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Thursday, October 15, 2020
साहिब!
हुई है बेअसर हर शख़्स की दुआ साहिब
सियार करते थे शब भर हुआ-हुआ साहिब
उन्हें भगाने चला आया तेंदुआ साहिब
हमारे चैन की हुंडी का हो गया सौदा
ज़रा बताओ, मुनाफ़ा किसे हुआ साहिब
ज़ुबां तो काट दी, रोटी न छीनना हमसे
सुना है पेट भी देता है बद्दुआ साहिब
ज़रा-ज़रा सा कब तलक करोगे क़त्ल हमें
दबा ही क्यों नहीं देते हो टेंटुआ साहिब
कई करोड़ निवाले हैं दाँव पर इसमें
तुम्हारे वास्ते जो है महज़ जुआ साहिब
सही बताओ, तुम्हें कुछ समझ नहीं आता?
बहाते रहते हैं क्यों लोग टेसुआ साहिब
तुमसे पहले की मसीहाई चुआती थी छतें
ये तुमने क्या किया, आँखों से कुछ चुआ साहिब
जोंक जब जिस्म से चिपकी तो ये समझ आया
इससे अच्छा था गये साल केंचुआ साहिब
✍️ चिराग़ जैन
Saturday, October 10, 2020
देवप्रयाग की वह सुबह
एक अदद मनुष्य का सवाल है
Friday, October 9, 2020
खो गई है पाती
Thursday, October 8, 2020
भोर से ठीक पहले
रेत, अंतिम बून्द भी यदि सोख ले अपनी नदी की
साफ़ मतलब है पहाड़ों की बरफ़ अब गल चुकी है
रात का अंधियार जब अपने चरम पर आ गया हो
तब समझना, सूर्य की पहली किरण अब चल चुकी है
त्यौरियों के बोझ से भौंहें भले दुखने लगी हों
होंठ की बस एक हरक़त से हवा हो जाएंगी ये
ये निराशा, ये उदासी, ये परेशानी जगत् की
एक पल की आस जगते ही कहीं खो जाएंगी ये
दिन ढले कल धैर्य ने कुछ बीज बोये थे हृदय में
सिर्फ़ दो पल और ठहरो, वह प्रतीक्षा फल चुकी है
आँख से कह दो कि अब उजियार की मत आस छोड़े
जब सुबह होगी, इसी को लालिमा का दर्श होगा
कान, जो वीरान सन्नाटा लपेटे फिर रहे हैं
चंद घड़ियों में इन्हीं को कलरवों का हर्ष होगा
बस अभी दुर्भाग्य को तुम हाथ मलते देख लेना
भाग्य की देवी कहीं पर आँख अपनी मल चुकी है
सिर उठाओ, देख लो पूरब निखरने लग गया है
होंठ फैलाओ, सवेरा सृष्टि पर छाने लगा है
खोल दो बाँहें, पवन सौरभ लुटाता आ रहा है
पंछियों का दल गगन में झूम कर गाने लगा है
श्वास में स्वर घोल कर आकण्ठ उत्सव में उतर लो
भैरवी गाओ, अंधेरी रात जग से टल चुकी है
✍️ चिराग़ जैन
Wednesday, October 7, 2020
राजनीति की फ़िल्म इंडस्ट्री
बलात्कार को ओनर किलिंग बनाने की शुरुआत
कुरेदेंगे तुम्हारे ही बदन के घाव, मत भूलो
तुम्हारी चीख़ से कुर्सी न हिल जाये मसीहा की
अरे ओ हाथरस वालो, अभी उन्नाव मत भूलो