Tuesday, August 11, 2020

मानवता को श्रद्धांजलि

ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा।
यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के किस मुकाम तक ले आए हैं हम? देर तक विचार किया, तो समझ आया कि जिस देश में धर्म अथवा जाति के आधार पर बने किसी राजनैतिक दल को संविधान में वैध नहीं माना जाता, उस देश की पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर समाज में घृणा फैलाने में सफल हो गई है।
विश्वास कीजिये, राजनीति का सिर्फ़ एक ही धर्म होता है और वह है सत्ता। इस धर्म के निर्वाह के लिए आध्यात्मिक मूल्यों से लेकर विचारधारा तक सबकी बलि चढ़ाई जा सकती है। जो आपसे आपके हिन्दू होने या मुस्लिम होने की दुहाई देकर वोट मांग रहा है, जो आपको दलित या सवर्ण होने का वास्ता देकर वोट मांग रहा है, वह किसी भी स्थिति में देश को समग्र विकास के पथ पर नहीं ले जा सकेगा।
राजनीति ने हमें विधर्मियों की घृणा से इतना लबरेज कर दिया है कि हम अपने ही धर्म के संस्कार भूल गए। ‘चाहे मय्यत हो किसी की, बढ़ के कंधा दीजिये, रंजिशें अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह’ - यह बात तो हमारी मनुष्यता की पक्षधर जान पड़ती है, इस बात ने तो कभी कहीं कोई दंगा नहीं करवाया! फिर हम इसको कैसे भूल गए?
मेघनाद की मृत्यु के उपरांत उसके शव को ससम्मान उसके परिजनों तक पहुँचानेवाले राम; अपनी पत्नी के अपहृता रावण तक कि मृत्यु को अपमानित न करने वाले राम; शत्रु की मूर्च्छा का उपचार करनेवाले सुषेण; शाप देने वाले श्रवण कुमार के माता-पिता की अंत्येष्टि करनेवाले दशरथ ....क्या कुछ भी याद नहीं रहा हमें। अभी तो राम मंदिर के शिलान्यास की ईंट भी ढंग से नहीं जमी कि हमने राम के समस्त आचरण से मुँह फेर लिया।
अनजाने शव को भी ससम्मान पंचतत्व में विलीन करनेवाले इस देश की संवेदनाएँ इतनी भौंथरी कैसे हो गईं भाई!
हमें क्यों नहीं समझ आता कि अनजाने ही जिन दलों के एजेंट बनकर हम आपस का व्यवहार कलुषित कर रहे हैं, उनके लिए हमारा धार्मिक मनोबल केवल वोट जुटाने का एक ज़रिया भर है। जिन विचारधाराओं के पीछे हम अपने अड़ोस-पड़ोस के लोगों से घृणा कर रहे हैं चुनाव का बाद सत्ता का जोड़-तोड़ के लिए उन विचारधाराओं का बलात्कार करने से पहले, हमसे एक बार पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा जाता।
मैं यहाँ उस हर दल की बात कर रहा हूँ जो ख़ुद को दक्षिणपंथी, वामपंथी, सेक्यूलर या अन्य किसी भी तमगे से नवाज़ने का ढोल पीटते हैं। यदि इनके पास सिद्धांत, नैतिकता या विचार जैसा कोई शब्द होता तो मूर्ति को फिजूलखर्च कहनेवाले आज ब्राह्मणों का वोट पाने के लिए मूर्ति बनवाने की घोषणा न कर रहे होते। यदि ये विचार के ही प्रति समर्पित होते तो वामपंथी दल राजग में कभी न रहे होते। कश्मीर में वह सरकार कभी न बनी होती जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
लेकिन इस सबके लिए राजनीति ही दोषी नहीं है। हम भी तो परशुराम की मूर्ति देखते ही उन नेताओं की पिछली करतूतें भूल जाने में माहिर हैं। हम भी तो राहुल गांधी का जनेऊ देखकर उसके धर्म पर बुलेटिनों में बहस करने लगते हैं।
हमें क्या लेना-देना, तुम्हारे धर्म से। तुम जनेऊ पहनो या न पहनो। तुम टोपी लगाओ या न लगाओ। तुमने चाय बेची या शोरूम चलाया... इस सबसे हमें क्या मतलब! हमें तो यह बताओ कि देश कैसे चलाओगे? हमें तो यह बताओ कि न्याय व्यवस्था कैसे सुधरेगी? हमें तो यह आश्वस्ति चाहिए कि हमारे वोट का दुरुपयोग तो नहीं करोगे?
किसी भी दल में सारी अच्छाइयाँ नहीं हो सकतीं। इसीलिए सभी दलों की थोड़ी-थोड़ी अच्छाई के दम पर लोकतंत्र की गाड़ी चलती रहती है। लेकिन आजकल लगभग सभी दलों में एक बुराई ज़रूर घर कर रही है कि किसी धार्मिक मुद्दे को उछाल दो तो जनता आपस में लड़कर ख़ुश रहती है। इस बुराई के लिए केवल जनता ज़िम्मेदार है। और जनता ही इस कैंसर से देश की राजनीति को मुक्त कर सकती है।
अब हम मृत्यु पर भी गाली-गलौज करने लगे हैं। कम से कम अब तो दो मिनिट का मौन रखकर इस मरती हुई मानवता को श्रद्धांजलि देने का प्रयास करें।

✍️ चिराग़ जैन

अलविदा राहत भाई!



शायरी का एक जज़्बा आज ख़ामोश हो गया है। हिंदी कवि-सम्मेलन को उर्दू मुशायरों से जो चंद तोहफ़े अता हुए, उनमें से एक आज रुख़सत हो गया। कितने ही खट्टे-मीठे वाक़यात आँखों के सामने तैर रहे हैं। मंच पर उनका जलवा सबने देखा है, लेकिन मंच के इतर जो उनका हास्यबोध था, जो उनकी बेबाक़ी थी उससे सिर्फ़ उनके सहकर्मी ही वाक़िफ़ हैं।
हमने शायरी के इस सितारे को बहुत क़रीब से देखा है। उनका अक्खड़पन, उनकी शरारतें और उनका बेलौस लहजा उनके क़िरदार पर ख़ूब फबता था। जब कभी मंच पर उन्हें महसूस होता था कि उन्हें ढंग से नहीं सुना जा रहा है तो वे अपनी अदा से डाँट-डपटकर पूरी कोशिश करते थे, लेकिन जैसे ही उन्हें यह आश्वस्ति हो जाती थी कि यहाँ कोशिश करना बेकार है, तो वे बेहद ख़ूबसूरती से अपनी पारी अचानक समाप्त करके बैठ जाते थे।
उनकी इसी आदत से अनुमान लगा रहा हूँ कि ज़िन्दगी के इस मुशायरे में उन्होंने मौत की हूटिंग को काबू करने की भरपूर कोशिश की होगी लेकिन जब तमाम कोशिशें बेकार होती दिखी होंगी, जब उनका दिल टूट गया होगा तो पूरी शानो-शौक़त के साथ मौत के गले में बाँहें डालकर चलते बने।
...मैं उनकी इस बेईमानी का कभी समर्थक नहीं रहा लेकिन इस बेईमानी की अदा इतनी ख़ूबसूरत होती थी कि मन ही मन अच्छी भी लगती थी। पर आज, मुआफ़ करना राहत भाई! ...आज ये बेईमानी अच्छी नहीं लगी।
जब अस्पताल में भरती होने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर मैसेज पोस्ट किया तो उनके तेवर उसी जिंदादिल शाइर के तेवर थे, जिसका बेलौस लहजा लोगों को आसानी से हजम नहीं होता था। उनकी शायरी कितने ही लोगों के दिल की धड़कन रही, लेकिन आज वे अपनी ही धड़कन को कोई शेर सुनाकर वापिस न ला सके।

✍️ चिराग़ जैन

Sunday, August 9, 2020

रोटी मांगे पेट

राम जी का मंदिर बनैया रे, बनैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
सरयू जी के तट पर रमैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

रामराज की फील करा दो, सब कुछ कर दो सेट
भूखे पेट भजन का करिहैं, रोटी मांगे पेट
कित्ते दिन मंझीरा बजैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

थाली और कटोरी देखें दो रोटी की राह
चूल्हा ठण्डा पड़ा सीगड़ी कब से रही कराह
बैठी-बैठी घूरे कढ़ैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

पैटरोल के दाम डराते, देस रहा है झेल
सारी पूंजी हर कर ले गया, रावण बनकर तेल
कैसे अब गड़िया चलैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

✍️ चिराग़ जैन

मेघनाद वध

लक्ष्मण के जीवित होने पर, अतिरिक्त क्रोध से भरा हुआ
रण करने निकला मेघनाद, आश्चर्य-बोध से भरा हुआ
फिर से चतुरंग सजी सेना, लंका का डंका त्रस्त हुआ
लेकिन मन ही मन इंद्रजीत, इक आशंका से ग्रस्त हुआ
मर कर जीवित होने वाला, साधारण मनुज नहीं होगा
यह काल स्वयं तो नहीं खड़ा, तपसी का धारण कर चोगा
पौरुष का वेग विलुप्त हुआ, शंका का मेघ घुमड़ आया
आगत का चिन्तन गौण हुआ, बीते का क्षोभ उमड़ आया
मेरी जय वृथा हुई कैसे, यह कहीं काल का चक्र न हो
मेरे गोचर विपरीत न हों, ग्रह दृष्टि मुझी पर वक्र न हो
मन ही मन कोलाहल उफना, भीषण वैचारिक द्वंद्व मचा
संशय से विह्वल हुए भट ने, माँ निकुम्भला यज्ञ रचा
पर क्या हित करते तंत्र-मंत्र, जिनके अंतस में पाप पला
जिसने ईश्वर से द्रोह किया, उसका क्या करती निकुम्भला
वानर दल की इक टुकड़ी ने, पूरा यज्ञस्थल ध्वस्त किया
रण में आने से पहले ही, आमूल मनोबल पस्त किया
विचलित योद्धा बाहर आया, क्रोधी था किन्तु सशंकित था
पूजन में विघ्न घटा कैसे, वह मन ही मन आतंकित था
बस तभी विभीषण को लखकर, आपे से बाहर हुआ वीर
घर के भेदी को देखा तो हो गई रौद्र अनकही पीर
ओ कुलघाती, ओ कुलद्रोही, ले तेरा कर्ज उतारूँ मैं
लक्ष्मण से पीछे निपटूंगा, आ पहले तुझको मारूं मैं
जिसने लंका को फूंक दिया, वह अंजनिपुत्र पराया था
लेकिन तूने भी घी डाला, चाचा, तू तो माँ जाया था
लंका की आज नियति जग को, तेरी नीयत बतलाती है
ये राम-लखन तो चेहरे हैं, तू कुंभकर्ण का घाती है
फिर उबला रक्त शिराओं में, आँखों तक उफन-उफन आया
भिंच गई बत्तीसी योद्धा की, यम-अस्त्र धनुष पर तन आया
प्रत्यंचा खिंच कर छूट गई, आयुध बन कर छूटा मलाल
भयभीत विभीषण तक आया, शरगति से बढ़ता हुआ काल
लेकिन लक्ष्मण के पौरुष ने, निस्तेज किया यम का प्रहार
टूटा मन चकनाचूर हुआ, हो गया व्यर्थ इक और वार
हारे मन ने सब नियम तोड़, ब्रह्मांड अस्त्र संधान किया
प्रतिशोध भाव से दिव्य अस्त्र, लक्ष्मण से सम्मुख तान दिया
धरती डोली, पाताल हिला, मेघों ने किया प्रबल गर्जन
कम्पायमान त्रैलोक्य हुआ, रण बीच आ गए चतुरानन
बोले ब्रह्मा, हे इंद्रजीत, क्या नियमों को ठुकराएगा
मन को संयत कर ले वरना वरदान शाप बन जाएगा
लेकिन उस पल क्रोधानल का उस पर था ऐसा चढ़ा ताव
कर गया मूढ़ उन्मादी हो, अनसुना विधाता का सुझाव
संधान हुआ शर का लेकिन, फिर हुआ पराजित अभिमानी
ब्रह्मास्त्र सफल कैसे होता, ब्रह्मा की बात नहीं मानी
फिर चला दिया पाशुपत अस्त्र, लग सका नहीं मद पर विराम
शिव का यह अस्त्र विलीन हुआ, कर शेषस्वरूपी को प्रणाम
फिर वैष्णव अस्त्र प्रयोग किया, भीतर का क्षोभ जमा करके
लेकिन वह भी वापस आया, लक्ष्मण की परिक्रमा करके
असहाय हो गया इंद्रजीत, इस लक्ष्मण को कैसे मारे
जिस पर निष्फल होते देखे, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर सारे
रणक्षेत्र छोड़ लंका आया, दशकंधर से सब बात कही
ये मनुज नहीं हैं, ईश्वर हैं; यह बात तात सर्वदा सही
मैं पितृधर्म के पालन में, निज प्राण हवन कर जाता हूँ
फिर उसके बाद ठहर जाना, इतना ही कहना चाहता हूँ
ठिठका रावण का अंतर्मन, पर मद का वेग भयंकर था
निज कुल का नाश बचाने का, सम्भवतः अंतिम अवसर था
यह अवसर चूक गया रावण, ठुकराकर मन का सब विषाद
ईश्वर के हाथों तर जाने, रण में जा पहुँचा मेघनाद
ईश्वर से लड़ने आया था, ईश्वर जैसा ही युद्ध किया
माया से, छल से लड़-लड़ कर, लक्ष्मण के मन को क्रुद्ध किया
वह जान गया था यह उसका अंतिम रण है, अंतिम क्षण है
उसके हाथों हत होना है, वह जिसकी रचना का कण है
जाने कितने ही जन्मों का मैंने सौभाग्य जुटाया है
जिस तक सब जाने को तरसें, वह स्वयं द्वार तक आया है
यह युद्ध जीत कर भी जीवन इतना अभिराम नहीं होता
मुठभेड़ों का परिणाम सदा, रण का परिणाम नहीं होता
लक्ष्मण ने साधा तीक्ष्ण बाण, मन में धारण कर राम नाम
वह तीर देह से मुक्त करा, ले गया वीर को पुण्यधाम
धड़ से सिर विलग हुआ क्षण में, आ गिरा धरा पर इंद्रजीत
रघुपति के चरणों में सिर था, इक वर्तमान अब था अतीत

© चिराग़ जैन

Thursday, August 6, 2020

रावण

यदि अब राम की शरण में चला गया तो
मुझे मेरे भीतर का पाप मार डालेगा
एकमात्र सधवा बचेगी मेरी पत्नी तो
शेष विधवाओं का विलाप मार डालेगा
जिनसे सुशोभित थी रावण की राजसभा
उन रिक्त आसनों का शाप मार डालेगा
मृत्यु जो करेगी वह जग को दिखाई देगा
जीवन तो मुझे चुपचाप मार डालेगा 

जिस अपराध से न मुक्त हो सकूंगा कभी
उसको मैं बीच मँझधार कैसे छोड़ दूँ
अब मेरा पाप मेरे साथ जग से विदा हो
पाप पर जीवन उधार कैसे छोड़ दूँ
वीर हूँ तो जीतकर जीत त्याग कर दूंगा
युद्ध करने का मैं विचार कैसे छोड़ दूँ
विजयी हुआ तो सिया, राम को ही सौंप दूँगा
अन्यथा मैं मेरा अधिकार कैसे छोड़ दूँ 

हारने को कुछ भी बचा नहीं है शेष अब
प्राणप्रिय पुत्र मेघनाद भी चला गया
नयनों से अधरों तलक़ हुआ भावहीन
हर्ष भी चला गया, विषाद भी चला गया
जीत भी गया तो किसको दिखाएगा विजय
हारने का हर अवसाद भी चला गया
रण में मरण का वरण करना ही होगा
रावण ये जानने के बाद भी चला गया 

तन अट्टहास करता था निज मूढ़ता पे
मन रो रहा था अपनों के तर्पण को
जिसपे गिरा था उसके कुटुम्ब का रुधिर
चूमने को चला उस भू के कण-कण को
अपनी ही हठ से प्रचण्ड क्रुद्ध हो गया था
राम से नहीं था कोई क्षोभ दशानन को
जिससे हुई थी बंधु-बांधवों की देह जीर्ण
भोगने गया था उस बाण की चुभन को 

उचक-उचक नभ में कुटुम्ब ढूंढ़ता था
सबको लगा जो अभिमान से भरा हुआ
दस-दस शीश धरती में गड़े जा रहे थे
अपने ही मन से स्वयम् उतरा हुआ
अपने ही हाथों अपना ही यश नष्ट कर
अपने ही आप को बहुत अखरा हुआ
रामजी ने हार-जीत की प्रथा निभाई बस
रावण तो रण में गया ही था मरा हुआ 

© चिराग़ जैन

Wednesday, August 5, 2020

अयोध्या

शोभ रही नगरी सरयू तट खोज रहे उपमा तुलसी
नील सरोवर में दमके जिस भाँति कली इक रातुल-सी
मानस-मानस राम बिराजत, आंगन-आंगन माँ तुलसी
या नगरी वरनैं न थके, क्या तो आदिकवि अरु क्या तुलसी

© चिराग़ जैन

Tuesday, August 4, 2020

घूरे में पड़ा अतीत: आशापुरी

भोपाल के पास एक छोटा-सा कस्बा है, आशापुरी। यहाँ उत्खनन में कुछ प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिले हैं। सड़क किनारे एक अहाते में खुले चौक में लाल पत्थर की भव्य मूर्तियाँ रखी गई हैं। पूछने पर पता चला कि खुदाई में इन्हें बरामद करने के बाद यहाँ रखा गया है। सर्दी, गर्मी, बरसात में यह बहुमूल्य धरोहर बेकद्री की शिकार है।
इन मूर्तियों का पुरातात्विक महत्व तो है ही, लेकिन इनको देखकर जो आस्था उपजती है, वह तो मूल्यातीत है। केयरटेकर टाइप के एक लड़के से पूछा कि इनकी ख़ैर-ख़बर लेने कोई आता है क्या, तो वह बेपरवाह होते हुए बोला- ‘कोई कछु ना पूछै साहब!’ उसकी बात का प्रमाण खोजते हुए इन अवशेषों की पड़ताल की तो देखा गंधर्व, तोरण, देहरी, वेदी, गणेश, महावीर, कुबेर, शिव, विष्णु, नृसिंह, नवावतर, इंद्र और न जाने कितने ही शिल्प यहाँ खुले में पड़े अपने उद्धार की राह देख रहे हैं। इनमें से कुछ खंडित हैं और कुछ समय की मार से स्वयं को बचा लाए हैं।
घूरे में पड़ी इन मूर्तियों पर पीपल और जंगली घास ने दस्तक देनी शुरू कर दी है। एक तराशे हुए विशाल पत्थर पर हरियाली बेल ऐसे इठलाकर बढ़ी है जैसे शिल्पी द्वारा पत्थर पर तराशी हुई बेल से ईश्वर अपनी बेल की प्रतियोगिता कर रहा हो। इस विलक्षण सौंदर्य को निहार ही रहा था कि अचानक ऐसा लगा जैसे ये हरी बेल इन मूर्तियों को ताना मार रही हो कि, ‘धरती मैया की गोद में रहकर तो दम घुटता था, अब यहाँ घूरे में पड़कर चैन मिल गया!’





आस्था और इतिहास पर गर्व करनेवाली संस्कृति में यह दृश्य मन को भीतर तक कचोट गया। इधर क्षोभ बढ़ रहा था, उधर कौतूहल। इसी कस्बे में आगे एक पहाड़ी जैसे इलाके की चोटी पर वह स्थान देखने को मिला जहाँ से ये मूर्तियाँ निकाली गई हैं। देखकर, समझा जा सकता है कि यहाँ कभी कितना भव्य देवालय रहा होगा! पत्थर का एक भी टुकड़ा ऐसा न मिला जिस पर किसी कलाकार ने नक्काशी से कोई आस्था न उकेरी हो।


एक गर्भगृह अभी भी लगभग गर्भगृह जैसा ही लग रहा है। उसमें शिवलिंग का स्थान अभी तक यथावत है। किन्तु उसमें से शिवलिंग निकालकर एक पुजारी ने पास के ही मंदिर में स्थापित कर लिया है। अब जब भी कोई ‘पर्यटक’ इन खंडहरों की दुर्दशा देखने आ जाता है तो पुजारी जी वह शिवलिंग दिखाने के बहाने उसे अपने नवनिर्मित मंदिर में ले आते हैं और वहीं माथा टिकवाकर उससे दक्षिणा की डिमांड करते हैं। इस दृश्य पर अपने स्थान से अलग हुआ शिवलिंग ठठाकर हँस पड़ता है कि चलो इतने बड़े मंदिर का कोई हिस्सा तो किसी का रोज़गार बन सका।
यह मुझे नहीं पता चला कि यह अमूल्य धरोहर किसी धर्मांध आततायी की कट्टरता का शिकार हुई है या फिर धरती की किसी करवट ने ईश्वर के इस भव्य मंदिर को तहस-नहस कर डाला है। लेकिन इतना मुझे ज़रूर समझ आया कि अब, जब यह अमूल्य धरोहर स्वतः ही अपनी गर्द झाड़ कर चमकना चाह रही है तब सरकारी ढर्रे की लापरवाही इन खण्डहरों को दिन-प्रतिदिन जर्जर किये जा रही है।


✍️ चिराग़ जैन

Monday, August 3, 2020

राममंदिर का शिलान्यास

पथराए हुए नयन बोले
देहरी बोली, आंगन बोले
फिर राम अयोध्या लौटे हैं
पुलकित होकर जन-जन बोले
साकेत स्वर्ग हो जाएगा, अब रामराज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

अब नहीं कहीं कोई अबला, पत्थर बनकर दिन काटेगी
अब नहीं कहीं कोई रेखा, मानव-मानव को बाँटेगी
शबरी के बेर चखें राघव, फिर ये रिवाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

जिस धाम चुनौती उपजेगी, उस धाम उपाय निकालेंगे
नल-नील, गिलहरी सब मिलकर, सागर पर सेतु बना लेंगे
अपने सीमित संसाधन से हर कामकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

अब कहीं किन्हीं सुग्रीवों के अन्तस् में क्षोभ नहीं होगा
अब युद्ध जीतने वाले को, लंका का लोभ नहीं होगा
अपनी-अपनी मर्यादा में, अब राजकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, August 1, 2020

थाने मत जइयो...

हमारे यहाँ पूरा पुलिस महक़मा दर्शनशास्त्र के इसी सिद्धांत पर कार्य करता है कि बड़ी समस्या आते ही मनुष्य को अन्य समस्याएँ छोटी लगने लगती हैं। इसीलिए आप कोई भी समस्या लेकर थाने जाइये, पुलिसवाले उसे टुच्चा सिद्ध करने के लिए तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। तब आपको पता चलता है कि जिसे आप समस्या समझ रहे थे, वह तो दरअस्ल समस्या थी ही नहीं। समस्या तो वह है, जो आपने थाने आकर मोल ली है।
थाने में आपको जीवन का असली ज्ञान मिलता है। नैतिक शिक्षा की पोथियों में छुपा जो ज्ञान सीखने से मनुष्य चूक जाता है, वह थाने में उसे चुटकियों में प्राप्त हो जाता है। जैसे, मनुष्य को अहंकार नहीं करना चाहिए। जीवन का यह दिव्य सूत्र सिखाने में बड़े-बड़े संत-फ़क़ीर विफल हो गए। लेकिन थाने पहुँचते ही पुलिसवाले जिस भाषा में आपसे बात करते हैं, आप तुरंत समझ जाते हैं कि किस बात का अहंकार करना है! जिसे बातों से समझ नहीं आता उसके लिए पुलिसकर्मियों के पास एक विशेष विशारद पाठ्यक्रम भी है। इस पाठ्यक्रम के निष्फल होने का आज तक कोई प्रमाण मनुष्य जाति के पास नहीं है।
अव्वल तो आपकी समस्या पर सुनवाई की ही नहीं जाएगी। ऐसा इसलिए नहीं, कि पुलिस महक़मा आपकी समस्या को लेकर गंभीर नहीं है, वरन इसलिए कि आपको समझाया जा सके कि जिस धन की चोरी की रपट आप लिखवाने आए हैं, वह सब मोह-माया है। इसलिए रपट लिखने की बजाय आपको गीता का उपदेश दिया जाता है- ‘क्यों व्यर्थ चिंता करते हो। किससे व्यर्थ डरते हो। तुम्हारा क्या था, जो चला गया। तुम क्या लेकर आए थे, जो चोरी हो गया?’ फिर भी आपको यह महान ज्ञान समझ में न आए, तो आपसे पूछा जाता है कि जिस पैसे की चोरी हुई है, वह तुमने कैसे कमाया था? इस देश में किसी आम आदमी के पास एक नंबर में इतना पैसा हो ही कैसे सकता है, जिसे चुराया जा सके!
इन प्रश्नों का पिटारा खुलते ही आपको कहा जाता है कि जो पैसा चोरी हुआ है, उसे ईमानदारी का पैसा सिद्ध करो। इस कार्य को करने में जितने तरीके के काग़ज़ लगते हैं, उन्हें बटोरने में आपको अपने समस्त सत्कर्म और दुष्कर्म याद आ जाते हैं। एक तरह से पुलिसवाले आपको चिंतन करने का अवसर देते हैं कि जिस धन को आप अपना समझकर रपट लिखाने आए थे, वह तो दरअस्ल जी का जंजाल था। जिसके होते हुए आपकी नींद हराम हो गई थी, और जिसके चोरी होने पर थानेवाले आपका चैन छीन ही लेंगे।
यदि आपने ज़िद्द पकड़ ली और उसको ईमानदारी का धन सिद्ध कर ही दिया, और कहीं से एप्रोच लगाकर रपट दर्ज करा ही दी तो इंवेस्टिगेटिंग अफसर आपको पूछताछ के लिए बार-बार थाने बुलाएगा ताकि आपका उस धन से मोहभंग हो जाए। धीरे-धीरे आपके मन में चोर के प्रति सम्मान की भावना पनपने लगेगी कि वह बेचारा तो बिना आपको तंग किये, बिना आपका अपमान किये आपका पैसा ले गया। आपके मन में चोर के प्रति जो कलुष उत्पन्न हुआ था, वह धुल जाएगा और आपका मन पवित्र हो जाएगा।
इस अवस्था को प्राप्त होने के बाद आप अपनी कम्प्लेंट वापस लेने का विचार करेंगे तो थाना आपको एक और ज्ञान प्रदान करेगा कि ‘बिना विचारे जो करे, सो पीछे पछताय!’ अर्थात् रपट वापसी के लिए आपको कठोर तपस्या करनी होगी। चूँकि आपने एक अनावश्यक रपट लिखवाकर रोज़नामचे का काग़ज़ और पुलिसवालों का समय नष्ट किया है, इसलिए इसका आपको हर्जाना भरना होगा। आप यह हर्जाना भरने में आनाकानी करने की सोचोगे तो पुलिसवाले दिव्य शब्दयुग्मों से आपको विभूषित करेंगे, जिनका सामान्य भाषा में तात्पर्य होगा कि हम तेरे बाप के नौकर नहीं हैं, जो जब चाहे रपट लिख लेंगे और जब चाहे उसे रद्द कर देंगे। आखि़र पुलिस को भी आगे जवाब देना होता है। 
आप अब तक ‘आगे जवाब देने’ का अर्थ समझ चुके होते हैं। सो, जनता की सेवा में रत पुलिसकर्मियों को आगे जवाब देने में कोई दिक्कत न हो, इसकी व्यवस्था करके ठुमरी स्टाइल में एक भजन गुनगुनाते हुए घर लौट आएंगे कि, थाने मत जइयो...!

✍️ चिराग़ जैन

मापदंड बदलते क्यों हैं

कोरोना से निबटने के लिए पहले जनता कर्फ़्यू और फिर लॉकडाउन की एहतियात बरती गई। अनुमान था कि 21 दिन की तालाबंदी कोरोना को पूरी तरह समाप्त कर देगी।
बहरहाल, सरकार ने यह क़दम जनता के हित में ही उठाया था। बाद में लॉकडाउन भी बढ़ता रहा, वायरस भी फैलता रहा और रोजगार सम्बन्धी समस्याएँ भी विकट से विकटतम होती गईं। ठप्प पड़े देश में केवल एक चीज़ थी, जो कभी बन्द नहीं हुई, और उस अति आवश्यक चीज़ का नाम है राजनीति।
बाद में कुछ एहतियात बरतते हुए कम स्टाफ के साथ सरकारी दफ़्तर खोले गए। सरकार से प्रेरित होकर निजी क्षेत्र के दफ़्तर भी खुल गए। व्यापारियों ने प्रदर्शन किए तो बाज़ार भी खुल गए। फिर चुपके से दफ्तरों में भी शत प्रतिशत स्टाफ की अनुमति मिल गई। नेताजी की नेतागिरी में सोशल डिस्टेंसिंग की अनदेखी होती ही रही। चीन से हुई मुठभेड़ में शहीद हुए वीर सैनिकों की अंतिम यात्रा में भी हज़ारों लोग बाक़ायदा भीड़ की तरह सड़कों पर दिखे। जगन्नाथ जी की यात्रा के समय ज़िद्द की गई तो कुछ एहतियातों के साथ यात्रा निकालने की इजाज़त मिल गई। बकरीद के समय ज़िद्द की गई तो कुछ एहतियातों के साथ ईद मनाने की भी इजाज़त मिल गई। अयोध्या में प्रसाद के लाखों पैकेट बनवाए गए हैं, मतलब लाखों लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से परस्पर सम्पर्क में आएंगे।
आजकल अक्षय कुमार एक विज्ञापन के माध्यम से बताते हैं कि सरकार ने उनके इलाज के लिए पूरा इलाज कर रखा है इसलिए कोरोना से डरकर घर मत बैठो, काम पर जाओ। उनकी बात सुनकर अखिलेन्द्र मिश्र भी मास्क लगाकर काम पर चल पड़ते हैं।
यह विज्ञापन देखकर मुझे बहुत आश्चर्य होता है। लॉकडाउन के बढ़ते जाने के दौर में जब कोई यह कहता था कि ‘सरकार इलाज की व्यवस्था दुरुस्त करे, बाक़ी देश को चलने दे’ -तो उसे ग़ैर-ज़िम्मेदार, लापरवाह, विरोधी चमचा और न जाने क्या-क्या कहकर अपमानित किया जाता था। और आज सरकार दो महंगे अभिनेताओं को पैसा देकर उसी बात का प्रचार करवा रही है।
जहाँ ज़िद्द की गई, वहाँ इजाज़त मिल गई। जहाँ प्रदर्शन हुए, वहाँ भी अनुमति मिल गई। सरकारी दफ़्तरों में सौ फीसदी उपस्थिति से कोरोना नहीं फैलेगा लेकिन शिक्षण संस्थानों में इसका पूरा ख़तरा है। नेताजी सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ाते हुए भीड़ जुटाएंगे तो कोरोना नहीं फैलेगा, लेकिन सिनेमाघर में या प्रेक्षागृह में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भी कोरोना फैल जाएगा। तन-मन को बेसुध करनेवाली शराब का धंधा जारी रहना ज़रूरी है, लेकिन मन को स्वस्थ करने वाली कलाओं का प्रदर्शन बंद रहना चाहिए।
यह सब सोच ही रहा था, कि अक्षय कुमार फिर बताने लगे कि घर मत बैठो, काम पर जाओ क्योंकि सरकार ने हमारे इलाज की पूरी व्यवस्था कर रखी है।
...यदि ज़िन्दगी क़ीमती है तो सबकी ज़िन्दगी क़ीमती होनी चाहिए। कोरोना को यह कैसे पता चलेगा कि रामलाल शोरूम खोलने जा रहा है और श्यामलाल पटरी पर माल बेचने जाएगा। वायरस कैसे जान सकेगा कि आयाराम राम मंदिर का प्रसाद बाँटने जा रहा है और गयाराम राम जी की कथा सुनाने जाएगा।
फ़िल्म जगत्, कलाकार, इवेंट मैनेजर्स, पर्यटन, होटल, दिहाड़ी मजदूर और ऐसे ही तमाम वर्ग प्रदर्शन और ज़िद्द किये बिना सरकार के निर्णय की प्रतीक्षा में विपन्न होते जा रहे हैं, उनकी भी कुछ चिंता सरकार को करनी चाहिए, क्योंकि उन्हें सरकार के निर्णयों पर ‘प्रदर्शन करने वालों से’ ज़्यादा विश्वास है। और रोटी की आवश्यकता तो सबको होती है!


✍️ चिराग़ जैन