकल ही आएंगे!

✍️ चिराग़ जैन

Monday, March 16, 2020

भ्रष्टाचार की परंपरा

कोरोना विश्व भर में महामारी की तरह फैल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इस संकट से उबरने के उपाय खोज रहे हैं। ‘जान है तो जहान है’ के सिद्धांत पर चलते हुए जान बचाने के लिए काम-धंधे, आवागमन, मेलजोल आदि सब बन्द कर दिए गए हैं। दुनिया भर के शेयर बाज़ार औंधे मुँह गिर रहे हैं। लेकिन दुनिया, शेयरों के गिरने की परवाह छोड़कर कोरोना की चपेट में आए लोगों की संख्या का हिसाब रखने में व्यस्त है। अमरीका, इटली, चीन जैसे देशों में आपातकाल घोषित हो गया है। सरकारें अपने बजट का बड़ा हिस्सा इस आफत से निपटने में ख़र्च कर रही हैं। विद्यालयों में परीक्षाएँ महत्वपूर्ण नहीं रह गईं; स्टेडियम के लिए खेल महत्वहीन हो गए; बाज़ार के लिए व्यापार द्वितीयक हो गया; सीमाओं ने आग उगलना बन्द कर दिया; यहाँ तक कि कोई ख़ास आतंकी घटना भी सुखिऱ्यों में नहीं आ रही।
लेकिन इस स्थिति में भी भारतीय जनमानस के रक्त में प्रवाहित बेईमानी पर कोरोना का कोई असर नहीं दिखाई दिया। बात-बात में संस्कृत के श्लोक उध्दृत करनेवाले हम भारतीय इस आपातकाल में भी मास्क पर दस-दस गुना मुनाफ़ा बटोरने में लगे हैं। ‘तुम क्या लाए थे, और क्या ले जाओगे’ के उपदेश देने वाले हम भारतीय सेनिटाइजर में मिलावट करके लोगों के जीवन से खेल रहे हैं क्योंकि हम जानते हैं कि ‘आत्मा न कभी पैदा होती है, न कभी मरती है।’
हरिश्चंद्र, राजा शिवि, भामाशाह, विक्रमादित्य और अशोक के वंशज हम भारतीय प्रयोग किये हुए मास्क को दोबारा ‘पॉलीथिन’ में पैक करके संक्रमण के प्रसार में सहयोग कर रहे हैं ताकि संविधान में उल्लिखित ‘समानता के अधिकार’ के तहत कोई नागरिक कोरोना के स्पर्श से वंचित न रह जाए। जब सौ-पचास लोग मर लेंगे तब गोदाम में भरे मास्क और सेनिटाइजर महंगे दामों पर बेचे जाएंगे क्योंकि हम जानते हैं कि यदि आज मास्क को तीन सौ रुपये में बेचने का लोभ छोड़ दिया जाए तो परमपिता परमात्मा इस त्याग से प्रसन्न होकर ऐसी परिस्थिति का वरदान देंगे कि वही मास्क हज़ार रुपये में बिक सकेगा।
कितने महान हैं हम। महामारी फैलती है तो हम दवाइयों की कालाबाज़ारी करने लगते हैं। प्यार फैलता है तो हम वेलेंटाइन डे पर गुलाब की कालाबाज़ारी करने लगते हैं। दरगाहों और तीर्थों पर मेले लगते हैं तो जेब काटने के टेंडर भरे जाते हैं। बाढ़ और भूकम्प आता है तो पीड़ितों की सहायता के लिए चंदा उगाकर खा जानेवाले समाजसेवी अवतरित हो जाते हैं।
बीमारी आती है तो हमें ज्ञात होता है कि केमिस्ट बेईमान हैं। दंगे होते हैं तो हमें पता चलता है कि पुलिस बेईमान है। नोटबन्दी होती है तो सरकार बताती है कि बैंकर बेईमान हैं। ऑडिट होता है तो पता चलता है कि पूरा दफ्तर बेईमान है। न्यायपीठ बैठती है तो पता चलता है कि जिन दफ्तरों को ईमानदारी की क्लीन चिट मिली है उनका ऑडिटर बेईमान है। नई सरकार बनती है तो पता चलता है कि पिछली सरकार बेईमान थी।
हम किताबों में पढ़ते आए हैं कि भारत विविधता में एकता वाला देश है। किंतु जब ज़िन्दगी पढ़ी तो देखा कि यहाँ विविधता ही विविधता है। एकता ढूंढने निकले तो ज्ञात हुआ कि कोई भारतीय चाहे कोई भी व्यवसाय करे, वह अवसर मिलने पर उसमें बेईमानी ज़रूर करेगा। एकता ढूंढने निकले तो ज्ञात हुआ कि हर व्यवसाय के पास अपने आपको सबसे ज़रूरी, सबसे जनहितकारी और सबसे आध्यात्मिक बताने के लिए जुमले मौजूद हैं। यह भारत का सौंदर्य है कि यहाँ हर नागरिक यह चाहता है कि गुनाहों के बहीखाते में किसी और का नाम लिखा जाए और मुनाफ़े की पंक्ति में पहला नम्बर हमारा हो।
जिला अस्पताल के शवगृह में शव-सुपुर्दगी की पर्ची काटनेवाला बाबू भी रोते-बिलखते परिजनों से सौ रुपैये ऐंठते हुए सरकार के भ्रष्टाचार को गाली देता है क्योंकि ऐसा करने से उसके अपराध की फोकस लाइट फैलकर पूरे परिवेश के धब्बे दिखाने लगती है।
संस्कार, अध्यात्म और परंपरा का फटा ढोल पीटनेवाला हमारा समाज इस योग्य भी नहीं बचा है कि किसी को बेईमान कह सके। यह पूरे समाज की बीमारी है। इसमें कोई एक जाति, कोई एक सम्प्रदाय, कोई एक धर्म, कोई एक विचारधारा, कोई एक वाद, कोई एक भाषा, कोई एक क्षेत्र, कोई एक वर्ण, कोई एक लिंग, कोई एक व्यवसाय या कोई एक पीढ़ी अलहदा नहीं है। बेईमानी ने पूरे देश को एकसूत्र में बांध रखा है।
कोरोना को भारत में प्रवेश किये दो सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। एक बार इस वायरस की शिराओं में यहाँ की आबो-हवा घुल जाने की देर है, फिर यह वायरस भी कुछ ले-दे के लोगों को बीमार करना बंद कर देगा।

*नोट : इस लेख को गणपति भाव से पढ़ें और पूरा अर्थ ग्रहण करने के उपरांत ही प्रतिक्रिया दें। यदि द्रोणाचार्य की तरह आधा पढ़कर बुद्धि के कपाट बंद कर लिए तो युधिष्ठिर के सिर तो केवल अर्द्धसत्यभाषण का पाप आएगा किन्तु आधी बात से निर्णय पर पहुँचने वालों की हानि अधिक होगी।

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, March 15, 2020

ओ कोरोना

ओ कोरोना
हम पर पहले ही है काफ़ी रोना-धोना
तुम जीवन दुश्वार करो ना!

तुमको क्या लगता है, क्यों बे
हम खाँसी से डर जाएंगे
ऐसी खाँसी करने वाले तो भारत में
सीएम बने फिरा करते हैं

हाथ मिलाने से बढ़ते हो
ताप बढ़े तो मर जाते हो
भारत में टेम्प्रेचर
अड़तालीस डिग्री तक चढ़ जाता है
राख तलक भी नहीं मिलेगी

राजनीति के हाथ अगर तुम चढ़ जाओगे
नामो-निशां नहीं बचने का
ये वज्रोदर
पुल, चारा, शौचालय सब कुछ खा जाते हैं
इनकी महाक्षुधा के आगे
तुम बिन सैनेटाइज़र के ही मिट जाओगे
इन्हें नहीं आता कुछ भी जीवन भर ढोना
ओ कोरोना!

अगर किसी दिन
किसी मीडिया के चैनल में धरे गए तो
प्रश्नों का तूफ़ान उठेगा
उत्तर देने तक का अवसर नहीं मिलेगा
इनके लिए तुम्हारी कोई
चार बुलेटिन से ज़्यादा औक़ात नहीं है
अगली बड़ी ख़बर आने तक
तुम हो इनका खेल-खिलौना
ओ कोरोना!

उत्सव सारे मंद हो गए
खेल-तमाशे बंद हो गए
आना-जाना बंद हुआ है
हँसना-गाना बंद हुआ है
ओ सन्नाटै के उद्घोषक
शर्म नहीं आती क्या तुमको
काफ़ी आफ़त मचा चुके हो
अब तुम जाकर किसी कुँए में डूब मरो ना!
ओ कोरोना!

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, March 11, 2020

जनता चुपचाप देखेगी

कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए और मीडिया की मौज हो गई। भाजपाई बता रहे हैं कि पार्टी को अपने ख़ून-पसीने से सींचनेवाले किसी नेता को साइड लाइन करना नैतिकता नहीं है। यह बयान सुनते ही शत्रुघ्न सिन्हा, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और के एन गोविंदाचार्य जैसे ढेर सारे नाम स्मृतियों में तैर गए। कांग्रेसी बता रहे हैं कि जो दल बदल रहा है वह तुम्हारा भी सगा नहीं होगा। यह बयान सुनते ही नवजोत सिंह सिद्धू, बी डी शर्मा, घनश्याम तिवारी और जनार्दन सिंह गहलोत जैसे नाम ठठाकर हँसने लगे।
भाजपाइयों को कांग्रेस का इतिहास याद आ गया और वे सीताराम केसरी, नरसिम्हा राव और डॉ प्रणब मुखर्जी के अपमान की गाथाएँ सुनाने लगे। ये गाथाएँ सुनकर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी की आँखें डबडबा आईं।
कांग्रेस में दो लीडरों के आगे सबकी प्रतिभा को दबाने की परंपरा रही। भाजपा में भी प्रतिभाशाली नेतृत्व को सलीक़े से साइड लाइन करने के अनगिन उदाहरण मिल जाएंगे।
प्रश्न कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, पीडीपी, जदयू, राजद, द्रमुक, अद्रमुक, झामुमो या अन्य किसी दल का है ही नहीं। यह शुद्ध रूप से सत्ता की लड़ाई है, जिसमें विचारधारा, नैतिकता, राष्ट्रहित, जनहित, धर्म, सम्प्रदाय, विदेशनीति, अर्थनीति जैसे तमाम शब्द खिलवाड़ की तरह प्रयोग किये जाते हैं।
राजनीति का एक ही सिद्धांत है, हमारे साथ रहो, नहीं तो हमसे गाली खाओ। यह सिद्धांत सभी का है। बेशर्मी और ढिठाई से प्रवक्ता बनकर चैनल्स पर बैठनेवाले रीढ़विहीन लोगों के घर में दर्पण की उपस्थिति निषेध होती है। राजनीति की चौखट पर क़दम रखते ही लाज के चीर स्वतः उतार फेंकने होते हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के दल बदल लेने से कुछ नहीं बदलेगा। चैनल जब कभी सिंधिया परिवार के इतिहास पर बहस करेंगे तो भाजपा और कांग्रेस के प्रवक्ता आपस में संवाद बदल लेंगे। ड्रामा वैसा ही चलेगा। अब कांग्रेस झाँसी की रानी के साथ हुए विश्वासघात पर सिंधिया परिवार को ग़द्दार बनाने पर तुल जाएगी और भाजपा सुभद्राकुमारी चौहान को कम्यूनिस्ट घोषित करके उस कविता और उस दौर के इतिहास को साज़िश करार दे देगी।
तमाशा चलता रहेगा। लीडर अवसर देखकर दल बदलते रहेंगे। आलाकमान समय की नज़ाक़त को देखते हुए सुखरामों को गले लगाते रहेंगे। कार्यकर्ता तो बेचारा जमूरा है। आज उसे कहा जाएगा कि हमने सिंधिया से कुट्टा कर ली है। और कार्यकर्ता फेसबुक पर उसके नाम की गारी गाने लगेगा। कल उसे कहा जाएगा कि अब हमने उससे अब्बा कर ली है और कार्यकर्ता उसके नाम की बधाई गाने लगेगा।
विधायकों को रिजॉर्ट में क़ैद करके ईद के बकरों की तरह ख़रीदने की परंपरा पुष्ट हो रही है और कार्यकर्ता चुनाव के दिन लाइन में लगकर वोट देने की अपील करते रहेंगे। आदर्श नागरिक लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए व्हील चेयर तक पर लदकर वोट डालने जाएगा और समझदार लीडर उसके वोट को हथियार बनाकर लोकतंत्र की टांगें काट डालेगा।
न्यायालय अपील होने तक प्रतीक्षा करेगा और राजनीति क़ानूनी ख़ामियों का लाभ उठाकर न्याय को फाँसी पर लटकाते रहेंगे। कार्यपालिका नपुंसक ख़सम की तरह ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के सिद्धांत पर जिस रात की जो दुल्हन होगी, उसी के तलवे चाटती रहेगी। और मीडिया इस पूरे दंगल में अपनी हाट बिछाकर टीआरपी बटोरती रहेगी।
जनता चुपचाप देखेगी। क्योंकि जनता ने कसम खाई है -
हम, भारत के लोग...!

✍️ चिराग़ जैन

Monday, March 9, 2020

नेपाल यात्रा

6 मार्च। आज एवरेस्ट को क़रीब से देखा। बादलों के बीच घिरा श्वेत हिमालय, उस पर सोने सी पिघलती सूरज की रौशनी, नीले चोगे में लिपटे आकाश पर सफेद बादलों की बूंदी का प्रिंट। साथ में अपने भौगौलिक ज्ञान से परिपूर्ण महेंद्र अजनबी जी, जीवन के प्रति बेहद दार्शनिक सकारात्मक दृष्टिकोण से युक्त आशकरण अटल जी और प्रकृति के प्रत्येक बिम्ब में गीत की मूल पीड़ा तलाश लेने वाली डॉ सीता सागर। छोटे से देश नेपाल में जीवन की सबसे अनुभवसिक्त यात्रा भोग रहा हूँ। कवि-सम्मेलनों का धन्यवाद!

9 मार्च। नेपाल के तीन शहरों में हिंदी कविता का महोत्सव हुआ। एकल विद्यालय के संपर्क अभियान के उपलक्ष्य में आयोजित इन कवि-सम्मेलनों के आयोजन में जिन लोगों को कार्यकर्ता बनकर व्यवस्था करते देखा उनमें एस्सल समूह के उपाध्यक्ष श्री लक्ष्मीनारायण गोयल, जिंदल इंडस्ट्रीज़ के चेयरमेन श्री सुरेन्द्र कुमार जिंदल, श्री बिट्ठल माहेश्वरी, श्री महावीर घिराइया, श्री अशोक बैद, श्री गणेश खेतान, श्री अशोक सर्राफ, श्री विनोद पोद्दार, श्री शिव गोयल और श्री ओमप्रकाश लोहिया जैसे लक्ष्मीपुत्र सम्मिलित थे। जो लोग गलीचों से नीचे क़दम नहीं रखते उन्हें बीरगंज के जीतपुर गाँव की कीचड़ भरी गलियों में नंगे पाँव चलते देखा। जिनसे मिलने के लिए लोगों को अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है उन्हें गाँव की कच्ची मढ़ैया में बैठकर लोगों से बिनती करते देखा कि वे अपने बच्चों को पढ़ने दें। जिनके पास करोड़ों के बिज़निस प्रोपोज़ल लिए लोगों की लाइन लगी रहती है उनको भरे सभागार में हैंड्स माइक लेकर लोगों से डोनेशन मांगते देखा।
‘जो विद्यालय नहीं जा सकते, उनके पास विद्यालय को ले जाना होगा’ -इस पुनीत उद्देश्य से कार्यरत एकल विद्यालय के इन कार्यक्रमों में पहली बार देखा कि भामाशाह स्वयं महाराणा प्रताप की तलाश में दर-दर भटक रहा है।
क्रमशः काठमांडू, बिराटनगर और बीरगंज में हज़ारों लोग इन कार्यक्रमों में सम्मिलित हुए। कविता के रस भी छलके, ठहाकों का महोत्सव भी हुआ और एकल विद्यालय के पुनीत कार्य के लिए हजारों लोगों को एकसूत्र में बंधते भी देखा।

✍️ चिराग़ जैन

Monday, March 2, 2020

सोशल मीडिया से दुःखी

पीएम ने कहा है कि वे सोशल मीडिया से दुःखी हो गए हैं। और यह बात भी उन्होंने सोशल मीडिया से ही बताई.

✍️ चिराग़ जैन

इंसानियत के क़त्ल की अफ़वाह उड़ा दो

कुर्सी के लिए क़ौम की परवाह उड़ा दो
नारों की आंधियों में हर इक आह उड़ा दो
लफ़्ज़ों की आग से भी न गर मुल्क जले तो
इंसानियत के क़त्ल की अफ़वाह उड़ा दो


✍️ चिराग़ जैन

Saturday, February 29, 2020

फन्नी ढाबा कवि सम्मेलन

डॉ अनुज त्यागी पेशे से प्राध्यापक हैं किंतु सत्संगति के साथ ही कुसंग भी प्रभावित करता है, सो आगरे के कवियों के साथ रहकर कवि सम्मेलनों का शौक़ पड़ गया और रमेश मुस्कान के साथ रहकर पूरी कविता का कंटेंट वन-लाइनर में निपटा देने की लत लग गई। इस लत ने ‘फन्नी ढाबा’ खुलवा दिया और निरंतर व्यंग्य पकने लगे। ‘फन्नी ढाबा’ प्रसिद्ध होता गया और डॉ अनुज त्यागी के कटाक्ष तीखे होते गए। ‘फन्नी ढाबा’ की इसी लोकप्रियता से प्रभावित होकर डॉ अनुज त्यागी ने होली के अवसर पर ‘फन्नी ढाबा कवि सम्मेलन’ करवाने का निर्णय लिया है। आगरे के काव्य प्रेमियों के लिए बहुत मेहनत करके डॉ त्यागी ने एक मंच और निर्मित कर दिया है।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी ग़लत टाइमिंग की वजह से इस ढाबे के फन्नी व्यंजनों का स्वाद चखने से चूक गए हैं। इससे वे ख़ासे निराश भी हैं। कांग्रेस के उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने फोन करके डॉ अनुज त्यागी को शुभकामनाएँ दीं और कहा कि अगर उनके भाग्य में हँसी लिखी होती तो वे कवि सम्मेलन सुनने ज़रूर आते। उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने बताया कि होली खेलने के लिए चुराई हुई टोंटियों की फिटिंग करवा रहा हूँ, अगर शाम तक प्लम्बर ने काम पूरा कर दिया तो वे ज़रूर आएंगे। दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल जी ने बताया कि दिल्ली में होली पर बढ़नेवाली पानी की मांग को देखते हुए वे अपने बासठ विधायकों के साथ जमुना से मटकियाँ भर-भर कर स्टोर कर रहे हैं, ताकि जनता को फ्री पानी की कमी न पड़े। दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री मनोज तिवारी ने यह कहकर असमर्थता जताई कि वे कवियों से पंगा लेकर पहले ही बहुत दुःखी हैं। हाईकमान ने उन्हें कवियों से दूर रहने का आदेश दिया है।
सबसे दुःखी होकर डॉ अनुज त्यागी ने आगरा की जनता को आमंत्रण दिया और सभी राजनैतिक स्वार्थों से दूर रहनेवाला आम आदमी ख़ुशी-ख़ुशी आज शाम ‘फन्नी ढाबा कवि सम्मेलन’ में ठहाकों के पकवान खाने पहुँच रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

Friday, February 28, 2020

नृत्य : हर्ष का उत्कर्ष

सृष्टि के समस्त नाद की अनूदित कृति है नृत्य। सुर के अनुरूप गति, ताल के अनुरूप थाप, अर्थ के अनुरूप मुद्रा और भाव के अनुरूप भंगिमा; इन सबको एक साथ साधने का कौशल है नृत्य। नर्तक नटराज की प्रतिकृति है। शब्द से भंगिमा तक की यात्रा का सारथी नर्तक है।
देह के एक-एक अंग को अलग-अलग करके एक ही लय ताल में थिरकाना नर्तक का कौशल है। भृकुटि, नेत्र और दृष्टि... तीनों अलग-अलग होकर एक साथ नाचने लगती हैं। अधर, कपोल, ग्रीवा, कंधे, वक्ष, भुजाएँ, कलाई, हथेली, अंगुलियाँ, कटि, नितम्ब, चरण... सब नाचते हैं... विलग किन्तु एकाकार। मन बावरा होकर नाचता है। धरती एड़ी से टकराकर नूपुर में स्वर भरने लगती है।
शेष साज दूर खड़े नर्तक के स्पर्श को तरसते रहते हैं और नूपुर कलाकार के पैर पकड़कर नृत्य का अंग बन जाता है। नूपुर यह संदेश देता है कि आनन्द से एकाकार होना है, तो पैर ही पकड़ने होंगे। यदि पैर न पकड़े जाएँ तो आनन्द के दर्शन सम्भव हैं, स्पर्श नहीं। कृष्ण की बाँसुरी आनन्द उत्पन्न कर सकती है किंतु कृष्ण के नृत्य का अंग नहीं बन सकती। किन्तु मीरा के घुंघरू मीरा के साथ-साथ नाच सकते हैं। क्योंकि बाँसुरी ने अधर चुने और घुंघरुओं ने पग।
नृत्य स्वयं में एक दर्शन है। देह के विदेह होने की झाँकी है। वातावरण में घुल जाने का अनुभव है। मन के भीतर जुट आए उत्स का मूर्त रूप है। झिझक और संकोच से विरक्ति है नृत्य। सहजता का महापर्व है नृत्य। निश्छल हो जाने का उद्घोष है नृत्य। निस्पृह हो जाने की सूचना है नृत्य। आत्मा के अलंकृत और मन के झंकृत हो उठने का पल है नृत्य। हर्ष के उत्कर्ष का अनुवाद है नृत्य। यही कारण है कि जिसने उसे पा लिया, वह नाचने लगा। नाचने के लिए कुछ पा लेने की ख़ुशी; न्यूनतम अर्हता है। मीरा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। राधा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। सूर, कबीर, रैदास, तुलसी... सब नाचते हुए लोग हैं। यहाँ तक कि लंगड़ा मनसुखा भी नाच उठता है। नाचने के लिए देह चाहिए ही नहीं। नृत्य तो मन में घटित होता है, देह तक तो केवल कम्पन पहुँचता है। जैसे धरती के गर्भ में हुई हलचल का कम्पन भर भूकम्प बन जाता है, किन्तु भूकम्प हलचल का कारण नहीं है। कारण तो अदृश्य है। बहुत गहरे, मन की भीतरी परतों में।
यही कारण है कि जब कोई प्रेम में होता है तो मन की इस हलचल का असर चेहरे पर दिखाई देने लगता है। फिर स्वयं प्रेमी भी किसी तरह इस असर को रोक नहीं सकता। हलचल हुई है तो भूकम्प का आना तय है। मन नाच उठा है तो देह का थिरकना अवश्यम्भावी है। इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है।
बरसात होती है तो वृक्ष नाचने लगते हैं। बादल घिरते हैं तो पवन की थिरकन दिखाई देती है। समुद्र लहर-लहर नाचता है, झीलें, नदियाँ... सब नृत्यमय हैं। मरुस्थल भी नाचता है। पर्वत जड़ होकर भी वादियों में नृत्य करता प्रतीत होता है। झरने गाते हुए नाचते हैं। इन सबका नाचना ही प्रकृति के स्वास्थ्य का द्योतक है। रुग्ण व्यक्ति नाच नहीं सकता।
नाचने के लिए स्वस्थ होना ही पड़ेगा और स्वस्थ बने रहने के लिए नाचना ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, February 25, 2020

सद्भाव की ख़ुशबू

भारत का भविष्य न तो उन अराजकों से प्रश्न पूछेगा, जो बंदूकें लहराते हुए 'हीरो' बनने का सपना पाल रहे हैं; न ही उन छुटभैये लीडरों से सवाल करने जाएगा, जो दंगे भड़काकर राष्ट्रीय टेलिविज़न की सुर्ख़ियों में दर्ज होने का ख़्वाब देख रहे हैं। आने वाली पीढ़ियों के सामने यदि सामाजिक विद्वेष की कहानी का कोई भी पन्ना फड़फड़ाया तो वह काग़ज़ का एक टुकड़ा उस महान संस्कृति के लिए कठघरा बन जाएगा, जो स्वयं के विश्वगुरु होने का दम भरती है। जो लोग इन दंगों में मारे गए हैं, उनके वंशजों को जब भारतीय संस्कृति की महानता की कहानी पढ़ाई जाएगी तब उनकी आँखों में घृणा मिश्रित आश्चर्य दहक उठेगा। फिर उसी घृणा को आधार बनाकर तब के राजनैतिक मनसूबे साधे जाएंगे। 
जब कोई हमें वर्तमान की स्थितियों पर उकसाने में सफल नहीं हो पाता तब वह इतिहास का ही कोई पन्ना फाड़कर हवाओं में उस पर दर्ज नफ़रतों का धुआँ घोलने लगता है। जातीय विद्वेष की वर्तमान स्थिति इस अभ्यास का प्रमाण है। पीढ़ियों पहले किसी वर्ग विशेष द्वारा किसी व्यक्ति विशेष पर किया गया अन्याय आज जातीय घृणा की प्राणवायु बन गया है। 
शम्बूक के वंशजों को यह बताया जाता है कि देखो तुम्हारे पुरखे के साथ कितना अन्याय किया गया। और राम के वंशजों को यह बताया जाता है कि तुम्हारे पुरखों ने शबरी और निषाद को गले लगाया फिर भी इन लोगों को संतोष नहीं मिलता। ये पन्ने लहराने वाले उनसे ज़्यादा ख़तरनाक़ हैं, जो सड़क पर बंदूक लहरा रहे हैं। इसीलिए भविष्य बंदूकों से नहीं, पन्नों से पृष्ठ पूछेगा। जिन्होंने बंदूक उठा ली, जिन्होंने पत्थर फेंके, जिन्होंने आग लगाई और जिन्होंने लूटपाट की वे सब आज नहीं तो कल पकड़े जाएंगे, आज नहीं तो कल मर जाएंगे। 
उनके प्रति किसी के मन में कोई दया भी नहीं होगी। उनके पक्ष में भी कोई खड़ा न होगा। लेकिन जिन्होंने बंदूक उठवाई, जिन्होंने घृणा से भरे लेख लिखे, जिन्होंने आग में घी डाला, जिन्होंने नफ़रत के पन्ने लहराए उन सबकी बातें कभी नहीं मरेंगी। उन सबके शब्द हमेशा वातावरण में मंडराते रहेंगे। 
भूखे से रोटी छीनना तो अपराध है लेकिन भूखे के सामने रोटी का गुणगान करना पाप है। क़ानून केवल अपराध का दंड देता है लेकिन पाप का दंड पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। जब समुंदर उफ़ान पर हो तब उसमें और पानी डालने वालों भी उतना ही ख़तरा होता है, जितना उसमें से पानी निकालने वालों को। जब कोई मुद्दा गर्म हो तब उसके पक्ष में बोलना भी उतना ही नुकसानदायी है जितना उसके विरोध में बोलना। 
कई बार मौन से स्थितियां आसान हो जाती हैं। अराजकता का उद्देश्य होता है कि वह ध्यान आकर्षण करे। यदि उस पर ध्यान दिया जाए या उस पर चर्चा की जाए तो वह प्रोत्साहित होती है। हमें सोशल मीडिया और न्यूज़ मीडिया को सकारात्मकता की ख़बरों से पाटने की ज़रूरत है। हमें अपनी हर पोस्ट से यह संदेश देना होगा कि चर्चाओं में रहना है तो बुराई का रास्ता छोड़ना होगा। मांग कोई भी हो, अगर उसको कहने का सलीका विधि-सम्मत नहीं होगा तो उसे अखबारों में नहीं छापा जाएगा। उपद्रव के समाधान हेतु सरकारी तंत्र तो सक्रिय होगा लेकिन मीडिया उसके समाचारों की पल-पल रिपोर्टिंग करके उसे प्रोत्साहित नहीं करेगा। हमारे व्हाट्सएप्प से कोई भी ऐसा समाचार प्रसारित नहीं होगा जो किसी उपद्रव का प्रचार करता हो। 
'बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा' - यह डायलॉग उनकी सोच को संचालित करता है तो हम उनका ज़िक्र करना छोड़ दें। जिसकी चर्चा करना छोड़ दो वह हमारे मस्तिष्क से बाहर हो जाता है। हमें इन नकारात्मकताओं को इतिहास से बाहर करना है तो इसके लिए पहला क़दम यही होगा कि इन्हें चर्चाओं से बाहर किया जाए। यदि इनकी चर्चा बन्द हो गई तो वे मनसूबे भी मर जाएंगे जो इन लपटों पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं, और वे कुंठाएं भी मर जाएंगी जो पीढ़ियों पहले हुई किसी घटना की टीस से वर्तमान को सड़कों पर नंगा करने में जुटी हैं।फिर भविष्य के पास इतिहास को कोई सफ़हा उड़ता हुआ पहुँचेगा तो उससे सद्भाव की ख़ुशबू आएगी, पथराव की दुर्गंध नहीं। 

✍️ चिराग़ जैन