Thursday, November 12, 2020

बात बात पर बदलें मापदण्ड

हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था।
विकास दुबे एनकाउंटर केस में भी लगभग यही तर्क दिये गये और उन बधाई संदेशों में उत्तर प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा से यह प्रतिध्वित हो रहा था कि पुलिस सरकार के निर्देश पर काम कर रही थी और सरकार में शेरदिल व्यक्ति बैठा है इसलिये अपराधी को ऑन द स्पॉट निपटाया जा सका।
किन्तु हाथरस काण्ड में पुलिस द्वारा किये गये अर्द्धरात्रि शवदाह में पुलिस की ग़लती बताकर सरकार ने कुछ पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया। सरकार ने उस परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जिसने कथित रूप से अपनी ही बेटी की हत्या करके उसका आरोप कुछ ‘बेचारे’ बेगुनाहों पर मढ़ दिया।
सलमान ख़ान को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई और चंद घण्टों की भागदौड़ में ही उस ऊँची अदालत ने उसको बरी कर दिया, जिसमें अपील दर्ज कराने में महीनों गुज़र जाते हैं। उस समय यह तर्क दिया गया कि समाजोपयोगी व्यक्ति होने के नाते सलमान ख़ान की रिहाई तर्कसंगत है।
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में उसी समाजोपयोगी व्यक्ति सलमान ख़ान के चरित्र को फ़िल्म जगत् का सबसे बड़ा माफिया, नेपोटिज़्म का पोषक और न जाने किन-किन अलंकारों से सुसज्जित किया गया।
कंगना राणावत के दफ़्तर पर बुलडोजर चला, तब बताया गया कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके निजी द्वेष निकाल रही है। अर्णब गोस्वामी को जेल हुई तो बताया गया कि राज्य सरकार ने पुलिस के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है। निचली अदालत ने अर्णब गोस्वामी की जमानत रद्द की तो पता चला कि न्यायपालिका राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है। फिर अदालती कार्रवाई की धीमी गति के नियम को तोड़कर कछुआ, खरगोश की तरह दौड़ा और ताबड़तोड़ अर्णब भैया की जमानत ऊँची अदालत से मंज़ूर हो गयी। हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति कृतज्ञता से भर गये। हमने न्याय व्यवस्था की तारीफ़ों के पुल बांध दिये।

काफ़ी कन्फ्यूज़न क्रिएट हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि-
1) वास्तव में हमारी न्याय व्यवस्था नपुंसक है या महान है?
2) यदि न्यायालय समाजोपयोगी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम है तो फिर न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी बांधने के पीछे क्या उद्देश्य है?
3) विकास दुबे के एनकाउंटर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाइयाँ क्यों मिलती हैं? फिर हाथरस में पुलिसवाले क्यों सस्पेंड होते हैं?
4) पुलिस द्वारा क़ानून की धज्जियाँ उड़ाकर एनकाउंटर करना कैसे उचित है?
5) यदि निचली अदालत राज्य सरकार के इशारे पर चल सकती है तो ऊँची अदालतें केंद्र सरकार के इशारे पर क्यों नहीं चल सकतीं?
6) हैदराबाद, कानपुर और हाथरस में पुलिस की मनमानी जस्टिफाइड है, तो मुम्बई में पुलिस की मनमानी अन्याय कैसे है?
7) यदि महाराष्ट्र की राज्य सरकार सरकारी विभागों और संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग अपने हित में कर सकती है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें और केंद्र में बैठी सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकती?
और सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा- यदि हर बार, हर घटना पर मापदंड बदल जाने हैं तो हमारे देश में लिखित संविधान की व्यवस्था क्यों है?

मैं इस देश के लोकतंत्र से इतनी सी अपेक्षा करता हूँ कि हमारे लिखित संविधान से ऊपर कोई भी न हो। यदि समाज में कोई विकृति व्याप्त हो तो हमारे चुने हुए प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर उस विकृति के समाधान हेतु लिखित संविधान में आवश्यक परिवर्तन करें और न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक का तमाम तंत्र उसी लिखित संविधान के अनुरूप आचरण करके लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखें। इसके इतर व्यवस्था को जिस भी तरीके से चलाया जायेगा उसका प्रत्यक्ष शिकार भले ही अर्णब हो, कंगना हो या रिया हो... लेकिन परोक्ष रूप से उसका हर वार लोकतंत्र की आत्मा पर ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

Friday, November 6, 2020

नकारखाने में तूती की आवाज़

हम घटना और व्यक्ति में अन्तर करना क्यों नहीं सीख पाते। हमारी मान्यता ऐसी क्यों है कि जिसकी एक ग़लती सिद्ध हो गयी है, वह अन्य सब जगह भी ग़लत ही होगा। एक ही व्यक्ति एक जगह सही और दूसरी जगह ग़लत क्यों नहीं हो सकता।
हमारा समाज लम्बे समय से इस रोग से ग्रस्त है कि जिसे हमने नायक मान लिया उसके प्रत्येक कार्य को सही मान बैठे और जिसका एक कृत्य ग़लत हुआ उसके व्यक्तित्व से घृणा कर बैठे।
इसी प्रवृत्ति का दुष्परिणाम है कि जब कोई किसी राजनैतिक निर्णय का विरोध करता है तो बाक़ी सब लोग यह कहने लगते हैं कि कल तक तो तुम अमुक का समर्थन करते थे, आज विरोध कर रहे हो। यही कारण है कि किसी घटना अथवा निर्णय का विरोध या समर्थन करनेवाले को किसी व्यक्ति का विरोधी या समर्थक घोषित कर दिया जाता है।
हाल ही में हुई अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी के संदर्भ में उठने वाली आवाज़ से अर्नब, शिवसेना, भाजपा, कांग्रेस, राष्ट्रवाद, वामपंथ या अन्य किसी संज्ञा के पक्ष-विपक्ष की प्रतिध्वनि सुनने के प्रयास में हम भारतीय लोकतंत्र की उस बीमारी को अनदेखा कर रहे हैं जो बड़ी तेज़ी से उभरकर पटल पर आना चाह रही है।
अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी इस बात का प्रमाण है कि राजनीति अपने विरोधियों को दबाने के लिए कार्यपालिका का प्रयोग करती है। वहीं सुसाइड नोट में नामज़द होने के बावजूद तीन आरोपियों पर कोई कार्रवाई न होना भी इस बात का प्रमाण है कि रसूखदार लोग राजनैतिक प्रभाव से न्याय की मशीनरी से खिलवाड़ कर सकते हैं।
इस घटना से यह एक बार फिर सिद्ध हुआ है कि पुलिस जाँच में जो अपराधी सिद्ध हुआ है, वह निर्दाेष भी हो सकता है और पुलिस जिसे निर्दाेष क़रार देती है वह अपराधी भी हो सकता है। इस घटना से न तो केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगा है, न ही केवल राजनीति की कार्यशैली का पर्दाफ़ाश हुआ है। इस घटना से उस कार्यपालिका की ईमानदारी तथा निष्ठा कठघरे में आ खड़ी हुई है, जिसके हाथों में इस लोकतंत्र ने आंतरिक सुरक्षा का दायित्व सौंपा हुआ है।
प्रश्न न तो किसी उद्धव ठाकरे का है न ही किसी संजय राउत का; मुद्दा न किसी अर्नब का है न ही किसी रिया या कंगना का। प्रश्न यह है कि इस देश में सत्ता पर क़ाबिज़ मस्तिष्कों के हाथ में कठपुतली की तरह नाचता तंत्र इस देश के लोक का कितना और कैसा कल्याण कर सकता है? प्रश्न यह है कि इस देश का कोई भी नागरिक किसी राजनैतिक गलियारे की नज़रों में खटकते ही एक पूरी क़ौम का दुश्मन कैसे बना दिया जाता है। प्रश्न यह है कि जब कोई व्यक्ति समस्त राजनैतिक दलों की समान स्वार्थवादी सोच पर सवाल उठाने की कोशिश करता है तब अचानक उसके चरित्र, उसकी राष्ट्रभक्ति, उसका व्यक्तिगत जीवन और उसकी ईमानदारी के विवाद का शोर क्यों मचने लगता है?
एक अभिनेता के रूप में शत्रुघ्न सिन्हा मेरी पसंद या नापसंद हो सकते हैं, किंतु इस आकलन से मेरी उनके राजनैतिक जीवन के प्रति राय का अनुमान क्यों किया जाता है? एक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के किसी निर्णय से मैं सहमत या विमत हो सकता हूँ किन्तु इससे उनके व्यक्तित्व के विषय में मेरी राय का आकलन क्यों किया जाता है? मैंने कभी मुनव्वर राणा की शायरी का अनुमोदन किया हो तो इसका यह अर्थ कैसे हो गया कि मुझे उनके विवादित बयानों से भी उतनी ही मुहब्बत होगी?
पुलिस की कार्यशैली से मैं असंतुष्ट हूँ तो इसका यह तात्पर्य कैसे हो गया कि मैं पुलिस रहित समाज का पक्षधर हूँ? न्याय व्यवस्था की धीमी गति और पेचीदा औपचारिकताओं के विरोध में कुछ कहने का यह अर्थ कैसे हो गया कि मुझे न्यायपालिका से रहित अराजक लोकतंत्र चाहिये?
अगर मैं अमुक से नफ़रत नहीं करता हूँ तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि मैं उससे प्यार करता हूँ। ‘हाँ’ का अभाव ‘न’ नहीं है। जीत न पाने का अर्थ हार जाना नहीं है। जीवित न होने का अर्थ मर जाना नहीं है।
हम अपने पूर्वग्रहों के कारण जजमेंटल होने के आदी हो गये हैं। समाज की इसी जल्दबाज़ी का लाभ उठाकर राजनैतिक स्वार्थ साधे जा रहे हैं। आपकी एक उक्ति को संदर्भ बनाकर आपके पूरे जीवन और चरित्र का चित्र प्रस्तुत किया जाता है। और मज़े की बात यह है कि वह उक्ति भी राजनीति के तत्कालीन स्वार्थों के अनुरूप बदलती रहती है।
जब वसुंधरा राजे मैदान में होंगी तो कांग्रेसी कार्यकर्त्ता रानी लक्ष्मीबाई की मदद न करने के ग्वालियर घराने के अपराध गिनाएंगे। जब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे तो भाजपाई उनके खानदान को जी भर-भर कोसेंगे और राष्ट्रद्रोही सिद्ध करेंगे। फिर जब ज्योतिरादित्य भाजपा में आ जाएंगे तो भाजपावालों से सिंधिया खानदान के लिए निर्मित सभी अपशब्द कांग्रेस वाले ख़रीद लेंगे।
नीतीश कुमार, मोदी जी को कम्यूनल कहकर इस हद तक घृणा प्रदर्शित करते हैं कि उनके माध्यम से सहायतार्थ मिलने वाला चंदा भी उनको स्वीकार नहीं होता। बाद में राजनैतिक समीकरण देखते हुए वे ही नीतीश कुमार उन्हीं मोदी जी का फोटो दिखाकर वोट मांगने लगते हैं। सारी ज़िन्दगी कांग्रेस की यशोगाथा गानेवाले सचिन पायलट, अशोक गहलोत के विरुद्ध गाली-गलौज करते हैं और फिर सब रास्ते बन्द होते देख उन्हीं अशोक गहलोत को बुज़ुर्ग बताकर उनकी शरण स्वीकार कर लेते हैं।
स्वार्थों के इस घिनौने खेल में समाज, धर्म, कार्यपालिका, पत्रकारिता और यहाँ तक कि मनुष्यता की भी बोली लगायी जा रही है। भारतीय समाज के हितैषी वे लोग नहीं हैं जो किसी के चाबी भरते ही खिलौने की तरह कलाबाज़ी खाने लगते हैं, बल्कि भारत का भविष्य उन लोगों की ओर निहार रहा है जो नकारखाने में तूती की आवाज़ को भी सुनने की क्षमता रखते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

Thursday, November 5, 2020

सुना है...

सुना है, कुछ वर्ष पूर्व मुम्बई में कोई परिवार, एक पत्रकार को दोषी ठहरा कर आत्मघात कर गया। मुम्बई पुलिस ने मुआमले की तफ़्तीश की और बिना किसी पर आरोप सिद्ध किये, मुआमला बन्द हो गया।
सुना है, इस बीच मुम्बई में बैठी सरकार के साथ दिल्ली में बैठी सरकार का झगड़ा हो गया। परिवार बँटा तो घर के बर्तनों से लेकर चाटुकारों तक को बाँट लिया गया।
सुना है, इस मांडवाली में उक्त पत्रकार दिल्ली वाली सरकार के हिस्से आ गया और उसने मुम्बई वाली सरकार के खि़लाफ़ ख़ूब ज़हर उगला।
सुना है, मुम्बई सरकार ने उक्त पत्रकार को उसकी औक़ात याद दिलाने के लिये आत्महत्या वाले उस मुआमले को फिर से खुलवा दिया और उस पत्रकार को गिरफ़्तार करवा लिया।
सुना है, इस देश में पुलिस जनता के लिये काम करती है।
सुना है, इस देश में पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है।
सुना है, इस देश में न्यायपालिका भी है।
सुना है, इस देश में जनता का शासन है।
सुना है, आत्महत्या करने वाले परिवार ने भी ऐसी कई बातें सुन रखी थीं।

✍️ चिराग़ जैन

Tuesday, November 3, 2020

विद्वेष और कविता

कविता मुहब्बत की ज़ुबान है। किसी भी परिस्थिति में घृणा के उद्वेग बोने का काम कविता नहीं कर सकती। कविता बलिदान का शौर्यगायन कर सकती है, किन्तु किसी को ‘किसी भी परिस्थिति में’ बलि लेने के लिए उकसा नहीं सकती।
किसी भी वाद या विचार से दूर मनुष्यता को सर्वाेपरि रखना कवि होने की प्रथम वरीयता है। राजनीति और साहित्य में मूल अंतर यही है कि राजनीति आपको मनुष्यता से दूर ले जाकर जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, विचारधारा, वाद, वर्ण, देश और नस्लों के शिकंजों में क़ैद कर लेना चाहती है, जबकि कविता आपको इन सब शिकंजों से मुक्त करके संवेदना के धरातल पर ले आने के लिए कटिबद्ध है।
हिंसा, अराजकता, बर्बरता और वैभत्स्य को हतोत्साहित करने के लिये कविता, करुणा को पोषित करती है। कविता कट्टरता की जड़ों में मट्ठा डालने के लिये रूढ़ियों का उपहास करती है। कविता भय को मिटाने के लिये खिलखिलाने की वक़ालत करती है। कविता विकारों को श्रीहीन करने के लिए श्रृंगार के गीत गाती है।
राजनीति, शक्ति के मद में अकड़ने लगे तो कविता राजनीति पर हास्य करने लगती है। समाज कट्टरता की ज़ंजीरों में जकड़ने लगे तो कविता परंपराओं को रेगमाल की तरह घिसने की पैरवी करती है।
कट्टरता की कीचड़ में पड़े समाज को सड़ांध मारते नियमों से बाहर निकालने की बजाय कीचड़ में सने लोगों के नख-शिख सौंदर्य का गान न तो शायर के लिये शोभनीय है न ही समाज के लिये।
दुर्भाग्यवश यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक धार्मिक समुदाय में घर करती जा रही है। हमारे समुदाय के व्यक्ति न ग़लत किया या सही, हम उसके साथ होंगे। हमारे धर्म के विषय में कुछ भी कहा, तो काट दिये जाओगे -कौन से धर्म में यह घृणा सिखाई गयी है भाई। क्राइस्ट की सर्वाधिक प्रसिद्ध पेंटिंग में वे ब्रेड और वाइन के साथ दिख रहे हैं। श्रीराम कंचन मृग का शिकार करने जाते हैं। नारद मुनि को बन्दर बनाकर विष्णु उन्हें स्वयंवर में भेजते हैं और उनका उपहास करते हैं। कृष्ण इन्द्र की पूजा के नियम को तोड़ने में नहीं हिचकते। कृष्ण प्रेम करते हैं। कृष्ण युद्ध में छल करते हैं। ...यदि हास-परिहास से परहेज किया गया तो ये सब पौराणिक पात्र जड़ हो जायेंगे। फिर अशोक वाटिका ध्वस्त करते हनुमान जी का दृश्य दिखाकर रामलीलाएँ ठहाके न लगा सकेंगी। जैन धर्म का प्रथमानुयोग फिर किसी अंजन को ‘आणं ताणम्....’ बोलते न देख पायेगा।
इस जड़ता से बाहर आइये साहिब। धर्म कोई भी हो, कट्टरता उसके विकास के लिये सर्वाधिक घातक सिद्ध होती है। विश्वास कीजिये हमारे धार्मिक संस्कारों की जड़ें इतनी कमज़ोर नहीं हैं कि उनको अपमानित करके कोई भी उन्हें ध्वस्त करने में सफल हो जाये। जब हज़ारों मूर्तियाँ खण्डित करके कोई औरंगज़ेब सनातन मंदिरों को नष्ट न कर सका, तो संस्कारों की जड़ें तो मंदिरों की बुनियाद से कहीं अधिक गहरी होती हैं।
इस्लाम हो या वैष्णव धर्म; किसी भी ओट में मनुष्यता को भुला देना स्वीकार नहीं किया जा सकता। और हाँ, जब भी कोई शख़्स, धर्म की आड़ लेकर विद्वेष फैलाने की बात करने लगे तो समझ जाइये कि न तो वह धार्मिक है, न कवि है.... वह कोरी सियासत कर रहा है।

© चिराग़ जैन

Monday, November 2, 2020

आज्ञाकारी कोविड

भारत देश ही ऐसा है कि जो भी यहाँ आता है, जल्दी ही यहाँ के रंग-ढंग सीख जाता है। कोविड कि साथ भी यही हुआ। हमने उसे भारत में रहने के नियम-क़ायदे सिखाने में देर नहीं लगायी। अब कोविड हर रोज़ सुबह उठकर अख़बार पढ़ता है और सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार अपनी दिन भर की प्लानिंग करता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान है।
रुकी हुई हवाई सेवाएँ प्रारम्भ करते हुए सरकार ने बताया कि मिडिल सीट ख़ाली रखनी है। हवाई अड्डे पर पहुँचने से पहले वेब चेक इन करना है। आरोग्य सेतु एप में ग्रीन स्टेटस होना आवश्यक है। हेल्थ डिक्लेरेशन वेब चेकइन के समय ही भरवा लिया गया। हवाई अड्डे पर थर्मल स्क्रीनिंग और न जाने क्या-क्या नियम बनाकर कोविड से सुरक्षा के उपाय किये गये।
बाद में पता चला कि इन सब नियमों में एयरलाइंस की कमाई की संभावनाएँ खुल गयी हैं। वेब चेक इन करते समय जहाज में कोई भी सीट निःशुल्क नहीं है। अगर आप एयरपोर्ट आकर चेक इन करेंगे तो एयरलाइंस आपसे 100 रुपये चार्ज करेगी। मतलब कोविड को समझा दिया गया है कि जो सौ रुपये ख़र्च करे, उसके नहीं चिपटना है।
जिस मिडिल सीट को ख़ाली रखना था उस पर डिस्पोजेबल सूट पहनाकर यात्री बैठाये जा रहे हैं। अगर कोई घर के कपड़े पहनकर सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन करेगा तो कोविड उसे पकड़ लेगा। लेकिन अगर किसी कोई सफेद क़फ़न टाइप का ढकोसला लपेटकर दोनों तरफ़ के लोगों से सटकर बैठे तो उससे कोविड ख़ुद डिस्टेंस रखेगा। जिस आरोग्य सेतु एप्लिकेशन के न होने पर प्रारम्भ में लोगों को हवाई अड्डे में घुसने नहीं दिया जा रहा था, उसको अब कोई चैक तक नहीं कर रहा है।
उधर कोविड को यह भी समझ आ गया है कि इस मुल्क में राजनैतिक गतिविधियों से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं है। इसीलिए श्मशान में जलती चिताओं के पास खड़े शोकाकुल परिजनों की गिनती की गयी, बारात में बारातियों की गिनती की गयी, बाज़ार में समान बेचते दुकानदारों के चालान काटे गये लेकिन किसी राजनैतिक पार्टी के सदस्यता अभियान में हज़ारों लोगों की उपस्थिति से कोई समस्या खड़ी नहीं हुई क्योंकि वहाँ कोविड के घुसने पर मनाही थी।
बिहार में चुनावी रैलियों में भीड़ आती है तो राजनेता इतराते हुए उसकी फोटो ट्वीट करके अपनी लोकप्रियता का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि कोविड को पहले ही समझा दिया गया है कि ‘देखो भाई, तुम्हारा वोटर कार्ड नहीं बना है इसलिए रैली के आसपास भी मत दिखना।’
कोविड समझता है कि सरकारी कामकाज में अड़ंगा लगाया तो उसको जेल में बन्द कर दिया जाएगा। इसलिए कोविड सरकारी नियमों का पालन करता है। सरकार ने सिनेमाघरों में एक सीट छोड़कर बैठने की इजाज़त दी है तो कोविड को समझ आ गया है कि उसके लिये सिनेमाघरों में स्थान छोड़ दिया गया है, अब वह उस छोड़ी हुई सीट के दोनों ओर बैठे लोगों को तंग नहीं करेगा।
कोविड जानता है कि जलती हुई चिता के आसपास लोग भीड़ लगाकर खड़े हो जाते हैं, उनको पकड़ना चाहिए, लेकिन रैली में लोग लोकतंत्र के लिए जान हथेली पर रखकर आते हैं। इन देशभक्तों का सम्मान करना चाहिए।
किसी से हाथ मिलाओगे तो कोविड फैल सकता है लेकिन चुनावी रैली में कोई नेता पोडियम के साथ खड़ी रोती हुई महिला को गले लगाकर चुप कराता है तो कोविड भावुक होकर दूर खड़ा रहेगा।
वह दिन दूर नहीं जब कोविड बाक़ायदा रसीद बुक लेकर सड़कों पर खड़ा होगा और आते-जाते लोगों को रोककर उन्हें कहेगा कि 100 रुपये की रसीद कटवा लो, वरना क्वारन्टीन करवा दूंगा।

✍️ चिराग़ जैन

Wednesday, October 28, 2020

लॉकडाउन की दिवाली

मार्किट ठंडा
घर-घर मंदा
जेब सभी की ख़ाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है

कोरोना की दहशत ऐसी अबकी गिफ्ट नहीं आये
इसके डिब्बे उसके घर में होकर शिफ्ट नहीं आये
ख़ूब घुमंतू सोन पापड़ी घर पर बैठी ठाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है

कोरोना ने लक्ष्मी जी को कैसा क्वारंटाइन किया
धनतेरस के धन्वंतरि ने पूरा सिस्टम जॉइन किया
आतिशबाजी के जलने से पहले जली पराली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है

एनजीटी ने पॉल्यूशन का बढ़ता ग्राफ दिखाया है
फ्यूल कॉस्ट ने महँगाई को रस्ता साफ़ दिखाया है
हेल्थ मिनिस्ट्री ने एक्टिव केसों की लिस्ट निकाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है

© चिराग़ जैन

इलेक्सन

क्या करना है कारोबार
कल और इलेक्सन होंगे
कल और इलेक्सन होंगे, घनघोर इलेक्सन होंगे
हर ओर इलेक्शन होंगे, पुरजोर इलेक्शन होंगे
सब कुछ मुफ्त मिलेगा यार
कल और इलेक्सन होंगे

एमपी वाले चावल देंगे, दिल्ली वाई-फाई
पटना जाकर फोकट में ले लेंगे यार दवाई
मेहनत के मुँह पर पोतेंगे, उंगली की सब स्याही
जब उंगली से काम चले तो काहे देह हिलाई
महंगा वोटों का बाजार
कल और इलेक्सन होंगे

हर नेता में होड़ लगी है, ख़ूब लुटाओ पैसा
राजनीति में सब जायज़ है, इसमें खटका कैसा
भैंस उसी की, जिसने अपने खूंटे बांधा भैंसा
उसने ऐसी-तैसी की थी, हमने ऐसा-तैसा
जी भर जीमो बिना डकार
कल और इलेक्सन होंगे

© चिराग़ जैन

लॉकडाउन की सिचुएशन में वरिष्ठ कवि

मैथिलीशरण गुप्त
प्राची से ज्यों दिनकर निकला
यों अग्निमिलन को दुग्ध चला
हे क्षीर न इह विधि व्यर्थ बहो
इस भाँति करो न अनर्थ अहो
मत विकल करो मेरे मन को
नर हूँ, न निराश करो मन को

अब और न अधिक सहूंगा मैं
इस क्षण तव पान करूंगा मैं
अन्यथा देवि उठ जायेगी
मुझ पर कितना चिल्लायेगी
धिक्कारेगी मम जीवन को
न रहो, न निराश करो मन को

रामधारी सिंह दिनकर
कोने-कोने में घूम-घूम
गीले कपड़े से चूम-चूम
सारा घर-आंगन स्वच्छ किया
निज कर से सब प्रत्यच्छ किया
इक मकड़ी जाला लटका था
सीलिंग पर जाकर अटका था
आँखों से ओझल था वह खर
हाथों की सीमा से ऊपर
वह एक चूक मेरे सर थी
उर्वशि की दृष्टि उसी पर थी
जब नाश मनुज पर छाता है
तब इक जाला बच जाता है
भीतर तक टीस रहा हूँ मैं
अब चटनी पीस रहा हूँ मैं

काका हाथरसी
किसी काम ना आ रही, सम्मेलन की ड्रेस
काकाजी ख़ुद लग गये, करने कपड़े प्रेस
करने कपड़े प्रेस, गन्ध महकी घर भर में
'क्या फूंका' का मंत्र गुंजा काकी के स्वर में
जब तक काकी ने कमरे के भीतर झाँका
कपड़े नहीं, इस्तरी फूंक चुके थे काका

गोपालदास नीरज
हींग भी गली न थी कि हाय छौंक जल गया
क्या हुआ जो फ्राइपेन का कलर बदल गया
सब्ज़ियाँ मचल गयीं, मटर-मटर उछल गया
ये हसीन सीन घर की लक्ष्मी को खल गया
सात सुर पिछड़ गये
छन्द सब बिगड़ गये
फिर रसोई की तरफ़
किसी के पाँव बढ़ गये
और हम डरे-डरे, श्लोक सुन खरे-खरे
गैस की मशाल का क़माल देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे

ओमप्रकाश आदित्य
काम न करूंगा कोई, हाथ न बँटाऊंगा मैं
मेरे हिस्से कोई काम डाल नहीं सकती
काव्य की अनन्य प्रतिभा से मैं दमकता हूँ
प्रतिभा ये कपड़े खंगाल नहीं सकती
भाव में पगा के शब्द काव्यभोग भोगता हूँ
लेखनी ये दाल तो उबाल नहीं सकती
घर से निकालेगी तो थाने चला जाऊंगा मैं
मुझको तू घर से निकाल नहीं सकती


किशन सरोज
लॉक डाउन के समय में चौंक कर
दाल-सी इक नायिका को छौंक कर
देख क्या पाता किसी के हाथ की मेहंदी
छौंक से झलते नयन, मलता रहा मन
धर दिए अब और बर्तन चार करने साफ
काम कर करके मेरा जलता रहा मन

जगदीश सोलंकी
जिनका सरफ एक बार धुल जाए
उनको फिर से सरफ वाले ढेर में न रखना
पूजा के जो कपड़े हैं, उनको अलग धोना
और उन्हें धो के अपने पैर में न रखना
रंग छोड़ते हैं, नए कॉटन के क्लॉथ; सुनो
उन्हें और कपड़ों के फेर में न रखना
हाथ से रगड़ कर जल्दी-जल्दी रख देना
धीरे-धीरे धो के देर-देर में न रखना

© चिराग़ जैन

Sunday, October 18, 2020

नवरात्रि और स्त्री सशक्तिकरण

नवरात्रि पर्व इस बात का प्रमाण है कि स्त्री सशक्तिकरण की अवधारणा का उद्गम सनातन जीवनशैली में ही हुआ। देवी के नवरूप की आराधना के साथ-साथ कन्या पूजन की परंपरा स्त्री की महत्ता को रेखांकित करने हेतु प्रतिष्ठित की गयी होगी। स्त्री को शक्तिस्वरूपा मानने के पीछे भी स्त्री के सशक्तिकरण की ही अवधारणा रही होगी।
किन्तु यह स्त्री, सशक्त होने के लिये उच्छृंखल होने के स्थान पर अपने स्त्रैण गुणों को पोषित करती दिखाई देती है। सशक्त होने के लिये वह पुरुष हो जाने को आतुर नहीं होती। पुरुष से समानता की हठ में वह अपनी स्त्री को बिसार देने की वक़ालत नहीं करती। ‘देेेखरेख’ और ‘रोकटोक’ दो अलग-अलग शब्द हैं। पुरुष को देखरेख की आड़ में अनावश्यक रोकटोक करने की परंपरा छोड़नी होगी और स्त्री को रोकटोक का विरोध करते समय देखरेख का विरोध करने से बचना होगा।
अनुचित के विद्रोह में हथियार तक धारण करनेवाली देवी भी आद्योपांत नारीत्व से परिपूर्ण है। सनातन परम्परा की इस अवधारणा का सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने पर आभास होता है कि स्त्री-सशक्तिकरण के समर्थन में इससे अधिक उपयुक्त कोई विचार हो ही नहीं सकता कि स्त्री के भीतर की स्त्री को बलवती किया जाये, न कि उसके भीतर की स्त्री पर किसी पुरुष के प्रति, स्पर्धा थोप दी जाये।
यह पर्व इंगित करता है कि स्त्री रहते हुए सशक्त होना ही स्त्री की वास्तविक विजय है। समाज के सम्यक संतुलन के लिये यह अतीव आवश्यक भी है कि स्त्री को भी अपने स्त्रीत्व के विकास का उतना अवसर अवश्य मिले, जितना पुरुष को उसके पौरुष के विकास का मिलता है। स्त्री को भी अनुचित के प्रतिकार की उतनी ही स्वतंत्रता मिले, जितनी किसी पुरुष को मिलती है।
शक्तिरूपेण संस्थिता देवी से यही प्रार्थना है कि होड़ में सशक्तिकरण ढूंढ़ रहे स्त्री समाज के आत्मबल के विकास का मार्ग प्रशस्त हो ताकि प्रत्येक स्त्री, स्वयं के स्त्री होने पर अभिमान कर सके। यही ‘अभिमान’, स्त्री को अबला सिद्ध करके पनपी कुरीतियों के षड्यंत्र के लिये मारकेश सिद्ध होगा।

✍️ चिराग़ जैन

Saturday, October 17, 2020

नफ़रतें

आइये, मिलकर बढ़ायें नफ़रतें
चप्पे-चप्पे पर उगायें नफ़रतें

धर्म अपना यूँ निभायें नफ़रतें
एक दिन हमको ही खायें नफ़रतें

प्यार, माफ़ी,अम्न और इंसानियत
इन सभी को काट आयें नफ़रतें

गर मुहब्बत की कोई बातें करे
तो उसे ज़िन्दा जलायें नफ़रतें

जिसने ये दुनिया बनाई प्यार से
आओ, उसको भी सिखायें नफ़रतें

✍️ चिराग़ जैन