Thursday, April 22, 2021

माइंड इट प्लीज़

जहाँ-जहाँ जो जो संपर्क सूत्र थे उन सबको प्रयोग कर चुका हूँ। अब नाशिक से लेकर इंदौर तक और देहरादून से लेकर जोधपुर तक अपने फोन में उपलब्ध प्रभावी तथा सामाजिक रूप से सक्रिय लोगों के नम्बर न जाने कितने लोगों के साथ साझा कर चुका हूँ।
मेरी इस धृष्टता से कई ज़रूरतमंदों को समय पर मदद मिल गयी है। हालाँकि कुछ लोग नाराज़ भी हुए हैं लेकिन मेरे लिए ये नाराज़गी झेलना महंगा सौदा नहीं है। यदि आप भी मेरी फोनबुक में मौजूद हैं तो तैयार रहिएगा, किसी अनजान नम्बर से आपके पास भी मदद का फोन आ सकता है; यदि इर्रिटेट हो जाएँ तो बाद में मुझे फोन करके गालियाँ दे लेना, पर इस वक़्त मुसीबत में फँसे उस व्यक्ति की सहायता कर देना।

-चिराग़ जैन

Wednesday, April 21, 2021

मदद के हाथों को घायल मत करो

कोरोना से जूझते लोगों और उनके परिवारों की मदद में जुटे सभी वालंटियर्स का आभार व्यक्त करते हुए एक विनम्र अनुरोध यह है कि हम सब अपनी-अपनी सीमित क्षमताओं में प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में किसी ज़रूरतमंद का संदेश अनदेखा रह जाए तो कृपया उस पर कटाक्ष करने की बजाय, अपने गिरेबान में झाँकने का प्रयास करें।
ये सब लोग जो अपनी सोशल प्रोफ़ाइल, अपना समय और अपने समस्त सम्पर्कों को झोंककर लोगों के लिए सहायता जुटा रहे हैं इन्हें कोई लोभ-लालच नहीं है। ये सब मनुष्यता के नाते मनुष्य के प्रति करुणाभाव लिये दिन-रात जाग रहे हैं। सम्भव है कि इनको हर जगह सफलता न मिले, लेकिन इनकी कोशिश सदैव स्तुत्य रहेगी।
कहीं संपर्क नहीं हो पा रहा तो कहीं कुछ अमानवीय लोगों द्वारा फैलाए हुए श्फेकश् सम्पर्कों के कारण भ्रामक स्थिति बन रही है। इन सब चुनौतियों से जूझते हुए ये सब पावनमना मनुष्य अपने घर-परिवार को ताक पर रखकर जी-जान से इस अभियान में जुटे हुए हैं।
आप इनके सम्बल बनिये। यदि इनकी किसी पोस्ट पर किसी ज़रूरतमंद की कोई गुहार दिखाई दे तो वहीं रिप्लाई में उसे यथासम्भव सहायता पहुँचाने की कोशिश करें। जो जहाँ परेशान है उसे उस जगह का कोई स्थानीय संपर्क सूत्र ही उपलब्ध करा दें। सम्भव है आपका यह कृत्य किसी के लिए जीवनदायी सिद्ध हो।
ये देश आपका भी उतना ही है, जितना इस अभियान में जुटे लोगों का। इसके चरमराते ढांचे को बचाने में हाथ न लगा सकें तो कृपया लात भी न मारें।
अपनी तमाम नकारात्मकता के साथ एक बार सोचें जिनको रात के दो बजे भी सहायता के लिए कोई नम्बर मिल पा रहा हो उसे कैसा लग रहा होगा। एक बार सोचें कि जिसकी टूटती उम्मीद के आखिरी छोर पर सहायता खड़ी मिल रही हो उसे कैसा लग रहा होगा।
हाँ, ये सब आप जितने अनुभवी नहीं हैं कि ग़लती होने के भय से कुछ करें ही नहीं। ये तो बेचारे सारी ग़लतियों का रिस्क लेकर भी आगे बढ़कर सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं। सैंकड़ों लोगों तक इन तीन-चार दिनों में सहायता पहुँचाने में सफल भी हुए हैं।
ये नन्हें-नन्हें हाथ तूफान से जूझकर कश्ती खेने चले हैं। इनको आशीष दो!

-चिराग़ जैन

Tuesday, April 20, 2021

कान्हा की उंगली पर गौवर्द्धन

जिनकी कविताएँ पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है, उन सब युवाओं की पिछले दो-तीन दिन की क़वायद ने बुझती हुई आँखों में नयी रौशनी भर दी है। दिन-रात लगकर ये सब अनजान लोगों की मदद के लिये सबके आगे हाथ फैला रहे हैं।
न खाने का होश है न पीने की चिंता। बस यहाँ ऑक्सीजन, वहाँ इंजेक्शन, वहाँ डोनर, वहाँ प्लाज़्मा और यहाँ तक कि किसी के घर खाना कैसे पहुँचे इसकी भी ज़िम्मेदारी उठा ली है इन मासूम कंधों ने।
इनसे कोई पूछ ही नहीं रहा कि तुम्हारी अपनी तबीयत तो ठीक है ना! जब किसी तक मदद पहुँचाने में सफल हो जाते हैं तो इनके स्टेटस में लिखे शब्द बल्लियों उछलने लगते हैं और जब कहीं निराशा हाथ लग जाती है तो निढाल हो जाते हैं।
कोई छल-कपट नहीं है इनमें। इनके ये प्रयास किसी मन्दिर की आरती और मस्जिद की अज़ान से ज़्यादा पवित्र जान पड़ते हैं। जिसकी मदद की गुहार सुनते हैं, उसका धर्म-जाति, भाषा वगैरा कुछ भी सोचे बिना बस उसके शहर का नाम पढ़ते हैं और धड़ाधड़ सम्पर्क साधने में जुट जाते हैं। ये इस देश का असली जज़्बा है। इन्हें जिसकी सहायता करनी है, मतलब करनी है। उसके लिए डीएम से लेकर सीएम तक जिसका नम्बर मिल जाए, ये धड़ल्ले से उसे फोन खटका देते हैं। ऐसा ही देश सोचा होगा हमारे पुरखों ने।
क़ीमत बहुत बड़ी चुकानी पड़ी है लेकिन इस बीमारी के कारण मेरे देश की फुलवारी ने वटवृक्षों को सहारा देना सीख लिया है। इनके हौसले को बनाए रखने में जो मदद हो सके, ज़रूर कीजिये।
इन्हें ध्यान से देखो, हर बालक में एक कन्हैया दिखाई देगा जिसने अपने गोकुल की रक्षा के लिये अपनी नन्हीं उंगली पर गौवर्द्धन उठा लिया है।
इति शिवहरे, ललित तिवारी, रुचि चतुर्वेदी, प्रिंस जैन, दीपाली जैन, पार्थ नवीन, सृष्टि सिंह, प्रियांशु गजेंद्र, भूमिका जैन, सुनील साहिल, अजय अंजाम, अवनीश त्रिपाठी, स्वयं श्रीवास्तव, सुदीप भोला, रामायण धर द्विवेदी, रश्मि शाक्या, कमलेश शर्मा, अनुज त्यागी, नंदिनी श्रीवास्तव, दीपक पारीक, नीर गोरखपुरी, विनोद पाल, दुर्गेश तिवारी, कुमार सागर, पूजा यक्ष, सरगम अग्रवाल, शालिनी सरगम, गौरव चौहान, संदीप शजर, रूपा राजपूत, भावना राठौर, पल्लवी त्रिपाठी, एकता भारती, गोपाल पाण्डे, हिमांशु भावसार और न जाने कितने सारे ऊर्जावान युवा लगातार लोगों के आँसू पोंछने के लिए अपनी नन्हीं हथेलियाँ लिए उपलब्ध हैं।
इन्हें नाम की कोई चाह नहीं है। जिस तक मदद पहुँच जाए, उसके लिए की गयी मदद की गुहार वाली पोस्ट भी ये अपनी वॉल से डिलीट कर देते हैं। कई ऐसे भी हैं जो व्हाट्सएप समूहों में लगातार जुटकर लोगों की मदद कर रहे हैं लेकिन उनका नम्बर मेरे पास दर्ज नहीं है इसलिए उनका नाम तक मैं नहीं जानता।
सचमुच, ये ऐसे मदद कर रहे हैं जैसे मदद की जानी चाहिये। ईश्वर मेरे जीवन के सारे पुण्य इन सब पर बरसा दे!

-चिराग़ जैन

Monday, April 19, 2021

मौके की नज़ाक़त

टूटने से काम नहीं चलेगा। व्यवस्था में बैठे हुए लोग तुम्हें इग्नोर करेंगे, लेकिन किसी भी स्थिति में किसी की मदद के लिये ‘प्रयास’ करने से मत चूकना। दस जगह फोन करोगे तो नौ जगह से कोई उत्तर नहीं आएगा, लेकिन दसवीं जगह भी कोशिश ज़रूर करना।
बस एक बात ध्यान रखना कि जो आपके पास मदद मांगने आया है वह आप पर विश्वास कर रहा है। आप भगवान नहीं हैं कि उसकी मदद कर ही देंगे, लेकिन आप इंसान ज़रूर बने रहना कि कोशिश में कोई कमी न रहे।
सोशल मीडिया पर अनेक विज्ञापन चल रहे हैं, कहीं ऑक्सीजन की सप्लाई के लिए सम्पर्क करने का विज्ञापन है तो कहीं रेमडेसिवर की उपलब्धता की लंबी-लंबी लिस्टें फॉरवर्ड की जा रही हैं। यदि आपके पास ऐसी कोई सूची हो तो उसे उठाकर पीड़ित के परिजनों को भेजने से पूर्व कम से कम उसकी सत्यता जाँच लें। जो जीवन मृत्यु से जूझ रहा है, उसके परिवार के किसी भी व्यक्ति का एक मिनिट बर्बाद करना कितना बड़ा अपराध है, इसका एहसास इन फेक लिस्टों को फॉरवर्ड करते समय ज़रूर रहना चाहिए।
आप सबने बड़ी मेहनत करके सोशल मीडिया की ताक़त जुटाई है। इस माध्यम का प्रयोग लोगों की जान बचाने के लिए कीजिये। कहीं भी किसी को भी मदद की ज़रूरत हो तो उसकी वास्तविकता की पुष्टि करके उसे अपनी टाइमलाइन से पोस्ट करें, न जाने कौन-सी पोस्ट किसकी जान बचा ले। इस दौर में किसी को यह एहसास भी दे दिया जाए कि वह अकेला नहीं है, तो उसकी हिम्मत बढ़ जाएगी।
सिस्टम और सरकार को कोसनेवाले लोग मेरी प्रोफ़ाइल से फिलहाल दूर रहें। मैं कोविड से त्रस्त लोगों की जानकारी पोस्ट कर रहा हूँ। यदि किसी की कोई सहायता कर सकें, या ऐसी इच्छा हो तो ही मेरी प्रोफ़ाइल पर आएँ, अन्यथा अनर्गल प्रलाप करने के लिए और बहुत प्रोफाइल्स हैं।
कृपया इस समय जीवन बचाने की क़वायद में हमारा सहयोग करें। हम सब बचे रहेंगे तो राजनीति और सिस्टम पर गाल बजाने के बहुत अवसर मिल जाएंगे।

Saturday, April 17, 2021

जीवन छीन लाने का समय

ध्वंस मुँह बाये खड़ा है
मृत्यु का पहरा कड़ा है
घाट धू-धू जल रहे हैं
हर लहर मातम जड़ा है
यह बिखरने का नहीं, हिम्मत जुटाने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है

मृत्यु का विकराल वैभव इस जगत् पर छा चुका है
आँसुओं के अर्घ्य से कब काल का ताण्डव रुका है
अब हमें अड़ना पड़ेगा
अनवरत बढ़ना पड़ेगा
श्वास पर विश्वास रखकर
यह समर लड़ना पड़ेगा
आत्मबल से भाग्य का रुख मोड़ आने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है

चाह अमृत की रखी पर, विष उलीचा है जलधि ने
सृष्टि भर के प्राण दूभर कर दिये फिर से नियति ने
काल प्रलयंकर बना है
मृत्यु हर कंकर बना है
जब हवा में विष घुला है
तब कोई शंकर बना है
फिर इसी जलधाम से अमृत जुटाने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है

अपशकुन पर ध्यान क्यों दें, हम शकुन के गीत गाएँ
इस अंधेरे से डरें क्यों, क्यों न इक दीपक जलाएँ
हर लहर का क्रोध फूटे
साथ जीवट का न छूटे
सिर्फ़ हिम्मत साथ रखना
टूटती हो नाव टूटे
यह प्रलय पर पाँव रखकर पार जाने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है

✍️ चिराग़ जैन

हिरण्यकश्यप होने का नुक़सान

स्वयं को भगवान मानने की महत्वाकांक्षा में हिरण्यकश्यप ने होलिका के वरदान का दुरुपयोग किया। चिता ने चीख-चीख कर कहा कि, ‘मूर्ख हिरण्यकश्यप, जनता पर इतना अत्याचार न कर कि तेरे ही महल के खंभे तेरे विनाश का उद्गम बन जाएँ!’
मदान्ध राजा ने चिता की बात अनसुनी कर दी। फिर एक दिन पत्थर की भी छाती फट गयी। फिर एक दिन सारे वरदान उसके विरुद्ध खड़े हो गये। फिर एक दिन नियति के नाख़ून, अत्याचारी के पाप से अधिक बड़े हो गये।

आत्मबल का अवलम्बन

जो कुछ इस समय घट रहा है, उसकी भरपाई कभी न हो सकेगी। मृत्यु ने समूची मानवजाति को दहला दिया है। मानव बस्तियों में अजीब-सा अमंगल छा गया है। सब मन ही मन अपने-अपने अपनों की गिनती करके इस संख्या के यथावत बने रहने की दुआ मांग रहे हैं।
सब ऊपर ही ऊपर यह जता रहे हैं कि हमें कुछ नहीं होगा, लेकिन सब भीतर ही भीतर यह जान रहे हैं कि किसी को भी कुछ भी हो सकता है। काल इतना क्रूर हो गया है कि किसी के लिए भी जीवन बचाने से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं रह गया है।
हमने ऐसी-ऐसी दुर्भिक्ष के विषय में पढ़ा है कि गाँव के गाँव ख़ाली हो गये थे। मसान छोटे पड़ गये थे। लोगों ने खेत-खलिहान और यहाँ तक कि आंगन में ही चिताएँ जलानी शुरू कर दी थीं। इन स्थितियों के विषय में जब पढ़ते थे तो लगता था कि अब ऐसा नहीं होगा। अब समाज बहुत विकसित हो गया है। अब हम साधन-सम्पन्न हैं। किन्तु कोरोना के इस प्रकोप ने यह सिद्ध कर दिया कि स्थिति जस की तस है।
मनुष्यता का ऐसा ह्रास शायद ही कभी हुआ हो कि लोगों की अन्तिम यात्रा तक में चार कंधे पूरे नहीं हो पा रहे। पूरे माहौल पर मसान का सन्नाटा छा रहा है। इस सूनामी से स्वयं को बचाए रखने के लिये मनोबल बनाए रखना बेहद ज़रूरी हो गया है।
मैं स्वयं को यह कह-कहकर ऊर्जा और सकारात्मकता से सींच रहा हूँ कि ‘समाज पर इतना बड़ा संकट आया है, ऐसे में बीमार पड़ने की फ़ुरसत ही कहाँ है!’ यह टोटका काम कर रहा है। यह विचार डूबते हुए मन को सम्बल प्रदान करता है। जिस किसी के विषय में थोड़ा भी पता चलता है, उसकी कुशल-क्षेम जानने की क़वायद, और जहाँ तक सम्भव हो उस तक सहायता पहुँचाने की इच्छाशक्ति मेरे तन में व्याप्त रोग को सिर उठाने की मोहलत नहीं दे रही है।
समय का यह टुकड़ा एक तूफ़ान जैसा है। इसके गुज़रने से होनेवाली तबाही को रोकना लगभग असंभव है, किंतु इसकी दिशा देखकर, इसकी चपेट में आनेवालों को अपनत्व का मानसिक अवलम्बन थमाकर नुक़सान और पीड़ा को कम तो किया ही जा सकता है।

-चिराग़ जैन

Friday, April 16, 2021

विनाशकाले


जिनकी जाँच नहीं हो पा रही 
उनको ख़ामोश कर देना।
जिनको इलाज नहीं मिल पा रहा
उनकी ज़ुबान सी देना।
जो अस्पतालों के बाहर दम तोड़ रहे हैं
उन पर पर्दा डाल लेना।
जो श्मशान में
अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं
उनसे नज़रें फेर लेना।

...लेकिन एक क़िस्सा
अपने आलीशान बैडरूम में
ठीक अपनी आँखों के सामने लिखवा लेना
कि जब चिताएँ भी
हिरण्यकश्यप की महत्वाकांक्षा का
साधन बन जाती हैं
तब
उसके अपने ही महल के खंभे
उसके विनाश का उद्भव बन जाते हैं।

© चिराग़ जैन

Monday, April 12, 2021

जनता ख़ामोश है।

पूरे देश का मज़ाक़ बनाकर रख दिया है। बेशर्मी से झूठ बोलनेवाले राजनेता, एक साथ मिलकर सब कुछ बर्बाद कर रहे हैं और देश की जनता ख़ामोश होकर तमाशा देख रही है।
प्रश्न समूची राजनीति की उस ढिठाई का है जो जनता के जीवन से खिलवाड़ करने में हिचकती नहीं है। प्रश्न जनता की उस मानसिकता का है जो किसी भी राजनैतिक निर्णय की चर्चा शुरू होने से पूर्व किसी दल या विचारधारा का चश्मा पहनना नहीं भूलते।
अरे भाई, सही हर स्थिति में सही होता है और ग़लत हर हाल में ग़लत? इतनी सी बात हम समझना नहीं चाहते। कांग्रेस के शासन में कम किसानों ने आत्महत्या की थी, भाजपा के शासन में ज़्यादा किसान मर रहे हैं। इस बात को कहकर कांग्रेसी भला कैसे इतरा सकते हैं? राजनीति ने जनता को विवेकशून्य बनाया है या फिर विवेकशून्य जनता ने राजनीति को इतना मक्कार और बेशर्म कर दिया है इस पर ढंग से विचार करना ज़रूरी हो गया है।
उन्हें पता है कि चुनाव के समय उनका कोई एक पैंतरा देखते ही तुम उनकी बदतमीज़ियों के पोथे भूल जाओगे। उन्हें पता है कि पैदल चलकर घर जाती जनता को कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने के लिए छोड़ा जा सकता है क्योंकि बिहार में चुनाव आते ही राजनीति इन सब कीड़े-मकोड़ों को वोट में तब्दील कर लेगी। उन्हें पता है कि न्यायपालिका की पेचीदा भूल-भुलैया में फँसा नागरिक कभी इतनी फ़ुरसत ही न पाएगा कि व्यवस्था के सुधार की मांग कर सके।
उन्हें पता है कि लाखों-करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा करने से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि इस देश की जनता की इतनी हिम्मत ही नहीं है जो उस पैकेज के अस्तित्व पर प्रश्न पूछ लेवे। और अगर इतने वर्ष की मेहनत के बाद भी कोई विवेकशील व्यक्ति इस जनता के बीच बचा रह गया है तो उसको धराशायी करने के लिए इसी जनता के बीच अपने-अपने लीडर पर अटूट श्रद्धा रखनेवाले लोगों की कोई कमी थोड़े ही है।
राजनीति बीस लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा करेगी और हम दो पाटों में बँट जाएंगे। राजनीति मजदूरों के लिए बसों की लिस्ट लेकर आएगी, उसमें बसों के नाम पर बसें न हों तो भी हम भाजपा-कांग्रेस करने में व्यस्त हो जाएंगे।
हमारे लिए सवाल यह है ही नहीं कि तपती दुपहरी में जानवरों की तरह घिसटने को मजबूर इंसान तक सहायता पहुँची या नहीं पहुँची, हम तो इस तमाशे में व्यस्त हैं कि इसमें कांग्रेस ने बीजेपी को धूल चटाई या बीजेपी ने कांग्रेस को। इससे आगे हमारी संवेदनात्मक सोच का इंजन चल ही नहीं पाता।
हम यह समझ ही नहीं पाते कि शिवसेना और कांग्रेस के गठबंधन में भी वही लालचमण्डी है जो अन्य किसी प्रदेश में है। लेकिन हम इससे खुश हो जाते हैं कि अमित शाह की चाल फेल हो गयी।
कोई अमित शाह को फेल करके खुश है, कोई राहुल गांधी को, कोई केजरीवाल को तो कोई मोदी या दीदी को। लोकतंत्र के आखिरी पायदान पर खड़े आदमी पर किसी का ध्यान नहीं है।
राजनीति ने सिद्ध कर दिया है कि इस देश की जनता रिमोट से चलती है। जब तक राजनीति किसानों को अन्नदाता कहती रहती है तब तक कोई खेतों में पड़ रहे जानलेवा कैमिकल्स पर सवाल नहीं कर सकता। जब राजनीति ने किसानों को आतंकवादी कहना शुरू कर दिया तो कोई टीवी चैनल उनके विरोध की आवाज़ प्रसारित नहीं कर सका।
रामदेव के आंदोलन पर रात में लाठीचार्ज करवानेवाली कांग्रेस, भाजपा को आन्दोलन से निपटने की नैतिकता सिखाती है और कुल दो लोगों की तानाशाही पर चल रही भाजपा, कांग्रेस को पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक मूल्य स्थापित करने का ज्ञान देती है।
कितनी आदर्श स्थिति है, इस देश के महान राजनेता यकायक चुनाव से ठीक पहले अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर ‘नये दल’ में चले जाते हैं। जो चुनाव से पहले आत्मा की आवाज़ न सुन पाए वो चुनाव जीतने के बाद उस आवाज़ को सुन लेते हैं। सब कुछ खुल्लमखुल्ला चल रहा है लेकिन अपना-अपना चश्मा पहने जनता इस बात पर ख़ुश है कि अमित शाह ने ममता बनर्जी की पार्टी का दिवाला निकाल दिया।
सब अपनी-अपनी कांग्रेस और अपनी-अपनी भाजपा में इतने लिसड़े हुए हैं कि देश की बर्बादी उन्हें दिखाई ही नहीं देती। जिन्हें यह बर्बादी दिख रही है, जिन्होंने अपने चश्मे हटाकर देश को देखने की कोशिश की है उन्हें उनकी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है। उनको गद्दार, राष्ट्रद्रोही, हिन्दू विरोधी और ऐसे ही तमाम अलंकरणों से सँवारने के लिए पूरी टोली सक्रिय है।
लोकतंत्र में सत्ताधारी पक्ष की निरंकुशता पर लगाम लगानेवाला विपक्ष भी इस पूरी स्थिति में बराबर का हिस्सेदार है क्योंकि जिसे इस निरंकुशता के विरुद्ध खुलकर बोलने से डर लगता है समझ लो कि उसने अपने होंठों में अपना ख़ुद का कच्चा चिट्ठा भींच रखा है।
भारत की महानता के ढोल पीटते हुए सदियाँ बीत गईं, लेकिन आज भी दिल्ली से लेकर दार्जिलिंग तक कोई कस्बा, कोई शहर, कोई गाँव, कोई मुहल्ला ऐसा न मिलेगा जहाँ इस महान देश का कोई नागरिक जानवरों से बदतर ज़िन्दगी जीने को मजबूर होगा।
विचारधाराओं के नाम पर देश को टुकड़े-टुकड़े करनेवाले इन सियासतदानों से पूछो कि प्रचण्ड बहुमत की सरकार बनाकर भी ‘अंत्योदय’ की अवधारणा अहल्या की भाँति पत्थरों में ही क्यों सुबक रही है? इतने लम्बे समय तक शासन करने के बावजूद गांधी का ‘रामराज’ कोरी कल्पना ही क्यों बनकर रह गया? न लोहिया का समाजवाद आया, न अंबेडकर का संविधान ही शत प्रतिशत लागू हो सका!
फिर क्यों चल रहा है ये ढोंग? यह प्रश्न न पूछ लिया जावे इसीलिए राजनीति आपको चुटकुलों, जुमलों और सोशल मीडिया के प्रोपेगैंडा में उलझाए रखेगी। इस उलझन से आपको स्वयं बाहर आना होगा अन्यथा ये उलझन एक दिन आपकी आगामी पीढ़ियों के लिए फाँसी बन जाएगी।

© चिराग़ जैन

Saturday, April 10, 2021

एक ज़रा-सा झोंका

एक ज़रा-सा झोंका आया
नैया ने खाये हिचकोले
जिन लहरों पर तैर रही थी
उन लहरों पर डगमग डोले
बस इतने भर से इस पल में हम पूरे मुस्तैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये

बदले-वदले भूल चुके हैं, सपने-वपने याद न आए
जैसे भी हो इन लहरों से नैया पार लगा ली जाए
जिनको हल करना है इस पल
कब वो प्रश्न बहुत गहरे हैं
इक नदिया है, इक नैया है
इक हम हैं और कुछ लहरें हैं
इस क्षण कहीं और देखा तो समझो हम नापैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये

जितनी जटिल समस्या होगी, उतना बड़ा सबक लाएगी
सुख में तो कुछ तिनके डाली पर कोयल भी रख आएगी
लेकिन जब आंधी आएगी
जब डाली से बौर झड़ेगा
तब अपने जीवन की रक्षा
पेड़ आम का स्वयं करेगा
वो क्या सोचे सावन-भादो, जिसके दूभर चैत हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये

© चिराग़ जैन